
आज़ादी का इतिहास बताता है कि प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 ई. में हुआ था लेकिन इससे दो वर्ष पूर्व ही अपने हक़, अपनी अस्मिता की लड़ाई के लिए हुंकार भरी जा चुकी थी संथाल परगना के इलाके में, जिसे हुल दिवस या संथाल विद्रोह के नाम से जाना जाता है।
शासकों के दुराचार के खिलाफ जहां कोई एक आगे होने से डरता है, वहीं झारखंड राज्य के साहिबगंज जिले के भोगनाडीह गांव के एक ही परिवार के चार भाइयों सिद्धू, कान्हू, चांद, भैरव और दो बहनों फूलो और झानो ने वीरांगनाओं की तरह अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंका।
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी अत्यधिक लगान (Tax) वसूल रही थी।
जमींदार, अंग्रेजों के इशारे पर संथालों की जमीनों पर कब्जा कर रहे थे और उनसे बेगारी (बिना पैसे के काम) करवाते थे।
साहूकार, कर्ज के जाल में फंसाकर उनका भयंकर आर्थिक और शारीरिक शोषण करते थे।
इस अन्याय और शोषण ने संथालों के भीतर भारी आक्रोश पैदा कर दिया था।
30 जून 1855 को भोगनाडीह गांव में सिद्धू और कान्हू के नेतृत्व में लगभग 400 गांवों के 10,000 से 50,000 संथाल आदिवासी एकत्र हुए। यहीं पर उन्होंने शोषकों के खिलाफ शंखनाद किया और नारा दिया, "अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो।"
इसी दिन उन्होंने घोषणा की कि वे अब किसी को लगान नहीं देंगे और अपना स्वतंत्र 'संथाल राज' स्थापित करेंगे।
विद्रोह की आग पाकुड़, दुमका, गोड्डा, साहिबगंज और बंगाल के बीरभूम तक फैल गई। संथालों ने कई थानों, जमींदारों के ठिकानों और रेलवे लाइनों को नष्ट कर दिया।
संथालों के पास अंग्रेजों जैसी आधुनिक बंदूकें और तोपें नहीं थीं। उन्होंने अपने पारंपरिक हथियारों—तीर-धनुष, भाले और कुल्हाड़ी से ही अंग्रेजों की विशाल और आधुनिक सेना का सामना किया।
ब्रिटिश सरकार इस विद्रोह से पूरी तरह घबरा गई थी। उन्होंने विद्रोह को कुचलने के लिए 'मार्शल लॉ' लगा दिया। बंदूकों और तोपों के सामने तीर-धनुष ज्यादा देर टिक नहीं सके।
इस विद्रोह में लगभग 20,000 संथाल आदिवासी शहीद हुए। कई गांवों को अंग्रेजों ने पूरी तरह जला दिया।
सिद्धू और कान्हू को गिरफ्तार कर लिया गया और भोगनाडीह गांव में ही एक पेड़ से लटकाकर उन्हें फांसी दे दी गई। चांद और भैरव भी अंग्रेजों की गोलियों का शिकार हुए।
हालांकि विद्रोह को क्रूरता से दबा दिया गया, लेकिन अंग्रेजों को आदिवासियों की ताकत का अहसास हो गया। इसके परिणामस्वरूप अंग्रेजों को संथाल परगना (Santhal Pargana) नाम का एक अलग जिला बनाना पड़ा और आदिवासियों की जमीन बचाने के लिए विशेष कानून (Santhal Pargana Tenancy Act / SPT Act) लागू करना पड़ा, ताकि कोई गैर-आदिवासी उनकी जमीन न छीन सके।
हुल दिवस केवल एक विद्रोह की याद नहीं है, बल्कि यह जल, जंगल, जमीन और स्वाभिमान की रक्षा के लिए दी गई अदम्य शहादत का प्रतीक है। भारतीय इतिहास में 30 जून का अमर दिन याद दिलाता है कि हक़ की बात में समझौता नहीं, विद्रोह करना ही अपनी पहचान है।
~ प्रहलाद मंडल ✍️

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