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@MunnaMore1
जयस जिला प्रभारी बड़वानी।
Madhya Pradesh, India Katılım Temmuz 2019
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मध्यप्रदेश के अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु नियुक्त 5254 पेसा मोबिलाइजर्स की सेवाएं समाप्त करना आदिवासी स्वशासन व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। पंचायत राज संचालनालय के आदेश क्रमांक 8448 दिनांक 18/05/2026 के तहत आरजीएसए योजना समाप्त होने का हवाला देकर इन कर्मचारियों को सेवामुक्त किया गया है, जबकि वर्षों से यही मोबिलाइजर्स ग्राम सभाओं को सक्रिय करने, पेसा कानून और वनाधिकार अधिनियम के प्रति जागरूकता फैलाने तथा शासन और ग्रामीणों के बीच समन्वय स्थापित करने का कार्य कर रहे थे।
प्रदेश के 89 आदिवासी विकासखंडों के दूरस्थ गांवों में पेसा मोबिलाइजर्स ने ग्राम सभा बैठकों, गौण वनोपज प्रबंधन, पंचायत स्तरीय प्रशिक्षण, सर्वे और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अचानक सेवामुक्ति से हजारों परिवारों की आजीविका संकट में पड़ गई है और आदिवासी क्षेत्रों में पेसा कानून का जमीनी क्रियान्वयन भी प्रभावित होगा।
मैं मप्र सरकार से मांग करता हूं कि सेवामुक्ति आदेश तत्काल निरस्त कर पेसा मोबिलाइजर्स को बहाल करे, ताकि संविधान की पांचवीं अनुसूची की भावना और आदिवासी स्वशासन व्यवस्था मजबूत बनी रहे। @JansamparkMP @GovernorMP
@INCMP @RahulGandhi

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खंडवा जिले की पवित्र नगरी Omkareshwar के बाग नगर क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई एक बार फिर विवाद और तनाव का कारण बन गई। सिंहस्थ की तैयारियों के नाम पर प्रशासन लगातार बुलडोजर कार्रवाई कर रहा है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि विकास की कीमत आखिर कौन चुका रहा है? गरीब, आदिवासी और कमजोर तबके के लोग ही क्यों बार-बार निशाने पर आ रहे हैं?
कुछ दिन पहले जिस महिला का वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह अपने घर को बचाने के लिए जेसीबी के सामने लेट गई थी, उसी क्षेत्र में आज फिर नगर परिषद, राजस्व विभाग और पुलिस की टीम भारी बल के साथ पहुंची। कार्रवाई के दौरान विरोध हुआ, अफरा-तफरी मची और एक महिला गंभीर रूप से घायल हो गई, जिसे अस्पताल भेजना पड़ा। यह घटना बताती है कि प्रशासनिक कार्रवाई में संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण की कितनी कमी है।
सवाल केवल अतिक्रमण का नहीं है, बल्कि पुनर्वास, वैकल्पिक व्यवस्था और आदिवासी-गरीब परिवारों के अधिकारों का भी है। यदि वर्षों से बसे लोगों को हटाया जा रहा है, तो क्या उन्हें बसाने की जिम्मेदारी सरकार नहीं लेगी? विकास और धार्मिक आयोजन जरूरी हैं, लेकिन किसी गरीब की छत उजाड़कर नहीं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में बुलडोजर नहीं, संवाद और न्याय सबसे बड़ा रास्ता होना चाहिए।
@collectordhar
@JansamparkMP @RahulGandhi
@INCIndia
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देश के करोड़ों आदिवासी समाज के लोगों के अस्तित्व, आस्था, संस्कृति और पहचान के सम्मान के लिए जरूरी है अलग धर्म कोड।
जनगणना में आदिवासी समाज को मिले आदिवासी/सरना धर्म कोड...
Tribal Army@TribalArmy
2026 जनगणना में ‘सरना धर्म’ को अलग धार्मिक पहचान के रूप में मान्यता दी जाए !
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मध्यप्रदेश सरकार के विधि विभाग द्वारा सुप्रीम कोर्ट एवं हाईकोर्ट की तीनों खंडपीठों के लिए लगभग 150 पैनल वकीलों की नियुक्ति की गई, लेकिन बेहद चिंताजनक और दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि इस सूची में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्ग के वकीलों को लगभग पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया।
जब संविधान अनुसूचित जाति को 16% और अनुसूचित जनजाति को 21% प्रतिनिधित्व एवं समान अवसर की भावना देता है, तो फिर न्याय व्यवस्था से जुड़े इतने महत्वपूर्ण पदों पर इन वर्गों की भागीदारी शून्य क्यों है? क्या यही भाजपा और आरएसएस की तथाकथित “सामाजिक समरसता” है?
यदि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की खंडपीठों के लिए बनाए गए 150 वकीलों के पैनल में एससी-एसटी वर्ग के योग्य अधिवक्ताओं को स्थान नहीं मिलेगा, तो भविष्य में इन वर्गों से हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश कैसे बनेंगे?
यह केवल प्रतिनिधित्व का सवाल नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, संवैधानिक अधिकार और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का प्रश्न है। मध्यप्रदेश के आदिवासी, दलित और वंचित समाज के युवाओं को इस भेदभाव को समझना होगा और अपने हक एवं अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठानी होगी।
भारत का संविधान सबको समान अवसर देने की बात करता है। यदि व्यवस्था में आपको बराबरी का अवसर नहीं मिल रहा, तो यह सामाजिक न्याय की भावना के साथ अन्याय है। आज अगर हम चुप रहे, तो आने वाली पीढ़ियों के अधिकार भी खतरे में पड़ जाएंगे।
— डॉ. हिरालाल अलावा
विधायक, मनावर
राष्ट्रीय संरक्षक, जयस
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मध्यप्रदेश में हाई ब्लड प्रेशर अब सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि तेजी से फैलता हुआ साइलेंट किलर बन चुका है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (NFHS-5) की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश का हर चौथा व्यक्ति हाइपरटेंशन से पीड़ित है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि लगभग 40% लोगों को खुद यह पता ही नहीं कि वे इस गंभीर बीमारी की चपेट में हैं। मोबाइल और लैपटॉप का देर रात तक उपयोग, खराब नींद, तनाव और अनियमित जीवनशैली इस संकट को और बढ़ा रहे हैं।
एम्स भोपाल की स्टडी में मोटापे से ग्रस्त बच्चों में भी हाई बीपी के मामले सामने आए हैं, जो बेहद चिंताजनक संकेत है। विशेषज्ञों के अनुसार हाई बीपी हार्ट अटैक, स्ट्रोक, किडनी फेलियर, लकवा और डायबिटीज जैसी 15 गंभीर बीमारियों की वजह बन सकता है।
सरकार को गांव-गांव नियमित स्वास्थ्य जांच अभियान चलाना चाहिए और युवाओं में डिजिटल डिटॉक्स व स्वस्थ जीवनशैली के प्रति जागरूकता बढ़ानी चाहिए। क्योंकि यदि समय रहते इस साइलेंट किलर को नहीं रोका गया, तो यह आने वाले वर्षों में एक बड़ी जनस्वास्थ्य आपदा बन सकता है।
@JansamparkMP

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मध्यप्रदेश की जनता ने भारतीय जनता पार्टी को 29 में 29 सीटें सौंपकर भरोसे का ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाया था। उम्मीद थी कि लोकसभा में प्रदेश की आवाज़ गूंजेगी, लेकिन हकीकत आंकड़ों में सिमटकर रह गई।
औसतन 4 घंटे 23 मिनट की आवाज़—यानी पूरे कार्यकाल में जनता का माइक जैसे म्यूट मोड पर रहा। कुछ सांसद 100% हाजिरी लगाकर भी ‘मौन व्रत’ निभाते दिखे। गणेश सिंह 24 मिनट बोलकर सबसे आगे हैं—पर सवाल यह है कि क्या 24 मिनट में करोड़ों लोगों की समस्याएं समा सकती हैं?
दिलचस्प विडंबना देखिए—जो सांसद एक शब्द नहीं बोले, वे उपस्थिति में अव्वल हैं। और जिनसे सवाल पूछने की उम्मीद थी, वे संसद में सवालों से ज्यादा खामोशी छोड़ आए। जनता ने विकास, रोजगार, किसान, शिक्षा के मुद्दे भेजे थे—वापस आया सन्नाटा।
29 सीटों का पूर्ण बहुमत अगर 4 घंटे की आवाज़ में बदल जाए, तो यह जनादेश नहीं, जनादेश की अनदेखी है। लोकतंत्र में खामोशी भी जवाब देती है—और यह जवाब बता रहा है कि सत्ता का शोर, जनता की आवाज़ को दबा रहा है।

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मध्य प्रदेश में मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) मेंस 2025 का मामला अब प्रशासनिक अव्यवस्था और न्यायिक देरी का प्रतीक बन गया है। 2 अप्रैल 2025 से मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश के चलते परीक्षा अटकी हुई है, जबकि 21 जुलाई 2025 को कोर्ट ने खुद संकेत दिया था कि मेंस पर सीधी रोक नहीं है। इसके बावजूद 5 अगस्त, 23 सितंबर, 9 अक्टूबर, 27 फरवरी और अब 15 मई 2026—तारीखों का यह अंतहीन सिलसिला युवाओं के धैर्य की परीक्षा ले रहा है।
करीब 4000 अभ्यर्थी, जिन्होंने प्री परीक्षा पास कर ली, आज अनिश्चितता, आर्थिक दबाव और मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि इसी नियम 2015 के तहत अन्य भर्तियां जारी हैं, लेकिन मेंस 2025 ही सिस्टम का शिकार बना हुआ है।
अंत में मैं मप्र सरकार से मांग करता हूं कि—अगर युवाओं को सिर्फ तारीख पर तारीख ही देनी है, तो साफ कह दीजिए कि तैयारी नहीं, धैर्य की परीक्षा चल रही है! लेकिन यदि सच में रोजगार देना है, तो तुरंत हाईकोर्ट में प्रभावी पैरवी कर सुनवाई सुनिश्चित कराएं, मेंस परीक्षा का शेड्यूल घोषित करें और दोषी तंत्र पर जवाबदेही तय करें, ताकि युवाओं का भविष्य अंधेरे में न रहे।

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@HIRA_ALAWA सरकार आदिवासियों की आवज उठाने वाले योद्धाओ को दबाना चाहती है
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MP की बीजेपी सरकार अरबपति पूर्व मंत्रियो के सरकारी बंगलो का किराया माफ़ करने का कैबिनेट मे प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रही है लेकिन प्रदेश के गरीब किसानों का कर्जा माफ़ करने का प्रस्ताव मोहन यादव सरकार की कैबिनेट मे कब आएगा
@CMMadhyaPradesh
@JansamparkMP
@digvijaya_28
@PMOIndia
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मध्यप्रदेश में दिन-दहाड़े एक वकील की हत्या लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था पर सीधा हमला है। जो लोग समाज को न्याय दिलाने के लिए लड़ते हैं, अगर वही सुरक्षित नहीं हैं तो यह बेहद चिंताजनक स्थिति है।
हम सभी वकील साथियों के साथ खड़े हैं और @DrMohanYadav51 सरकार से मांग करते हैं कि इस निंदनीय घटना पर तुरंत संज्ञान लेकर आरोपियों की शीघ्र गिरफ्तारी और कड़ी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
@SpShivpuri न्याय और सुरक्षा हर नागरिक का अधिकार है — दोषियों को सजा मिले और कानून का सम्मान कायम रहे।#JusticeForLawyers

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