تغريدة مثبتة

इस पार,प्रिय किताबें, अपनी रातें हैं, उस पार न जाने क्या होगा।
इस पार चमकती स्क्रीनें हैं, लक्ष्मीकांत और स्पेक्ट्रम का मेला है ,
इस पार एकांत की रातें हैं, बस चाय और यादों का रेला हैं, उस पार न जाने क्या होगा।
इस पार सजीली उम्मीदें हैं, हर सुबह नया एक जज़्बा है,
इस पार रंगीली दुनिया छोड़, बस कमरों में अपना कब्ज़ा है ,उस पार न जाने क्या होगा।
इस पार सुकोमल ख़्वाब कई,जो टूटते है जो बनते है,
इस पार निराशा के क्षण है, जो रोते हैं,जो हंसते हैं,उस पार न जाने क्या होगा।
इस पार मनुज का धीरज है, जो गिरता है संभलता हैं,
इस पार प्रीलिम्स – मेंस का चक्रव्यूह, जिसमें हर राही गलता है, उस पार न जाने क्या होगा।
पर छोड़ ना सकते इस ज़िद को हम,जब तक कोशिश का बंधन हैं,
इस पार हमारी कर्म – भूमि, ये UPSC ही हमारा जीवन हैं, उस पार न जाने क्या होगा।
इस पार, प्रिय किताबें, अपनी रातें हैं, उस पर न जाने क्या होगा।
हिन्दी













