रोज़ की दिनचर्या अपनी सहज गति से चलती रहती है,लेकिन किसी दिन जब उसमें हल्का-सा परिवर्तन आ जाता है,तो मन उसी बदलाव में उलझ जाता है मस्तिष्क बार-बार यह सोचने लगता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ होगा जिसने इस सामान्य क्रम को बदल दिया...!
सब कुछ लिखने का हुनर होने के बावजूद,जब तुम्हारे सवाल के जवाब में मेरे होंठों से सिर्फ हाँ या हू ही निकलता है,तो यह बात मुझे भी कई बार खटकती है,लेकिन हर बार मैं यही सोचकर ठहर जाता हूँ कि जहाँ करीबी होती है,वहाँ एक शब्द भी पूरी भावनाओं को व्यक्त कर देता है...!
अज्ञानी होना कोई बुरी बात नहीं,क्योंकि हर ज्ञान की शुरुआत उसी से होती है किन्तु जब व्यक्ति अपने अज्ञान को ही सत्य मानकर उसे दूसरों पर थोपने लगता है,तब वह न केवल स्वयं के विकास को रोकता है,बल्कि समाज में भ्रम और मतभेद भी उत्पन्न करता है...!
सब कुछ जब सही चल रहा होता है,तभी अचानक कुछ ऐसा हो जाता है कि मन उलझनों में घिर जाता है समझ नहीं आता कि क्या किया जाए और कैसे उस स्थिति से बाहर निकला जाए ऐसे क्षणों में इंसान खुद को असहाय महसूस करता है,लेकिन समय के साथ यही ठहराव हमें फिर से संभलना और आगे बढ़ना सिखा देता है...!
कभी-कभी मन यूँ ही अतीत की यादों और भविष्य की चिंताओं में उलझकर खुद को उदास कर लेता है,और इस भटकाव में वह वर्तमान की खुशियों को महसूस ही नहीं कर पाता ऐसे में इन चंद शब्दों का सहारा मन में फिर से विश्वास जगा देता है,वक्त कभी एक समान नहीं रहता...!
कुछ समय से मैंने खुद को सब से दूर कर लिया है,अब जब कोई अपनापन दिखाकर करीब आने की कोशिश करता है,तो दिल में सुकून नहीं,बल्कि एक अनजानी सी ऊब और खामोशी उतर आती है जैसे मन ने लोगी की भीड़ से थककर,अकेलेपन को ही अपना सहारा बना लिया हो...!
एक लड़ाई लड़नी है अपने आप से और इसके लिए मैंने स्वंय को तैयार भी कर लिया है,खैर!...आप सब को पता ही होगा कि किसी पुरानी स्मृति को भूलकर उसकी जगह नई स्मृति जमाना कितना मुश्किल है खासकर उस तरह के समाज में जहां लोग जीते जी पत्थर मारते हैं और बाद मरने के पूजते है...!