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गृह मंत्री अमित शाह ने नक्सली हिंसा पर लोक सभा में दिए गए सम्बोधन में सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश पर नक्सल विचारधारा के प्रति सहानुभूति रखने का प्रत्यक्ष आरोप लगाया।
अमित शाह ने बताया कि सरकार ने छत्तीसगढ़ में आदिवासी युवाओ का सलवा जुड़ुम सुरक्षा समूह बनाया और नक्सलियों से लड़ने के लिए उन्हें ट्रेनिंग एवं हथियार दिए गए। लेकिन जुलाई 2011 में नंदिनी सुन्दर (इसके बारे में एक इंटरनेट सर्च से पता चल जाएगा; नक्सलियों की घोर समर्थक है) एवं अन्य लोगो ने सुप्रीम कोर्ट में सलवा जुड़ुम के विरूद्ध एक केस फाइल। नंदिनी रामचंद्र गुहा, ई ए एस शर्मा जैसे लोग सलवा जुड़ुम के केस के साथ भी जुड़े थे। न्यायाधीश सुदर्शन रेड्डी ने निर्णय दिया कि नक्सलियों के विरूद्ध राज्य की लड़ाई गैरकानूनी है और इन्हे तुरंत हथियार सरेंडर करने का आर्डर दे दिया।
परिणाम यह हुआ कि सलवा जुड़ुम के हथियार वापस लिए गए, जबकि नक्सलियों के पास हथियार था। अतः, नक्सलियों ने सलवा जुड़ुम से जुड़े लोगो को चुन-चुनकर मार दिया।
इन्ही सुदर्शन रेड्डी को कांग्रेस ने विपक्ष की ओर से उपराष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाया था।
गृह मंत्री ने जोर दिया कि न्यायाधीशों को तटस्थ माना जाता है। लेकिन कोई व्यक्ति संवैधानिक कपड़े पहनकर अपनी विचारधारा को एक ऐसा आर्डर देता है जिससे लोगो की जान जाए तो मैं ऐसे निर्णय की घोर निंदा करता हूँ। उन लोगो की भी निंदा करता हूँ जिन्होंने इसे प्रत्याशी बनाया और वोट दिया।
शाह ने आगे बताया कि मनमोहन सरकार के समय सोनिया की अध्यक्षता में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् बनाई गयी थी जो एक एक्स्ट्रा-संविधानिक (अर्थात, संविधान के बाहर) संस्था थी। इस परिषद का सदस्य हर्ष मंदर था जिसके NGO 'अमन वेदिका' में शीर्ष नक्सली की पत्नी को पद दिया गया था। वह महिला उन नक्सलियों में सम्मिलित थी जिन्होंने अपहरण किया था।
फिर शबनम हाशमी, राम पुनियानी, उषा रामनाथन, एन सी सक्सेना, जीन ड्रेज़, फराह एवं विनायक सेन (नक्सलियों के घोर समर्थक) थे जो वर्ष 2010 में कोर्ट द्वारा दोषी पाए गए थे, फिर भी उनको योजना आयोग की स्वास्थ्य सम्बन्धी समिति जैसी संस्थाओ में महत्वपूर्व पदों पर रखा गया था।
जब राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् जैसी एक्स्ट्रा-संविधानिक संस्था, जो प्रधानमंत्री के भी ऊपर थी, के सदस्य नक्सलवाद के समर्थक हो तो कैसे नक्सलियों का हौंसला टूटेगा?
एक महेश राउत नामक नक्सली था जो महाराष्ट्र में जेल में था और जिसकी रिहाई के लिए जयराम रमेश ने तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था।
वर्ष 2011 में मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री ग्रामीण विकास फेलोशिप (विश्वविद्यालय में अध्यापक का एक पद) लांच की थी, तब उसमे महेश राउत फेलो (शिक्षक) बने थे। एक नक्सली को इसका लाभ दिया गया तो नक्सलवादियों के हौंसले कैसे टूटेंगे?
जब वर्ष 2010 में नक्सलों ने छत्तीसगढ़ में 76 जवानो को मार दिया था, तब JNU में उत्सव मनाया गया था और भारतीय तिरंगे को पैरो के नीचे रखकर नृत्य किया गया था।
तब उस समय के गृह मंत्री चिदंबरम ने कहा था कि "हम आपसे हथियार डालने के लिए नहीं कह सकते, क्योकि हम जानते है कि आप ऐसा नहीं करेंगे क्योकि आप हथियारबंद आजादी की लड़ाई में विश्वास करते है।"
राहुल गाँधी स्वयं नक्सलों और उनके समर्थको के साथ देंखे गए है। भारत जोड़ो यात्रा में कई नक्सल संगठनों ने भाग लिया था। वर्ष 2010 में राहुल ने ओडिसा में एक नक्सल लीडर, लाडो सिकाका, के साथ मंच साँझा किया था। वर्ष 2018 में राहुल ने हैदराबाद में गुम्माडी विट्ठल राओ उर्फ़ गद्दार, जो नक्सल विचारधारा के करीब थे, से मीटिंग की थी।
172 जवानो को मारने वाला हिडमा जब मारा गया था, तब इंडिया गेट पर नारे लगे थे कि कितना हिडमा मारोगे, हर घर से हिड़मा निकलेगा। इस घटना के वीडियो को राहुल गाँधी ने स्वयं ट्वीट किया था।
इन्होने (कांग्रेस ने) वर्ष 1970 से लेकर मार्च 2026 तक नक्सलवाद और नरसंहार का समर्थन किया है। नक्सली हिंसा में जो 20,000 लोग मारे गए है अगर उसका की एक दोषी है तो वह कांग्रेस की वामपंथी विचारधारा वाली पार्टी है।
गृह मंत्री ने निष्कर्ष निकाला कि नक्सलों के साथ रहते-रहते कांग्रेस पार्टी एवं इसके नेता स्वयं नक्सलवादी बन गए है।
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अमित सिंघल
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