Hansraj Meena@HansrajMeena
धागा का कोई धर्म नहीं होता।
रंग का कोई धर्म नहीं होता।
कलश का कोई धर्म नहीं होता।
इन्हें बनाने वाले हाथ अक्सर उन्हीं वंचित, मेहनतकश, दलित-आदिवासी और पिछड़े समाजों के होते हैं, जिन्हें इतिहास में सबसे ज्यादा हाशिये पर रखा गया।
सदियों से हमारे समाज के कारीगर मिट्टी को आकार देते आए हैं, धागों को बुनते आए हैं, रंगों से दुनिया सजाते आए हैं।
हमने किसी से सभ्यता नहीं सीखी, बल्कि दुनिया के कई धर्मों और व्यवस्थाओं ने हमारी संस्कृति, हमारे श्रम और हमारी परंपराओं से बहुत कुछ सीखा है।
जो लोग आज प्रतीकों पर अपना एकाधिकार जताते हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि किसी भी संस्कृति की असली नींव धर्म नहीं, बल्कि मेहनतकश लोगों के हाथ होते हैं।
सम्मान धर्म का नहीं, सम्मान इंसान और उसके श्रम का होना चाहिए।