Rahul Singh Lodhi
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Rahul Singh Lodhi
@Rasingh25
|| साहित्य का विद्यार्थी || Phd || Delhi University|| Reader || writer || critic || Madhya Pradesh || Repost are not my endorsement ||
Tham gia Aralık 2024
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सोशल मीडिया अनियंत्रित गली-गलौच और अश्लीलता का क्षेत्र बन चुका है। यह चिंताजनक है।
#socialmedia
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चिंताजनक स्थिति है यह। जिस शायर को आप संसद में पढ़ते हैं, अपने भाषणों में जिक्र करते हैं। उस शायर के लिए एक शोक संदेश भी नहीं लिखा गया।
Atul Kumar Rai@AuthorAtul
पक्ष हो या विपक्ष बशीर बद्र का शेर संसद में सबने पढ़ा है. लेकिन न ही प्रधानमंत्री की तरफ़ से कोई शोक संदेश आया और न ही नेता विपक्ष की तरफ़ से. हो सकता है व्यस्तताएं हों या बशीर बद्र किसी विचारधारा की राजनीति में अप्रासंगिक लगते हों..लेकिन कम से कम नेताओं के भाषण में शायरी डालने वाले सलाहकारों को ये बताना चाहिए कि जिन लाइनों पर आपने संसद में तालियाँ बजवाई थीं, वो शायर नहीं रहा.. !
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OneDay, One Person
Support @musafir_aman bhai
मेरा प्यारा छोटा भाई अमन मुसाफ़िर आज असिस्टेंट प्रोफेसर (हिंदी) के पद पर राजकीय महाविद्यालय, खरखड़ा, रेवाड़ी (हरियाणा) में जॉइन कर लिया है।
आप सब भी बधाई दीजिये, दुआएँ दीजिये।💝
ये मेरे लिये बहुत ख़ास दिन है। अभी इससे पहले ये गृहमंत्रालय में कार्यरत थे।

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@rajasthanroyals suryvanshi six nhi mar rha hai isliye bura lag rha h
CY
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मैं गृहमंत्री जी से अनुरोध करूंगा कि इस ‘हरामी नाला’ का नाम बदल दिया जाए
ANI_HindiNews@AHindinews
#WATCH गुजरात: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कच्छ में भारत-पाकिस्तान सीमा के निकट स्थित 'हरामी नाला' क्षेत्र का दौरा किया।
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@shubhankrmishra बहुत बड़ा स्कैम चल रहा है। आम श्रद्धालु इतने संघर्ष से केदारनाथ धाम की यात्रा करते हैं;उन्हें कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। ना खाना मिलता है, ना पानी मिलता है, रुकने की पर्याप्त सुविधाएं भी नहीं है। आम श्रद्धालुओं का पैसा आम जनता पर खर्च होना चाहिए।
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शब्दों, भाषा को हम छोटी चीज समझते हैं। वही बात है जब चीजें नहीं होती हैं तो उनकी महत्ता ज्यादा होती है। जब मनुष्य समाज के पास भाषा नहीं थी तो उसके लिए भाषा बहुत बड़ी वस्तु थी। लेकिन आज हम भाषा, शब्दों और वाक्यों का सम्मान कितना करते हैं;ये सब जगजाहिर है। अगर एक वाक्य में कहूं तो ‘भाषा बहुत संवेदनशील वस्तु है।’
कई बार होता है कि हमारे पार विचार होते हैं लेकिन उनको व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं होते। अंततः विचार शब्दों के अभाव में मर जाते हैं। ऐसा हमारी जिंदगी में कई बार होता है। इस तरह हम शब्दों के अभाव में विचारों को मारते रहते हैं।
कुंवर नारायण की एक कविता से समझिए जिसे उन्होंने भाषा के ऊपर लिखा। इस कविता के अंतिम वाक्यों को ध्यान से पढ़िए।
बात सीधी थी पर एक बार
भाषा के चक्कर में
ज़रा टेढ़ी फँस गई ।
उसे पाने की कोशिश में
भाषा को उलटा पलटा
तोड़ा मरोड़ा
घुमाया फिराया
कि बात या तो बने
या फिर भाषा से बाहर आये-
लेकिन इससे भाषा के साथ साथ
बात और भी पेचीदा होती चली गई ।
सारी मुश्किल को धैर्य से समझे बिना
मैं पेंच को खोलने के बजाय
उसे बेतरह कसता चला जा रहा था
क्यों कि इस करतब पर मुझे
साफ़ सुनायी दे रही थी
तमाशाबीनों की शाबाशी और वाह वाह ।
आख़िरकार वही हुआ जिसका मुझे डर था –
ज़ोर ज़बरदस्ती से
बात की चूड़ी मर गई
और वह भाषा में बेकार घूमने लगी ।
हार कर मैंने उसे कील की तरह
उसी जगह ठोंक दिया ।
ऊपर से ठीक ठाक
पर अन्दर से
न तो उसमें कसाव था
न ताक़त ।
बात ने, जो एक शरारती बच्चे की तरह
मुझसे खेल रही थी,
मुझे पसीना पोंछती देख कर पूछा –
“क्या तुमने भाषा को
सहूलियत से बरतना कभी नहीं सीखा ?”
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अखबारों से प्रूफ रीडर नाम का प्राणी लुप्त हो गया। यह मानकर चलते हैं कि कोई कॉपी रिपोर्टर लिख रहा है तो उसमें प्रयुक्त वर्तनी आदि देखने की जिम्मेदारी उसकी है। व्यवहार में ऐसा नहीं है। रिपोर्टर ही नहीं अब कॉपी डेस्क पर भी भाषा और विषय की अच्छी समझ वाले लोग कम हो रहे हैं। मीडिया हाउसों को इस तरफ ध्यान देना चाहिए। अक्सर टीवी चैनलों के स्क्रॉल और कैप्शनों में बड़ी गलतियाँ होतीं हैं। सुपरिभाषित शैली पुस्तिका और एक अंदरूनी गुणवत्ता सिस्टम इसे ठीक कर सकता है।
पठनीय 👇pramathesh.blogspot.com/2026/05/blog-p…
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भोपाल के बड़ा बाग कब्रिस्तान में हुआ शहूर शायर बशीर बद्र का अंतिम संस्कार
#BashirBadr #Bhopal #BashirBadrDeath
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