Avinash Das

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Avinash Das

Avinash Das

@avinashonly

Writer | Director

Mumbai, India 参加日 Mart 2007
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ParanjoyGuhaThakurta
ParanjoyGuhaThakurta@paranjoygt·
from Boman bhai
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Madhu Purnima Kishwar
Madhu Purnima Kishwar@madhukishwar·
This explains why I kept a safe distance from Modi from the time he assumed power in May 2014. I did not even go to gift him a copy of my book on him. Just sent an unsigned copy through his favourite bureaucrat Bharat Lal! The names of women who were made MPs and ministers by Modi due to intimacy with him were being whispered loudly enough within Sanghi power networks right at the outset. That is why I took precautions very early on. The names of those like Hardeep Puri who provided him special services while he was Gujarat CM were also being shared in hushed tones as soon as Hardeep and Jaishankar were included in the Cabinet! In 2014, when I went for lectures to America, there too tales of his aiyyashi were doing the rounds. Appointment of 12th pass Smriti Irani as Education Minister had given credence to other scandals, till then hidden from public view. The scandal involving Mansi Soni had already reached the Supreme Court. Someone close to Modi gave me a whole set of papers submitted in the Supreme Court by the incarcerated IAS officer who too was having a rollicking time with Soni. In addition, people from Gujarat, including some of those close to Modi, shared with me disgusting stories of his sickly dalliances with women while he was Gujarat CM. And earlier while he was pracharak and BJP office bearer! Hearing those stories, I became so averse to his presence that I avoided even those functions, including marriage receptions, where Modi was likely to show up! So traumatized I was by the gory accounts that I actually sank into deep depression in 2014 which deeply impacted my health. Went for 21 days to an Ayurvedic healing centre in Coimbatore in 2015 in the hope of recovering from multiple shocks. I remember when I shared my grief at the reports I was hearing with a very senior RSS intellectual, he shrugged it off saying, "why are you so shocked? Why should his personal life bother any of us?" The appointment of #pornpeddler Amit Malviya as BJP's Social Media incharge was yet another proof of the inclinations of the top bosses of BJP! I might have overlooked his predatory sexual conduct, if he had done well on other fronts. But his aggressive peddling of genocidal vaccines and brazen attempts at crushing Hindu samaj and demonizing Hindu dharma, his outrageous patronage of Bheemtas and Meemtas to launch lethal attacks on Hindus, his slavish conduct vis a vis the Globalist Mafia, his devilish conduct in persecuting Hindus during the Kathua Kand (described in detail in my book The Girl From Kathua, A Sacrificial Victim of GhazwaE Hind) and much else, made me realize in the first term itself that we are saddled with a Satanic ruler, a CIA plant who has been put in power to wreck India, and decimate Hindus! Modi's personality disorders have convinced me that we should pay far more attention to sexual corruption of our leaders. Those who are compromised on this front very easily succumb to blackmail by enemies of Bharat, than those who are financially corrupt! Will soon provide proof of how he is being blackmailed from day one. Hence the vulgar 56 inchiya boasts!
Tarun Gautam@TARUNspeakss

Subramanian Swamy makes huge allegations again “I can give names of 3-4 women who became MPs, who had to sleep with M*di, one even became minister” And he said this while replying to names of Indians in #EpsteinFiles Will BJP take action against Swamy?

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Avinash Das
Avinash Das@avinashonly·
ये सही है!!
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Avinash Das
Avinash Das@avinashonly·
NotebookLM Podcast, Based On Veteran Journalist P Sainath's B G Verghese Memorial Lecture 2026. youtu.be/ZQCsK6MBdD0
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Avinash Das
Avinash Das@avinashonly·
गुल-ओ-गुलज़ार गुहर चांद सितारे बच्चे रंग-ओ-बू नूर के पैकर हैं ये सारे बच्चे ▪️फ़ारूक़ इंजीनियर #EidUlFitr #EidMubarak2022
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Avinash Das
Avinash Das@avinashonly·
जानकी बाई इलाहाबादी उर्फ़ छप्पन छुरी पर यह डॉक्यु-पॉडकास्ट दिलचस्प है। मुझे मालूम नहीं था कि गूगल का #NotebookLM इतना कमाल काम करता है!!
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Avinash Das
Avinash Das@avinashonly·
दस्तूर है दुनिया का मगर ये तो बताओ हम किससे मिलें किससे कहें ईद मुबारक अपना तो किसी तौर से कट जाएगा ये दिन तुम जिनसे मिलो आज उन्हें ईद मुबारक ▪️तहज़ीब हाफ़ी #EiDMubarak
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Avinash Das
Avinash Das@avinashonly·
युद्ध की चियरलीडिंग बंद होनी चाहिए ▪️विश्व दीपक @vdiimc युद्ध की चियरलीडिंग बंद होनी चाहिए। ईरान ने यहां मिसाइल मार दी, वहां ड्रोन गिरा दिया इससे वास्तव में कोई फर्क नहीं पड़ता। सोशल मीडिया के युद्ध विश्लेषक मुस्लिम भावनाओं का दोहन करने के लिये ऐसा लिखते हैं। युद्ध के चियरलीडर्स मत बनिए! थाड एंटीना दोबारा बन जाएगा, एयरपोर्ट की रिपेयरिंग हो जाएगी लेकिन अली लारिजानी दोबारा नहीं मिलेगा। वह आइडियोलॉग था, रणनीतिकार था। उसे ज़िंदा रहना चाहिए था। लारिजानी को बचाना सिर्फ ईरान की नहीं दुनिया की जिम्मेदारी थी। कितना भी विरोध हो, मेरा मानना है कि बौद्धिक लोगों की युद्ध में भी हत्या नहीं करनी चाहिए। तैमूर लंग तक शायरों, बौद्धिकों को जिंदा छोड़ देता था। जब मध्यकाल में यह नैतिकता थी तो आज होनी चाहिए। दुनिया इस अर्थ में मध्यकाल से भी पीछे जा चुकी है। अली खामनेई की हत्या के 15 दिन के भीतर, पहले से घोषणा करके लारिजानी को मार देना बताता है कि ईरान अंदर से बेहद कमजोर हैं। कंप्रोमाइज्ड है। लारिजानी ने एक दिन पहले ही मुस्लिम देशों से एकता की अपील की थी। अगले दिन उसकी हत्या हो गयी। उसकी हत्या में वही मुस्लिम देश शामिल हैं जिनसे वह एकता की अपील कर रहा था। इसका क्या मतलब है? ओआईसी कहां है, क्या कर रहा है? फिर कह रहा हूं कि ट्रंप के साथ इस खेल में पुतिन और शी जिनपिंग भी शामिल हैं। माफिया पुतिन और कुंठित शी जिनपिंग की जगह कोई स्टेट्समैन होता तो ट्रंप से यही कहता कि लारिजानी को नहीं छुओगे। फरवरी से पहले तक खुद ट्रंप लारिजानी को विकल्प के तौर पर देख रहा था। ट्रंप की सनक ने ईरान युद्ध को वहां पहुंचा दिया है जहां बातचीत के सारे रास्ते बंद होते नज़र आ रहे हैं। अली लारिजानी को मार दोगे तो बात किससे करोगे? उनसे ज्यादा लेजिटिमेसी किसी की नहीं थी ईरान में। एक दिन बात करनी पड़ेगी अमरीका-इजराइल को भी, ईरान को भी। दोनों को एक दूसरे का अस्तित्व स्वीकार करना पड़ेगा। #iranisraelwar #IranUSAwar #AliLarijani #tehran #Israel
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Avinash Das
Avinash Das@avinashonly·
“राष्ट्रपति ट्रंप साहब, काफी सोच-विचार के बाद मैंने तय किया है कि मैं नेशनल काउंटरटेररिज़्म सेंटर के डायरेक्टर के पद से, आज से ही, इस्तीफा दे रहा हूं। सीधी बात ये है कि मैं अपने ज़मीर के खिलाफ जाकर ईरान के साथ चल रही इस जंग का साथ नहीं दे सकता। ईरान से हमारे मुल्क को कोई फौरन ख़तरा नहीं था। साफ़ दिख रहा है कि ये जंग हमने इज़राइल और उसके असरदार अमेरिकी लॉबी के दबाव में शुरू की है। मैं आज भी उन्हीं उसूलों और विदेश नीति के साथ खड़ा हूं, जिन पर आपने 2016, 2020 और 2024 के चुनाव लड़े थे, और जिन्हें आपने अपने पहले कार्यकाल में लागू किया। जून 2025 तक आपको भी साफ समझ आ गया था कि मिडिल ईस्ट की जंगें एक जाल होती हैं - जो हमारे लोगों की जान लेती हैं और देश की तरक्की को पीछे धकेलती हैं। अपने पहले कार्यकाल में आपने ये दिखाया था कि बिना अंतहीन जंग में फंसे, ताकत का सही और तय तरीके से इस्तेमाल कैसे किया जाता है। कासिम सुलेमानी को मारना और ISIS को खत्म करना उसी का हिस्सा था। लेकिन इस बार, शुरुआत से ही इज़राइल के बड़े अफसरों और अमेरिकी मीडिया के असरदार लोगों ने मिलकर एक गलत कहानी गढ़ी। इसने आपके “अमेरिका फर्स्ट” एजेंडा को कमजोर किया और लोगों को जंग के लिए तैयार किया। आपको यकीन दिलाया गया कि ईरान तुरंत खतरा है और अगर अभी हमला करेंगे तो जल्दी जीत जाएंगे। सच्चाई ये है कि ये सब झूठ था। यही तरीका पहले इराक की जंग में अपनाया गया था - जिसमें हमारे हजारों जवान मारे गये। हम वही ग़लती फिर नहीं दोहरा सकते। मैं एक फौजी रहा हूं - ग्यारह बार जंग में गया हूं, और मैं एक ऐसा शख्स भी हूं जिसने अपनी पत्नी शैनन को उस जंग में खोया, जो इज़राइल के कहने पर लड़ी गयी थी। मैं अगली पीढ़ी को ऐसी बेकार जंग में भेजने का समर्थन नहीं कर सकता, जिसमें न कोई फ़ायदा है और न ही उनकी जान की क़ीमत जायज़ ठहरती है। मैं आपसे गुजारिश करता हूं कि ठहरकर सोचिए - हम ईरान में क्या कर रहे हैं और किसके लिए कर रहे हैं। अभी भी वक़्त है। आप चाहें तो रास्ता बदल सकते हैं और देश को नयी दिशा दे सकते हैं, वरना हम और गिरावट और अफ़रातफ़री की तरफ बढ़ेंगे। फ़ैसला आपके हाथ में है। आपकी सरकार में काम करना और अपने देश की सेवा करना मेरे लिए हमेशा सम्मान की बात रहेगी। सादर,
जोसेफ केंट
डायरेक्टर, नेशनल काउंटरटेररिज़्म सेंटर”
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Avinash Das
Avinash Das@avinashonly·
ईरान पाकिस्तान को क्यों छोड़ रहा है? ▪️रॉबर्ट कियोसाकी [Robert Kiyosaki] ईरान ने इराक, सऊदी अरब, यूएई, बहरीन, क़तर, कुवैत, जॉर्डन, तुर्की - यहां तक कि साइप्रस तक पर बमबारी की है। सोलह दिन से जंग जारी है। हर तरफ़ मिसाइलें और ड्रोन उड़ रहे हैं। लेकिन एक मुल्क, जो सीधे ईरान की सरहद से लगा हुआ है - अब तक बिल्कुल महफ़ूज़ है। पाकिस्तान। और पाकिस्तान की ज़मीन पर अमेरिकी फ़ौजी जासूसी (reconnaissance) ऑपरेशंस भी मौजूद हैं। तो फिर ईरान पाकिस्तान को क्यों छोड़ रहा है? यह इस पूरी जंग का सबसे दिलचस्प स्ट्रैटेजिक सवाल है और इसका जवाब सिर्फ़ पाकिस्तान से कहीं ज़्यादा बड़ी तस्वीर सामने लाता है। सबसे पहले - जो बातें हमें पक्के तौर पर मालूम हैं। पाकिस्तान और ईरान के बीच करीब 900 किलोमीटर लंबी सरहद है। यानी दोनों सीधे पड़ोसी हैं। ईरान ने ऐसे देशों पर हमले किये हैं, जो उसके लिए कहीं कम ख़तरा थे - जैसे जॉर्डन, तुर्की, ओमान, साइप्रस - ऐसे देश जिनकी न तो उससे सरहद मिलती है और न ही वे अमेरिकी अभियान में कोई ख़ास रणनीतिक अहमियत रखते हैं। लेकिन पाकिस्तान - जो सीधा पड़ोसी है, जिसकी ज़मीन पर अमेरिकी निगरानी मौजूद है, जिसने सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते के तहत अपने F-16 विमान तैनात किए हैं - उस पर ईरान ने एक भी हमला नहीं किया। इतना ही नहीं, ईरान ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ ज़ुबानी हमला भी नहीं किया। न कोई धमकी, न कोई चेतावनी, न कोई अल्टीमेटम। जबकि इस जंग में ईरान ने ब्रिटेन से लेकर साउथ कोरिया तक सबको धमकाया है - पाकिस्तान के लिए पूरी ख़ामोशी। तो वजह क्या है? [1] पाकिस्तान हर तरफ़ एक साथ खेल रहा है - और ईरान यह समझता है। इस वक्त पाकिस्तान दुनिया के सबसे पेचीदा हालात में खड़ा है। एक तरफ़ उसका सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता है - जो ईरान का बड़ा क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी है। उसने अपने F-16 सऊदी ज़मीन पर तैनात किये हैं। उसकी 80% से ज़्यादा सैन्य ख़रीदारी चीन से होती है। वह अफ़ग़ान सरहद पर तालिबान से अपनी अलग जंग लड़ रहा है। अपने ही शहरों में उसे ईरान समर्थक शिया प्रदर्शन झेलने पड़ रहे हैं। उसने ईरान में फंसे लगभग 35,000 पाकिस्तानी नागरिकों को बाहर निकाला है। और सार्वजनिक तौर पर उसने यह भी कहा है कि ईरान अमेरिका-इज़राइल की कार्रवाई के ख़िलाफ़ “ख़ुद का बचाव” कर रहा है। यानी पाकिस्तान एक साथ ईरान के दुश्मनों के साथ भी खड़ा है और उसकी बात को समझ भी रहा है। अगर ईरान पाकिस्तान पर हमला करता है, तो पाकिस्तान को मजबूरन किसी एक तरफ़ जाना पड़ेगा। और अभी - पाकिस्तान का किसी एक तरफ़ न जाना, ईरान के लिए किसी भी मिसाइल हमले से ज़्यादा क़ीमती है। [2] चीन का फैक्टर। यहीं से मामला और अहम हो जाता है। चीन ने चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) में 62 अरब डॉलर का निवेश किया है। यह एक विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है, जो पश्चिमी चीन से लेकर पाकिस्तान के बलूचिस्तान में ग्वादर बंदरगाह तक जाता है। ग्वादर, ईरान के चाबहार बंदरगाह से सिर्फ़ 170 किलोमीटर दूर है। चीन साफ़ कह चुका है कि CPEC और ग्वादर पोर्ट की हर हाल में हिफ़ाज़त होनी चाहिए। यहां तक कि उसने वहां स्थायी तौर पर अपनी फ़ौज तैनात करने का प्रस्ताव भी दिया है। अगर ईरान पाकिस्तान पर हमला करता है, तो वह सीधे तौर पर चीन के सबसे अहम रणनीतिक प्रोजेक्ट पर हमला होगा। और चीन - ईरान के तेल का सबसे बड़ा ख़रीदार है, जो उसकी अर्थव्यवस्था की सबसे अहम लाइफ़लाइन है, ख़ासकर इस जंग के दौरान। ईरान उस हाथ को नहीं काट सकता, जो उसे ज़िंदा रखे हुए है। [3] कॉरिडोर थ्योरी। यह एक विश्लेषणात्मक अंदाज़ा है, पक्की बात नहीं - लेकिन डिफेंस एक्सपर्ट्स इसे गंभीरता से देख रहे हैं। ईरान पिछले 16 दिनों से लगातार हज़ारों मिसाइल और ड्रोन दाग रहा है। अमेरिका का दावा है कि उसने ईरान की मिसाइल फैक्ट्रियां और सैन्य ढांचा तबाह कर दिया है, और अब उसकी मारक क्षमता पहले दिन से 90% कम हो चुकी है। तो सवाल उठता है - फिर यह हथियार आ कहां से रहे हैं? एक थ्योरी यह है कि CPEC का रास्ता - जो पाकिस्तान के बलूचिस्तान से होकर गुजरता है और ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान से जुड़ा है - एक सप्लाई रूट की तरह इस्तेमाल हो सकता है। एक तरफ़ ईरान से तेल चीन जा रहा है, और दूसरी तरफ़ हथियार - ड्रोन, मिसाइल, सैन्य सामान - वापस आ रहे हैं। अगर यह सच है, तो पाकिस्तान पर हमला करना उसी सप्लाई लाइन को तबाह करना होगा, जिस पर ईरान की पूरी जंग टिकी हो सकती है। [4] परमाणु फैक्टर। पाकिस्तान एक परमाणु ताक़त है। ईरान नहीं। किसी परमाणु देश पर हमला करना - चाहे पारंपरिक हथियारों से ही क्यों न हो - बहुत बड़ा जोखिम है। अगर जंग पाकिस्तान तक फैलती है, तो इसमें चीन, भारत और परमाणु संतुलन जैसी चीज़ें शामिल हो सकती हैं - जो इस वक्त की खाड़ी की जंग से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक होगी। ईरान इस जंग को हिसाब से, सोच-समझकर लड़ रहा है - बिना लापरवाही के। अमेरिका और इज़राइल से एक साथ लड़ते हुए पाकिस्तान के साथ परमाणु स्तर का संकट खोलना - रणनीति नहीं, आत्मघात होगा। ▪️ इन चारों वजहों को साथ रखकर देखें, तो तस्वीर साफ़ हो जाती है। ईरान ने पाकिस्तान पर हमला इसलिए नहीं किया क्योंकि पाकिस्तान - चाहे जानबूझकर या हालात की वजह से - उन तमाम रणनीतिक हितों के बीच बैठा है, जिन्हें ईरान बचाकर रखना चाहता है। चीन का पैसा। चीन का इंफ्रास्ट्रक्चर। सप्लाई चेन। परमाणु संतुलन और कूटनीतिक अस्पष्टता। ईरान पाकिस्तान पर रहम नहीं कर रहा। ईरान सिर्फ़ रणनीतिक चाल चल रहा है। मेरी समझ यही कहती है। हो सकता है मैं ग़लत हूं - लेकिन फिलहाल तस्वीर कुछ ऐसी ही दिखती है।
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Avinash Das
Avinash Das@avinashonly·
By Fatima Bhutto “The assassination of Ayatollah Khamenei is the single greatest strategic blunder in modern US history. By killing him, the US and Israel didn’t just eliminate a leader; they fulfilled a 1,400-year-old prophecy and created a martyr whose shadow will haunt the West for decades. Consider the symbolism: Iran has NEVER had a martyred Supreme Leader. Khomeini died of natural causes. For the Leader of the Islamic Republic to be martyred by the "US/Israel" is 1000% on brand. It transforms a political office into a sacred, eternal cause. The timing is catastrophic. Khamenei was killed in Ramadan, the same holy month as Imam Ali, the first Imam of Shiism and the "Epitome of Justice." To millions, this isn't a "strike", it’s a divine parallel. He died as Ali died: at the hands of an assassin during the month of fasting. He was killed with his family. In the Shia psyche, this immediately mirrors the Martyrdom of Husayn at Karbala. The narrative of the "oppressed" (Mazlum) vs the "oppressor" (Zalim) is now fully activated. This isn't just an Iranian tragedy; it’s a global Shia rallying cry. The blowback is already unprecedented. We are seeing something rare: Shia-Sunni unity. From Karachi to Baghdad to Lucknow, Sunnis are joining Shias in the streets. By targeting a religious authority of this stature, the US has unified the Ummah against a common "tyrant." Trump’s "kill everyone" doctrine, dictated by Netanyahu, has backfired. They thought they were decapitating a regime. Instead, they’ve given the Islamic Republic its most powerful symbol of legitimacy since 1979. You cannot kill an idea, especially one now bathed in the blood of "martyrdom." The West is celebrating a "tactical success" while sleepwalking into a strategic nightmare. The US just traded a predictable adversary for an unpredictable, divinely-inspired global insurgency. This isn't the end; it's the beginning of a much darker chapter.” Forwarded by @paranjoygt
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Avinash Das
Avinash Das@avinashonly·
फ़ातिमा भुट्टो की क़लम से “आयतुल्लाह ख़ामेनेई की हत्या, आधुनिक अमरीकी तारीख़ की सबसे बड़ी स्ट्रैटेजिक ग़लती है। उन्हें क़त्ल करके अमरीका और इस्राइल ने सिर्फ़ एक रहनुमा को ख़त्म नहीं किया; उन्होंने 1400 साल पुरानी एक पेशगोई को पूरा कर दिया और ऐसा शहीद पैदा कर दिया जिसकी परछाईं दशकों तक पश्चिम का पीछा करती रहेगी। ज़रा इसकी अलामत (symbolism) पर ग़ौर कीजिए: ईरान में आज तक कोई सुप्रीम लीडर शहीद नहीं हुआ। ख़ुमैनी की मौत कुदरती वजहों से हुई थी। इस्लामी जुम्हूरिया के रहनुमा का “अमरीका/इस्राइल” के हाथों शहीद होना बिल्कुल उसी कहानी को मज़बूत करता है। इससे एक सियासी ओहदा एक मुक़द्दस और हमेशा ज़िंदा रहने वाली क़ौमी वजह में बदल जाता है। वक़्त भी बेहद ख़तरनाक है। ख़ामेनेई रमज़ान के महीने में मारे गये - वही मुक़द्दस महीना जिसमें शिया मत के पहले इमाम और ‘इंसाफ़ की मिसाल’ हज़रत अली शहीद हुए थे। लाखों लोगों के लिए यह सिर्फ़ एक ‘हमला’ नहीं, बल्कि एक इलाही समानता (divine parallel) बन गया है। उनकी मौत भी ऐसे ही हुई जैसे अली की हुई थी - रोज़े के महीने में एक क़ातिल के हाथों। वो अपने ख़ानदान के साथ मारे गये। शिया ज़ेहनियत में यह तुरंत कर्बला में इमाम हुसैन की शहादत की याद दिलाता है। ‘मज़लूम’ बनाम ‘ज़ालिम’ की जो कहानी है, वह अब पूरी तरह ज़िंदा हो गयी है। यह सिर्फ़ ईरान का मातम नहीं, बल्कि दुनिया भर के शियाओं के लिए एक पुकार बन गया है। इसका असर पहले ही बे-मिसाल दिखाई दे रहा है। हम एक दुर्लभ चीज़ देख रहे हैं: शिया-सुन्नी इत्तेहाद। कराची से बग़दाद और लखनऊ तक, सुन्नी भी शियाओं के साथ सड़कों पर निकल रहे हैं। इतनी बड़ी मज़हबी शख़्सियत को निशाना बनाकर अमरीका ने उम्मत को एक साझा ‘ज़ालिम’ के ख़िलाफ़ जोड़ दिया है। ट्रम्प का ‘सबको मार दो’ वाला नज़रिया - जो नेतन्याहू की हिदायत पर चल रहा था - उल्टा पड़ गया है। उन्होंने समझा था कि वह एक निज़ाम का सर क़लम कर रहे हैं। लेकिन इसके बजाय उन्होंने इस्लामी जुम्हूरिया को 1979 के बाद से उसकी सबसे ताक़तवर वैधता का प्रतीक दे दिया है। किसी ख़याल को आप क़त्ल नहीं कर सकते, ख़ासकर जब वह ‘शहादत’ के ख़ून से और मज़बूत हो जाए। पश्चिम इस वक़्त एक ‘टैक्टिकल कामयाबी’ का जश्न मना रहा है, जबकि वह एक स्ट्रैटेजिक ख़्वाबगाह में चलते हुए डरावने ख़्वाब की तरफ़ बढ़ रहा है। अमरीका ने अभी-अभी एक ऐसे दुश्मन को, जिसे समझा जा सकता था, बदलकर एक ऐसे आलमी बग़ावती जज़्बे से कर लिया है जो मज़हबी यक़ीन से प्रेरित होगा। यह अंत नहीं है; यह एक कहीं ज़्यादा अंधेरे दौर की शुरुआत है।”
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Ashok Kumar Pandey अशोक اشوک
ईरान में भगवान शिव का मंदिर, शिव स्तुति गाती ईरानी महिला, सिक्कों पर शिव। सदियों के रिश्ते और सांस्कृतिक आदान-प्रदान से होता है यह। कोई इजरायल में एक मंदिर दिखा दे मुझे...
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Avinash Das
Avinash Das@avinashonly·
भारत में ईरान दूतावास का बयान हमारे भारतीय भाइयों और बहनों में से कई ख़ैरख़्वाह और नेकदिल लोगों की बार-बार की गयी अपीलों के बाद - कि जारी जंग से प्रभावित ईरानी नागरिकों की इंसानी मदद की जाए - नयी दिल्ली में इस्लामी गणराज्य ईरान का दूतावास नक़द दान जमा कराने के लिए नीचे दिया गया बैंक खाता नंबर जारी करता है। बैंक खाते का नाम: Embassy of Iran बैंक खाता नंबर: 11084232535 IFSC कोड: SBIN0000691 अगर आप चाहें तो भुगतान करने के बाद उसका स्क्रीनशॉट या रसीद इस व्हाट्सऐप नंबर पर भी भेज सकते हैं: +91 98998 12318
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Avinash Das
Avinash Das@avinashonly·
कृपया पैनिकिस्तान से बाहर आएं! अफ़वाहिस्तान तो बिल्कुल न फैलाएं!
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Avinash Das@avinashonly·
Trump Handling Iran 🤣
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Avinash Das
Avinash Das@avinashonly·
जब दुख समझ में आने लगता है तो जनता कविता-मोड में आ जाती है! ये लाइनें इस वक़्त जनता में वायरल हो रही हैं! 2016: घर मे शादी है लेकिन कैश नही है! 2026: घर मे सिलेंडर है, लेकिन गैस नही है!!
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Avinash Das
Avinash Das@avinashonly·
क्या ये सचमुच @IndianOilcl की तरफ़ से किया गया ट्वीट है?
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Avinash Das
Avinash Das@avinashonly·
युद्ध ईरान और इज़रायल में छिड़ा है, पर धुआं भारतीय रसोई से ग़ायब होने लगा है। सरकार कह रही है कि सिलेंडर की कमी नहीं, बस अफ़वाहों का आधिक्य है। दरअसल, इस देश में राष्ट्रवाद की आंच इतनी तेज़ है कि दाल कच्ची भी रहे, तो कुछ लोग उसे स्वादिष्ट बताकर खा लेते हैं। जो भूखा है वो ग़द्दार है, क्योंकि असली देशभक्त तो हवा खाकर भी 'सब चंगा है' का नारा लगाता है। शुक्रिया आरजे नवेद, अच्छी रील बनायी!
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