🏅ROBIN أُعيد تغريده

एक माँ की चीत्कार
मैंने पहले ही जान लिया था…
कि आज मैं मर जाऊँगी।
हाँ,
जब मैंने उस नाव पर कदम रखा था,
उसी वक़्त जान लिया था
कि ये सफ़र मंज़िल तक नहीं जाएगा।
इसलिए…
मैंने उसे और कसकर पकड़ लिया।
तुम्हें लगता है
ये हादसा था?
नहीं।
ये तय था।
पहले से तय था
जैसे तय था कि
इस नाव में बचाने का कोई इंतज़ाम नहीं होगा।
जैसे तय था कि
लाइफ जैकेट गिनती की होंगी…
और ज़िंदगियाँ ज़्यादा।
जैसे तय था कि
जब हम डूबेंगे
तो मदद रास्ते में ही अटक जाएगी।
और जैसे तय है कि
मेरे मरने के बाद
तुम सब कुछ दिन रो लोगे…
कुछ दिन चिल्ला लोगे…
फिर चुप हो जाओगे।
देखो मुझे
मैं अब भी उसे पकड़े हूँ।
मरकर भी…
मैंने उसे छोड़ा नहीं।
क्योंकि मुझे तुम पर भरोसा नहीं था।
मुझे पता था
अगर मैंने छोड़ दिया,
तो तुम भी छोड़ दोगे।
तुम्हारे लिए
हम सिर्फ एक “न्यूज़” हैं।
दो दिन की हेडलाइन।
तीसरे दिन…
नई कहानी।
मेरा बच्चा
तुम्हारी स्क्रीन पर
बस एक तस्वीर रहेगा।
लोग लिखेंगे…
“दिल दहला देने वाली तस्वीर…”
फिर स्क्रोल कर देंगे।
मुझे पता था…
मेरे घर तक
मुआवज़ा पहुँचेगा।
काग़ज़ों में
मेरी कीमत तय होगी।
और उसी काग़ज़ के नीचे
मेरी मौत दब जाएगी।
पर सुनो
मैं मरकर भी पूछ रही हूँ…
कितनी बार मरेंगे हम?
कब तक यूँ ही मरते रहेंगे हम
कितनी बार
माँ अपने बच्चे को ऐसे ही पकड़कर
पानी में उतरेंगी…
और वापस नहीं आएँगी?
कितनी बार
तुम कहोगे
“जांच के आदेश दे दिए गए हैं”?
कितनी बार
हम कीड़े-मकोड़ों की तरह
गिने जाएँगे…
और फिर भुला दिए जाएँगे?
मेरी ये तस्वीर..
हाँ, यही…
दो दिन तक
तुम्हें विचलित करेगी।
दो दिन तक
तुम इसे शेयर करोगे,
रोओगे, गुस्सा करोगे…
और तीसरे दिन
मैं मर जाऊँगी…
दूसरी बार।
किसी की भूल से ..
किसी की गलती से
किसी की लापरवाही से
फिर कहीं . कोई और माँ
ऐसे ही अपने बच्चे को पकड़े मिलेगी।
और तुम फिर लिखोगे..
“दिल दहला देने वाली तस्वीर…”
और मैं…
फिर से मरूँगी।
बार-बार।
क्योंकि इस देश में
हम मरते नहीं
हमें भुला दिया जाता है।
और फिर…
तुम जैसे कविता लिखने वाले लोग लोग,
एक और कविता लिखेंगे।
कहेंगे
“मैं बहुत विचलित हूँ…”
“मैं सो नहीं पाया…”
“ये तस्वीर मेरे ज़ेहन से नहीं निकल रही…”
दो दिन तक
तुम सचमुच टूटे रहोगे
और तीसरे दिन
तुम सब ठीक हो जाएँगे।
सब भूल जाएँगे।
और फिर
किसी और माँ की बारी होगी।
-शांत
हिन्दी















