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Dr. Sushil Kumar Jha
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Dr. Sushil Kumar Jha
@damini2003
चन्दनं शीतलं लोके,चन्दनादपि चन्द्रमाः । चन्द्रचन्दनयोर्मध्ये शीतला साधुसंगतिः ।। संसार में चन्दन को शीतल माना जाता है लेकिन चन्द्रमा चन्दन से भी शीतल होता है।
New Delhi, India Beigetreten Ocak 2011
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वृंदावन की पवित्र भूमि पर एक शांत और सुहानी रात थी। आकाश में अनगिनत तारे चमक रहे थे और पूर्णिमा का चाँद अपनी उजली चाँदनी से पूरे वातावरण को प्रकाशित कर रहा था। यमुना नदी का निर्मल जल चाँदनी को प्रतिबिंबित कर रहा था, जिससे चारों ओर एक दिव्य और मनमोहक दृश्य बन गया था। चारों तरफ खिले हुए फूलों की सुगंध फैल रही थी और छोटे-छोटे जुगनू हवा में चमकते हुए मानो रात को और भी सुंदर बना रहे थे।
यमुना तट के पास एक सुंदर वृक्ष के नीचे बाल रूप में श्रीकृष्ण खड़े थे। उन्होंने पीले रंग की धोती पहनी हुई थी और उनके घुंघराले बालों में मोरपंख सजा हुआ था। उनके मुख पर मधुर मुस्कान थी और वे अपनी बांसुरी से मधुर धुन बजा रहे थे। उनकी बांसुरी की ध्वनि इतनी मधुर थी कि पूरा वृंदावन जैसे उस संगीत में डूब गया था।
राधा रानी पास ही बैठी थीं और बड़े प्रेम से कृष्ण को निहार रही थीं। उनके चेहरे पर आनंद और शांति की झलक दिखाई दे रही थी। उनके साथ कुछ सखियाँ भी बैठी थीं, जो कृष्ण की बांसुरी की मधुर धुन सुनकर प्रसन्न हो रही थीं।
पास ही एक छोटा बछड़ा शांत होकर बैठा था और एक सुंदर मोर भी मानो उस संगीत को सुनने के लिए ठहर गया था। यमुना के जल में खिले कमल के फूल चाँदनी में चमक रहे थे और हवा की हल्की लहरें वातावरण को और भी पवित्र बना रही थीं।
उस रात ऐसा लग रहा था मानो वृंदावन की हर वस्तु—नदी, पेड़, फूल, पशु-पक्षी और लोग—सब श्रीकृष्ण की बांसुरी के दिव्य संगीत में मग्न हो गए हों।
यह केवल एक सुंदर दृश्य नहीं था, बल्कि राधा-कृष्ण की एक पावन **बाल-लीला** थी, जिसमें प्रेम, भक्ति और प्रकृति की सुंदरता एक साथ मिलकर एक अद्भुत और दिव्य क्षण का निर्माण कर रही थी। 🌙🦚🎶

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✨ माँ लक्ष्मी और कुबेर देव की कृपा ✨
जहाँ माँ लक्ष्मी की कृपा होती है, वहाँ धन, सुख और समृद्धि का कभी अभाव नहीं होता।
और जब धन के देवता कुबेर देव का आशीर्वाद साथ हो, तो जीवन में वैभव और खुशहाली चारों ओर फैल जाती है।
माँ लक्ष्मी और कुबेर देव से प्रार्थना है कि वे सभी के जीवन को धन, समृद्धि, सफलता और खुशियों से भर दें। 🙏
🌺 जय माँ लक्ष्मी
💰 जय कुबेर देव महाराज

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" कृष्ण टेढ़े क्यों है टेढ़े कान्हा की कथा "
बहुत ही अद्भूत कथा है हमारा बेड़ा पार तो हमारे कान्हा जी ही लगा सकते है !
एक बार की बात है ,वृंदावन का एक साधू अयोध्या की गलियों में राधे कृष्ण राधे कृष्ण जप रहा था । अयोध्या का एक साधू वहां से गुजरा तो राधे कृष्ण राधे कृष्ण सुनकर उस साधू को बोला ,अरे जपना ही है तो सीता राम जपो, क्या उस टेढ़े का नाम जपते हो ?
वृन्दावन का साधू भडक कर बोला -ज़रा जुबान संभाल कर बात करो, हमारी जुबान भी पान भी खिलाती हैं तो लात भी खिलाती है । तुमने मेरे इष्ट को टेढ़ा कैसे बोला ?
अयोध्या वाला साधू बोला इसमें गलत क्या है ? तुम्हारे कन्हैया तो हैं ही टेढ़े । कुछ भी लिख कर देख लो-
उनका नाम टेढ़ा – कृष्ण
उनका धाम टेढ़ा – वृन्दावन
वृन्दावन वाला साधू बोला चलो मान लिया, पर उनका काम भी टेढ़ा है और वो खुद भी टेढ़ा है, ये तुम कैसे कह रहे हो ?
अयोध्या वाला साधू बोला – अच्छा अब ये भी बताना पडेगा ? तो सुन
जमुना में नहाती गोपियों के कपड़े चुराना, रास रचाना, माखन चुराना – ये कौन सीधे लोगों के काम हैं ? और आज तक ये बता कभी किसी ने उसे सीधे खडे देखा है कभी ?
वृन्दावन के साधू को बड़ी बेइज्जती महसूस हुई , और सीधे जा पहुंचा बिहारी जी के मंदिर । अपना डंडा डोरिया पटक कर बोला – इतने साल तक खूब उल्लू बनाया लाला तुमने ।
ये लो अपनी लुकटी, ये लो अपनी कमरिया, और पटक कर बोला ये अपनी सोटी भी संभालो ।
हम तो चले अयोध्या राम जी की शरण में ।
और सब पटक कर साधू चल दिये ।
अब बिहारी जी मंद मंद मुस्कुराते हुए उसके पीछे पीछे । साधू की बाँह पकड कर बोले अरे ” भई तुझे किसी ने गलत भडका दिया है ”
पर साधू नही माना तो बोले, अच्छा जाना है तो तेरी मरजी , पर ये तो बता राम जी सीधे और मै टेढ़ा कैसे ? कहते हुए बिहारी जी कूंए की तरफ नहाने चल दिये ।
वृन्दवन वाला साधू गुस्से से बोला
” नाम आपका टेढ़ा- कृष्ण,
धाम आपका टेढ़ा- वृन्दावन,
काम तो सारे टेढ़े- कभी किसी के कपडे चुरा, कभी गोपियों के वस्त्र चुरा, और सीधे तुझे कभी किसी ने खड़े होते नहीं देखा। तेरा सीधा है किया”।
अयोध्या वाले साधू से हुई सारी झैं झैं और बइज़्जती की सारी भड़ास निकाल दी।
बिहारी जी मुस्कुराते रहे और चुप से अपनी बाल्टी कूँए में गिरा दी ।
फिर साधू से बोले अच्छा चला जाइये, पर जरा मदद तो कर जा, तनिक एक सरिया ला दे तो मैं अपनी बाल्टी निकाल लूं ।
साधू सरिया ला देता है और कृष्ण सरिये से बाल्टी निकालने की कोशिश करने लगते हैं ।
साधू बोला अब समझ आइ कि तौ मैं अकल भी ना है।
अरै सीधै सरिये से बाल्टी भला कैसे निकलेगी ?
सरिये को तनिक टेढ़ा कर, फिर देख कैसे एक बार में बाल्टी निकल आवेगी ।
बिहारी जी मुस्कुराते रहे और बोले – जब सीधापन इस छोटे से कूंए से एक छोटी सी बालटी नहीं निकाल पा रहा, तो तुम्हें इतने बडे भवसागर से कैसे पार लगा सकेगा ?
अरे आज का इंसान तो इतने गहरे पापों के भवसागर में डूब चुका है कि इस से निकाल पाना मेरे जैसे टेढ़े के ही बस की है !
श्री द्वारिकेशो जयते।
बोलिये वृन्दावन बिहारी लाल की जय।
जय जय श्री राधे।

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चैत्र नवरात्रि विशेष – सिद्धकुंजिका स्तोत्र महिमा🌷
नवरात्रि के पावन दिनों में सिद्धकुंजिका स्तोत्र का पाठ अत्यंत प्रभावशाली माना गया है। यह स्तोत्र दुर्गा सप्तशती की कुंजी माना जाता है, जिसका श्रद्धा से पाठ करने पर सम्पूर्ण सप्तशती के पाठ का फल प्राप्त होता है। यह साधकों के लिए देवी कृपा प्राप्त करने का सरल और शक्तिशाली मार्ग है।
श्री सिद्धकुंजिकास्तोत्रम्
शिव उवाच
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम् ।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः भवेत् ॥१॥
न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम् ।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम् ॥२॥
कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत् ।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ॥३॥
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति ।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।
पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम् ॥४॥
अथ मन्त्रः
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः
ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा
इति मन्त्रः॥
नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ॥१॥
नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिन ॥२॥
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे ।
ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका ॥३॥
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते ।
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी ॥४॥
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिण ॥५॥
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी ।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देविशां शीं शूं मे शुभं कुरु ॥६॥
हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी ।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः ॥७॥
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा ॥
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ॥८॥
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिंकुरुष्व मे ॥
इदंतु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे ।
अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति ॥
यस्तु कुंजिकया देविहीनां सप्तशतीं पठेत् ।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ॥
इतिश्रीरुद्रयामले गौरीतंत्रे शिवपार्वती
संवादे कुंजिकास्तोत्रं संपूर्ण।
साधक प्रतिदिन प्रातःकाल या रात्रि में एकाग्र होकर इस स्तोत्र का पाठ करें। लाल आसन पर बैठकर दीपक जलाकर माता का ध्यान करते हुए श्रद्धा से जप करने पर साधना में शीघ्र सिद्धि, नकारात्मक शक्तियों से रक्षा और मनोकामनाओं की पूर्ति के संकेत प्राप्त होते हैं।
यह स्तोत्र अत्यंत शक्तिशाली है, इसलिए इसका पाठ सदैव शुद्ध भाव, संयम और सकारात्मक संकल्प के साथ ही करना चाहिए। नवरात्रि के नौ दिनों तक नियमित पाठ करने से विशेष फल प्राप्त होता है और माता की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है।
जय माता दी✨🔥🌟

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🌺माता लक्ष्मी जी ✨🌺🚩🌿
धन, समृद्धि और सुख की अधिष्ठात्री माता लक्ष्मी जी का आशीर्वाद जिस पर बना रहता है, उसके जीवन में कभी अभाव नहीं रहता।
माता हमें केवल धन ही नहीं, बल्कि शांति, संतोष और सकारात्मकता भी प्रदान करती हैं।
आइए, सच्चे मन से उनकी पूजा करें और अपने कर्मों को भी पवित्र बनाएं, ताकि उनका आशीर्वाद सदैव बना रहे। 🙏
"ॐ श्री महालक्ष्म्यै नमः" 🌺🌿

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