🐝 शुद्धता प्रमाणित करनी पड़ती है:
आजकल बाज़ार में “Pure Honey” के नाम पर बहुत कुछ बिक रहा है । किंतु सत्य यही है कि
Rice Syrup + Corn Syrup = Honey नहीं होता
असली शहद सिर्फ मधुमक्खियों की मेहनत से बनता है
#FabaHoney -
हम वादा नहीं करते… हम दिखाते हैं।
🍯 Faba Honey
100% प्राकृतिक
बिना मिलावट
सीधे मधुमक्खी पालन से
अगर शहद लेना है… तो भरोसे वाला लीजिए, दिखावे वाला नहीं।
#Beekeeping#VocalForLocal
Lenskart is yet to apologise for informing employees they are permitted to wear a hijab but not a bindi. Open challenge to @peyushbansal to inform employees they are permitted to wear a bindi but not a hijab.
You won’t have a head left to lodge your @Lenskart_com frames on.
थोड़ा सोचने का विषय है कि आपका बच्चा किसी भी मीडियम में पढ़े, किसी भी बोर्ड से पढ़े... सरकारी या निजी स्कूल में पढ़े, कान्वेंट या सार्वजनिक स्कूल में पढ़े... उसके भविष्य को लेकर आपने या खुद उसने क्या सोंचा है?... ?
आपके किसी भी स्कूल में पढ़ाने, कितने भी लाख फ़ीस खर्च करने के बाद जब वह 12th पास करके निकलता है तो क्या होता है?
1) वो अन्य बोर्ड और माध्यम या कम फ़ीस देकर पढ़ाई किये हुए बच्चों के साथ B Sc कर रहा है,
2) वो अन्य बोर्ड और माध्यम या कम फ़ीस देकर पढाई किये हुए बच्चों के साथ IIT, मेडिकल की कोचिंग कर रहा है,
3) वो अन्य बोर्ड या माध्यम या कम फ़ीस देकर पढ़े हुए बच्चों के साथ सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा है...
मुझे लगता है मँहगे स्कूलों में पढ़े हुए बच्चे भी इन्ही 3 श्रेणियों में आते हैं... IITs, मेडिकल आदि में चयन में अंग्रेजी बहुत निर्णायक भूमिका नहीं निभाती... उसमे विषयों पर गहरी पकड़ चाहिए... IIM में भले ही अंग्रेजी महत्वपूर्ण रोल अदा करती है...
आपका बच्चा भी इन्ही 3 श्रेणीयों में आने वाला है कुछ सालों में, वो हिंदी भाषी छात्रों से कम्पटीशन करेगा, औऱ महत्वपूर्ण बात ये है कि उसे लाखों खर्च करके पढ़ने के बाद भी "कम्पटीशन" या प्रतियोगिता करनी ही पड़ेगी सबसे... यकीनन स्कूल की बिल्डिंग या क्लासरूम में लगा हुआ AC किसी भी तरह कैरियर में मददगार नहीं होगा... जिसके नाम पर आज आप लाखों भर रहे हैं...
Middle-class households prioritize safety, obedience, and employability over health and wellness.
We were taught to save money, not invest in our physical health. To protect our reputation, not our posture. Our childhoods were filled with lectures on academic achievement, manners, and marriage, but we were never taught how to manage stress, the importance of proper sleep, or the impact of sugar on our bodies.
We were raised to believe that rest is laziness and exercise is a leisure activity.
Health was an afterthought, something we only dealt with when a problem arose.
We were taught to treat symptoms, not prevent them.
We invest in insurance policies, but neglect to invest in our mental and physical health.
We prioritize material possessions over our well-being.
This neglect is justified with pride.
We wear fatigue like a badge of honor and talk about our health issues like they're a normal part of life.
The irony is stark.
The same middle class that saves every receipt and rupee forgets to invest in the body that holds it all together.
We build careers, raise families, and tick every box that society expects of us, but neglect the body that carries us through it all.
We ignore the warnings our bodies send us until it's too late.
Maybe it's not willpower we lack, but vocabulary. Instead of saying "I'm tired," we should say "I need a break." Instead of putting off our health concerns, we should prioritize them.
Health is not an expense, but our first investment. And fitness is not indulgence, but survival.
If we don't change our approach now, we'll spend our entire savings on a body we never learned how to care for and leave the next generation with body debt.
सांसद विधायक क्षेत्रों की संख्या बढ़ाना गलत भी नहीं।
भारत की जनसंख्या और क्षेत्र बहुत बड़ा है।
पर एक मिनट।
जो सबसे जरूरी है , उसकी बात क्यों नहीं होती?
1947 के समय भारत में जितने थाने, तहसील और जिले थे, उनकी संख्या में कितना इजाफा हुआ?
कितने नए पटवारी/लेखपाल क्षेत्र बने?
कितने नए विकास खंड?
कितनी नई न्याय पंचायतें?
कितनी नई ग्राम पंचायतें बनीं?
कितनी नई नगर पालिकाएं और कितनी नई नगर पंचायतें बनीं?
भारत की जनसंख्या के हिसाब से ये 1947 के दस गुने नहीं तो पांच गुने तब भी हो जाना चाहिए था।
इन सब चीजों से आम आदमी का रोजाना वास्ता पड़ता है।।
पर हिंदुस्तान के आम आदमी को सरकारी चीजों से इतनी कुंठा है कि वो इनकी बातें नहीं करेगा।
जबकि इन सब नई चीजों (जो कि उसके लिए भी बहुत जरूरी हैं) की आवश्यकता नए सांसद विधायक क्षेत्रों से ज्यादा ही है।
इससे नई नौकरियां भी बढ़ेंगी, रोजगार भी मिलेगा और आम आदमी को कम से कम अपने क्षेत्र का दारोगा पटवारी या सचिव आसानी से मिलेगा।
जिसके पास काल्पनिक गांव फुलेरा के काल्पनिक सचिव की तरह सिर्फ एक नहीं दर्जन दर्जन भर ग्राम पंचायतें होती हैं।
पर उस देश में चर्चा इन बेसिक बातों पर कोई नहीं करना चाहता जिससे जनता और सरकारी तंत्र (प्रशासन) दोनों को आसानी हो ,जिस देश में आम आदमी का पूरा दिमाग केवल जातिगत राजनीति पर ही लगता आया हो।
परिसीमन के बाद यूपी विधानसभा में 600 सीटें हो जायेंगीं। लगभग 200 विधायक बढ़ेंगे। अच्छी राजनीति करने वालों के लिए बहुत बढ़िया मौका है। समाज में अपनी पहचान बनाइये, लोगों से मिलिए, उनकी समस्याओं को बारीकी से पहचानिए और परिसीमन में उभरने वाले नए क्षेत्र से जनता के बीच अपनी दावेदारी ठोकिए। पुराने स्थापित नेताओं को चुनौती देने का यह बहुत ही बढ़िया अवसर है। दलगत राजनीति से भी ऊपर उठिए।
मैं जानता हूं कि सरकार बनाने के लिए राजनीतिक दलों की आवश्यकता होती है लेकिन अगर आपके पास अपने क्षेत्र में जनता की ताकत है तो कोई आपको इग्नोर नहीं कर सकता।
मठाधीशी करने वाले नेताओं के वोट बैंक में सेंध लगाइए और अपने हिस्से का यश, बल और संसाधन उनसे छीन लीजिए।
कुछ लोग कहते हैं कि सारे जज भ्रष्ट हैं, जबकि कुछ लोग कहते हैं कि सारे जज भ्रष्ट नहीं हैं।
मुझे भी ऐसा ही लगता है कि सारे जज भ्रष्ट नहीं हैं। यही बात नेताओं के लिए भी है...