Kalamkaar

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Raghvendra Dwivedi
Raghvendra Dwivedi@RaghvendraLive·
अब समझ आया हमें ये रूह क्यों बेचैन है फिर रहे हैं ज़ेहन पर हम बोझ लादे जिस्म का ~ राघवेंद्र द्विवेदी
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Raghvendra Dwivedi
Raghvendra Dwivedi@RaghvendraLive·
ये भी मुमकिन है कि सूरज को बुझा दे पल में वो अगर चाहे तो जुगनू को सितारा कर दे ~ राघवेंद्र द्विवेदी
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दोस्तो इस से बड़ी कोई इबादत ही नहीं आदमी को आदमी के काम आना चाहिए ~ अख़्तर आज़ाद
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देगा दहेज क्या जो खिलौने न दे सका इक बाप चाहता है कि बेटी बड़ी न हो ~ मेहदी हुसैन ख़ालिस
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हमारे बाद तिरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चूमेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे ~ विक्रम गौर वैरागी
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हज़ारों काम मोहब्बत में हैं मज़े के 'दाग़' जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं ~ दाग़ देहलवी
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बर्बाद कर दिया हमें परदेस ने मगर माँ सब से कह रही है कि बेटा मज़े में है ~ मुनव्वर राना
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पहुँचे हैं जो अपनी मंज़िल पर उन को तो नहीं कुछ नाज़-ए-सफ़र चलने का जिन्हें मक़्दूर नहीं रफ़्तार की बातें करते हैं ~ शकील बदायूनी
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मेरे क़दम भी रुक गए सिन्दूर देख कर उस ने भी अपनी कार का शीशा चढ़ा लिया ~ तनवीर ग़ाज़ी
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अंदाज़ अपना देखते हैं आइने में वो और ये भी देखते हैं कोई देखता न हो ~ निज़ाम रामपुरी
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कहाँ तक आसमाँ की हद कहाँ तक उड़ के जाना है  मुसलसल क़ैद में रह कर परिंदे भूल जाते हैं ~ राघवेंद्र द्विवेदी (@RaghvendraLive)
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तिजारत के लिए बालों में ख़ुशबू बाँध लेती है ज़रूरत आख़िरी मंज़िल पे घुंघरू बाँध लेती है ~ शायर जमाली
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नए अमीरों के घर भूल कर भी मत जाना हरेक चीज़ की क़ीमत बताने लगते हैं ~ मलिकज़ादा जावेद
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ये सर्द रात ये आवारगी ये नींद का बोझ हम अपने शहर में होते तो घर गए होते ~ उम्मीद फ़ाज़ली
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मिरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा इसी सियाह समुंदर से नूर निकलेगा ~ अमीर क़ज़लबाश
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वो लोग ख़ुश-नसीब हैं दुनिया की भीड़ में जिनको क़लम-दवात किताबों से इश्क़ है ~ राघवेंद्र द्विवेदी #ChitraguptPuja
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मिलाते हो उसी को ख़ाक में जो दिल से मिलता है मिरी जाँ चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है ~ दाग़ देहलवी
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शेर से शाइरी से डरते हैं कम-नज़र रौशनी से डरते हैं ~ हबीब जालिब
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हुस्न सब को ख़ुदा नहीं देता हर किसी की नज़र नहीं होती ~ इब्न-ए-इंशा
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इन शोख़ हसीनों पे जो माइल नहीं होता कुछ और बला होती है वो दिल नहीं होता ~ अमीर मीनाई
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