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कर्ण
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कर्ण
@1981bhs
गुरुसियाग सिद्धयोग अभ्यासी Website https://t.co/awBtoo5e3z ,मुझे फॉलों मत करना ईश्वरीय तत्व को फॉलो करो या फॉलो उनको करे जिनसे आपको स्वयं का साक्षात्कार हो🙏
जहा मेरे गुरुदेव Inscrit le Aralık 2012
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#AwakenYourSoulbyGSSY When the mind is out of order, no positive outcome can be obtained. So, in Gurudev Siyag's Siddhayoga, diseases of teh mind, body & spirit r overcome & addictions disappear without withdrawal symptoms preparing the way for Self Realization

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It is not because there is something bad in you that blows fall on you,—blows fall on all human beings because they are full of desire for things that cannot last and they lose them or, even if they get, it brings disappointment and cannot satisfy them.
#SriAurobindo

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#AwakenYourSoulbyGSSY
Guru Siyag’s Siddha Yoga
• Guru Siyag’s Siddha Yoga (GSSY) is a purely meditation-based yoga.
• The practice of GSSY awakens the Kundalini.
• The Kundalini is a female energy force that lies dormant at the base of the spinal column in every human body.
• Awakening of the Kundalini through GSSY brings about three major.
benefits: Healing or curing of physical diseases and freedom from addiction and stress.
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#AwakenYourSoulbyGSSY True Yoga happens when our inner resistance to the Divine force of Transformation is overcome thru inner surrender. Gurudev Siyag's Siddhayoga practice makes this surrender possible thru mental chanting & meditation

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गुरुदेवसियाग ध्यानयोग कार्यक्रम!
दिनांक: 7 अप्रैल 2026
स्थान: राउमावि,खानपुर (झालावाड़)
आयोजक: अध्यात्म विज्ञान सत्संग केंद्र जोधपुर शाखा कोटा।
विशेष: विश्व स्वास्थ्य दिवस के उपलक्ष्य में।
#TrueWorshipEndsSuffering
Jay shree Gurudev 🙏
#AwakenYourSoulbyGSSY




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***मौन में शक्ति संचित करो
और आध्यात्मिकता का
एक गतिशील स्रोत बन जाओ।***🌹🌹
~~स्वामी विवेकानन्द✨


Sangeeta tiwari (Hindu)@ST64607
@VinayKu26612542 Jay shree Gurudev 🙏 #AwakenYourSoulbyGSSY
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#AwakenYourSoulbyGSSY In Gurudev Siyag's Siddhayoga we meditate on Gurudev 's image at the Third eye. Since the Guru has become One with the manifested & non manifested aspects of the Divine with Krishna & Gayatri Siddhi, His image arrests the mind leading to deeper meditation

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Jai Gurudev 🌹🌹
***संजीवनी मंत्र , यह राधा और कृष्ण का मंत्र है इसमें दोनों तत्व शामिल है।"🌹🌹


𝕊𝕠𝕟𝕚𝕪𝕒 shyam 𝔾𝕠𝕪𝕒𝕝@SaAgarwal68884
राधा बिना कृष्ण अधूरे, कृष्ण बिना राधा सूनी। ये प्रीत न कोई तोड़ सका, ये डोर है अनोखी..!!
हिन्दी

@Dipti_2205 @Rajasthanwalla लाजवाब 🙏
बात तो छोटी ही है पर बात में दम है...
तारीफ क्या ही करे ,मेरे पास शब्द भी कम है....
हिन्दी
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🙏* OM SHRI GANGAI NATHAY NAMAH🔱*🙏
Website:the-comforter.org
🙏ॐ श्री गंगाईनाथाय नमः 🙏
#SpiritualBliss
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Part 40
शब्द से सृष्टि की उत्पत्ति के सिद्धान्त विश्व के सभी धर्म मानते हैं। इसी सार्वभौम सिद्धान्त के आधार पर हमारे ऋषियों ने मंत्र शास्त्र की रचना की है। सृष्टि के संबंध में ज्ञान संकलिनी तन्त्र में कहा है-
आकाशज्जायते वायुर्वायोत्पद्यते रविः ।
रवेरुत्पद्यते तोयं तोयादुत्पधते मही ।। 25 ।।
'आकाश से हवा, हवा से अग्नि अग्नि से जल और जल से पृथ्वी उत्पन्न होती है।' और संसार के सभी प्राणी पृथ्वी से उत्पन्न हुए। हमारे शास्त्र भी इन्ही पाँच तत्वों से मनुष्य शरीर की रचना मानते हैं।
पाँचों तत्वों की सूक्ष्मावस्था को तन्मात्र भी कहते है।जैसे पृथ्वी की गन्धतन्मात्रा, जल की रसतन्मात्रा, अग्नि की रुपतन्मात्रा, वायु की स्पर्शतन्मात्रा और आकाश की शब्द तन्मात्रा। क्योंकि सृष्टि का जनक शब्द तन्मात्रा है, इसलिए जिस प्रकार अधोगमन के कारण मनुष्यों की उत्पत्ति हुई, उसी प्रकार शब्द (मंत्र) के सहारे ऊर्ध्व गमन करता हुआ मनुष्य छह चक्रों और तीन ग्रन्थियों का वेधन करता हुआ अपने जनक आकाशतत्व (सहसार) में लय हो सकता है। इसी का नाम मोक्ष है।
यहूदियों ! अब करूण पुकार का समय है।
कालचक्र अनादिकाल से अबाध गति से चलता आया है और चलता रहेगा। युग परिवर्तन प्रकृति का अटल सिद्धान्त है। ईश्वर समय-समय पर संपूर्ण विश्व में संतों को पैदा करके शान्ति स्थापित करता है। परन्तु जब तामसिक वृत्तियाँ इतनी प्रबल हो जाती है और संतों उपदेश का कुछ भी प्रभाव नहीं होता, वरन वे संत पुरूषों को तंग ही नहीं करती है, उनके प्राण तक ले लेती है। ऐसी स्थिति में उस परमसत्ता को उन दुष्ट वृतियों का संहार करने को स्वयं अवतार लेना होता है क्योंकि तामसिक वृत्तियाँ निर्दयी और क्रूर होती है। अतः वे लड़ाई किए बिना कभी नहीं मानती। अतः युग परिवर्तन की प्रथम शर्त है,नरसंहार। इतिहास साक्षी है ऐसा हर युग परिवर्तन के समय हुआ।
यीशु न भी युग परिवर्तन की स्पष्ट शब्दों में घोषणा की है। युग परिवर्तन में जो भंयकर नरसंहार होगा उसका वर्णन करते हुए उसने कहा है- सैंट मार्क 13:11 से 20 'क्योंकि वे दिन ऐसे क्लेश के होंगे कि सृष्टि के आरंभ से जो परमेश्वर ने सृजी हैं अब तक न तो हुए और न कभी होंगे। और यदि प्रभु उन दिनों को न घटाता तो कोई प्राणी भी नहीं बचता, परन्तु उन चुने हुओं के कारण जिनको उसने चुना है, उन दिनों को घटाया।
काई प्रामी भी नहीं बचता, परन्तु उन चुने हुओं के कारण जिनको उसने चुना है, उन दिनों को घटाया।
यीशु ऐसे ही अंधकारपूर्ण युग में प्रकट हुआ। उस समय तामसिक वृत्तियों ने प्रभु के मंदिर में भी व्यभिचार और पापों का अड्डा बना रखा था। यीशु ने ज्योंही उन वृत्तियों का विरोध करना प्रारंभ किया कि वे क्रोधित हो उठी। उन्होंने अकारण ही उस पवित्रात्मा को मृत्यु दण्ड दिलवा दिया। उसका दोष मात्र यही था कि उसने कह दिया कि मैं ईश्वर का पुत्र हूँ। इसी संदर्भ में उसने उस समय के धर्माचार्यों से कहा कि अगर मेरी बात असत्य है तो जो चमत्कार-पूर्ण कार्य प्रभु ने मेरे से करवाये आप लोगों में से कोई करके दिखा दे। परन्तु फिर भी उस समय के क्रूर धर्म-गुरु नहीं माने और उस निर्दोष को मृत्यु दंड दिलवा दिया।
जब उस निर्दोष के प्राण लिए गए तो प्रकृति बहुत ही कुपित हुई। इस संबंध में बाइबल में लिखा है- 'दो पहर से लेकर तीसरे पहर तक उस सारे देश में अंधेरा छाया रहा। तीसरे पहर के निकट यीशु ने बड़े शब्द से पुकार कर कहा 'एली' एली, लमा शबक्तनी? अर्थात् हे मेरे परमेश्वर ! तूने मुझे क्यों छोड़ दिया? जो वहाँ खड़े थे, उनमें से कितनों ने यह सुनकर कहा, यह तो एलियाह को पुकारता है। औरों ने कहा ठहरो एलियाह उसे बचाने आता है कि नहीं। उस समय धर्माचार्यों ने उस समय खुशियाँ मनाई। उन्होंने कहा देखते हैं मंदिर ढ़ाने वाला और तीन दिन में बनाने वाला क्रूस पर से उतर कर अपने आप को बचा लें। इसी प्रकार महामायाजक भी शास्त्रियों सहित आपस में ठट्टे से कहते थे, कि उसने औरों को बचाया और अपने आप को नहीं बचा नहीं सकता। इस्राएल का राजा अब क्रूस पर से उतर आए कि हम विश्वास करें।
यीशु की भविष्यवाणी के अनुसार इस युग के अंत के समय भी प्रकृति वही रूप धारण करेगी, जो कुपित होकर उस महान आत्मा की मृत्यु के समय धारण किया था। इस भविष्यवाणी का समय ज्यों-ज्यों पास आ रहा है, तामसिक वृत्तियाँ भयभीत हो रही है। प्राण तो सभी का प्यारे होते हैं। उस निर्दोष पवित्र आत्मा ने तीन बार औंधे मुंह गिरकर प्राण रक्षा के लिए कैसी करुण पुकार की थी, परन्तु फिर भी क्या उसके प्राण बचे सके ? इसी प्रकार भविष्यवाणी के अनुसार इस युग का अंत होगा और उन वृत्तियों को उनकी करनी दंड मिलेगा। प्रभु के घर न तो देर है और न अंधेर ही। पाप का घड़ा भरने पर ही फूटता ही है। यह प्रभु की पूर्व निश्चित व्यवस्था है, जो कि अटल है।

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Part 41
आज विश्व भर में प्रभु का सुसमाचार सुनाने वालों के कानों में उस पवित्र आत्मा के ये करुण शब्द कि 'आत्मा तो तैयार है, परन्तु शरीर दुर्बल है' क्या नहीं गूंजते ? इन शब्दों में इतनी प्रबल शक्ति है कि धनबल और जनबल के सहारे धर्म का प्रचार-प्रसार करने वाले मठाधीशों की नींद हराम हो जाएगी।
रोग एक नहीं कई लगे है। बाइबल बारम्बार उस पीढ़ी के अंत की बात कहती है, जो युग परिवर्तन के समय होगी। इस संबंध में 2 पीटर के 3:3 से 8 एवं 10 से 13 में स्पष्ट शब्दों में कहा है- 'और यह जान लो कि अंतिम दिनों में हंसी ठट्टा करने वाले लोग आएँगे, जो अपनी ही अभिलाषाओं के अनुसार चलेंगे। और कहेंगे, उसके आने की प्रतिज्ञा कहाँ गई? क्योंकि जब से बाप दादा सो गए हैं, सब कुछ ऐसा ही है, जैसा सृष्टि के आरंभ से था। वे तो जान बूझ कर भूल गए हैं कि परमेश्वर के शब्द (वचन) के द्वारा आकाश प्राचीन काल से वर्तमान है, और पृथ्वी भी जल से बनी और जल में स्थिर है। इन्ही के द्वारा उस युग का जगत जल में डूब कर नाश हो गया था। पर वर्तमान काल के आकाश और पृथ्वी उसी वचन के द्वारा इसलिए रखें कि जलाए जाएँ, और वह भक्तिहीन मनुष्यों के न्याय और नाश होने के दिन तक ऐसे ही रखे रहे।' 'परन्तु प्रभु का दिन चोर की नाई' आएगा, उस दिन आकाश बड़ी हड़हड़ाहट के शब्द के साथ जाता रहेगा, और, तत्व बहुत ही तप्त होकर पिघल जाएँगे, और पृथ्वी और उस पर के काम जल जाएँगे। तो जब ये सब वस्तुएँ इस रीति से पिघलने वाली हैं, तुम्हें पवित्र चाल-चलन और भक्ति में कैसे मनुष्य होने चाहिए। और परमेश्वर के उस दिन की किस रीति से बाट जोहनी चाहिए और उसके जल्द आने के लिए कैसा यत्न करना चाहिए, जिसके कारण आकाश आग से पिघल जाएँगे, और आकाश के गण बहुत ही तप्त होकर गल जाएँगे। पर उसकी प्रतिज्ञा के अनुसार हम एक नये आकाश और नई पृथ्वी की आस देखते हैं जिसमें धार्मिकता वास करेगी।'
यहूदियों को मात्र यीशु ने ही श्राप नहीं दिया था, जिसका वर्णन पहले किया जा चुका है, बल्कि परमेश्वर ने भी 'भारी श्राप' दिया हुआ है। इस संबंध में मलाकी 3:8 से 10 में कहा है- क्या मनुष्य परमेश्वर को धोखा दे सकता है? देखों तुम मुझको धोखा देते हो, और पूछते हो कि हमने किस बात में तुझे लुटा ? दशमांश और उठाने की भेंटों में। तुम पर भारी श्राप पड़ा है क्योंकि तुम मुझे लूटते हो वरन सारी जाति ऐसा करती है।
युग परिवर्तन के बारे में पुराने नियम में भी जगह-जगह भविष्यवाणियाँ की हुई है। इस संबंध में मलाकी 4:1 से 3 'क्योंकि देखो वह धधकते भट्टे का सा दिन आता है, जब सब अभिमानी और सब दुराचारी लोग अनाज की खूंटी बन जाएँगे, और उस आने वाले दिन में वे ऐसे भस्म हो जाएँगे कि उनका पता तक न रहेगा, सेनाओं का यहोवा का यही वचन है।
अतः यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के द्वारा स्वर्ग राज्य की घोषणा किये जाने के समय से लेकर मसीह का बादलों में पुनरागमन तक यह व्यवस्था का युग जारी रहेगा (मती 11:12 एंव लूक 16:16) अनुग्रह के युग के शुरुआत के साथ ही व्यवस्था समाप्त हो जावेगी।
ईसाई जगत् को अनुग्रह के युग की अभी जानकारी नहीं है। वे तो मात्र अपनी पुस्तकों के आधार पर उस युग की कल्पना करते हैं। जब उन पर अनुग्रह होगा, तब वे पूर्ण सत्य से अवगत होंगे। इस संबंध में स्वामी मुक्तानन्द जी ने अपनी पुस्तक 'कुंडलिनी जीवन का रहस्य' में कश्मीरी शैव सिद्धान्त का वर्णन करते हुए लिखा है- 'कश्मीरी शैव- सिद्धान्त के अनुसार ईश्वर के पंचकृत्य है- सृष्टि, स्थिति, लय, तिरोधान और अनुग्रह। पाँचवा कृत्य जो अनुग्रह है, उससे मानव को अपनी व विश्व की यर्थाथता का बोध होता है। कश्मीरी शैव- सिद्धान्त में गुरू का पाँचवा कार्य सम्पन्न करने वाला अर्थात् अनुग्रहकर्त्ता के रूप में माना गया है। शिवसूत्र विमर्शिनी कहती है:-
'गुरूर्वा पारमेश्वरी अनुग्रहिका शक्तिः "गुरु परमेश्वर की अनुग्रह शक्ति है'।
वह शक्ति की पुरातन प्रक्रिया द्वारा अनुग्रह प्रदान करता है, जिससे साधक की सुषुप्त कुण्डलिनी क्रियाशील हो जाती है।'

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Part 42
बाइबल में जिस पवित्रात्मा के बपतिस्में' (शक्तिपात दीक्षा) की बात कही गई है जब वह उन्हें मिलने लगेगी, तब ईसाई जगत् को अनुग्रह की वास्तविकता का ज्ञान होगा। इस दीक्षा से 2 कुरिन्थियों के 6:16 में वर्णित सार्वभौम सिद्धान्त के अनुसार मन मंदिर में ही मनुष्यों को उस परमसत्ता की प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार होने लगेंगे। ऐसी स्थिति में मानव निर्मित मंदिरों की लोगों को आवश्यकता ही नहीं रहेगी। इस प्रकार उस सहायक के प्रकट होकर शक्तिपात दीक्षा देने कारण ही चर्चों और मंदिरों का अस्तित्व समाप्त होगा, न कि ईश्वर विरोधी और यीशु विरोधी तत्वों के कारण। यह व्यवस्था संपूर्ण विश्व में एक साथ बदलेगी।'
हे यहूदियों ! यीशु और परमेश्वर के भारी श्राप के कारण यहूदी जाति का भारी संहार होने वाला है, उसे ध्यान में रखते हुए करुण पुकार का समय है। उस महान आत्मा ने बहुत दुःखी होकर यहूदियों को कहा था कि- 'तुम्हारा घर तुम्हारे लिए उजाड़ छोड़ा जाता है। क्योंकि मैं तुमसे सच कहता हूँ कि अब से जब तक तुम न
कहोगे कि धन्य है वह जो प्रभु के नाम से आता है, तब तक तुम मुझे फिर कभी न देखोगे।'
दानियेल 12:11 एवं 12 को यहूदियों को कभी नहीं भूलना चाहिए।' जब से नित्य होमबलि उठाई जाएगी, और वह घिनौनी वस्तु जो उजाड़ करा देती है, स्थापित की जाएगी, तब से बारह सौ नब्बे दिन बीतेंगे। क्या ही धन्य है वह जो धीरज धरकर तेरह सौ पैंतीस दिन के अंत तक भी पहुँचे।'
बाइबल की सभी भविष्यवाणियों के अनुसार वह सहायक 20 वीं सदी के अंत से पहले प्रकट हो जाएगा। संसार में तामसिक वृत्तियाँ इतनी प्रभावी हो चली है कि किसी भी धर्म के लोगों को अपने धर्म ग्रन्थ पर थोड़ा भी विश्वास नहीं रह गया है। सभी लोग ऐसा मान के चल हैं कि ऐसा कुछ भी नहीं होने जा रहा है। कलियुग की करामात देखो सब की अक्ल को भी अंधा कर दिया है संत श्री तुलसीदास जी यह बात पूर्ण सत्य प्रमाणित हो रही है कि 'जाको प्रभु दारूण दुख देहि बाकी मति पहिले हर लेहि।'
विश्व के अविश्वासी नास्तिक चाहे संतों की भविष्यवाणियों पर विश्वास करें या न करें, प्रभु की पूर्व निश्चित व्यवस्था में कोई अन्तर नहीं आवेगा। ऐसा हमेशा से होता आया है कि यथा स्थितिवादियों ने परिवर्तन को कभी स्वीकार नहीं किया। रावण, कंस, दुर्योधन आदि अनेक उदाहरण है। उनकी जो गति अतीत में हो चुकी वही गति ऐसे लोगों की आगे भी होगी।
मात्र सनातन धर्म ही विश्व शांति का रक्षक
महर्षि श्री अरविन्द ने घोषणा की थी कि 'भारत ही भगवान् को धरती पर लायेगा'। महर्षि श्री अरविन्द ने कहा था कि अंधकार ठोस बनकर जम गया है, अब संतों से शांति असंभव है। अब धरा पर भगवान् के अवतार की आवश्यकता है। और महर्षि ने मात्र इसी लिए आराधना की। महर्षि अपने उद्देश्य में पूर्ण रूप से सफल हुए और उन्होंने घोषणा कर दी कि 24 नवंबर 1926 को ही श्री कृष्ण का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था। श्री कृष्ण अतिमानसिक प्रकाश नहीं है। श्री कृष्ण के अवतरण का अर्थ है अधिमानसिक देव का अवतरण जो जगत् को अतिमानस और आनन्द के लिए तैयार करता है। श्रीकृष्ण आंनदमय है। वे अतिमानस को अपने आनंद की ओर उद्बुद्ध करके विकास का समर्थन और संचालन करते हैं। इसी संदर्भ में महर्षि श्री अरविन्द ने भविष्यवाणी की हुई है कि वह शक्ति जो 24.11.1926 को मनुष्य के रूप में जन्म ले चुकी है, सन् 1993 के अंत तक अपने क्रमिक विकास के साथ संपूर्ण विश्व के सामने प्रकट हो जाएगी।
भगवान ने श्री अरविन्द को अलीपुर जेल में आदेश दिया था कि 'मैं इस देश को अपना संदेश फैलाने के लिए उठा रहा हूँ, यह संदेश उस 'सनातन धर्म' का संदेश है, जिसे तुम अभी तक नहीं जानते थे, पर अब जान गये हो। तुम बाहर जाओ तो अपने देशवासियों को कहना कि तुम सनातन धर्म के लिए उठ रहे हो। तुम्हें स्वार्थ सिद्धि के लिए नहीं, अपितु संसार के लिए उठाया जा रहा है। जब कहा जाता है कि भारतवर्ष महान है तो उसका मतलब है सनातन धर्म महान है। मैंने तुम्हें दिखा दिया है, कि मैं सब जगह और सब मैं मौजूद हूँ। जो देश के लिए लड़ रहे हैं, उन्हीं में नहीं, देश के विरोधियों में भी काम कर रहा हूँ। जाने या अनजाने, प्रत्यक्ष रूप से सहायक होकर या विरोध करते हुए, सब मेरा ही काम कर रहे हैं। मेरी शक्ति काम कर रही है, और वह दिन दूर नहीं जब काम में सफलता प्राप्त होगी।'
यीशु मसीह की भविष्यवाणियों के अनुसार भी उस सहायक के पूर्व से आने की बात कही गई है। उस सहायक के आने का यही समय है। इसके अतिरिक्त विश्व के कई भविष्य वक्ताओं ने भी कहा है कि 20 वीं सदी के अंत से पहले एक नई सभ्यता जिसका उद्गम भारत से होगा, संपूर्ण विश्व को आँधी तूफान की तरह ढ़क लेगी।

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Part 43
विश्व भर के सभी धर्मों में मात्र सनातन धर्म ही एक ऐसा धर्म है जो मनुष्य को विकास की चरम सीमा तक पहुँचाने की बात कहता है। वैदिक मनोविज्ञान के अनुसार मनुष्य शरीर की संरचना सात प्रकार के तत्वों से हुई है, जिनके अन्दर आत्मा अन्तर्निहित है। इन सात तत्वों की अलग-अलग व्याख्या करते हुए ऋग्वेद कहता है- (1.) अन्नमयकोश (2.) प्राणमय कोश (3.) मनोमय कोश (4.) विज्ञानमय कोश (5.) आनन्दमय कोश (6.) चित्मय कोश (7.) सतमय कोश।
आज तक इनमें से प्रथम चार कोश ही मानवता में विकसित हो पाये हैं। बाकी तीनों (सत् + चित्+ आनन्द - सच्चिदानन्द) कोश अभी तक विकसित नहीं किए जा सके। वैदिक मनोविज्ञान के अनुसार अन्नमय कोश से विज्ञानमय कोश तक अपरार्द्ध या सत्ता का निम्नतर भाग है, जहाँ विद्या पर अविद्या का आधिपत्य है।
आनन्द से सत् तक परार्द्ध या उच्चतर अर्द्ध जिसमें अविद्या पर विद्या का प्रभुत्व है और वहाँ अज्ञान, पीड़ा या सीमा का नाम नहीं। क्योंकि प्रथम चारों कोशों में विद्या अविद्या का आधिपत्य है इसलिए विज्ञान का प्रयोग सृजन के स्थान पर विध्वंश में ही अधिक हो रहा है।
विश्व में मात्र वैदिक धर्म ही अवतारवाद का जनक है, वही कहता है ईश्वर की प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार संभव है। संसार के बाकी पैगम्बरवादी धर्मों में यह सामर्थ्य नहीं है। वे तो मात्र पैगम्बर के बताए अनुसार ही ईश्वर को जानते हैं। प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार करने को कोई पथ उन धर्मों में नहीं है। जब सात में से चार तत्वों की जानकारी विश्व को हो चुकी है तो बाकी तीन कोशों का भी ज्ञान प्राप्त करना संभव है। परन्तु उस ज्ञान को प्राप्त करने की सामर्थ्य केवल सनातन धर्म में ही है, क्योंकि वह ईश्वरवाद का जनक है। पैगम्बरवादी धर्म यह कार्य नहीं कर सकते। क्योंकि अब बाकी तीनों तत्वों (सत्+चित्+आनन्द - सच्चिदानन्द) के चेतन होने का नम्बर है, अतः यह कार्य मात्र भारत ही करेगा। अनादिकाल से यह ज्ञान विश्व को भारत ही देता रहा। इसी दिव्य ज्ञान का प्रसार-प्रचार संपूर्ण विश्व में पुनः करके अपने स्वर्ण युग में प्रवेश कर जाएगा।
मनुष्य योनि में चरम विकास की बात कहते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के 13वें अध्याय के 22वें
श्लोक में पुरूष की व्याख्या करते हुए कहा है-
उपद्रष्टानुमन्ता भर्ता भोक्ता महेश्वर ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहऽस्मिन्पुरूषः पर ।।
वास्तव में पुरूष इस देह में स्थित हुआ भी पर (त्रिगुणातीत) ही है (केवल) साक्षी होने से उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देने वाला होने से अनुमन्ता (एवं) सबको धारण करने वाला होने से भर्ता, जीवरूप से भोक्ता (तथा) ब्रह्मादिकों का भी स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्दधन होने से 'परमात्मा' ऐसा कहा गया है।
गीता की उपर्युक्त व्याख्या के अनुसार मनुष्य आत्म साक्षात्कार करते तद्रूप बन सकता है। अतः वैदिक मनोविज्ञान के अनुसार उपर्युक्त सातों तत्वों को चेतन करके मनुष्य अपने चरम विकास को प्राप्त कर सकता है। भारत के ही नहीं विश्व भर के अनेक भविष्यवक्ताओं ने जो भविष्यवाणी की है कि भारत का ही दर्शन 21वीं सदी में मान्य होगा। 21 वीं सदी में भारत पुनः अपने जगत् गुरु के पद पर आसीन हो जाएगा।
इसी प्रकार भारतीय योगदर्शन भी क्रियात्मक ढंग से उस परमपर को प्राप्त करने की विधि बताता है। हमारे दर्शन के अनुसार मनुष्य ईश्वर की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है, मनुष्य वास्तव में विराट है। अतः हमारा दर्शन स्पष्ट शब्दों कहता है कि जो ब्रह्माण्ड में है वही पिण्ड में है। इसीलिए ज्ञानसंकलिनी तन्त्र में कहा है-
देहस्थाः सर्व्व विधाश्च देहस्थाः सर्व्व देवताः ।
देहस्थाः सर्व्व तीर्थानि गुरु वाक्येन लभ्यते ।।
उपर्युक्त दार्शनिक सिद्धान्त के अनुसार ऋषियों ने जब संपूर्ण ब्रह्माण्ड को देखकर उस परमतत्व की खोज मनुष्य शरीर में आरंभ की तो पाया, कि उस परमसत्ता का निवास सहस्रार में है। उसी ने अपनी शक्ति के सहारे इस संपूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना की, जिसका निवास स्थान उसने मूलाधार में पाया। इन्हीं दोनों तत्वों के कारण संपूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति हुई। प्रभु की वह शक्ति सहस्रार से नीचे चली और असंख्य ब्रह्मण्डों और लोकों की रचना करती हुई मूलाधार में आकर स्थित हो गई। यह शक्ति सुषुप्ति अवस्था में रहती है। केवल मनुष्य योनि में ही इसे जागृत किया जा सकता है। यह कार्य गुरुकृपा रूपी शक्तिपात से ही संभव है।

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