
आँखों में क्या, इस दिल से पूछो ज़रा
देखूँ मैं क्या माजरा, चेहरे के पीछे
ख़ामोशी के रंगीं साए, रुख़सार पे किसी के,
मिल चुका हूँ मैं इनसे, कुछ ऐसा लगता है
आए यही मेरे जी में, इनपे मर मिटूँ अभी से
- मजरुह सुलतानपुरी (खामोशी : द म्युजिकल 1996)
छोटी कविता@ChhotiKavita
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