پن کیا گیا ٹویٹ
🥀 Mrityunjay Tiwari
428.1K posts

🥀 Mrityunjay Tiwari
@_Tiwarie__63
NationFirst | Sanatani | Aviation | Politics | TechEducator | NaMoNamah | Trump | MAGA🇺🇸 | ❌️DM
NY. AMD. VNS. شامل ہوئے Haziran 2013
30K فالونگ54.6K فالوورز
🥀 Mrityunjay Tiwari ری ٹویٹ کیا
🥀 Mrityunjay Tiwari ری ٹویٹ کیا

Pakistan is developing larger motors for ICBMs - Pakistan developing missile that can reach America - this is causing concerns in US !! Will have implications for India also app.indiatoday.link/d/hFuISfTqM4
English
🥀 Mrityunjay Tiwari ری ٹویٹ کیا
🥀 Mrityunjay Tiwari ری ٹویٹ کیا

@ShriAyodhya_ 🌟‼️यतो धर्म: ततो हनुमान:, यत:हनुमान: ततो जय:‼️🌟
MR
🥀 Mrityunjay Tiwari ری ٹویٹ کیا

|| भगवान से भी बड़ा उनका नाम ||
राजा सुकंत की कहानी.. हनुमान जी और श्री राम के बीच युद्ध !
नारद जी बड़े लीला-बिहारी हैं। वे हर लीला भगवान के नाम, महिमा, गुण, और शरणागति की महिमा को पुष्ट करने के लिए ही प्रकट करते हैं। वे स्वयं भगवान का साक्षात स्वरूप हैं।
एक बार की बात है.. सुकंत नामक एक राजा था। वह बड़ा प्रतापी था। उस समय भगवान श्रीराम जी चक्रवर्ती सम्राट पद पर विराजमान थे। एक सभा में बड़े-बड़े ब्रह्म ऋषि विराजमान थे। नारद जी सुकंत जी को सभा के बाहर मिल गए।
नारद जी ने उनसे पूछा- "अंदर प्रभु के दर्शन करने जा रहे हो?"
सुकंत जी ने कहा, "हाँ।”
नारद जी बोले, "वहाँ बहुत से ब्रह्मऋषि बैठे हैं। सबको प्रणाम भी करोगे?"
सुकंत जी ने कहा, "हाँ, मर्यादा है, संतों को प्रणाम करने की।"
नारद जी बोले, "विश्वामित्र जी को भी प्रणाम करोगे?"
सुकंत बोले, "हाँ, वे तो ब्रह्म ऋषि हैं।"
नारद जी बोले, "ब्रह्म ऋषि कहाँ हैं? वे तो क्षत्रिय कुल में, कौशिक वंश में प्रकट हुए हैं।"
सुकंत बोले, "हाँ, पर उन्होंने तपस्या से ब्रह्म पद प्राप्त किया है।"
नारद जी बोले, "पर मूल में तो क्षत्रिय ही हैं ना?"
सुकंत बोले, "आप कहना क्या चाहते हैं?"
नारद जी बोले, "उन्हें बस ऐसे ही प्रणाम कर लेना, माथा मत रखना। बाकी सब ऋषियों के आगे माथा टेक लेना"
इसके बाद सुकंत जी भगवान के दरबार में गए। उन्होंने भगवान को नमन किया, सभी ऋषियों के चरणों में मस्तक रखा। पर जब विश्वामित्र जी के पास पहुँचे, तो केवल हाथ जोड़कर प्रणाम किया, लेकिन माथा नहीं रखा।
विश्वामित्र जी ने ध्यान तक नहीं दिया। सभा पूर्ण हुई। इसके बाद नारद जी विश्वामित्र जी के पास आकर बैठे।
नारद जी ने विश्वामित्र जी से पूछा, "आपने कुछ देखा?"
विश्वामित्र जी बोले, "क्या?"
नारद जी बोले, "सुकंत को?"
विश्वामित्र जी बोले, "क्या बात हुई? मैंने तो ध्यान नहीं दिया"
नारद जी बोले, "सुकंत ने सबको माथा टेककर प्रणाम किया, आपको बस ऐसे ही प्रणाम कर दिया।"
विश्वामित्र जी बोले, "हाँ, उसने ऐसे तो किया, पर इस बात पर मेरा ध्यान नहीं गया। इसका कोई विशेष कारण है?"
नारद जी बोले, "हाँ, वो कह रहे थे कि आप मूल में तो क्षत्रिय ही हैं, ब्रह्म ऋषि तो आप बाद में तपस्या से बने।"
यह सुनते ही विश्वामित्र जी को बहुत क्रोध आया।
नारद जी ने कहा, "उसे दंड तो मिलना ही चाहिए। आप जैसे ब्रह्म ऋषि के साथ ऐसा व्यवहार?"
नारद जी ने वहाँ सुकंत को विश्वामित्र जी का अपमान करना सिखाया और यहाँ उनकी शिकायत भी कर दी। इसमें उनका कुछ विशेष उद्देश्य था।
विश्वामित्र जी आवेश में खड़े हुए और बोले- "रघुनाथ! आपके दरबार में हमारा अपमान हुआ है!"
श्री राम बोले, "प्रभु, आपका अपमान!"
विश्वामित्र जी ने कहा, "सूर्य अस्त होने से पहले सुकंत का मस्तक मेरे चरणों में होना चाहिए!"
इसपर श्री राम जी ने कहा, "प्रभु, मैं आपके सामने सत्य वचन कहता हूँ- यदि सूर्यास्त से पहले मैं उसका मस्तक आपके चरणों में न डाल दूँ, तो मैं रघुवंशी नहीं! आप शांत हो जाइए"
नारद जी सीधा सुकंत जी के राजमहल पहुँचे। वो सुकंत जी से बोले-"अब तो शाम तक मारे जाओगे! भगवान श्री राम ने संकल्प कर लिया है कि तुम्हारा गला काटकर विश्वामित्र जी के चरणों में डालेंगे।
सुकंत जी घबरा गए। बोले, "महाराज! आपने हमें फँसा दिया। हम तो साष्टांग प्रणाम कर लौटने ही वाले थे। आपने ही कहा था कि बस हाथ जोड़ देना।"
नारद जी बोले, "हमें क्या पता था कि बात इतनी बिगड़ जाएगी? अब तो समस्या सच में फँस गई है।"
सुकंत जी रोने लगे, "प्रभु! अब कैसे बचें? भगवान ने तो कह दिया है - 'मैं रघुवंशी नहीं यदि सूर्यास्त से पहले उसका मस्तक आपके चरणों में न पहुँचाऊँ।' और भगवान कभी मिथ्या वचन नहीं कहते। अब तो मैं मारा ही जाऊँगा। कोई उपाय है प्रभु?"
नारद जी बोले, "एक ही उपाय है.. हनुमान जी। वही बचा सकते हैं।"
सुकंत बोले, "पर राम जी की आज्ञा का विरोध हनुमान जी कैसे कर सकते हैं? और फिर, हमारी पहुँच भी कहाँ है हनुमान जी तक?"
नारद जी बोले, "हनुमान जी को यदि कोई राम जी के अलावा आज्ञा दे सकता है, तो वो हैं माता अंजनी। चलो, मैं तुम्हें उनसे मिलवाता हूँ।"
नारद जी उन्हें अंजनी माता के पास ले गए। सुकंत जी ने साष्टांग दंडवत प्रणाम किया और रोते हुए कहा, "माँ! रक्षा कीजिए।"
माता अंजनी बोलीं, "बेटा, बताओ तो सही, क्या समस्या है?"
सुकंत बोले, "माँ, त्रिभुवन में अब केवल आप ही हैं जो मेरी रक्षा कर सकती हैं। एक राजा मुझे मारना चाहता है।"
माता अंजनी ने कहा, "मेरा पुत्र महावली, हनुमान है। यदि मैं उसे आज्ञा दूँ, तो वह कभी मेरी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करेगा। जाओ, मैं तुम्हारी रक्षा का व्रत लेती हूँ।"
नारद जी मन ही मन प्रसन्न हुए - "काम बन गया! अब भगवान के नाम की महिमा प्रकट होगी।"
हनुमान जी से माता अंजनी ने कहा, "बेटा, मैंने इसकी रक्षा का व्रत लिया है।"
हनुमान जी बोले, "आपकी आज्ञा मेरे सिर-आँखों पर! त्रिभुवन में कोई ऐसा पैदा ही नहीं हुआ कि मेरी माँ किसी की रक्षा का व्रत ले और वो उसे मार दे! कौन राजा है, जो इसे मारना चाहता है?
सुकंत ने हाथ जोड़कर धीरे से कहा, "भगवान श्रीराम।"
हनुमान जी सुनकर सन्न रह गए। "क्या! मेरे स्वामी? माँ, आपने किसके विरुद्ध रक्षा का व्रत ले लिया!" "माँ, ये तो मेरे प्रभु हैं। उनके विरुद्ध मैं कैसे खड़ा हो सकता हूँ?"
माता अंजनी बोलीं, "बेटा, हमने तो वचन दे दिया है। अब उसे निभाना होगा।"
हनुमान जी बोले, "चलो, एकांत में चलो।" वे सुकंत को एकांत में ले गए। संध्या का समय निकट था। सूर्यास्त होने ही वाला था।
हनुमान जी बोले, "अब बस एक उपाय है - तुझे अपनी हर श्वास में राम नाम जपना होगा। जहाँ राम नाम रुका, वहीं भगवान का बाण तुझे समाप्त कर देगा।
पर यदि तेरी हर श्वास में राम-नाम चलता रहा, तो तू बच जाएगा। तू बस सीताराम... सीताराम... सीताराम - यही जपता रह। यह क्रम कभी टूटना नहीं चाहिए।
यदि बीच में ज़रा भी अंतर पड़ा, तो प्रभु का अमोघ बाण तुझे काट देगा। अब तू चिंता मत कर। बैठ जा और नाम जप शुरू कर दे।
सुकंत बैठ गए और जपने लगे, "सीताराम... सीताराम... सीताराम..." हनुमान जी महाराज ने करताल उठाई और वो भी प्रभु का नाम जपने लगे और उनके आस-पास नृत्य करने लगे।
उधर भगवान श्रीराम ने अमोघ बाण का संधान किया। छोड़ा गया, और वह तीव्र वेग से चला... लेकिन जहाँ हनुमान जी महाराज और सुकंत नाम जप कर रहे थे, वहाँ पहुँचकर बाण रुक गया। उसने उन दोनों की परिक्रमा की और वापस लौट गया!
भगवान श्रीराम चकित रह गए। "आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ! अमोघ बाण बिना लक्ष्य को बेधे वापस कैसे आ गया?"
वे आश्चर्य से बोले, "त्रिभुवन में ऐसा कौन है, जिससे मेरा बाण टकराकर लौट आया?"
उन्होंने लक्ष्मण जी से कहा, "जहाँ सुकंत हैं, वहाँ तुरंत जाओ। देखो, वहाँ ऐसा क्या हो गया कि बाण ने उसका गला नहीं काटा?"
लक्ष्मण जी वहाँ पहुँचे। और जो दृश्य देखा वो अद्भुत था। हनुमान जी की आँखों में आँसू थे। वे प्रेम में डूबे, चारों ओर घूमते हुए नाम-संकीर्तन कर रहे थे "सीताराम... सीताराम... सीताराम..." सुकंत भी समाधि में लीन थे।
लक्ष्मण जी का भी हृदय पिघल गया। वे भी वहाँ बैठ गए और तालियाँ बजाते हुए जपने लगेः "सीताराम... सीताराम... सीताराम..." इधर भगवान श्रीराम ने ध्यान किया -
"बाण तो वापस आ गया... और अब लक्ष्मण भी नहीं लौटे और ना ही उनकी कोई सूचना आई... वहाँ कुछ तो विशेष चला है..."
विश्वामित्र जी ने कहा: "आपने संकल्प लिया था कि संध्या से पहले इसका शीश काटकर लायेंगे।"
भगवान श्रीराम ने विनम्रता से कहा: "गुरुदेव, कृपया धैर्य रखें। मैं स्वयं जाता हूँ।" यह सुनकर विश्वामित्र जी बोले: “तो मैं भी साथ चलूँगा। देखूँगा, तुम क्या निर्णय लेते हो।"
साथ में सभी ब्रह्मर्षि और देवर्षि नारद जी भी वीणा लिए चल पड़े। भगवान श्रीराम वहाँ पहुँचे। जो दृश्य देखा, वह अद्भुत था।
सुकंत प्रभु श्री राम का नाम जप रहे थे। हनुमान जी करताल लेकर कीर्तन कर रहे थेः "सीताराम... सीताराम... सीताराम..." उनके साथ लक्ष्मण जी भी कीर्तन में लीन थे।
भगवान श्रीराम की आंखों में करुणा झलक उठी। "अब मुझे समझ आया,” प्रभु बोले, "जिसके गले में निरंतर मेरा नाम चल रहा हो - वहाँ मेरा अमोघ बाण भी छेदन नहीं कर सकता।"
श्री राम ने विश्वामित्र जी से कहा, "गुरुदेव, आपने आज्ञा दी थी कि इसका शीश लाना है, लेकिन यह नहीं कहा था कि काटकर ही लाना है।"
श्री राम ने सुकंत से कहा, "रखो अपना मस्तक विश्वामित्र जी के चरणों में!" विश्वामित्र जी प्रसन्न हो गए।
नारद जी मुस्कराए और बोलेः "प्रभु ! न सुकंत का दोष है, न विश्वामित्र जी का। मैं बस यह दिखाना चाहता था - कि आपके अमोघ बाण से भी अधिक शक्तिशाली आपका 'नाम' है।
जिस गले में निरंतर राम नाम गूंजता है, वहाँ सुदर्शन चक्र भी असमर्थ है।"
नाम जापक एक अमोघ शक्ति से संपन्न हो जाता है। आप नाम जप शुरू करें। कुछ दिन नाम जपने के बाद अगर आपके जीवन में विपत्तियाँ आने लगे तो हारना मत, यह आपके पुराने कर्मों का हिसाब हो सकता है।
यह एक युद्ध है। कभी विपक्ष से बाण आकर घायल करता है तो शूर-वीर पीठ दिखाकर थोड़ी भाग जाता है। चाहे जितनी विपत्तियाँ आएँ, अब नाम जप नहीं छूटना चाहिए।
उन विपत्तियों का कोई प्रभाव आप पर नहीं पड़ेगा। हरि के स्मरण से सारी विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं।

हिन्दी
🥀 Mrityunjay Tiwari ری ٹویٹ کیا
🥀 Mrityunjay Tiwari ری ٹویٹ کیا
🥀 Mrityunjay Tiwari ری ٹویٹ کیا
🥀 Mrityunjay Tiwari ری ٹویٹ کیا
🥀 Mrityunjay Tiwari ری ٹویٹ کیا











