Anurag Dwary@Anurag_Dwary
ओडिशा में बहन का कंकाल लेकर बैंक पहुंचा शख्स, कंधे पर लेकर 3 किलोमीटर पैदल चला ... बैंक कर्मचारियों ने कहा था ... जिसका खाता है, उसे लेकर आओ।
भारत अब सचमुच डिजिटल हो चुका है ... यहाँ आदमी मर सकता है, पर सिस्टम की फाइल में जीवित होना चाहिए। यहाँ बहन कब्र में दफन हो सकती है, पर बैंक के सर्वर पर उसे स्वयं उपस्थित होना पड़ेगा। यहाँ मृत्यु प्रमाण पत्र से ज्यादा ताकतवर है क्लर्क की कुर्सी।
जीतू मुंडा अपनी बहन का कंकाल लेकर नहीं गया था, वह इस देश की उस संवेदनहीन व्यवस्था का एक्स-रे लेकर गया था, जिसमें इंसान की सांस से ज्यादा महत्व फॉर्म के कॉलम का है।
बैंक वालों ने शायद सोचा होगा ... ग्राहक सेवा हमारी प्राथमिकता है, बस ग्राहक ज़िंदा होना चाहिए। यह वही भारत है जहाँ सरकारें गरीबों के लिए योजनाओं के विज्ञापन में मुस्कुराती हैं, पर गरीब अगर अपना ही पैसा मांग ले, तो उससे कहा जाता है... पहले मृतक को साथ लाइए।
कब्र से निकला कंकाल दरअसल एक बहन का नहीं था, वह सरकारी करुणा का ढांचा था, जो वर्षों पहले मर चुका है। जीतू अनपढ़ था, ऐसा कहा गया। सच तो यह है कि वह अनपढ़ नहीं था वह इस व्यवस्था के असली पाठ को पढ़ चुका था। उसे समझ आ गया था कि यहाँ कागज़ आदमी से बड़ा है, और दस्तखत इंसानियत से। इस देश में आदमी की पहचान आधार कार्ड से है, और आत्मा की पहचान बैंक पासबुक से।
अब अगली बार क्या होगा? पेंशन के लिए बुजुर्ग अपनी अस्थियाँ लेकर लाइन में लगेंगे? यह घटना खबर नहीं है, यह भारतीय प्रशासन की चिता से उठता धुआँ है और सबसे बड़ा सवाल कंकाल बैंक में देखकर अफरा-तफरी क्यों मची? सिस्टम तो वर्षों से खुद कंकाल हो चुका है। उसे अपने ही चेहरे से डर लग गया क्या?