Jat Ethnic Religion@Jat_Ethnic
देखिए, बात ऐसी है कि अधिकांश किसान, कामगार, मजदूर जातियां सहज और सरल हृदय की होती हैं इसलिए किसान होने के नाते राजपूत समाज के लोग भी सरल और सहृदय लोग होते हैं. इनमें चालाकी नहीं होती इसलिए सहज और सीधी बातें ही समझते हैं. सारी गड़बड़ी तो चारणों, भाटों ने की जिन्होंने चने के झाड़ पर चढ़ाने का काम किया. सामंतों और राजाओं के फेंके टुकड़ों पर पलने वाले इन चारणों भाटों ने इनकी ऐसी तारीफ़ की कि इन्हें लगने लगा सूरज भी मेरी अनुमति से ही निकलता है. राजा साहब सोए ही रहते थे कि चारण आते थे और कहते थे विश्व विजयी सम्राट महाराजाधिराज की जय हो! सूर्य देव उदय होने की अनुमति चाहते हैं! अगर दिग्दिगंत विजयी महाराजधिराज चक्रवर्ती सम्राट अनुमति प्रदान करें तो सूर्य देव उदय हो लें जिससे प्रजा महाराज की सेवा में होने वाले कार्यों को संपन्न कर सके! राजा बेचारा खुश होकर अनुमति प्रदान करने का भी सुख भोग लेता था और उसे यह खुशफहमी भी हो जाती थी कि सूरज भी उसकी अनुमति से ही निकलता है. ऐसे में किसी का भी सीना अपने आप तन जाएगा, गर्दन स्वयंमेव अकड़ जाएगी.