Deviputra

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@Deviputra21

Charan (चारण)

Beigetreten Ekim 2022
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Angehefteter Tweet
Deviputra
Deviputra@Deviputra21·
Chārans have significantly contributed to the historical narratives of Rajasthan and Gujarat, playing diverse roles. This serves as a concise overview, and I plan to delve deeper into these topics in future threads. Source citations will be provided in the concluding tweet.
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Sujaan singh
Sujaan singh@USujaan·
सबको मीठी मासी बनना है। Bsdk achhai के पुतले बने हुए है। दिन भर से इस @manojmeena दल्ले का कोई स्पष्टीकरण नहीं आया, आएगा भी नहीं क्योंकि इसको जो चाहिए था मिल गया।
Deviputra@Deviputra21

मनोज मीणा ने इत्ती भद्दी बात करदी और सारे राजपूत हैंडल "भाई मनोज", "प्रिय मनोज" करके ट्वीट करते है और उसको प्यार से समझाते है। उसका लेटेस्ट रीट्वीट भी देखलो। बड़ा पश्चाताप हो रहा है उसे आपके मीठे बोल। सुनमन 🙏

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Deviputra
Deviputra@Deviputra21·
मनोज मीणा ने इत्ती भद्दी बात करदी और सारे राजपूत हैंडल "भाई मनोज", "प्रिय मनोज" करके ट्वीट करते है और उसको प्यार से समझाते है। उसका लेटेस्ट रीट्वीट भी देखलो। बड़ा पश्चाताप हो रहा है उसे आपके मीठे बोल। सुनमन 🙏
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Deviputra
Deviputra@Deviputra21·
और इस गढ़ेड़ को ये कौन बताएगा कि जिसका इसने उदाहरण दिया हैं वो राजस्थानी के करिकुलम में कही भी नहीं है। और राजस्थानी साहित्य का भी बस १०% है।
Jat Ethnic Religion@Jat_Ethnic

★ क्यों राजस्थानी को भाषा का दर्ज़ा नहीं मिलना चाहिए? आज राजस्थानी को भाषा का दर्ज़ा दिलाने की मांग तेज़ हो रही है। लेकिन यह मांग अक्सर उसके सामाजिक-राजनीतिक प्रभावों को समझे बिना की जा रही है—और यही सबसे बड़ा खतरा है। भारत में भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह सामाजिक संरचना और सत्ता के वितरण से गहराई से जुड़ी होती है। जैसा कि समाजशास्त्री Pierre Bourdieu ने स्पष्ट किया था, भाषा भी एक प्रकार की “symbolic power” होती है—जो यह तय करती है कि किसका ज्ञान वैध माना जाएगा और किसकी आवाज़ हाशिए पर रहेगी। भारतीय संदर्भ में यह संबंध और भी जटिल है, जहाँ भाषा, जाति और सामाजिक प्रतिष्ठा एक-दूसरे से गुंथे हुए हैं। राजस्थानी के साथ समस्या केवल उसकी मान्यता की नहीं, बल्कि उसके साहित्यिक चरित्र की भी है। ऐतिहासिक रूप से राजस्थानी साहित्य का बड़ा हिस्सा चारणों और दरबारी कवियों द्वारा रचा गया, जिसमें शासकों—राजा-रजवाड़ों और ठाकुरों—की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा, वीर-गाथाएँ और सामंतवादी मूल्यों का महिमामंडन प्रमुख रहा है। इस साहित्य में यथार्थ से अधिक कल्पना, और समाज की समानता से अधिक सत्ता की चापलूसी दिखाई देती है। ऐसा साहित्य जब भाषा के साथ संस्थागत रूप से प्रमोट होता है, तो वह केवल सांस्कृतिक अभिव्यक्ति नहीं रहता—बल्कि एक विचारधारा का विस्तार बन जाता है। परिणामस्वरूप: समाज में सामंतवादी मानसिकता को नई वैधता मिलती है जातिगत ऊँच-नीच और भेदभाव को सांस्कृतिक समर्थन मिलता है “वीरता” और “सम्मान” के नाम पर असमानता को सामान्य बना दिया जाता है यह वही प्रक्रिया है जिसमें साहित्य के माध्यम से एक ऐसा कल्पना-लोक गढ़ा जाता है, जहाँ ऐतिहासिक शासक “नायक” बन जाते हैं और आम जन का संघर्ष अदृश्य हो जाता है—मानो वे किसी काल्पनिक गाथा के पात्र हों, न कि वास्तविक समाज के हिस्से। इसलिए यह प्रश्न केवल भाषा का नहीं है, बल्कि उस सामाजिक प्रभाव का है जो उसके साथ जुड़ा हुआ है। यदि किसी भाषा की मुख्यधारा का साहित्य लगातार सामंतवाद, अतिशयोक्ति और सामाजिक असमानता को ही पोषित करता रहा है, तो उसे संस्थागत मान्यता देना अनजाने में उन्हीं मूल्यों को पुनर्जीवित करना हो सकता है। अतः यह आवश्यक है कि हम भावनाओं में बहकर नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक समझ के साथ निर्णय लें। जब तक राजस्थानी साहित्य में व्यापक रूप से समतावादी, यथार्थवादी और प्रगतिशील दृष्टिकोण का विकास नहीं होता, तब तक उसे भाषा का दर्ज़ा देने की मांग पर पुनर्विचार होना चाहिए। वैसे भी राजस्थानी भाषा का साहित्य अत्यधिक घटिया क़िस्म का हैं। जो व्यक्ति राजस्थानी साहित्य में रुचि लेने लग जाता हैं, वो शेष संसार से कट जाता हैं और एक कल्पना लोक में जीने लग जाता हैं। राजस्थानी साहित्य अत्यधिक अतिशयोक्तिवादी और सामंतवादी हैं। राजस्थानी साहित्य पढ़ने वाले को राजपूत Harry Potter के हीरो लगने लग जाते हैं। पूरे राजस्थानी साहित्य का एक नमूना इस प्रकार हैं जैसे : “पहलां सूरज अरदास करी, रण में लीयो नाम, धरती माथां तिलक धर्यो, बोल्या जीतूं आजो काम। जियो जियो ठाकुर लाखा, गजब कर्यो शौर्य काम, मकोड़ो रो माथो काप्यो, आबू बह्यो लहू तमाम। इतरो देख सब चकित रह्या, बाज्या ढोल-नगाड़ा नाम, नानकड़ो रण जीत गयो, बण गयो वीरां में धाम। कविया लिख्या गाथा ऐ री, बढ़्यो शौर्य रो नाम, मकोड़ां सूं रण जीत लियो, थांरो अमर रह्यो काम। नाम रो डंको गूंज उठ्यो, चारूं दिसा अर धाम, लाखा रा जस गावत फिरे, गूंज्यो थारो नाम। फेर उठी रण री हुंकार, हाथां ली तीखी तलवार, लाखा फेर कमाल कर्यो, लायो पाड़ तितर रो बाल। थांरो बढ़्यो सम्मान, देख्यो सगळो संसार, इण महा रण में फेर, थारो गूंज्यो जयकार।”

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Deviputra
Deviputra@Deviputra21·
अबे गधेड़ तेरे बाप दादा को फारसी संस्कृत सीखने बोलने पे कूट देते थे। ले देके यही थी तुम्हारे पास भी।
Jat Ethnic Religion@Jat_Ethnic

★ क्यों राजस्थानी को भाषा का दर्ज़ा नहीं मिलना चाहिए? आज राजस्थानी को भाषा का दर्ज़ा दिलाने की मांग तेज़ हो रही है। लेकिन यह मांग अक्सर उसके सामाजिक-राजनीतिक प्रभावों को समझे बिना की जा रही है—और यही सबसे बड़ा खतरा है। भारत में भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह सामाजिक संरचना और सत्ता के वितरण से गहराई से जुड़ी होती है। जैसा कि समाजशास्त्री Pierre Bourdieu ने स्पष्ट किया था, भाषा भी एक प्रकार की “symbolic power” होती है—जो यह तय करती है कि किसका ज्ञान वैध माना जाएगा और किसकी आवाज़ हाशिए पर रहेगी। भारतीय संदर्भ में यह संबंध और भी जटिल है, जहाँ भाषा, जाति और सामाजिक प्रतिष्ठा एक-दूसरे से गुंथे हुए हैं। राजस्थानी के साथ समस्या केवल उसकी मान्यता की नहीं, बल्कि उसके साहित्यिक चरित्र की भी है। ऐतिहासिक रूप से राजस्थानी साहित्य का बड़ा हिस्सा चारणों और दरबारी कवियों द्वारा रचा गया, जिसमें शासकों—राजा-रजवाड़ों और ठाकुरों—की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा, वीर-गाथाएँ और सामंतवादी मूल्यों का महिमामंडन प्रमुख रहा है। इस साहित्य में यथार्थ से अधिक कल्पना, और समाज की समानता से अधिक सत्ता की चापलूसी दिखाई देती है। ऐसा साहित्य जब भाषा के साथ संस्थागत रूप से प्रमोट होता है, तो वह केवल सांस्कृतिक अभिव्यक्ति नहीं रहता—बल्कि एक विचारधारा का विस्तार बन जाता है। परिणामस्वरूप: समाज में सामंतवादी मानसिकता को नई वैधता मिलती है जातिगत ऊँच-नीच और भेदभाव को सांस्कृतिक समर्थन मिलता है “वीरता” और “सम्मान” के नाम पर असमानता को सामान्य बना दिया जाता है यह वही प्रक्रिया है जिसमें साहित्य के माध्यम से एक ऐसा कल्पना-लोक गढ़ा जाता है, जहाँ ऐतिहासिक शासक “नायक” बन जाते हैं और आम जन का संघर्ष अदृश्य हो जाता है—मानो वे किसी काल्पनिक गाथा के पात्र हों, न कि वास्तविक समाज के हिस्से। इसलिए यह प्रश्न केवल भाषा का नहीं है, बल्कि उस सामाजिक प्रभाव का है जो उसके साथ जुड़ा हुआ है। यदि किसी भाषा की मुख्यधारा का साहित्य लगातार सामंतवाद, अतिशयोक्ति और सामाजिक असमानता को ही पोषित करता रहा है, तो उसे संस्थागत मान्यता देना अनजाने में उन्हीं मूल्यों को पुनर्जीवित करना हो सकता है। अतः यह आवश्यक है कि हम भावनाओं में बहकर नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक समझ के साथ निर्णय लें। जब तक राजस्थानी साहित्य में व्यापक रूप से समतावादी, यथार्थवादी और प्रगतिशील दृष्टिकोण का विकास नहीं होता, तब तक उसे भाषा का दर्ज़ा देने की मांग पर पुनर्विचार होना चाहिए। वैसे भी राजस्थानी भाषा का साहित्य अत्यधिक घटिया क़िस्म का हैं। जो व्यक्ति राजस्थानी साहित्य में रुचि लेने लग जाता हैं, वो शेष संसार से कट जाता हैं और एक कल्पना लोक में जीने लग जाता हैं। राजस्थानी साहित्य अत्यधिक अतिशयोक्तिवादी और सामंतवादी हैं। राजस्थानी साहित्य पढ़ने वाले को राजपूत Harry Potter के हीरो लगने लग जाते हैं। पूरे राजस्थानी साहित्य का एक नमूना इस प्रकार हैं जैसे : “पहलां सूरज अरदास करी, रण में लीयो नाम, धरती माथां तिलक धर्यो, बोल्या जीतूं आजो काम। जियो जियो ठाकुर लाखा, गजब कर्यो शौर्य काम, मकोड़ो रो माथो काप्यो, आबू बह्यो लहू तमाम। इतरो देख सब चकित रह्या, बाज्या ढोल-नगाड़ा नाम, नानकड़ो रण जीत गयो, बण गयो वीरां में धाम। कविया लिख्या गाथा ऐ री, बढ़्यो शौर्य रो नाम, मकोड़ां सूं रण जीत लियो, थांरो अमर रह्यो काम। नाम रो डंको गूंज उठ्यो, चारूं दिसा अर धाम, लाखा रा जस गावत फिरे, गूंज्यो थारो नाम। फेर उठी रण री हुंकार, हाथां ली तीखी तलवार, लाखा फेर कमाल कर्यो, लायो पाड़ तितर रो बाल। थांरो बढ़्यो सम्मान, देख्यो सगळो संसार, इण महा रण में फेर, थारो गूंज्यो जयकार।”

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Deviputra
Deviputra@Deviputra21·
मनोज मीणा भाई 🥺
Lokendra Singh@LSinghShekhawat

पहली बात तो @manojmeena मनोज मीणा भाई क्षत्रियों ने कभी बूंदा मीणा को अपना नहीं बताया ,पता नहीं आप किस उद्देश्य से किसी समाज विशेष पर ऐसी टिप्पणी कर रहे हो दूसरी मैं आप ही की बात को आगे बढ़ाऊ तो अगर मीणा राजा-महाराजा ही थे तो आप ST रिजर्वेशन क्यो खाए बैठे हो बेचारे संथाल,मुंडा,उनराव,भील,गोंडा,बैगा,बंजारा,बिरहोर,खोड़, सहरिया,कोरवा और गारो ऐसी जातियों तो सही में पिछड़ी है समाज की मुख्यधारा में नहीं है उनका हक़ निगल रहे हो छोड़ो अगर राजा महाराजा थे तो ऐसे छोटे मोटे नेताओं से मीणा समाज को दूरी बनानी चाहिए जो ज़हर घोलते हो

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Deviputra
Deviputra@Deviputra21·
Arshad Pappu could be utilised better. His intro with the "jaiye sajna" song was great. #dhurandhar2
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Deviputra
Deviputra@Deviputra21·
दोनों ने बेटी को सोचना चाहिए था बाप की इज्जत वगैरा का और ऐसा करना ही नहीं चाहिए था। अब प्यार/गलती हो गई थी तो बाप को समाज से ज्यादा अपने परिवार और बेटी की खुशियों को तवज्जो देनी चाहिए थी।
Arvind Chotia@arvindchotia

बेटी ने दूसरे समाज में शादी कर ली पिता ने जीते जी बेटी का शोक संदेश छपवा दिया बेटी ने गलत किया या पिता ने?

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बेवजह 🚶
बेवजह 🚶@KaroorSinh·
Sarso beche di aaj achha munafa ho gya, ek khet ke aadhe hisse me hi ki thi fir bhi achhi ho gyi, lag rha ab mansoon ki kheti chhodkar rabi ki kheti krni chahiye sare kheto me.
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Deviputra
Deviputra@Deviputra21·
@HorseBullet7 Bahot kum shehro ko mere चरण रज naseeb hui hai/hoti hai
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Deviputra
Deviputra@Deviputra21·
Any good book on history of Bombay underworld
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बेवजह 🚶
बेवजह 🚶@KaroorSinh·
रायते में बाटी चूर के खाने का आनंद ही अलग है
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Bahadmera
Bahadmera@Radzputt·
@Deviputra21 You mustn't have come across tyrant thakur of Kuchera then?
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Deviputra
Deviputra@Deviputra21·
बृहस्पति देव की कथा जैसे लिखा है पोस्ट को। 🤣🤣🤣🤣 वैसे कई त्योहारी की कथाओं में ऐसी ही टोन होती है। लास्ट में लिख देते, जिस तरह हनुमान जी ने इनकी मदद करी उसी तरह सबकी मदद करे। 🙏🙏 बाकी मजाक से हटके बात सच्ची है तो काबिले तारीफ है।
MP Saharan@manphoolsaran7

यह माताएं बहने हमारे नागौर के कुचेरा गांव की राजपूत समाज की है इन्होंने एक एक रुपया अपने खून पसीने की कमाई जोड़कर शहर में एक प्लॉट लिया था ताकि आने वाले समय में जरूरत पड़े तो इसको बेचकर अपने परिवार का भरण पोषण करले बच्चों के पीले हाथ कर दें इनके वह दिन आ भी गया बच्चियों की शादी तय हो गई जब इन्होंने अपना प्लाट बेचने का फैसला लिया वहां पर जाकर देखा तो प्लांट पर भू माफियाओं ने कब्जा कर लिया था ! भू माफिया ने यह कहकर इनको भाग दिया जो तुमसे बन पड़े कर लो यह प्लॉट तो अब हमारा है जो इनके घर में थोड़ी देर पहले खुशियों का माहौल था वह ‌एकदम गम में बदल गया इन्होंने पूरा प्रयास किया थक हार कर बैठ गए कहीं कुछ बात नहीं बनी, किसी समझदार आदमी ने इनको ढांढस और भरोसा दिलाया और कहा आप श्री हनुमान बेनीवाल का नाम रखा और कहा आप उनके पास चले जाओ वह आपकी जरुर मदद करेंगे महिलाओं ने कहा हमने हनुमान बेनीवाल को कभी वोट नहीं दिए ना हम उन को जानते हैं वह हमारी कैसे मदद करेंगे तब उस आदमी ने कहा आप एक बार जाओ तो सही हनुमान बेनीवाल के पास जान पहचान की जरूरत नहीं है जो उनके दरवाजे पर जाता है वह सब की मदद करते हैं महिलाओं ने ऐसा ही किया वह सीधा श्री हनुमान बेनीवाल के नागौर आवास पर पहुंच गई और एक कोने में जाकर बैठ गई ! हनुमान बेनीवाल जनसुनवाई कर रहे थे जैसे ही उनकी नजर इन महिलाओं पर पड़ी वह जनसुनवाई छोड़कर इनके पास में आ गए उनके आते ही महिलाएं अपना दुख नहीं बता सकी रोने लग गई सांसद साहब ने बड़े विनम्र भाव से कहा आप पहले बैठो चाय पियो पानी पियो और आराम से मुझे बताओ बात क्या हुई महिलाओं ने अपनी पूरी पीड़ा कहानी सांसद साहब को सुना दी उनकी पीड़ा सुनते ही साब का चेहरा आग बबुल हो गया उन्होंने अपना फोन घुमाया पता नहीं किसको कॉल किया , सांसद साहब ने उन महिलाओं को कहा आपके पास गाड़ी है क्या उन्होंने कहा साहब हम किराए की गाड़ी लेकर आई है ! सांसद साहब ने फिर कहा आप एक काम करो अपने प्लाट पर जाओ आपको कोई कुछ नहीं कहेगा और आप अपना प्लांट जिसको बेचना चाहते हो उसको भेज दो मैं हूं ना आपके साथ देखता हूं कौन क्या करता है ! महिलाएं अपनी गाड़ी लेकर जैसे ही प्लांट पर पहुंची प्लांट पर पहले से ही उनका इंतजार पुलिस कर रही थी पुलिस प्रशासन ने भी अपना फिर काम किया और उन भू माफिया को कहा यह महिलाएं सांसद साहब के पास जाकर आईं हैं देख लेना सांसद साहब का नाम आ जाए किसी फिर किसी की मजाल है कोई नाटक कर दे जैसे उनको सांप सुघ गया हो वह हालत हो गई भू माफिया की माताएं बहनों ने राहत की सांस ली ! महिलाओं ने अपना प्लाट बेचकर अपना पैसा पास में लेकर सांसद साहब को धन्यवाद बोलने गई साब को कहा आपका बहुत-बहुत धन्यवाद आपने हमको बचा लिया ! सांसद साहब ने उनको कहा यह मेरा दायित्व है आपने मुझे अपने जिले का मालिक बनाया है और आपकी पीड़ा में ही नहीं सुनूंगा तो कौन सुनेगा आप चिंता ना करें अपनी बच्चियों की शादी बड़े ही धूमधाम से करें आगे कोई भी दिक्कत हो तो मुझे फोन कर देना फिर दोबारा उन्होंने कहा मैं हूं ना 5100 रुपए कन्यादान देकर महिलाओं को विदा किया ! ✊🔰यह है हमारे लाडले नागौर के सांसद श्री हनुमान बेनीवाल✊ CP:- रणजीत जी

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Baagad Billa
Baagad Billa@nniibbaaa·
@Deviputra21 Digestion slow karta hai vohi saare side effects honge.... vomiting, diarrhea, pet dard and all but body checkup kara ke and fir prescription pe hi lena hai bcz piche kuch cases aate the jisse Blindness wagera ho gyi thi iski wajah se!!
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Deviputra
Deviputra@Deviputra21·
@nniibbaaa 25 kg kum krne k liye kitne lene pdenge, side effects kya hai, kaha milta hai, targeted weight loss hota hai kya?
Indonesia
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Baagad Billa
Baagad Billa@nniibbaaa·
@Deviputra21 Kuch din pehle hi kisi video mai dekha tha....Weekly injection aata hai 4k-5k ka I guess (mahine mai 4 baar). Makes you feel like you are full and also slows the digestion process. Thus resulting in weight loss. Similar to ozempic bass thoda usse thoda jada powerful.
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Deviputra
Deviputra@Deviputra21·
@nniibbaaa But it doesn't change the fact that she is cute
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