Rahul Singh Lodhi

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Rahul Singh Lodhi

@Rasingh25

|| साहित्य का विद्यार्थी || Phd || Delhi University|| Reader || writer || critic || Madhya Pradesh || Repost are not my endorsement ||

Beigetreten Aralık 2024
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Angehefteter Tweet
Rahul Singh Lodhi
Rahul Singh Lodhi@Rasingh25·
चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब सोचते रहते हैं किस राहगुज़र के हम हैं ~निदा फ़ाज़ली ~
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Rahul Singh Lodhi
Rahul Singh Lodhi@Rasingh25·
आज हिंदी पत्रकारिता दिवस है। आज ही दिन 30 मई 1826 पहला हिंदी समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ था।
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Rahul Singh Lodhi
Rahul Singh Lodhi@Rasingh25·
@ipsvijrk बहुत अधिक वृद्धि होती जा रही है।
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RK Vij
RK Vij@ipsvijrk·
सोशल मीडिया अनियंत्रित गली-गलौच और अश्लीलता का क्षेत्र बन चुका है। यह चिंताजनक है। #socialmedia
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Rahul Singh Lodhi retweetet
Anurag Dwary
Anurag Dwary@Anurag_Dwary·
ये युग कवि हैं,बशीर साहब पर लिखा है पहले पन्ने पर छपा है ... "बशीर साहब कुछ अप्रिय परिस्थितियों के कारण मेरठ से भोपाल आकर बसे", साहब दंगे थे,साफ लिखिए.. जिसमें उनका घर जला दिया गया था तभी उन्होंने लिखा था "लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में.."
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Ashwini Yadav
Ashwini Yadav@iamAshwiniyadav·
OneDay, One Person Support @musafir_aman bhai मेरा प्यारा छोटा भाई अमन मुसाफ़िर आज असिस्टेंट प्रोफेसर (हिंदी) के पद पर राजकीय महाविद्यालय, खरखड़ा, रेवाड़ी (हरियाणा) में जॉइन कर लिया है। आप सब भी बधाई दीजिये, दुआएँ दीजिये।💝 ये मेरे लिये बहुत ख़ास दिन है। अभी इससे पहले ये गृहमंत्रालय में कार्यरत थे।
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Rajasthan Royals
Rajasthan Royals@rajasthanroyals·
Kaisa lag raha hai?
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ANIL
ANIL@AnilYadavmedia1·
कंधे पर बैठकर कटहल और लौकी तोड़ने से कोई किसान नहीं होता है, उसके लिए जेठ की दोपहरी में खून जलाना पड़ता है, पसीना बहाना होता है,
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Rahul Singh Lodhi
Rahul Singh Lodhi@Rasingh25·
मैं गृहमंत्री जी से अनुरोध करूंगा कि इस ‘हरामी नाला’ का नाम बदल दिया जाए
ANI_HindiNews@AHindinews

#WATCH गुजरात: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कच्छ में भारत-पाकिस्तान सीमा के निकट स्थित 'हरामी नाला' क्षेत्र का दौरा किया।

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ANIL
ANIL@AnilYadavmedia1·
पांच ट्रिलियन इकॉनमी के देश में मेरे गाँव की सड़क,
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Rahul Singh Lodhi
Rahul Singh Lodhi@Rasingh25·
@shubhankrmishra बहुत बड़ा स्कैम चल रहा है। आम श्रद्धालु इतने संघर्ष से केदारनाथ धाम की यात्रा करते हैं;उन्हें कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। ना खाना मिलता है, ना पानी मिलता है, रुकने की पर्याप्त सुविधाएं भी नहीं है। आम श्रद्धालुओं का पैसा आम जनता पर खर्च होना चाहिए।
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Rahul Singh Lodhi
Rahul Singh Lodhi@Rasingh25·
शब्दों, भाषा को हम छोटी चीज समझते हैं। वही बात है जब चीजें नहीं होती हैं तो उनकी महत्ता ज्यादा होती है। जब मनुष्य समाज के पास भाषा नहीं थी तो उसके लिए भाषा बहुत बड़ी वस्तु थी। लेकिन आज हम भाषा, शब्दों और वाक्यों का सम्मान कितना करते हैं;ये सब जगजाहिर है। अगर एक वाक्य में कहूं तो ‘भाषा बहुत संवेदनशील वस्तु है।’ कई बार होता है कि हमारे पार विचार होते हैं लेकिन उनको व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं होते। अंततः विचार शब्दों के अभाव में मर जाते हैं। ऐसा हमारी जिंदगी में कई बार होता है। इस तरह हम शब्दों के अभाव में विचारों को मारते रहते हैं। कुंवर नारायण की एक कविता से समझिए जिसे उन्होंने भाषा के ऊपर लिखा। इस कविता के अंतिम वाक्यों को ध्यान से पढ़िए। बात सीधी थी पर एक बार भाषा के चक्कर में ज़रा टेढ़ी फँस गई । उसे पाने की कोशिश में भाषा को उलटा पलटा तोड़ा मरोड़ा घुमाया फिराया कि बात या तो बने या फिर भाषा से बाहर आये- लेकिन इससे भाषा के साथ साथ बात और भी पेचीदा होती चली गई । सारी मुश्किल को धैर्य से समझे बिना मैं पेंच को खोलने के बजाय उसे बेतरह कसता चला जा रहा था क्यों कि इस करतब पर मुझे साफ़ सुनायी दे रही थी तमाशाबीनों की शाबाशी और वाह वाह । आख़िरकार वही हुआ जिसका मुझे डर था – ज़ोर ज़बरदस्ती से बात की चूड़ी मर गई और वह भाषा में बेकार घूमने लगी । हार कर मैंने उसे कील की तरह उसी जगह ठोंक दिया । ऊपर से ठीक ठाक पर अन्दर से न तो उसमें कसाव था न ताक़त । बात ने, जो एक शरारती बच्चे की तरह मुझसे खेल रही थी, मुझे पसीना पोंछती देख कर पूछा – “क्या तुमने भाषा को सहूलियत से बरतना कभी नहीं सीखा ?”
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सुरेश पंत sureshpant
"भाषा के बारे में मैंने जो कुछ सीखा है, उसका सार यह है; हर कथन एक हिमशिला है। जो दिखता है यानी शब्द, वाक्य, विराम; वह तो ऊपरी छोर है। उसके नीचे डूबा है एक विशाल संसार यानी पूर्वमान्यताओं का, अनकहे अर्थों का, सामाजिक संदर्भों का, भाषा की शैली का, किसी व्यक्ति के चेहरे का, उसके बारे में सुनी-सुनाई बातों का। उसके धर्म का, उसके पेशे का, उसके पेशे में आई गिरावट का।"
Tribhuvan_Official@TheTribhuvan

डिग्री सिर्फ़ प्रमाण दे सकती है, विवेक नहीं उस संकट पर, जब प्रतिक्रिया विचार से पहले दौड़ती है और शब्द पढ़े जाने से पहले ही जला दिए जाते हैं एक · जब निर्णय समझ से आगे निकल जाए मैं आपसे एक ऐसी बात कहना चाहता हूँ जो आपको भीतर तक बेचैन करे। वह बेचैनी नहीं जो किसी पोस्ट को देखकर होती है और अगले स्क्रॉल तक विस्मृत हो जाती है, वह बेचैनी जो रात को नींद में भी पीछा करती है। मनुष्य-सभ्यता के इतिहास में आज सबसे अधिक उपाधियाँ बाँटी जा रही हैं। विश्वविद्यालयों के द्वार इतने विशालकाय कभी न थे। और फिर भी; जो बुनियादी बौद्धिक क्षमताएँ एक जीवंत लोकतंत्र को चाहिए; धैर्यपूर्वक पढ़ना, संदर्भ को पहचानना, अर्थ की अनेक परतों को सहन करना; वे सिकुड़ती चली गई हैं या चली जा रही हैं। यह संयोग नहीं है। यह एक संरचनागत विकार है, नैतिक पतन नहीं। संचरनागत विकार यानी structural problem, जिसे हम कहते हैं। जब कोई राजनीतिक रचना सामने आती है तो आज का पाठक उसे पढ़ता नहीं; वह उसे महसूस करता है। और महसूस करते ही, बिना यह जाने कि यह स्तुति है या व्यंग्य, चरित्र-चित्रण है या आलोचना; निर्णय सुना देता है। समझ के पतन पर। यह मूर्खता नहीं है। वह जो आपको या मुझे कचरा कह रहा है, वह असभ्य नहीं है। इस पर मैं आग्रहपूर्वक कहना चाहता हूँ। मनुष्य की बुद्धि घटी नहीं है। जो घटा है वह है, वह अवकाश है, वह ठहराव है, वह जड़ता है, जो प्रवाहमान है, जो शब्द की सतह और उसके आशय के बीच की दूरी को पार करने के लिए चाहिए। वॉल्टर लिपमान ने सौ वर्ष पूर्व जन-मत पर लिखते हुए कहा था कि हम तथ्यों को नहीं, अपने मन की बनी-बनाई छवियों को देखते हैं। आज वे छवियाँ प्रकाश की गति से आती हैं और तर्क उनके पीछे हाँफता रहता है। दो · भाषा के नीचे एक और भाषा भाषा के बारे में मैंने जो कुछ सीखा है, उसका सार यह है; हर कथन एक हिमशिला है। जो दिखता है यानी शब्द, वाक्य, विराम; वह तो ऊपरी छोर है। उसके नीचे डूबा है एक विशाल संसार यानी पूर्वमान्यताओं का, अनकहे अर्थों का, सामाजिक संदर्भों का, भाषा की शैली का, किसी व्यक्ति के चेहरे का, उसके बारे में सुनी-सुनाई बातों का। उसके धर्म का, उसके पेशे का, उसके पेशे में आई गिरावट का। जब कोई पत्रकार किसी नेता की चाल का वर्णन करता है तो वह वर्णन उस चाल का समर्थन नहीं होता। जैसे जब कोई रोगविज्ञानी या पैथोलॉजिस्ट किसी रोग को उसके पूरे विस्तार में लिखता है तो वह उस रोग का उत्सव नहीं मना रहा। विवरण और मूल्यांकन ; ये दो अलग-अलग काम हैं, दो भिन्न वाणी-कर्म। इन्हें एक मान लेना वर्ग-भ्रम है। और यह वर्ग-भ्रम जब लाखों मन में एक साथ पनपता है तो लोकतंत्र के लिए संकट बन जाता है। रोलाँ बार्थ का स्मरण यहाँ आना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा : "पढ़ना सदैव एक प्रकार का पुनर्लेखन भी होता है।" किन्तु जो पाठक कभी लिखता नहीं, वह समझे कैसे? इसलिए हर पाठ में अपना पूर्व-लिखा या पूर्व सोचा हुआ निष्कर्ष ही खोजता है; वह पढ़ता नहीं, पुष्टि करता है। और पुष्टि, ज्ञान की सबसे बड़ी शत्रु है। तीन · उपाधि और विवेक का अंतर अब मैं कुछ ऐसा कहूँगा जो शायद आपको खलेगा; पर मेरा आशय भेद करना नहीं, विचार को जगाना है। विधि की उपाधि, चिकित्सा की उपाधि, किसी भी संस्था का प्रमाण-पत्र; ये सब प्रमाण हैं कि व्यक्ति एक निश्चित संस्थागत प्रक्रिया से गुज़रा। पर वे यह प्रमाणित नहीं करते कि उसमें वह क्षमता है, जिसे मैं अर्थ-सजगता कहता हूँ; वह चेतना जो वक्ता के वास्तविक आशय को, हमारी आशंकाओं और आशाओं से अलग करके, पहचान सके। यदि विधि की शिक्षा तुम्हें तर्क और आरोप के बीच, विवरण और समर्थन के बीच, भेद करना न सिखाए; तो फिर उस शिक्षा ने, उस डिग्री ने, उन लाखों रुपए फूंक देने ने तुम्हें दिया क्या? शिक्षा और विवेक के अंतर पर जॉन डेवी कहते हैं; जिनका शिक्षा-दर्शन मुझे सबसे प्रिय है; विद्यालय का उद्देश्य सूचनाओं का हस्तांतरण नहीं, जिज्ञासा का संस्कार है; वह मानसिक आदत जो किसी भी निर्णय पर शीघ्र द्वार बंद नहीं कर देती। उस कसौटी पर आज का बहुत-सा शिक्षा-उद्योग क्या है? बस एक विस्तृत प्रमाण-पत्र वितरण की व्यवस्था, जिसमें मन की मूलभूत बुनावट अछूती रह जाती है। राजस्थानी में एक कहावत है : सीख सरीरां नीपजै, दींध्यां आवै डाम। इसे ब्रज में इस तरह कहा जा सकता है : बुद्धि न बजार बिकै, न पाठन सौं आवै; जाके भागन मां बसै, ताके चित उजियावै। प्रज्ञा अनुभव की देह में उपजती है; कक्षा की किताबों में नहीं। बुद्धि न बाज़ार में मिलती है, न पाठ में; जिसके भाग्य में है, उसके चित्त को वही आलोकित करती है। इन लोक-वाणियों ने सदियों पहले वह कह दिया, जो आधुनिक शिक्षाशास्त्र अभी खोज रहा है। चार · जब तंत्र स्वयं को दोहराने लगे एडवर्ड हर्मन और नॉम चाॅम्स्की ने जब सहमति का निर्माण लिखा तो उन्होंने दिखाया कि माध्यम-तंत्र या मीडिया यहाँ तक कि स्वतंत्र समाजों में भी; किस प्रकार विचार की परिधि को संकुचित करता है। पर जो तब वे लाेग न देख सके, वह यह था; यह संकुचन एक दिन भीतर चला जाएगा। आज किसी मंत्रालय की ज़रूरत नहीं। सोशल मीडिया की संरचना ने कुछ और ही कर दिया है; एक ऐसी जनता तैयार कर दी है, जो स्वयं अपना प्रचार करती है। एल्गोरिद्म तात्कालिक प्रतिक्रिया को पुरस्कृत करती है। मंच आक्रोश का मुद्रीकरण करता है। व्यवस्था उस मन को चुनती है, जो सोचता नहीं; प्रतिध्वनित होता है। और जब हर राजनीतिक विचार को तुरंत 'मित्र' या 'शत्रु', 'स्तुति' या 'आक्षेप' में बाँटना अनिवार्य हो जाए तो उस अवकाश का नाश हो जाता है, जहाँ वास्तविक राजनीतिक चिंतन जन्म लेता है। नागरिकता, प्रशंसकता में बदल जाती है। पाँच · एक निमंत्रण — ठहरो। तो तुमसे मैं क्या चाहता हूँ? एक ही चीज़ — वह क्षण-भर का विराम। उत्तर देने से पहले, साझा करने से पहले, निंदा करने से पहले, जयकारा लगाने से पहले; एक पत्रकार का प्रश्न पूछो, एक भाषाविद का प्रश्न पूछो, एक विधिवेत्ता का प्रश्न पूछो; यहाँ वास्तव में कहा क्या गया है? यह किस विधा की वाणी है? इस वाक्य को लिखने के लिए लेखक को क्या मानना पड़ा होगा? क्या कोई अर्थ है जो मैंने अभी नहीं देखा? यह तटस्थता नहीं है। यह कायरता नहीं है। यह सबसे कठिन बौद्धिक साधना है। कामू ने कहा था, लेखक का उद्देश्य है कि सभ्यता स्वयं को नष्ट न कर ले। मैं कहता हूँ, पाठक, रीडर या ट्विटर या किसी भी सोशल मीडिया पर कुछ भी पढ़ने वाले का उद्देश्य भी यही है। और यह उद्देश्य एक स्क्रॉल की गति से पूरा नहीं होता। शब्दों के कोलाहल में अर्थ की धीमी आवाज़ सुन सको; बस यही पर्याप्त है। डिग्री तुम्हें शिक्षित घोषित कर सकती है, पर समझदार केवल तुम स्वयं बन सकते हो; उस श्रमसाध्य, असुविधाजनक, धैर्यशील पाठ के माध्यम से, जिसे आज की दुनिया भूलती जा रही है। शब्द तुम्हारी प्रतीक्षा करेंगे। तुम ठहरो। फिर कहता हूँ, ध्यान से सुनो : डिग्री तुम्हें शिक्षित घोषित कर सकती है, पर समझदार केवल तुम स्वयं बन सकते हो! तुम्हारा लिखा हुआ एक शब्द तुम्हारे बौद्धिक स्तर का थर्मामीटर है। जो शब्द तुम ट्विटर पर, सोशल मीडिया के किसी भी प्लेटफॉर्म पर अपनी तरफ से या प्रतिक्रिया में लिखने के लिए चुनते हो, वह तुम्हारी आत्मा का प्रतिबिंब है। +++ कोई जब किसी विचार को पढ़कर केवल "चमचा" या "कचरा" ही लिख सके और हम देखें कि उसके बायो में यह लिखना कि वह लॉ ग्रेजुएट है तो या तो वह डिग्री नकली है, या वह ख़रीदी हुई है, या कुछ नहीं है तो उस संस्थान को जाँच के दायरे में लाने की ज़रूरत है। वह शब्द उसकी शब्द-सम्पदा नहीं बता रहा, उसकी चिंतन की सीमा बता रहा है। जवाब में जो शब्दावली उतरती है, वह भीतर के संसार की खिड़की है। छह . और अब एक और बात; जो शायद सबसे ज़रूरी है। जब कोई नेता; चाहे वह सत्ता के सिंहासन पर बैठा हो, चाहे विपक्ष की पंक्ति में खड़ा हो; किसी व्यक्ति की गरिमा को अपने शब्दों से रौंदता है तो वह केवल एक व्यक्ति को नहीं रौंद रहा। वह उस दस्तावेज़ को रौंद रहा है, जिसे इस देश ने अपना सर्वोच्च वचन माना है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में प्रतिष्ठा की समता केवल एक विधिक शब्द-पद नहीं है; वह एक नैतिक प्रतिज्ञा है। अनुच्छेद २१ कहता है कि जीवन का अधिकार, गरिमा के साथ जीने का अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार, अनेक निर्णयों में, यह स्थापित किया है कि गरिमा संविधान का प्राण है; उसकी परिधि नहीं, उसका केंद्र। तो जो व्यक्ति गरिमा का हनन करता है वह किसी दल का अपराधी नहीं, संविधान का अपराधी है। और संविधान के अपराधी के लिए दल का रंग कोई ढाल नहीं बन सकता। भाषा केवल संचार का साधन नहीं; वह शक्ति का औज़ार है। जो नेता किसी को अपमानित करने के लिए भाषा का उपयोग करता है, वह उस औज़ार को हथियार बना देता है। और जो नागरिक इस हथियार को दलीय चश्मे से देखता है; वह स्वयं भी उस हिंसा का भागीदार बन जाता है। गरिमा का प्रश्न वामपंथ और दक्षिणपंथ का प्रश्न नहीं है। सत्ता और विपक्ष का प्रश्न नहीं है। यह उस संविधान का प्रश्न है, जिसे आंबेडकर ने इसलिए नहीं लिखा था कि उसे किसी दल की विजय-पताका बनाया जाए; इसलिए लिखा था कि हर मनुष्य, हर परिस्थिति में, अपनी देह और आत्मा की गरिमा के साथ खड़ा रह सके। जो शब्द किसी की गरिमा गिराए; वह शब्द नहीं, संविधान पर प्रहार है। और जो इसे देखकर भी मौन रहे ; वह मौन, सहमति है।

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Rahul Singh Lodhi
Rahul Singh Lodhi@Rasingh25·
कोई दुख मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं वही हारा जो लड़ा नहीं ~कुंवर नारायण~
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Ashwini Yadav
Ashwini Yadav@iamAshwiniyadav·
भयंकर आँधी-पानी 💔 ये गर्मी से राहत देने के बजाय हर तरह की फसल को तबाह कर गयी है। पता नहीं कितनों के छप्पर उड़ जायेंगें, कितने पेड़, कितनी फसल, कितने मवेशी, कितने इंसान... सब कुछ इसकी चपेट में आएगा।😭 प्रभु सबकी रक्षा करें।
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Rahul Singh Lodhi retweetet
सुरेश पंत sureshpant
अखबारों से प्रूफ रीडर नाम का प्राणी लुप्त हो गया। यह मानकर चलते हैं कि कोई कॉपी रिपोर्टर लिख रहा है तो उसमें प्रयुक्त वर्तनी आदि देखने की जिम्मेदारी उसकी है। व्यवहार में ऐसा नहीं है। रिपोर्टर ही नहीं अब कॉपी डेस्क पर भी भाषा और विषय की अच्छी समझ वाले लोग कम हो रहे हैं। मीडिया हाउसों को इस तरफ ध्यान देना चाहिए। अक्सर टीवी चैनलों के स्क्रॉल और कैप्शनों में बड़ी गलतियाँ होतीं हैं। सुपरिभाषित शैली पुस्तिका और एक अंदरूनी गुणवत्ता सिस्टम इसे ठीक कर सकता है। पठनीय 👇pramathesh.blogspot.com/2026/05/blog-p…
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Rahul Singh Lodhi
Rahul Singh Lodhi@Rasingh25·
हिंदी विश्व की सबसे सुंदर भाषा है।
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Vistaar News
Vistaar News@VistaarNews·
भोपाल के बड़ा बाग कब्रिस्तान में हुआ शहूर शायर बशीर बद्र का अंतिम संस्कार #BashirBadr #Bhopal #BashirBadrDeath
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