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★ क्यों राजस्थानी को भाषा का दर्ज़ा नहीं मिलना चाहिए?
आज राजस्थानी को भाषा का दर्ज़ा दिलाने की मांग तेज़ हो रही है। लेकिन यह मांग अक्सर उसके सामाजिक-राजनीतिक प्रभावों को समझे बिना की जा रही है—और यही सबसे बड़ा खतरा है।
भारत में भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह सामाजिक संरचना और सत्ता के वितरण से गहराई से जुड़ी होती है। जैसा कि समाजशास्त्री Pierre Bourdieu ने स्पष्ट किया था, भाषा भी एक प्रकार की “symbolic power” होती है—जो यह तय करती है कि किसका ज्ञान वैध माना जाएगा और किसकी आवाज़ हाशिए पर रहेगी। भारतीय संदर्भ में यह संबंध और भी जटिल है, जहाँ भाषा, जाति और सामाजिक प्रतिष्ठा एक-दूसरे से गुंथे हुए हैं।
राजस्थानी के साथ समस्या केवल उसकी मान्यता की नहीं, बल्कि उसके साहित्यिक चरित्र की भी है। ऐतिहासिक रूप से राजस्थानी साहित्य का बड़ा हिस्सा चारणों और दरबारी कवियों द्वारा रचा गया, जिसमें शासकों—राजा-रजवाड़ों और ठाकुरों—की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा, वीर-गाथाएँ और सामंतवादी मूल्यों का महिमामंडन प्रमुख रहा है। इस साहित्य में यथार्थ से अधिक कल्पना, और समाज की समानता से अधिक सत्ता की चापलूसी दिखाई देती है।
ऐसा साहित्य जब भाषा के साथ संस्थागत रूप से प्रमोट होता है, तो वह केवल सांस्कृतिक अभिव्यक्ति नहीं रहता—बल्कि एक विचारधारा का विस्तार बन जाता है। परिणामस्वरूप:
समाज में सामंतवादी मानसिकता को नई वैधता मिलती है
जातिगत ऊँच-नीच और भेदभाव को सांस्कृतिक समर्थन मिलता है
“वीरता” और “सम्मान” के नाम पर असमानता को सामान्य बना दिया जाता है
यह वही प्रक्रिया है जिसमें साहित्य के माध्यम से एक ऐसा कल्पना-लोक गढ़ा जाता है, जहाँ ऐतिहासिक शासक “नायक” बन जाते हैं और आम जन का संघर्ष अदृश्य हो जाता है—मानो वे किसी काल्पनिक गाथा के पात्र हों, न कि वास्तविक समाज के हिस्से।
इसलिए यह प्रश्न केवल भाषा का नहीं है, बल्कि उस सामाजिक प्रभाव का है जो उसके साथ जुड़ा हुआ है। यदि किसी भाषा की मुख्यधारा का साहित्य लगातार सामंतवाद, अतिशयोक्ति और सामाजिक असमानता को ही पोषित करता रहा है, तो उसे संस्थागत मान्यता देना अनजाने में उन्हीं मूल्यों को पुनर्जीवित करना हो सकता है।
अतः यह आवश्यक है कि हम भावनाओं में बहकर नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक समझ के साथ निर्णय लें। जब तक राजस्थानी साहित्य में व्यापक रूप से समतावादी, यथार्थवादी और प्रगतिशील दृष्टिकोण का विकास नहीं होता, तब तक उसे भाषा का दर्ज़ा देने की मांग पर पुनर्विचार होना चाहिए।
वैसे भी राजस्थानी भाषा का साहित्य अत्यधिक घटिया क़िस्म का हैं। जो व्यक्ति राजस्थानी साहित्य में रुचि लेने लग जाता हैं, वो शेष संसार से कट जाता हैं और एक कल्पना लोक में जीने लग जाता हैं।
राजस्थानी साहित्य अत्यधिक अतिशयोक्तिवादी और सामंतवादी हैं।
राजस्थानी साहित्य पढ़ने वाले को राजपूत Harry Potter के हीरो लगने लग जाते हैं।
पूरे राजस्थानी साहित्य का एक नमूना इस प्रकार हैं जैसे :
“पहलां सूरज अरदास करी, रण में लीयो नाम,
धरती माथां तिलक धर्यो, बोल्या जीतूं आजो काम।
जियो जियो ठाकुर लाखा, गजब कर्यो शौर्य काम,
मकोड़ो रो माथो काप्यो, आबू बह्यो लहू तमाम।
इतरो देख सब चकित रह्या, बाज्या ढोल-नगाड़ा नाम,
नानकड़ो रण जीत गयो, बण गयो वीरां में धाम।
कविया लिख्या गाथा ऐ री, बढ़्यो शौर्य रो नाम,
मकोड़ां सूं रण जीत लियो, थांरो अमर रह्यो काम।
नाम रो डंको गूंज उठ्यो, चारूं दिसा अर धाम,
लाखा रा जस गावत फिरे, गूंज्यो थारो नाम।
फेर उठी रण री हुंकार, हाथां ली तीखी तलवार,
लाखा फेर कमाल कर्यो, लायो पाड़ तितर रो बाल।
थांरो बढ़्यो सम्मान, देख्यो सगळो संसार,
इण महा रण में फेर, थारो गूंज्यो जयकार।”