ब्रह्मर्षि द्विजश्रेष्ठ

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ब्रह्मर्षि द्विजश्रेष्ठ

ब्रह्मर्षि द्विजश्रेष्ठ

@ParasharAKS

Physics & Philosophy. Bhumihar Brahmin. Brahmins who refused to beg. I am an unapologetic vegetarian Brahmin Patriarchal Hindu.

India Katılım Ağustos 2017
422 Takip Edilen844 Takipçiler
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Ajeet Bharti
Ajeet Bharti@ajeetbharti·
ग्+ऋ+ह= गृह ✅ ग्+र्+ु+ह= ग्रुह ❌ ग्+र+ह= ग्रह ❌ ‘गृह’ या ‘स्मृति’ का उच्चारण ग्रि या म्रि के अधिक निकट है। ग्रु, म्रु क्षेत्रीय उच्चारण हैं। ‘ग्रह’ कहना, अधिक सही होने के चक्कर में गलत होने जैसा है। वैसे ही जैसे गणित को गड़ित पढ़ लेते हैं लोग। उचित उच्चारण ‘ग’ में ऋ-कार लगाना है, और ऋ को हम ‘रि’ ही कहते हैं, पर जीभ थोड़ा अधिक तालू के पीछे की तरफ जाता है।
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Sama Hoole
Sama Hoole@SamaHoole·
Activist: "Drinking milk is for baby cows, not humans." Farmer: "Humans have been drinking it for 10,000 years." Activist: "We're the only species that drinks another species' milk." Farmer: "We're also the only species that cooks food, wears clothes, and writes books. Should we pack those in too?" Activist: "It's unnatural." Farmer: "So are antibiotics. Refusing those next time you get pneumonia?" Activist: "That's different." Farmer: "How? Both are things humans do that other animals don't." Activist: "Milk is meant for calves." Farmer: "Wheat is meant to reproduce the wheat plant. And yet here you are eating bread." Activist: "Most humans are lactose intolerant." Farmer: "Most humans of European descent aren't. We evolved the trait. That's how evolution works." Activist: "It's still weird." Farmer: "Weirder than flying across continents in a metal tube? Weirder than arguing with a stranger on a phone you didn't build, charged by electricity you can't generate, about food produced by a farmer you've never met?"
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दिलीप कुमार
“कान्यकुब्ज वंशावली परंपरा के ‘काश्याप’ खंड में भुइंहार (भूमिहार) ब्राह्मणों का बारंबार उल्लेख मिलता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि काश्यप-परंपरा के भीतर एक महत्वपूर्ण धारा स्वयं को भूमिहार ब्राह्मण के रूप में पहचानती रही है।” jagran.com/uttar-pradesh/… kanyakubj.in/kanyakubj-vans…
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दिलीप कुमार
भूमिहार ब्राह्मण-1742ई0 "जो गौतम की कीर्ति को अलंकृत करने वाले रत्न के समान हैं और जिनका यश चिरकाल तक प्रकाशित रहने वाला है।वे श्रीमान्,वीर,महाराज बलवंत सिंह हैं,जो सब प्रकार से उन्नति को प्राप्त हों।जिनका यश चन्द्रमा के समान उज्ज्वल हैऔर जिन्होंने काशी में राज्य स्थापित किया।"
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Ankit Jakhar
Ankit Jakhar@Jakhar_ankit_·
> be Puṣyamitra Śuṅga. > literally the Senapati (Commander-in-Chief) who looked at a crumbling empire and said, "Fine, I’ll do it myself." > year is around 185 BCE. The Mauryan Empire has gone soft. Decades of state-sponsored pacifism have left the borders porous and the military demoralised. > The Yavana-Mlecchas (Indo-Greeks from Bactria) are mobilising. They think India is free real estate. > Last Mauryan Emperor, Bṛhadratha, is completely clueless and too weak to defend Āryāvarta. > Puṣyamitra organises a massive military review (Senā-darśana) at Pāṭaliputra. > casually draws his sword and assassinates the Emperor in plain sight of the entire imperial army. > The army doesn't mutiny. They literally cheer for him and declare him the new Samrāt. Absolute Senāpati supremacy. > Western historians cope by calling it a "military coup." Indian history calls it civilizational course-correction. > The Greeks, led by Demetrius and Menander, breach the frontiers and march deep into the heartland, besieging Sāketa (Ayodhya), Mathurā, and threatening Pāṭaliputra itself. > Puṣyamitra drops the hammer. He rallies the fractured Indian forces and utterly obliterates the Hellenistic war machine, driving the Greeks all the way back to the Indus. > Greek phalanxes met Vedic steel, and the Greeks lost. > but wait, he wasn't just a warlord. He was the ultimate restorer of Sanātana Dharma. > single-handedly ended the era of state-enforced religious pacifism and revived the martial and spiritual ethos of the Vedic civilisation. > to assert absolute, unquestionable sovereignty, he revives the ancient 'Aśvamedha Yajña' (Horse Sacrifice). > He didn't do it once. The Ayodhya Inscription confirms he performed the Aśvamedha twice (Dvir-aśvamedha-yājin). Absolute paramountcy. > Let the majestic sacrificial horse roam free across the subcontinent. He puts his teenage grandson, Vasumitra, in charge of guarding it with a contingent of cavalry. > The Greeks try to capture the horse on the banks of the Sindhu river. > Teenage Vasumitra absolutely massacres the seasoned Yavana forces, rescues the horse, and secures the frontier. The Chad bloodline is genetically undeniable. > Puṣyamitra writes a letter to his son Agnimitra basically saying: "Your boy just styled on the Greeks. The horse is safe. Pull up to the Yajña." Peak grandfather flex. > His court was the ultimate intellectual hub. The legendary sage Patañjali - author of the Mahābhāṣya (the greatest treatise on Sanskrit grammar) - was his contemporary and chief priest. > Patañjali literally uses the defeat of the Greeks as a grammar example in his book: “Aruṇad Yavano Sāketam” (The Yavana besieged Ayodhya - implying an event that just happened and was crushed by his patron). > Buddhist texts (like the Aśokāvadāna) cope and seethe, painting him as a villain because he showed zero tolerance for certain monasteries that acted as fifth columns and aided the invading Greek armies. > treason gets you the sword. No exceptions when the civilisation is at stake. > Senāpati, Samrāt, Yavana-Destroyer, Patron of Patañjali, and the architect of the Brāhmaṇical Renaissance. > The man who refused to let India fade into the dark pages of history.
Saurav trades@0xsauravtrades

Pushyamitra Shunga jayanti bhi manayenge hum toh ab.

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Comrade M
Comrade M@ComradeMalal·
भूतों की दुनिया में ब्रह्मपिशाच को गॉडली स्टेटस प्राप्त है। कहते हैं ब्रह्मपिशाच किसी के नियंत्रण में नहीं आता। यहाँ तक कि कई बार सिद्ध तांत्रिक और ओझा भी ब्रह्मपिशाच के चक्कर में आकर पार लग जाते हैं, मगर ब्रह्मपिशाच का बाल बाँका नहीं होता। वह पहले से ज्यादा तंदुरुस्त होकर फिर से अपने मिशन में लग जाता है। भारतीय गणराज्य, सत्ताजीवी राजनीतिक दलों, कम्युनिस्टों, संघियों, अंबेडकरवादियों, लठैत चिंतकों, पेरियारवादियों और ऐसे ही तमाम वर्गों को भी ब्राह्मणवाद के ब्रह्मपिशाच ने जकड़ रखा है। कुछ इससे प्रत्यक्ष रूप से लड़ रहे हैं, तो कुछ अप्रत्यक्ष रूप से। मगर ब्राह्मणवाद का ब्रह्मपिशाच काबू में नहीं आ रहा है। इनकी लड़ाई कब शुरू हुई पता नहीं, लेकिन ये बतलाते हैं कि 2000 वर्ष पूर्व किसी बुद्ध ने इस ब्रह्मपिशाच के खिलाफ पहली लड़ाई छेड़ी थी। अस्सी बरस की आयु में बुद्ध मूर्ति-पूजा , कर्मकांड के पाखंड इत्यादि से लड़ते हुए निर्वाण को प्राप्त हो गए और 200 बरस के भीतर उनकी प्रतिमाएं बनकर पूजा-पाठ के लिए तैयार हो गईं। भंते गण राजाओं से चंदा लेकर मालपुआ इत्यादि खाने लगे। जिन भंते जी लोगों को सुंदर-सुडौल स्त्री-देह की लालसा थी, उन्होंने अपनी-अपनी आम्रपाली ढूँढकर , अपने कर्मा-मुद्रा ध्यान शुरू कर दिया। और उसे तंत्र-विद्या का नाम दे दिया। वैसे भी बुद्ध का गुरुजी लोगों से बस पूजा-पाठ के पाखंड के लिए ही झगड़ा था। गुरुजी लोग स्वस्तिवाचन में ही इतना समय लगा देते थे कि वो बोर हो जाते थे । इसीलिए कुछ 'शॉर्ट एंड सिंपल' चाहते थे। अतः उन्होंने गुरुजी लोगों का ओपनसोर्स कोड लेकर अपना अलग सिस्टम बनाने का प्रयास किया। अन्य वोटबैंक संबंधी विषयों पर कमोबेश उनका कोई वाद-विवाद नहीं था। हाँ, वह राजा के घर में जन्मे थे, तो उनका कहना था कि हमारे सिस्टम में राजा लोग ही ऊपर रहेंगे, गुरुजी लोग अपना देख लें। अपने सिस्टम में उन्होंने हमको नंबर दो पर रखा है, तो हम भी अपने सिस्टम में उन्हें नंबर दो पर रखेंगे। यह मानवीय तमन्ना की बात थी। कई गुरुजी लोग उनके सिस्टम को समझ गए और उन्हीं के सिस्टम को बिल्ड, डिप्लॉय और स्केलिंग करने में लग गए।मस्त सिस्टम बनाया , पूरे एशिया तक डिप्लॉइ किया। भले बाद में होम सर्वर क्रैश हो गया हो। बुद्ध का अंतरजातीय विवाहों पर भी बहुत कड़ा रुख था और गैर-ब्राह्मण वर्णों की स्त्रियों से शादी करने वाले ब्राह्मणों को वे श्वान की संज्ञा देते थे। डर है कि दूसरों की बहू-बेटी में रुचि रखने वाले नए भंते गण, यदि उनके ऐसे विचारों को पढ़ें, तो बुद्ध को ब्राह्मणों का गुलाम न घोषित कर दें। जो बहुजन वोट लेकर ब्राह्मणों के झोली में डालने आया हो। एक ही बिन्दु है जहाँ कम्युनिस्ट, अंबेडकरवादी और पेरियारवादी इस ब्रह्मपिशाच के खिलाफ बुद्ध के मंच पर दिखते हैं, वो है बुद्ध द्वारा ब्राह्मणवादियों के प्रातः काल उठकर शौच-स्नान इत्यादि क्रियाओं का विरोध। बाकी जगह इनमें और बुद्ध में 22 हाथ का अंतर है। -विस्तार से नीचे लेख में :)
Comrade M@ComradeMalal

x.com/i/article/2023…

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Comrade M
Comrade M@ComradeMalal·
परशु और तप, ये दोनों वीरों के ही होते श्रृंगार, क्लीव न तो तप ही करता है, न तो उठा सकता तलवार। तप से मनुज दिव्य बनता है, षड् विकार से लड़ता है, तन की समर-भूमि में लेकिन, काम खड्ग ही करता है। किन्तु, कौन नर तपोनिष्ठ है यहाँ धनुष धरनेवाला? एक साथ यज्ञाग्नि और असि की पूजा करनेवाला? कहता है इतिहास, जगत् में हुआ एक ही नर ऐसा, रण में कुटिल काल-सम क्रोधी तप में महासूर्य-जैसा! मुख में वेद, पीठ पर तरकस, कर में कठिन कुठार विमल, शाप और शर, दोनों ही थे, जिस महान् ऋषि के सम्बल। यह कुटीर है उसी महामुनि परशुराम बलशाली का, भृगु के परम पुनीत वंशधर, व्रती, वीर, प्रणपाली का। 🙏🏼 -दिनकर
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दिलीप कुमार
भूँइहार/भूमिहार - कल्याणी कोश-(मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश) संपादक-पं० गोविन्द झा महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउन्डेशन कल्याणी निवास (दरभंगा)
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Ajeet Bharti
Ajeet Bharti@ajeetbharti·
इस विषय पर चंद अश'आर पेश-ए-ख़िदमत है: खोदोगे तो निकल जाएँगे तुम्हारे भी स्क्रीनशॉट ट्विटर पर खाली मेरा ही निशान थोड़े ही है! इतना फ्रस्ट्रेशन कि बन बैठे जुबैर के भाई मुल्लापरस्त होने का कोई गुमान थोड़े ही है पार्टी में ही जाना था तो किसी और विधि चले जाते तुमको आगे बढ़ाना हमारा काम थोड़े ही है
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Comrade M
Comrade M@ComradeMalal·
X बहुत निर्मम जगह है , परसों मुजी भाई ने X पर कुछ लोगों को एक्सपोज करने की शुरुआत की थी। आज X पर उनका रियल नेम , रियल फोटो , कट्टर हिंदू शेर का मुसलमान प्रोफेसर के साथ हाथ मिलाता फोटो , एमिटी विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री सब कुछ वायरल हो चुका है। 💔
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Comrade M
Comrade M@ComradeMalal·
ग़ज़ब कोआर्डिनेटेड अटैक चल रहा है , सिर्फ़ इसलिए क्योंकि कुछ सवर्णों ने पूछ लिया कि अगर जातिवाद ग़लत है तो हमारे साथ रिवर्स जातिवाद क्यों हो रहा है। हमारें ख़िलाफ़ हेट कैंपेन क्यों चल रहा है। हमारे बच्चों के लिए छात्रवृति की योजनाएं क्यों नहीं है ? हमारें बच्चों के उच्च शिक्षा से रोकने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से कानून क्यों बनाये जा रहे हैं? यह जातीय कुंठा से मुक्त सभी सवर्णों का सामूहिक प्रश्न है। उनके वर्तमान व भविष्य का प्रश्न है। फिर उनके ख़िलाफ़ यह प्रोपगंडा कि यह लोग पाकिस्तान से असलहा बारूद लाने का सोच रहे हैं। यह बिग ब्रेनिंग किन लोगों का है ? जो ऐसा अपने पैर पे कुल्हाड़ी मारने वाला नैरेटिव बना रहे हैं।
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दिलीप कुमार
भगवान विष्णु जी के छठे अवतार भगवान परशुराम जी का जन्मोत्सव है 19 अप्रैल को उस दिन तक सारे भूमिहार ब्राह्मण समाज के आने वाले युवा अपना अपना Profile Picture में भगवान परशुराम जी का फोटो लगाएं।
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दिलीप कुमार
बिहार के राज्यपाल रहे आदरणीय आर आर दिवाकर जी ने अपने शोध ग्रंथ bihar through the Ages मे भूमिहार ब्राह्मण को अग्रहार ब्राह्मण ही लिखा है ,जिन्होंने सैन्य और वैदिक ज्ञान के आधार पर अग्रहार प्राप्त किया था। facebook.com/brahmans.in
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दिलीप कुमार
सरयू नदी के निकट बसी अमिला की माटी साहित्य,कला,राजनीति एवं समाज सेवा के निपुण एवं निर्भय पुरोधा पंडित अलगू राय शास्त्री को जन्म देकर धन्य हुई थी।1923 में उनकी कविताओं का पहला संग्रह ‘शांति प्रताप’ प्रकाशित हुआ।1930 में उन्होंने‘शंकर के वेदान्त दर्शन’ bhaskar.com/local/uttar-pr…
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The Abhishek Tiwary Show
The Abhishek Tiwary Show@atsshow7·
स्कूल के दिनों में जब हम NCERT की किताबों में मृणाल पांडे जैसे नाम पढ़ते थे, तो मन में एक ऐसी छवि बनती थी मानो वो साक्षात ज्ञान की देवी हों। भारी-भरकम चश्मा, हाथ में कोई मोटी सी किताब और बातों में 'ऑक्सफोर्ड' वाली गहराई। हमें लगता था कि ये लोग जब मुंह खोलते होंगे तो ज्ञान के झरने बहते होंगे। लेकिन हकीकत Expectation vs Reality वाला मीम बनकर रह गई है। जब आप इन स्वघोषित बुद्धिजीवियों को करीब से देखते हैं, तो पता चलता है कि इनकी विद्वत्ता का गुब्बारा सिर्फ नफरत और खोखली बयानबाजी की हवा से फूला हुआ है। कल एक वामपंथी महाशय (पंकज मिश्रा) को देखा, फेसबुक पर वो 'कॉपी-पेस्ट' वाला कानूनी नोटिस चिपका रहे थे: "मैं मेटा को अपनी फोटो इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं देता!" अरे भाई साहब! जिस प्लेटफॉर्म की 'Terms and Conditions' बिना पढ़े आपने 'I Agree' पर अंगूठा लगाया है, उसे आप एक स्टेटस डालकर डरा रहे हैं? Are you serious Mr. Leftist? जिस इंसान को मार्क जुकरबर्ग की प्राइवेसी पॉलिसी समझ नहीं आ रही, वो अगले ही पोस्ट में प्रधानमंत्री को 'विदेश नीति' पर ट्यूशन दे रहा था। यह वही बात हो गई कि जिसे साइकिल का चेन चढ़ाना नहीं आता, वो स्पेसएक्स को मंगल ग्रह पर लैंडिंग की सलाह दे रहा है। ये वामपंथी लोग 'फुल एंटरटेनमेंट' पैकेज हैं! विहरिशंकर परसाई लिखते हैं "वे बुद्धिजीवी नहीं हैं, वे तो केवल 'शब्द-जीवी' हैं। वे शब्दों को पालते हैं, उन्हें चमकाते हैं और फिर उन्हीं के पीछे छिपकर अपनी अज्ञानता का उत्सव मनाते हैं।" इनकी 'इंटेलिजेंस' बस इतनी है कि ये बड़ी सफाई से यह साबित कर सकते हैं कि सूरज पश्चिम से निकलता है, बशर्ते उन्हें इसके लिए मोदी जी को दोष देने का मौका मिले, और राहुल ही राज्यसभा देने का वादा करें।
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दिलीप कुमार
किशोर कुणाल की प्रसिद्ध पुस्तक Ayodhya Revisited में उन्होंने विस्तार से दस्तावेजी प्रमाण दिए कोर्ट में भी उनके शोध का उपयोग हुआ उनकी गवाही ने आस्था को ऐतिहासिक दस्तावेजों से जोड़ने का काम किया,यानी सिर्फ धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि लिखित और प्रशासनिक साक्ष्य भी प्रस्तुत किए।
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दिलीप कुमार
परशुराम के पिता: जमदग्नि जमदग्नि के पिता: ऋचीक (भृगुवंशी ब्राह्मण) जमदग्नि की माता: सत्यवती कथा (महाभारत, पुराण) सत्यवती एक राजकुमारी (क्षत्रिय) थीं उनका विवाह ब्राह्मण ऋषि ऋचीक से हुआ इस प्रकार: ✔️ परशुराम की दादी भी क्षत्रिय कुल की थीं माता: क्षत्रिय
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दिलीप कुमार
“'बाभन' से 'भूमिहार' में परिवर्तन केवल औपनिवेशिक विकृतिकरण नहीं, बल्कि एक सचेत सामाजिक-रणनीतिक पुनर्निर्माण था।” “'भूमिहार' शब्द ने ब्राह्मण पहचान को कमजोर नहीं किया, बल्कि उसे नए सामाजिक संदर्भ में पुनर्परिभाषित किया।”
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दिलीप कुमार
“बाभन (भूमिहार ब्राह्मण)और ब्राह्मण का संबंध‘common origin but separate evolution’का है।दोनों की ऐतिहासिक जड़ें समान हो सकती हैं,लेकिन समय के साथ इनके सामाजिक ढाँचे,विवाह नियम और पहचान अलग-अलग विकसित हुए हैं,जिसके कारण आज ये व्यवहारिक रूप से दो भिन्न समूहों के रूप में हैं।”
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दिलीप कुमार
“ब्राह्मण”और“बाभन” को एक मान लेना ऐतिहासिकऔरसामाजिक रूप से सही नहीं है।ब्राह्मण परंपरा में शाकद्वीपी,मैथिल,कान्यकुब्ज, सरयूपारी आदि आते हैं,जबकि“बाभन”का आशय विशिष्ट रूप से भूमिहार ब्राह्मण और उनके आंतरिक समूहों-दोनवार,जेथरिया, सूर्यगणे,सावर्ण,भारद्वाज,द्रोणटेकार,चकवारआदि से है।
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