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अगर किसी देश में राष्ट्रपति, जो प्रथम नागरिक होता है, फिर भी स्वयं को शोषित और वंचित बताये; अगर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्री वर्षों तक सत्ता में रहने के बावजूद भी अपने आप को पिछड़ा कहते रहें, तो ऐसे देश को महान कहना वास्तव में एक विडंबना है।
यदि किसी देश में केवल जाति के आधार पर पीढ़ी दर पीढ़ी उच्च पदों पर पहुंचने वाले परिवार स्वयं को शोषित बताकर विशेष सुविधाओं और आरक्षण की मलाई का लाभ उठाते रहें, जबकि दूसरी ओर, सीमित संसाधनों—जैसे दो बीघा या उससे कम भूमि—पर किसी तरह जीवन यापन करने वाले परिवारों को ही शोषक बताया जाए और उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़े, तो यह व्यवस्था न्याय और समानता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
और यदि अतीत की तथाकथित शोषण की घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर और उसे Weaponise करके उनका दुरुपयोग किया जाए, तो इससे न केवल सामाजिक संतुलन बिगड़ता है, बल्कि यह देश के भविष्य के लिए भी चिंताजनक संकेत है। जिस तथाकथित शोषण का जिम्मेदार वर्तमान के व्यक्ति हैं ही नहीं, तो उनको सजा नहीं मिलनी चाहिए।
आरक्षण और अफ्फर्मटिवे एक्शन्स एक सीमा के अंदर होने चाहिये, न कि उनको मेरिट को नज़रंदाज़ करके स्कैम के रूप में वोट बैंक पॉलिटिक्स के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिये।
ऐसी परिस्थितियों में किसी भी राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की कल्पना करना कठिन हो जाता है। इन हालातों के मुख्य जिम्मेदार राजनैतिक नेता और दल हैं।
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