
🏃Lalbahadur Gupta🇮🇳
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@LBGupta7
Aries♈ महाकाल का दास ना सम्मान का मोह ना अपमान का भय! त्रिशूलधारी त्रिपुरारी त्रिलोकेश्वर अवधूत महाकाल 🍃🌙🔱🕉🏹🚩📿🧎🙌🙏🏼☺




TCS ने स्पष्ट किया कि निदा खान नासिक BPO में न तो HR मैनेजर थी और न ही किसी नेतृत्व पद पर थी. यह स्पष्टीकरण तब आया जब लगभग सभी मीडिया चैनलों ने उसे HR हेड और भर्ती पर नियंत्रण रखने वाली कथित ‘मास्टरमाइंड’ बताया था. देखिए! youtu.be/7oXoPjCL4ow



ये द्वेषभावना से भी परे की चीज है। एक लड़के ने चाय पिला दी तो Food सेफ्टी वाले छापा मार रहे रहे हैं। नेता से लड़ो भाई,गरीब आदमी ने क्या बिगाड़ा है?

अब भाजपा सरकार बताए कि पीडीए समाज के एक चायवाले को पलायन पर मजबूर करने के लिए कौन ज़िम्मेदार है? एक आम चायवाले पर अत्याचार करके लखनऊ की सरकार कहीं सांकेतिक रूप से किसी और को तो चुनौती नहीं दे रही है। आर्यन को अपने जीवन और जीवनयापन के लिए चिंता करने या डरने की ज़रूरत नहीं है, हम सब करोड़ों पीडीए लोग उसके साथ हैं, उसकी ढाल हैं। आशा है माननीय मुख्यमंत्री जी इस तुच्छता पूर्ण व्यवहार का संज्ञान लेते हुए, इस मामले से जुड़े हुए अराजक तत्वों और अधिकारियों पर तुरंत कार्रवाई करेंगे और अपने राज्य पर लगनेवाले पलायन के दाग़ से बचेंगे, नहीं तो लोग कहेंगे जो मुख्यमंत्री जी एक आम चायवाले की रक्षा अपने दल के अवांछनीय तत्वों से नहीं कर सकते हैं वो पूरा प्रदेश क्या चलाएंगे। अगर मुख्यमंत्री जी को अपने दल के उस असामाजिक तत्व का नाम नहीं पता हो तो हम बता देंगे। अगर फिर भी कुछ नहीं हुआ तो हम आर्यन के रोज़गार के लिए पुख़्ता व्यवस्था करेंगे क्योंकि हमें उसके हाथ की बनी और प्रेम से भरी चाय बहुत अच्छी लगी थी।



भाजपा की सरकार जब-जब किसी की रोज़ी-रोटी छीनेगी, हम तब-तब उसकी मदद के लिए अपनी सामर्थ्य से भी अधिक हाथ बढ़ाएंगे। हम वर्चस्ववादी भाजपा की क्रूरता का जवाब, पीडीए की एकता से देंगे और अत्याचारी भाजपा से पूछेंगे ‘5 बड़ा या 95?’ अब पीडीए साथ-साथ बढ़ेगा, पीडीए ही पीडीए की ताक़त बनेगा! #बुरे_दिन_जानेवाले_हैं







पत्थर तोड़ने वाली मेहनतकश स्त्री से संसद तक पहुँचने वाली भगवती देवी जी भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक न्याय की एक अद्वितीय और ऐतिहासिक उपलब्धि थीं। अत्यंत साधारण और वंचित पृष्ठभूमि से निकलकर उन्होंने श्रम, अभाव और सामाजिक उपेक्षा के बीच अपने जीवन का मार्ग बनाया। उनका संघर्ष इस सत्य का प्रमाण है कि लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व के दायरे का निरंतर विस्तार है - ताकि समाज की आख़िरी पायदान पर खड़ी स्त्री भी निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बन सके। 1969–1972, 1977–1980, 1995–1996 और 2000–2003 तक वे बिहार विधानसभा की विधायक रहीं, जबकि 1996 से 1998 तक लोकसभा सांसद के रूप में उन्होंने वंचितों, दलितों और गरीबों की आवाज़ को संसद तक पहुँचाया। इस पूरी यात्रा को संभव बनाने में लालू जी की सामाजिक न्याय की राजनीति का निर्णायक योगदान रहा, जिसने हाशिये के समाज को केवल मतदाता नहीं, बल्कि सत्ता का सहभागी बनाने की दिशा में ऐतिहासिक पहल की। महिला आरक्षण में भगवती देवी जी जैसी आवाज़ सुनाई देनी चाहिए, अन्यथा इसका अर्थ समान भागीदारी नहीं, बल्कि वर्चस्व को स्थापित करना होगा।













