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मौलाना अब्दुर रहमान कटकी ओडिशा के कटक के पास तांगी इलाके में मदरसा चलाते थे। उन पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने 2015 में दो बार सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा की थी। इसके अलावा उनके जम्मू-कश्मीर कई बार जाने की बात भी जांच में सामने आने का दावा किया गया था। दिसंबर 2015 में मौलाना अब्दुर रहमान कटकी को आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार किया था। उन पर आरोप लगाए गए कि उनका संबंध अल-कायदा से है। अब्दुल रहमान पर युवाओं को कट्टरपंथ की ओर धकेलने और आतंकी गतिविधियों के लिए लोगों की भर्ती करने के आरोप लगाए गए थे।
करीब 11 साल के बाद ओडिशा के कटक की एक अदालत ने मौलाना अब्दुर रहमान कटकी को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त और भरोसेमंद सबूत पेश नहीं कर पाया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि गवाहों के बयान और पेश किए गए सबूत इतने मजबूत नहीं थे कि उनके आधार पर आरोप तय किए जा सकें। इस मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), झारखंड के जमशेदपुर पुलिस और कटक कमिश्नरेट पुलिस सहित कई एजेंसियों ने अलग-अलग मामले दर्ज किए थे। बाद में मामले की जांच ओडिशा क्राइम ब्रांच को सौंप दी गई थी। ओडिशा क्राइम ब्रांच ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए उनके खिलाफ देशद्रोह की धाराएं भी लगाई थीं। हालांकि अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष इन गंभीर आरोपों को साबित करने में सफल नहीं रहा।
अब्दुर रहमान को 16 दिसंबर 2015 की रात दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल और भुवनेश्वर-कटक कमिश्नरेट पुलिस की संयुक्त टीम ने कटक के पास उनके घर पर छापेमारी कर गिरफ्तार किया था। उस दौरान पुलिस ने उनका पासपोर्ट, मोबाइल फोन, टैबलेट और कुछ दस्तावेज जब्त किए थे। वहीं, रहमान के परिवार ने शुरुआत से ही उन पर लगे सभी आरोपों को गलत बताया था। अब अदालत के फैसले के बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है।
मौलाना अब्दुर रहमान का नाम उन तमाम बाइज्ज़त बरी लोगों की लिस्ट में जुड़ गया है, जिन्होंने बेगुनाह होते हुए भी अपनी ज़िंदगी के बेशकीमती साल जेलों में बिताए हैं। सवाल फिर वही है कि भारतीय न्यायपालिका उन अधिकारियों पर कोई एक्शन क्यों नहीं लेती, जो अधिकारी नागरिकों की ज़िंदगियां बर्बाद कर रहे हैं। गिरफ्तारी के वक्त ऐसी-ऐसी कहानियां गढ़ी जाती हैं, कि मानो गिरफ्तार युवक इस दुनिया का सबसे खूंखार आतंकी हो! लेकिन वो कहानियां अदालतों में सबूतों की कसौटी पर पूरी ही नहीं उतर पातीं। तब सवाल यह है कि क्या ऐसे अधिकारियों को उनके नाकारापन की सज़ा नहीं दी जानी चाहिए? जिस इंसान की ज़िंदगी के बेशकीमती साल जेलों में बीत गए, क्या उसे उसका मुआवज़ा नही मिलना चाहिए? क्या उसे सिर्फ इसी से संतोष करना है कि उसे लंबी लड़ाई लड़ाई लड़ने के बाद ‘न्याय’ मिल गया? क्या यह धारणा “Justice Delayed Is Justice Denied" की सूक्ति को चरितार्थ नही कर रही है?

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