
मान लेते हैं कि ऐसा है और जंतर-मंतर के इस आंदोलन में काफ़ी गलतियाँ हो रही हैं। तो क्या उससे इस आंदोलन का मूल उद्देश्य, जो पेपर लीक के ख़िलाफ़ है, समाप्त हो जाता है? एक आदमी अपनी जान की बाज़ी लगाकर वहाँ बैठा है, ताकि आने वाली पीढ़ी, जो भारत का भविष्य लिखेगी, उसे पेपर लीक का सामना न करना पड़े... वह आपको क्यों नहीं दिख रहा? आज सोशल मीडिया इतना सक्रिय है कि किसी भी छोटी-बड़ी कमी को बढ़ा-चढ़ाकर पूरे आंदोलन के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर दिए जाते हैं। पहले के आंदोलनों में भी बहुत गलतियाँ हुई हैं, आगे भी होती रहेंगी। संसद में 400 सांसदों की बहस देखी है? कैसी चिल्लम-चिल्ली होती है, फिर भी कई बार कोई निष्कर्ष नहीं निकलता। यहाँ हज़ारों लोग एकत्र हो रहे हैं। सब क्या बोलेंगे और क्या नहीं बोलेंगे, इसकी गारंटी सोनम वांगचुक भी नहीं ले सकते। लेकिन आप जैसे तमाम लोग बस यही देख रहे हैं कि आंदोलन में कहीं कोई कमी मिल जाए, और उसे पकड़कर पूरा आंदोलन ही रद्द कर दो। जिस उद्देश्य और संदेश के लिए यह आंदोलन शुरू हुआ, उसे समझने की कोशिश क्यों नहीं हो रही?















