Mukesh Kumar Sinha

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@Tweetmukesh

Poet | Blogger | Editor | Gardening | Cooking प्रकाशन: हमिंगबर्ड | ...है न ! (कवितासंग्रह) | लाल फ्रॉक वाली लड़की(लप्रेक)| संपादन: 8 साझासंग्रह | संस्थापक: गूंज

New Delhi, India Beigetreten Ocak 2011
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Angehefteter Tweet
Mukesh Kumar Sinha
Mukesh Kumar Sinha@Tweetmukesh·
तुम हो खास बुक मार्क की तरह। मैंने जिंदगी की अपनी सारी किताबों में रखा हुआ है सिर्फ तुम्हे। (विश्व पुस्तक दिवस की शुभकामनाएं 😊)
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New Delhi, India 🇮🇳 हिन्दी
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Mukesh Kumar Sinha
Mukesh Kumar Sinha@Tweetmukesh·
दुःख व उदासी हैं सहोदर हैं बेवकूफ क्योंकि खिलखिला लेती है मेरे वजूद से लिपट कर कभी तुम भी आना मिलेंगे उसी पुराने टीले के साथ वाले कुएं के जल से सींचती बरगद के हरियाली के नीचे आओगी न आ भी जाना खिलखिलाना इतना भी बुरा नहीं उदासियों में तो मुस्कुराहट उर्वरक सी ही है
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गूँज
गूँज@goonjabhivyakti·
कविता दिन-भर थकान जैसी थी और रात में नींद की तरह सुबह पूछती हुई क्या तुमने खाना खाया रात को? - मंगलेश डबराल
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गूँज
गूँज@goonjabhivyakti·
ठेस यदि बार- बार लगे तब मन इतना ज्यादा सतर्क हो जाता है कि हम ठोकर के आभास मात्र से पीछे हट जाते है । - जुली सहाय
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Mukesh Kumar Sinha
Mukesh Kumar Sinha@Tweetmukesh·
कुछ तो है तेरी शख़्सियत में कि हर बार नज़रें ठिठक जाती हैं ठिठककर निहारना, निहारते-निहारते ठिठक जाना… कहीं इन नज़रों के तारों में गुलाबी-सा कोई प्रवाह तो नहीं ?
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गूँज
गूँज@goonjabhivyakti·
दुनिया में अच्छी चीजों की गिनती तुम्हारी मुस्कराहट और मेरी कविता के बिना पूरी नहीं हो सकती। - राकेश रोहित @RakeshRoh
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गूँज
गूँज@goonjabhivyakti·
किसी को तलब मार गई हमारी, और कोई हमें पा कर भी ख़ुश न हुआ! - जॉन एलिया
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गूँज
गूँज@goonjabhivyakti·
बुरे दिनों में अच्छी कविता कही अच्छे दिनों में प्रेम किया इस तरह बुरे, अच्छे दिनों का सही इस्तेमाल किया ० अपूर्व मोहन
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गूँज
गूँज@goonjabhivyakti·
ज़माने से उनको सुना ही नहीं है जमाने में जिनसे ज़माने लगे हैं - आर्या झा @Aryajha60992732
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गूँज
गूँज@goonjabhivyakti·
मृत्यु ---- मैं उनसे कभी नहीं मिला था और शायद मिलता भी नहीं कभी पर यह खयाल ही अब खाए जा रहा है मुझे कि मैं उनसे अब कभी मिल नहीं पाऊँगा। - विनोद पदरज
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गूँज
गूँज@goonjabhivyakti·
जो तकरार हुई तुम से, शिकस्त पक्की है मेरी मसअला ताकत का नहीं, उसूलों का है.... - अलंकृता राय
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गूँज
गूँज@goonjabhivyakti·
तपते जेठ-वैशाख में ओढ़ पीत- उजास , डालकर गलबहियाँ खिलखिलाते अमलतास l - सुनीता सिंह
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गूँज
गूँज@goonjabhivyakti·
न होने की नदी में होने का खेल खेलते हुए ही सारे पुल बनाए जा सके। (कवितांश) -प्रिया वर्मा @Priyave95987967
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गूँज
गूँज@goonjabhivyakti·
जल रहा है देश और सिंक रही हैं रोटियाँ दहशतों के दौर में न टिक रही हैं रोटियाँ कुर्सियों के पेट इस क़दर बढ़े हुए कि अब रोटियों की चाह में ही बिक रही हैं रोटियाँ - सुमन मिश्रा
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गूँज
गूँज@goonjabhivyakti·
चीज़ों को बहुत संभाल कर रखने की अपनी आदत की वजह से कई बार वह उन दुःखों को भी संभालती रही जिसे याद भर करने से वो दर्द से कराह उठती थीं अपनों का दिया हुआ आघात असहय होता है जो नासूर की तरह टीसता रहता है - वंदना पराशर
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Gunjan Agrawal
Gunjan Agrawal@Gunj26·
इंतजार🌷 मुकेश कुमार सिन्हा@Tweetmukesh
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गूँज
गूँज@goonjabhivyakti·
लगते इतने गूढ़ वो, जैसे कोई वेद, समझेंगे कैसे भला, कहो नयन के भेद।। - सविता सिंह मीरा
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गूँज
गूँज@goonjabhivyakti·
आप के पास अगर दो रुपए हैं, तो एक रुपए की रोटी लीजिये और एक रुपए की किताबें । रोटी से आप जी सकेंगे और किताबों से "कैसे जीना चाहिये" ये सीख सकेंगे । - डॉ भीमराव अंबेडकर
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गूँज
गूँज@goonjabhivyakti·
झाड़ू सारी रात करवट बदलती रहती है पौ फूटे वह काम पर लगे जब तक सब कुछ बुहार नहीं लेती चैन नहीं लेती अपने काम से संतुष्ट होकर पसर जाती है थकती नहीं • अपूर्व मोहन
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