
एक लेखक के लिए इससे बड़ी और दुर्लभ उपलब्धि क्या हो सकती है कि उसकी शुरुआती दोनों किताबें ही बेस्टसेलर बन जाएँ। वे अमेज़न की रैंकिंग में नंबर वन रहें, और दैनिक जागरण की बेस्टसेलर सूची में पूरे पिछले साल “प्रोफ़ेसर की डायरी” पहले स्थान पर बनी रहे। इस वर्ष की तिमाही बेस्टसेलर रैंकिंग में भी “प्रोफ़ेसर की डायरी” चौथे स्थान पर है, जबकि हाल ही में प्रकाशित “जाति जनगणना” पहले स्थान पर पहुँच गई है। गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों तक इन किताबों की हज़ारों प्रतियाँ पहुँच रही हैं। यहाँ तक कि उनकी पायरेटेड कॉपियाँ भी हज़ारों की संख्या में पढ़ी जा रही हैं। लोग इन किताबों पर चर्चा कर रहे हैं, उन पर कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं, और पाठक उन्हें एक-दूसरे को उपहार में दे रहे हैं। और जब ये किताबें वैचारिक और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हों, तब यह उपलब्धि और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है। यह इस बात का संकेत है कि गंभीर साहित्य, विचार और बहस की दुनिया में लोगों की रुचि लगातार बढ़ रही है। ऐसे समय में, जब सतही शोर को अधिक जगह मिलती है, तब किताबों के प्रति यह आकर्षण कलम की ताक़त, विचार की शक्ति और पाठकों के भरोसे को और मज़बूत करता है। यह विश्वास दिलाता है कि समाज में अब भी पढ़ने, समझने और सवाल करने वाले लोगों की बड़ी संख्या मौजूद है। इन दोनों किताबों के शानदार संपादन के लिए हिन्दी जगत के उत्कृष्ट संपादक आशीष का विशेष आभार। साथ ही @UnboundScript के प्रकाशक @theBookwalla का भी धन्यवाद, जिन्होंने इतने चुनौतीपूर्ण दौर में वैचारिक किताबों को पाठकों तक पहुँचाने की जिम्मेदारी निभाई। इस स्नेह, विश्वास और प्रेम के लिए सभी पाठकों, साथियों और शुभचिंतकों का हृदय से आभार। अगर आप किताब मँगवाना चाहें तो नीचे दिए गए लिंक पर जा सकते हैं: प्रोफ़ेसर की डायरी – amzn.in/d/fi5Zs9U जाति जनगणना – amazon.in/dp/9347125288