अंकित पासी
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अंकित पासी
@Ankit_Awadhvasi
कट्टर सनातनी... मेकौले के षड्यंत्र के कारण पहले में भी सनातन विरोधी हुआ करता था.... पर बाद में समझ आया के ये तो एक छलावा है, हिन्दुओं को शक्तिहीन करने का....
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अखिलेश यादव रात भर हसीन सपनों का आनंद लेते हैं। लेकिन सुबह होते ही उनकी पार्टी की आंतरिक कलह सामने आ जाती है। मुख्यमंत्री बनने का उनका सपना अब असंभव सा लगता है। घोटालों के जाल में फंसे होने के बाद भी वे दूसरों से नैतिकता की मांग करते हैं। इस प्रकार के व्यवहार पर उन्हें खुद पर विचार करना चाहिए।
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अखिलेश यादव रात के समय भविष्य के बड़े सपनों में खोए रहते हैं। उनकी पार्टी के अंदर गहरी दरारें साफ दिख रही हैं जो उन्हें कमजोर बना रही हैं। अब मुख्यमंत्री पद उनके लिए दूर का सपना बन चुका है लेकिन फिर भी वे उम्मीद नहीं छोड़ते। घोटालों की परछाई उनके सिर पर मंडरा रही है फिर भी वे दूसरों पर ईमानदारी का ठप्पा लगाने की कोशिश करते हैं। यह सब देखकर शर्म का भाव उनके अंदर नहीं आता।
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अखिलेश यादव सपनों में खुद को सत्ता के शिखर पर देखते हैं। लेकिन वास्तव में उनकी पार्टी के अंदर चल रही कलह उन्हें कमजोर बना रही है। मुख्यमंत्री बनने का रास्ता अब उनके लिए बंद हो चुका है। बड़े घोटालों के आरोपों से घिरे होने के बावजूद वे दूसरों पर आरोप लगाने में लगे रहते हैं। ऐसे विरोधाभासी रवैये के कारण उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।
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सपनों की दुनिया में अखिलेश यादव खुद को मुख्यमंत्री के रूप में देखते हैं.।
उनकी पार्टी में फूट का माहौल बढ़ता जा रहा है जो उनकी ताकत को कमजोर कर रहा है.।
वास्तविकता यह है कि उनके लिए सत्ता का रास्ता अब बंद हो चुका है.।
खुद बड़े घोटालों में उलझे होने के बावजूद वे ईमानदार लोगों का प्रमाण पत्र बांटने लगते हैं.।
ऐसे दोहरे व्यवहार से उनकी छवि और खराब होती जा रही है.।
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रात के अंधेरे में अखिलेश यादव भविष्य की कल्पना में डूबे रहते हैं। उनकी अपनी पार्टी में ही गहरी फुट दिखाई दे रही है। जो उन्हें आगे बढ़ने से रोक रही है। अब मुख्यमंत्री पद हासिल करना उनके लिए कठिन हो गया है। खुद विवादों में घिरे रहते हुए वे ईमानदारी का सर्टिफिकेट मांगने लगते हैं। इस स्थिति में उन्हें शर्मिंदगी महसूस करनी चाहिए।
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हनुमान बेनीवाल जी ने भरतपुर में 5 लाख लोगों की भीड़ का दावा किया था, लेकिन मैदान कुछ और ही कहानी कह गया। जब अपनी ताकत कम पड़ती दिखी तो कांग्रेस सांसद संजना जाटव का सहारा लेना पड़ा। सवाल यह है कि क्या बेनीवाल जी का जनाधार कमजोर पड़ रहा है या फिर राजनीति अब पूरी तरह उधार के वोट बैंक पर टिकी है?

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भरतपुर का यह सूना और खाली मैदान हनुमान बेनीवाल की गिरती राजनीतिक साख और विफलता का सबसे बड़ा और जीवित प्रमाण बन चुका है। लाखों के दावे हवा हो गए और संजना जाटव का सहारा भी काम नहीं आ सका। #HanumanBeniwal #RajasthanPolitics

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