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राष्ट्रीय शिक्षा दिवस: मौलाना आजाद का सपना और MAEF का संकट:
आज, 11 नवंबर, राष्ट्रीय शिक्षा दिवस पर, हम मौलाना अबुल कलाम आजाद को याद करते हैं, जिन्होंने कहा था, "हर व्यक्ति को कम से कम बुनियादी शिक्षा मिलना चाहिए, बिना जिसके वह नागरिक कर्तव्य निभा ही नहीं सकता।" आजाद साहब, स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री, शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का आधार मानते थे और अल्पसंख्यक समुदायों के उत्थान के लिए समर्पित थे। उन्होंने जोर दिया कि शिक्षा जन्मसिद्ध अधिकार है, जो समानता और बंधुत्व को मजबूत करे। लेकिन आज, उनके नाम पर बने मौलाना आजाद शिक्षा फाउंडेशन (MAEF) का क्या हाल है? यह फाउंडेशन शिक्षा के क्षेत्र में अल्पसंख्यकों के लिए एक मील का पत्थर था, जो अब संकट में है। MAEF की स्थापना 6 जुलाई 1989 को हुई, मौलाना आजाद की जन्म शताब्दी के अवसर पर, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के अधीन एक गैर-लाभकारी संगठन के रूप में। इसका उद्देश्य शिक्षा के पिछड़े अल्पसंख्यक समुदायों को मजबूत बनाना था, ताकि वे राष्ट्र के विकास में योगदान दे सकें। फाउंडेशन ने ग्रांट-इन-एड स्कीम के तहत स्कूलों, हॉस्टलों, वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर्स और आईटीआई/पॉलिटेक्निक के निर्माण व विस्तार के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की। इसके अलावा, साइंस/कंप्यूटर लैब उपकरण, फर्नीचर और मशीनरी की खरीद के लिए भी मदद दी गई, जो शिक्षा के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर केंद्रित थी। MAEF की प्रमुख योजनाओं में बेगम हजरत महल राष्ट्रीय छात्रवृत्ति शामिल थी, जो गरीब अल्पसंख्यक लड़कियों को मेरिट के आधार पर सहायता देती थी, ताकि वे उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकें। गरीब नवाज रोजगार योजना, सीखो और कमाओ स्कीम के जरिए अल्पसंख्यक युवाओं को स्किल ट्रेनिंग दी जाती थी, जिससे लाखों छात्र-छात्राओं को लाभ हुआ। हुनर हाट और एनजीओ को अनुदान योजना ने अल्पसंख्यक संस्थानों को मजबूत किया, न्याय, स्वतंत्रता और समानता के राष्ट्रीय आदर्शों को बढ़ावा दिया। इन प्रयासों से शिक्षा का पिछड़ापन दूर हुआ और समुदायों में सशक्तिकरण आया, जैसा आजाद साहब का सपना था।
लेकिन 7 फरवरी 2024 को अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने MAEF को अचानक बंद करने का आदेश जारी कर दिया, बिना कोई स्पष्ट कारण बताए। दावा किया गया कि यह 'अप्रचलित' हो गया है और मंत्रालय खुद योजनाएं चला रहा है, लेकिन पिछले कई साल से नई स्कॉलरशिप या ग्रांट नहीं बांटी गईं। MAEF के समर्पित कर्मचारी अपनी गहरी चिंता व्यक्त कर रहे हैं, वे बताते हैं कि बंद होने से न सिर्फ संगठन प्रभावित होगा, बल्कि कर्मचारियों के परिवारों का भविष्य दांव पर लग गया। इन कर्मचारियों की उम्र ज्यादातर 40 वर्ष से ऊपर है, जिन्होंने दशकों तक अल्पसंख्यक शिक्षा के लिए समर्पित जीवन जिया। दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर हुई, और कोर्ट ने मंत्रालय के फैसले को उचित बताते हुए आदेश दिया कि स्टाफ को 31 अक्टूबर 2025 तक निकलने का कोई प्रक्रिया ना करें। और कोर्ट ने याचिकाकर्ता को ये भी कहा कि अगर फैसले से संतुष्ट नहीं हैं तो आप सर्वोच्च न्यायालय जा सकते हैं। फिर स्टाफ ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और कोर्ट ने सुनवाई के लिए 14 नवंबर का समय दिया। लेकिन MAEF के स्टाफ का कहना है कि उनकी बायोमैट्रिक अटेंडेंस को 4 नवंबर को बंद कर दिया गया, उन्हें न कोई नोटिस दी गई और न ही कुछ बोला गया। अब सवाल ये है कि जब सर्वोच्च न्यायालय ने 14 नवंबर की date दी है तो फिर स्टाफ की अटेंडेंस को किस आदेश के तहत बंद कर दिया गया। संविदा कर्मचारी अपनी जीविका को लेकर परेशान हो रहें। क्या सरकार की नजर ने संविदा कर्मचारी सिर्फ एक यूज़ एंड थ्रो समान है , जिससे काम लिया और अब निकल दिया। क्या उनकी जिंदगी का महत्व ही नहीं? उन्हें ना ही किसी तरह का कोई मुआवजा दिया गया ना किसी तरह का कोई राहत। ऑफिस चेल्म्सफोर्ड रोड पर अभी भी चल रहा है, कुछ स्टाफ काम कर रहे।
क्या यह अल्पसंख्यक उत्थान की बातें मात्र दिखावा हैं? आजाद साहब कहते थे, "आधुनिक भारत की सबसे बड़ी विशेषता लोकतंत्र की भावना है, जो सभी नागरिकों को समान अवसर देती है।" लेकिन अपने ही स्टाफ की जिंदगी पर विचार न करना, शिक्षा के नाम पर अन्याय कैसे?राष्ट्रीय शिक्षा दिवस पर, जब हम शिक्षा की समावेशीता और सुधारों को याद करते हैं, MAEF का मामला एक काला अध्याय है। सरकार से अपील: MAEF को कर्मचारियों को बहाल करें या मुआवजा दें। अल्पसंख्यकों के लिए शिक्षा का मार्ग बंद न करें, ताकि आजाद साहब का सपना साकार हो।
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