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@nirarthak_

अर्थहीन इंसान , यही मेरी पहचान...!

जयपुर राजस्थान 参加日 Ağustos 2020
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निरर्थक@nirarthak_·
एक दिन हम मर जाएंगे, अपनी अपनी चुप्पियां लेकर ,और हमारा आखिरी ख्याल होगा:"हमें बोलना चाहिए था....!
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निरर्थक@nirarthak_·
काश हम दोनों के बीच ये दूरियाँ न होतीं,तो मैं तुम्हारी हर ख्वाहिश चंद मिनटों में पूरी कर देता पर अफसोस,ये जगहों की दूरी हर पल दिल को खटकती है,फिर भी दिलों की नज़दीकियाँ हमें एक-दूसरे से जोड़े रखती हैं और यही एहसास हमें हमेशा करीब होने का सुकून देता है...!
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निरर्थक@nirarthak_·
शिकायत करने वाले और जिससे शिकायत है के बीच एक गहरा सम्बन्ध होना जरूरी है वरना शिकायतों का कोई अर्थ नही रह जाता...!
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निरर्थक@nirarthak_·
रोज़ की दिनचर्या अपनी सहज गति से चलती रहती है,लेकिन किसी दिन जब उसमें हल्का-सा परिवर्तन आ जाता है,तो मन उसी बदलाव में उलझ जाता है मस्तिष्क बार-बार यह सोचने लगता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ होगा जिसने इस सामान्य क्रम को बदल दिया...!
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निरर्थक@nirarthak_·
सब कुछ लिखने का हुनर होने के बावजूद,जब तुम्हारे सवाल के जवाब में मेरे होंठों से सिर्फ हाँ या हू ही निकलता है,तो यह बात मुझे भी कई बार खटकती है,लेकिन हर बार मैं यही सोचकर ठहर जाता हूँ कि जहाँ करीबी होती है,वहाँ एक शब्द भी पूरी भावनाओं को व्यक्त कर देता है...!
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निरर्थक@nirarthak_·
अज्ञानी होना कोई बुरी बात नहीं,क्योंकि हर ज्ञान की शुरुआत उसी से होती है किन्तु जब व्यक्ति अपने अज्ञान को ही सत्य मानकर उसे दूसरों पर थोपने लगता है,तब वह न केवल स्वयं के विकास को रोकता है,बल्कि समाज में भ्रम और मतभेद भी उत्पन्न करता है...!
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निरर्थक@nirarthak_·
सब कुछ जब सही चल रहा होता है,तभी अचानक कुछ ऐसा हो जाता है कि मन उलझनों में घिर जाता है समझ नहीं आता कि क्या किया जाए और कैसे उस स्थिति से बाहर निकला जाए ऐसे क्षणों में इंसान खुद को असहाय महसूस करता है,लेकिन समय के साथ यही ठहराव हमें फिर से संभलना और आगे बढ़ना सिखा देता है...!
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निरर्थक@nirarthak_·
जीवन मे सबसे बडी़ विडम्बना तो यही है कि हर व्यक्ति अपनी जगह सही होता है और वास्तविक संघर्ष सही और गलत के बीच न होकर सही और सही के बीच ही होता है...!
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निरर्थक@nirarthak_·
कभी-कभी मन यूँ ही अतीत की यादों और भविष्य की चिंताओं में उलझकर खुद को उदास कर लेता है,और इस भटकाव में वह वर्तमान की खुशियों को महसूस ही नहीं कर पाता ऐसे में इन चंद शब्दों का सहारा मन में फिर से विश्वास जगा देता है,वक्त कभी एक समान नहीं रहता...!
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निरर्थक@nirarthak_·
कुछ समय से मैंने खुद को सब से दूर कर लिया है,अब जब कोई अपनापन दिखाकर करीब आने की कोशिश करता है,तो दिल में सुकून नहीं,बल्कि एक अनजानी सी ऊब और खामोशी उतर आती है जैसे मन ने लोगी की भीड़ से थककर,अकेलेपन को ही अपना सहारा बना लिया हो...!
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निरर्थक@nirarthak_·
मैं फालतू बहस नहीं करता,क्योंकि मुझे अच्छी तरह पता है कि ऐसी बहस में उतरते ही इंसान खुद ही अपनी समझ पर सवाल खड़े कर देता है...!
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