




Reshma Prasad
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@reshmatrans
सदस्य राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर परिषद नई दिल्ली #transgender Member, National Council for Transgender Person under MOSJE Government of India



















सियासी जीवन में होते हुए बड़ी शिद्दत के साथ लोकरंग, लोकपर्व, लोक आस्था, लोकगीत, लोकराज और लोकलाज को ज़िन्दा रखने की फ़िक्र के प्रतीक रहे हैं लालू जी @laluprasadrjd हां, वे मुख्यमंत्री आवास में लौंडा नाच आयोजित कर लोक कलाकारों को प्रतिष्ठित किया करते थे, उनका मान बढ़ाया करते थे, विलुप्त होती जा रही इस विधा को ज़िन्दा रखने की सचेतन कोशिश करते थे। हमें इस बात पर फ़ख़्र है! बिदेसिया, बेटीबेचवा, बिधवाबिलाप, पियानिसइल, गंगास्नान, आदि नाटकों के रचनाकर व भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर की परसों (10 जुलाई) बरसी थी। उनकी नाटक मंडली के अंतिम कलाकार रामचंद्र मांझी जी ने भिखारीनामा की ओर से 2017 में जेएनयू के कंवेंशन सेंटर में आयोजित कार्यक्रम में लालू जी को याद करते हुए कहा, "वे मेरे मालिक हैं, उन्होंने मुझे कहा कि रामचंद्र जी आपको इसमें से हटना नहीं है। इस तमाशा को ज़िन्दा रखना है। इसलिए आज तक केश पक गया है, बूढ़ा हो गया हूँ लेकिन आज भी आपके सामने हूँ।" रामचंद्र मांझी जी को लालू जी इतना मानते थे। इस प्रसंग का ज़िक्र लालू जी की जीवनी 'द किंगमेकर' में भी किया है। रामचंद्र जी को पिछली केंद्र सरकार ने पद्मश्री भी दिया। लेकिन, जिन्हें इस देश की न तो समृद्ध लोकसंस्कृति के बारे में पता है, न तो अपने धरोहरों को संजोने की भविष्य की कोई सुन्दर योजना है उनके पास, वे लालू जी द्वारा लोक कलाकारों को प्रोत्साहन व लोक-संस्कृति के संरक्षण के मौलिक प्रयासों की यूं ही खिल्ली उड़ाया करते हैं। मुझे कभी-कभी हैरत होती है कि लौंडा नाच को लोग हिकारत भरी नज़र से क्यों देखते हैं। लालू जी सिर्फ सोशल जस्टिस, जेंडर जस्टिस और इकोनोमिक जस्टिस नहीं, बल्कि क्लाइमेट जस्टिस व कल्चरल जस्टिस के भी हिमायती हैं। भाजपा के साथी लौंडा नाच का मज़ाक़ बना रहे, यह भोजपुरी समाज का अपमान है। भिखारी ठाकुर से लेकर महेन्द्र मिसिर तक ने न जाने कितनी सामाजिक बुराइयों पर चोट की अपने लेखन और अभिनय के जरिए। महेन्द्र मिसिर को तो "पुरबिया सम्राट" ही कहा जाता है। श्रृंगार रस के जितने अनूठे गीत उन्होंने दिये हैं, भोजपुरी में शायद ही किन्हीं और ने! हमारी महागठबंधन सरकार (2015-17) के दौरान जब तेजस्वी जी @yadavtejashwi उपमुख्यमंत्री थे, तो बिहार में पहली बार थर्ड जेंडर के लिए महोत्सव आयोजित किया था। शिवचंद्र राम जी कला, संस्कृति व युवा मामलों के मंत्री थे। हम अपनी माटी से जुड़े लोग हैं, और हमें अपनी कला, संस्कृति को लेकर कोई संकोच या हीनभावना नहीं है। संसद में अभिनेत्रियों को ला रहे हैं, लाइए। लेकिन भिखारी ठाकुर की कला और बाक़ी प्रांतीय व क्षेत्रीय सांस्कृतिक विविधता को बचाए रखने वाले लोगों को भी बुलाते, तो अच्छा होता! "लौंडा नाच" बिहार के लोक में बसा हुआ है। इसको हेय दृष्टि से देखने की ज़रूरत नहीं है। रामचन्द्र मांझी जी ने इस पर कई दफ़े तफ़्सील से रोशनी डाली है। क्या यह सच नहीं है कि जब कुलीन घराने की लड़कियां फ़िल्मों में काम नहीं करती थीं तो स्त्रियों का किरदार भी पुरुष ही निभाते थे! चौधरी चरण सिंह जी से लेकर ताऊ देवीलाल जी तक उस समय के नौजवान नेताओं को इसी नाम से संबोधित करते थे! भिखारी ठाकुर की रचनाधर्मिता की एक-दो मिसाल यहां देखें: सखिया सावन बहुत सुहावन ना मनभावन अइलन हो। रुपया गिनाई लिहाल, पगहा धराई दिहला जरिया के अरिया से कटला ए बाबू जी। ('बेटीबेचवा' से)





