Rajesh ری ٹویٹ کیا
Rajesh
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Rajesh
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Kedarnath from 1951, not just a random glimpse into the past but reminder of what true devotion & perseverance looked like b4, when pilgrimages were untouched, pollution plastic free environments & only true devotees embarking on such long arduous journeys.
Kyang Thang རྐྱང་ཐང་@Kyangs_Thang
Kedarnath - Oct 22, 2006 Some said it was open, some said it snowed too much & was inaccessible. No social media to verify. The snows had come in early that year. We were among the last people in town before the doors would be shut for winter. The crunch of snow beneath my feet, the silence & the sounds of bell ringing in the valley truly felt like a place in god's lap back then. An old woman at Devaprayag who came to know we were heading to Kedarnath, handed over Rs. 500 to us, complete strangers, to do prayers at the temple in her name. Travel back then was difficult, but different.
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तीर्थ: विलासिता की भेंट चढ़ती आस्था - क्या हम परमात्मा को पा रहे हैं या खो रहे हैं?
कल केदारनाथ मंदिर में जो दृश्य सामने आया, वह हिमालय की सनातन शांति और महादेव की वैराग्यमयी चेतना के विरुद्ध एक मौन विद्रोह जैसा था। जब आस्था अहंकार में बदल जाती है और तीर्थ तमाशा बन जाता है, तब पावन घाटियाँ केवल अव्यवस्था नहीं-एक गहरी आध्यात्मिक वेदना में कराह उठती हैं।
१. ‘तीर्थ’ का अर्थ: तपस्या या सुविधा?
शास्त्रों में तीर्थ वह है-जो जीव को भवसागर से पार उतार दे। आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिष्ठित परंपराओं का मूल तप और वैराग्य था। प्राचीन काल में तीर्थयात्रा का अर्थ था-अहंकार का विसर्जन। हर कदम शरीर को तोड़ता था, और उसी के साथ मन को ईश्वर से जोड़ता था।
लेकिन आज? आज हम परमात्मा को नहीं, ‘अनुभव’ को खोज रहे हैं। हम पर्वत पर चढ़ते नहीं-उसे अपनी सुविधाओं के नीचे दबाते हैं। जो स्थान अपरिग्रह सिखाने के लिए था, वहाँ अब विलासिता की तलाश है। और जहाँ सुविधा प्रधान हो जाती है, वहाँ श्रद्धा का दम घुटना केवल स्वाभाविक नहीं-अनिवार्य है।
२. VIP संस्कृति: मंदिर के द्वार पर भेदभाव का पाप
महादेव-श्मशानवासी, भस्मधारी-उनके द्वार पर ‘विशेष’ होने का आग्रह, आत्मिक पतन की पराकाष्ठा है। जब धन और प्रभाव के बल पर कतारें लांघी जाती हैं, तो वह दर्शन नहीं-अहंकार की तुष्टि है। महादेव के समक्ष राजा और रंक का भेद कहाँ? फिर यह ‘VIP’ का आग्रह क्यों? यदि गर्भगृह के समीप खड़ा व्यक्ति अपनी पद-प्रतिष्ठा के कारण विशेष है, तो वह भक्त नहीं-शक्ति-प्रदर्शन का माध्यम है। मंदिरों को यह स्मरण रखना होगा: परमात्मा ‘भाव’ के भूखे हैं, प्रोटोकॉल के नहीं।
३. डिजिटल व्याधि: रील का शोर, मौन का अंत
आज की अव्यवस्था का एक बड़ा कारण-हर हाथ में कैमरा। लोग परमात्मा को देखने नहीं, बल्कि स्वयं को परमात्मा के साथ दिखाने जा रहे हैं। तीर्थ-जहाँ मौन साधना होनी चाहिए-आज ‘कंटेंट निर्माण’ का मंच बनते जा रहे हैं। जब तक आपकी दृष्टि कैमरे के लेंस में कैद है, तब तक साक्षात दर्शन संभव नहीं। यह डिजिटल शोर, उस अखंड मौन को नष्ट कर रहा है जिसमें ही शिवत्व का अनुभव संभव है।
४. प्रकृति का क्रंदन: चेतावनियों की अनदेखी
प्रकृति की आपदाएँ केवल घटनाएँ नहीं-संकेत हैं। 2013 केदारनाथ बाढ़ एक कठोर चेतावनी थी। फिर भी हमने नहीं सीखा। निर्माण बढ़ रहा है, भीड़ अनियंत्रित है और इसे ‘विकास’ कहा जा रहा है। हिमालय पत्थरों का ढेर नहीं-एक जीवंत चेतना है। उसकी सहनशीलता को उसकी स्वीकृति समझ लेना हमारी सबसे बड़ी भूल है। हम श्रद्धा के साथ प्लास्टिक, शोर और अविवेक भी वहाँ पहुँचा रहे हैं। तीर्थ को पिकनिक स्थल बना देना-प्रकृति और परमात्मा, दोनों का अपमान है।
५. एक संन्यासी की पुकार: अभी भी समय है
एक दशनामी संन्यासी के रूप में स्पष्ट दिख रहा है कि हम धर्म के बाहरी ढाँचे को सुदृढ़ कर रहे हैं, पर उसकी आत्मा को खोते जा रहे हैं। यदि आप केवल भीड़ का हिस्सा बनने जा रहे हैं, तो आप तीर्थ नहीं-धार्मिक पर्यटन कर रहे हैं। और यदि आपकी उपस्थिति किसी एक सच्चे साधक के मार्ग में बाधा बनती है, तो यह केवल असंवेदनशीलता नहीं-अधर्म है।
तीर्थ की पहली शर्त है-मन की शांति। दूसरी-अन्य के प्रति करुणा। कतार में खड़े रहना केवल प्रतीक्षा नहीं, वह धैर्य की साधना है।
निष्कर्ष: परमात्मा भीड़ में नहीं, भाव में मिलते हैं
तीर्थों की वर्तमान स्थिति एक स्पष्ट चेतावनी है। सरकार को यात्रियों की संख्या पर कठोर नियंत्रण लागू करना होगा, और समाज को अपने आचरण पर पुनर्विचार करना होगा। यदि पावन धामों का एकांत नष्ट हो गया, तो वैराग्य का वह स्वरूप भी हमारी पहुँच से दूर हो जाएगा।
अंततः-परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग पर्वतों से नहीं, अहंकार से होकर जाता है।
यदि अहंकार साथ है-तो तीर्थ केवल एक कठिन यात्रा है।
यदि भाव जागृत है-तो वही यात्रा साक्षात्कार बन जाती है।
“परमात्मा को खोजना है तो मौन में खोजिए-भीड़ के शोर और कैमरों की चकाचौंध में केवल भ्रम मिलता है।”
|| ॐ नमो नारायण ||
~ एक अतरंगी संन्यासी
#Musings

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Today is Ganga Saptami..💦
The day is associated with the famous katha of Maharishi Jahnu.
As Devi Ganga made her way to Earth, she flowed through many regions, and once, when she disturbed the meditation of Maharishi Jahnu, he became enraged and swallowed her.
The Devas then intervened, requesting Jahnu to release the river. He released Ganga from his ear due to which she got another name Jahnavi (जाह्नवी).
English
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देवभूमि उत्तराखंड की पवित्र धरती पर आज श्री केदारनाथ धाम के कपाट पूरे विधि-विधान के साथ हम सभी श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए हैं।
केदारनाथ धाम और चारधाम की यह यात्रा हमारी आस्था, एकता और समृद्ध परंपराओं का दिव्य उत्सव है। इन यात्राओं से हमें भारत की सनातन संस्कृति के दर्शन भी होते हैं।
इस वर्ष चारधाम यात्रा के आरंभ उत्सव पर, उत्तराखंड आने वाले सभी श्रद्धालुओं के लिए मैंने एक पत्र के माध्यम से अपनी भावनाएं व्यक्त की हैं।
मेरी कामना है कि बाबा केदार सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें और आपकी यात्राओं को शुभ करें।
हर-हर महादेव!

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