Utkarsh Mishra retweeté

लंबाई थोड़ी ज्यादा है लेकिन जो सिरा खुला तो खुलता गया ... पढ़ेंगे तो अच्छा लगेगा
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भास्कर में आज एक लेख पढ़ा। बात बड़ी लुभावनी थी ... बढ़ती उम्र के साथ थोड़ा अजीब हो जाइए। दुनिया के सांचों से बाहर निकलिए। अपने भीतर लौटिए। अपने असली रूप के करीब पहुंचिए। बात में मिठास भी थी और राहत भी। जैसे किसी ने उम्र की झुर्रियों में स्वतंत्रता का गुलाब रख दिया हो।
लेख में अंतरात्मा पर शोध करने वाली प्रोफेसर रेबेका श्लेगल का हवाला था कि उम्र बढ़ने के साथ लोग अपने असली स्वरूप के करीब पहुंचते जाते हैं। हर दशक उन्हें थोड़ा और प्रामाणिक बना देता है। लेखिका डियान शिफर कहती हैं कि अपने अजीबपन को स्वीकार करना जोखिम भरा है, क्योंकि दुनिया आपकी हर पसंद पर ताली नहीं बजाएगी। जेंसी डन तो अजीब होने को सुपरपावर कहती हैं। डॉ. स्कॉट काफमैन के मुताबिक वियर्डनेस अनुभवों के प्रति खुलापन है, और यही रचनात्मकता की पहली शर्त है।
इन बातों से कौन असहमत होगा? सचमुच, थोड़ा अजीब होना चाहिए। थोड़ा दुनिया के हिसाब से न चलना चाहिए। थोड़ा बचकाना, थोड़ा सनकी, थोड़ा अनुपयोगी, थोड़ा असुविधाजनक होना चाहिए। आदमी अगर पूरी तरह व्यवस्थित हो जाए तो अलमारी बन जाता है, मनुष्य नहीं।
लेकिन यहीं एक पतली-सी रेखा है। इसी रेखा के उस पार अजीबपन नहीं, उन्माद शुरू होता है। आत्मस्वीकृति नहीं, अहंकार शुरू होता है। मौलिकता नहीं, मनुष्य के भीतर बैठा छोटा-सा तानाशाह जागता है। और हमारे समाज में यह तानाशाह बहुत जल्दी जाग जाता है खासकर तब, जब उसे कुर्सी, पद, माइक, लाल बत्ती, फाइल, सुरक्षा-कर्मचारी, या किसी और की नियति पर हस्ताक्षर करने का अधिकार मिल जाए।
हमारे यहां कई लोग अजीब नहीं होते, वे बस अपने को ईश्वर समझने लगते हैं।
नेता हो, अधिकारी हो, अफसर हो, संपादक हो, मालिक हो, प्रधान हो, ठेकेदार हो, संस्था का प्रमुख हो कई जगहों पर एक ही रोग दिखता है। आदमी जैसे ही कुर्सी पर बैठता है, उसे लगता है कि संसार उसके फन पर टिका है। वह शेषनाग है। उसने जरा करवट बदली तो धरती डगमगा जाएगी। वह जिसे चाहे उठा देगा, जिसे चाहे गिरा देगा। जिसकी नौकरी चाहे बचा देगा, जिसकी फाइल चाहे दबा देगा। जिसकी तकदीर चाहे लिख देगा, जिसकी सांस चाहे रोक देगा।
कुर्सी पर बैठे हुए उनके चेहरे देखिए। बोलने का ढंग देखिए। गर्दन का कोण देखिए। आंखों की ऊंचाई देखिए। वे सामने वाले आदमी को आदमी नहीं, आवेदनपत्र समझते हैं। उनकी मेज पर रखा पेपरवेट भी उनसे ज्यादा मानवीय लगता है।
और फिर समय का कमाल देखिए। वही लोग जब कुर्सी से उतरते हैं, तो कितने निरीह लगते हैं। वही फोन जिन्हें कभी वे उठाते नहीं थे, अब वे खुद मिलाते हैं। वही दरवाजे जिन पर लोग इंतज़ार करते थे, अब वे खुद इंतज़ार करते हैं। वही चेहरा, जो कभी निर्णय था, अब अनुरोध बन जाता है। वही आवाज, जो कभी आदेश थी, अब सफाई देती है।
यहीं जीवन का असली व्यंग्य है। कुर्सी पर बैठा आदमी सोचता है कि वह स्थायी है। कुर्सी चुप रहती है। उसे मालूम होता है कि आदमी अस्थायी है।
अजीब होना अगर मुक्ति है, तो ईश्वर होने का भ्रम कैद है। अजीब आदमी दुनिया के सांचे तोड़ता है, लेकिन दूसरों की गरिमा नहीं तोड़ता। अहंकारी आदमी अपनी सुविधा को सिद्धांत, अपनी सनक को नीति और अपनी क्रूरता को व्यवस्था कहने लगता है। वह दूसरों के जीवन में ऐसे प्रवेश करता है जैसे कोई कसाई बाड़े में उतरता है ... मापता है, तौलता है, काटता है, और फिर कहता है ... यह सब नियम के अनुसार हुआ है।
हमारे समय का सबसे बड़ा अवसाद यही है कि मनुष्य अपनी मनुष्यता से थक गया है, लेकिन ईश्वर बनने को उतावला है।
कुछ लोग सचमुच अवसाद की काली रात से गुजरते हैं। उनके सामने हार का भय होता है। चुनौतियां मुंह बाए खड़ी होती हैं। भीतर अंधेरा होता है। बाहर दरवाजे बंद होते हैं। जीवन पूछता है अब? और वे जवाब देते हैं ... अभी नहीं, अभी हारना नहीं है।
ऐसे लोग टूटते नहीं, तपते हैं। वे खुद को बड़ा नहीं घोषित करते, जीवन उन्हें धीरे-धीरे बड़ा बना देता है। उनकी महानता की कोई घोषणा नहीं होती। वह उनके श्रम की धूल, आंखों की नींद, अस्वीकृतियों के ढेर, उधार की रोटियों, कटे हुए दिनों और लहूलुहान आत्मसम्मान से बनती है।
हेनरी फोर्ड को लोग पागल समझते थे। रात-रात भर मशीनों पर ठक-ठक करता आदमी किसे समझ आता? पिता नाखुश, पड़ोसी परेशान, जेब खाली, भविष्य संदिग्ध। लेकिन उसके भीतर जो अजीबपन था, वह सृजनशील था। वह दुनिया पर शासन करने नहीं निकला था, वह मशीन से बातचीत कर रहा था। उसका पागलपन दूसरों को छोटा साबित करने का पागलपन नहीं था। वह कुछ बना देने की बेचैनी थी।
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