Vishwa Deepak

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@vdiimc

Journalist. Politics|History|Literature | Past - Deutsche Welle | BBC Hindi | Aaj Tak | Zee News |

New Delhi Katılım Mart 2012
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Vishwa Deepak
Vishwa Deepak@vdiimc·
Subhash Chandra took eight years to grasp what I'd expressed in 2016. I stepped down from ZEE when TV channels, particularly Times Now, ZEE, aided by ANI initiated a malicious campaign (anti-national, tukde-tukde gang) against JNU - one of the world's premier universities. My resignation letter highlighted how the media was used as a tool to fan communalism and the government’s agenda. If Chandra had comprehended it sooner, our country's media landscape might have been better. The credibility of journalism as a profession would not have been compromised. Faced struggles yet found no support from so-called progressive media like The Wire NDTV, then under the control of the Roys. Esteemed editors turned YouTubers remained mute spectators. I tried but in vain. While they all praised my courage, job opportunities were not extended. The system's immorality disillusioned me to the point where I stopped seeking ethical standards. The Caravan rescued me, restoring my confidence to continue in the profession I deeply cherish. Then, arrived a time when I found myself embroiled in legal conflicts. Faced a defamation case worth Rs5000 crore filed by Anil Ambani, and other legal battles. Endured a year of unemployment, depleting my savings. Yet, I stood on the right side of history. Today, I'm gratified that Chandra understands why a free press is vital for democracy not just to survive, but to flourish. — Vishwadeepak #ZeeNews #FreePress #Adani #Ambani #RahulGandhi
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Rahul Gandhi
Rahul Gandhi@RahulGandhi·
ऊना की चीख आज भी इंसाफ के दरवाज़े पर दस्तक दे रही है। बीते 10 सालों से पीड़ित न्याय के लिए दर-दर भटक रहे हैं। अपमान, हिंसा और हत्या - BJP शासित गुजरात में दलितों, आदिवासियों की यही हकीकत बना दी गई है। मोदी जी के इसी असंवैधानिक और अन्यायपूर्ण मॉडल को पूरे देश पर थोपा जा रहा है।
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vote Chor 😈@diividerinchief·
@WasimAkramTyagi @vdiimc सरजी @vdiimc “अमेरिकी प्रभुत्व को खत्म करने वाले मानसिक रूप से बीमार”लोगों के लिए कुछ कहने को आपके पास बचा खुचा कोई संदेश है या घोलकर पी गए ❗️ 🤣🤣🤣
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Wasim Akram Tyagi
Wasim Akram Tyagi@WasimAkramTyagi·
ईरान की बर्बादी की कीमत पर अमरीकी प्रभुत्व को खत्म करने का सपना देखने वाले लोग मानसिक रूप से बीमार हैं. सैडिस्ट हैं. चूंकि इस युद्ध में उनका नाखून भी नहीं कटना है इसलिए ईरान के पक्ष में युद्धोन्माद फैलाकर अपनी राजनीतिक कुंठाओं और ऐतिहासिक हीनताबोध की भरपाई कर रहे हैं. आगे जो मैं कहने जा रहा हूं वह कहने के लिये किसी को भविष्यवेत्ता होने की ज़रूरत नहीं है. सामान्य बुद्धि का आदमी भी बता सकता है कि शक्ति संतुलन, तकनीक आदि किसके पक्ष में है. अमरीका-इजराइल छोड़ दीजिये. ईरान के सारे पड़ोसी मुल्क तक उसके दुश्मन हैं. कहीं से कोई मदद की उम्मीद नहीं. सउदी-यूएई भी हमला करने की तैयारी कर रहे हैं. रूस और चीन जैसे देश जो ईरान को अमरीका के खिलाफ चढ़ा रहे थे वो या तो युद्ध से लाभ कमा रहे हैं या चुप मारकर बैठे हैं. ईरान की बर्बादी की कीमत पर रूस प्रतिदिन 150 मिलियन डॉलर कमा रहा है. रुबल या युआन नहीं 150 मिलियन अमरीकी डॉलर. यह बात ईरान का नाम लेकर युद्ध की चियरलीडिंग करने वालों को याद रखनी चाहिये. युद्ध न हवा में लड़ा जाता है, न जीता जाता है. दुनिया के सभी शक्तिशाली संगठन यूएन से लेकर 57 देशों का मुसलिम संगठन ओआईसी तक ईरान के विरुद्ध हैं लेकिन तीसरी दुनिया के चौथे दर्जे के देश भारत के लो आईक्यू वाले क्रांतिकारियों को लगता है कि ईरान मिसाइल मारकर अमरीकी प्रभुत्व खत्म कर देगा. जो काम सोवियत संघ नहीं कर सका और अंतत: करने का प्रयास करते हुये बिखर गया, चीन की हिम्मत नहीं कि वह मुंह खोल दे वह काम भारत के फर्जी क्रांतिकारी चाहते हैं कि ईरान पूरा करे. यह उनकी निजी कुंठा है. सचाई इस सदिच्छा से कोसों दूर है. सचाई यह है कि ईरान अंदर से बेहद कमजोर और बिखरा हुआ है. अगर कोई वास्तव में ईरान का शुभचिंतक है तो उसे कहना चाहिये कि लड़ लिये बहुत. अब बातचीत की टेबल पर बैठो. युद्ध अगर केवल साहस से जीते जाते तो दुनिया का रूप-रंग कुछ और होता. अगर किसी की निगाह में मिसाइल लॉन्च करना किसी देश की ताकत का पैमाना है तो फिर मूर्खता शब्द के लिये पर्यायवाची खोजने की ज़रूरत नहीं. जो मिसाइलें ईरान से दागी जा रही हैं उन मिसाइलों से हो क्या रहा है? सही मायने में वो मिसाइलें अमरीकी सत्ता को क्या और कितना नुकसान पुहंचा रही हैं? यह सोचने की ज़रूरत है. इजराइल पहुंचने वाली औसतन 10 में से 7-8 मिसाइलें इंटरसेप्ट हो रही हैं. जो नुकसान हो रहा है वह वॉरहेड गिरने से या क्लस्टर मिसाइलों से हो रहा है. डायरेक्ट हिट बहुत कम है. यूएई, बहरीन, दुबई में ड्रोन की टक्कर मारने वाले विजुअल देखकर युद्ध के चियरलीडर्स अभी से नतीजा निकाल रहे हैं. ईरान में बर्बादी का क्या आलम होगा – कभी सोचा है. अमरीकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल गिराने से अमरीका डर कर भाग जाएगा? अमरीका मानव सभ्यता की सबसे कुटिल और सबसे बड़ी हार्ड पॉवर है. पूरे ईरान के अंदर अमरीका-इजराइल के सैकड़ों विमान रात भर बॉम्बिंग करते हैं. वहां क्या हाल होगा यह सोचकर सिहर उठता हूं. इंटरनेट पर प्रतिबंध है इसलिये तस्वारें सामने नहीं आ पा रही हैं. लेकिन भारत में मौजूद युद्ध के चियरलीडर्स को इसकी चिंता कम है. उनको अपनी कुंठा भरपाई की चिंता ज्यादा सता रही है. जिस देश की टॉप लीडरशिप 20 दिन में खत्म हो गई उस देश के बिखराव का अंदाजा है? तुम मारते जाओ,हम मरने के लिये तैयार हैं – यह नारेबाजी है. मसूद पेजेश्कियन के बेटे ने टेलीग्राम पर लिखा कि पूरी लीडरशिप खौफ के साये में जी रही है. बाहर निकलने की हिम्मत नहीं किसी की. खामनेई की हत्या और लारिजानी के मारे जाने का दर्द क्या होता है यह ईरान की जनता जानती होगी. भारत में मौजूद युद्ध के चियरलीडर्स इस बात पर उछल रहे हैं कि इजराइल-अमरीका असली सूचनायें छिपा रहे हैं. युद्ध में हर देश छिपाता है लेकिन सामान्य विवेक क्या कहता है? रिपोर्टिंग के लिये कहां ज्यादा आज़ादी और सुविधा होगी? यह समझने के लिये न्यूटन होने की ज़रूरत नहीं है. दुनिया को किसने बताया कि अमरीका ने बच्चियों के स्कूल पर आपराधिक हमला किया? अमरीकी चैनल सीएनएन ने. फेक न्यूज़ और फेक नैरेटिव के अलावा गलत फहमियों का प्रचार भी कम बड़ा अपराध नहीं. यह युद्ध जितना जल्दी समाप्त होगा खुद ईरान के लिये, अमरीका-इजराइल के लिये, अरब के लिये और शेष दुनिया के लिये उतना ही बेहतर होगा. ईरान को अपनी कुंठा की भरपाई का माध्यम मत बनाइये. अमरीकी प्रभुत्व को खत्म करने का बोझा ईरान पर मत डालिये. अकेले उसके वश का नहीं है. इसके लिये पूरी दुनिया को इकट्ठा होना होगा. जिस दिन यह बात युद्ध के चियरलीडर्स को समझ आ जाएगी उस दिन इस युद्ध को देखने का नज़रिया बदल जाएगा. @vdiimc की फेसबुक वॉल से।
Wasim Akram Tyagi tweet media
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Dr. Brahma Chellaney
Dr. Brahma Chellaney@Chellaney·
NATO Members Condemn But India Dodges: A Diplomatic Misstep Egypt, Saudi Arabia and Pakistan have become the primary facilitators for U.S.-Iran dialogue and a ceasefire, after Egyptian Foreign Minister Badr Abdelatty led an "intensive diplomatic offensive." Yet all three strongly condemned the February 28 U.S.-Israeli joint war on Iran, calling it an "unacceptable violation of sovereignty," a “blatant” or unjustified attack. They were also quick to denounce the targeted assassination of Iran’s supreme leader, who also served as the country's head of state. In keeping with diplomatic protocol, they sent official messages of condolence to Iranian President Masoud Pezeshkian over the killing. In fact, most of America’s allies among the 32-nation NATO alliance view the war as unnecessary and illegal under international law — as Spanish leader Pedro Sánchez called it at the outset, and German President Frank-Walter Steinmeier put it on March 24. In stark contrast, India — the world’s largest democracy — has avoided any implied criticism of the U.S.-led war. Official statements steer clear of terms like “aggression” or “attack,” sticking instead to bland phrases such as "deep concern," "evolution of the situation" and "escalation in West Asia." Discarding diplomatic protocol, New Delhi sent no official condolence to Tehran over the supreme leader’s killing, despite the assassination flagrantly violating the international convention against targeting a head of state or government. Only after opposition criticism did the government, on March 5, dispatch the foreign secretary to sign the condolence book at the Iranian Embassy. New Delhi also refrained from even obliquely criticizing the March 4 U.S. sinking — in India’s own maritime backyard — of an Iranian "guest" warship returning from an India-hosted multilateral naval exercise, which featured U.S. Navy participation. Yet today, Washington has sidelined India in its diplomatic outreach to Tehran through third parties, even as the U.S.-led war holds the Indian economy hostage. The lesson is clear: No country should abandon its principles, especially when a war of aggression sets a dangerous new precedent in international relations. While ties with the U.S. and Israel serve India’s vital interests, appeasing self-centered, norms-flouting leaders like Donald Trump and Benjamin Netanyahu can only backfire.
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Dr. Sanjukta Basu, M.A., LLB., PhD
I cannot believe that a veteran journalist and intellectual like Mehdi Hasan has reduced war and conflict to such simplistic binary. It is not this but that. Truth is, it is both. Sure Israel has expansions ambitions but at the same time, they must destroy Hezbollah too not just for Israel but for the benefit of all mankind.
Mehdi Hasan@mehdirhasan

If you still think this is about Hizbollah, and not ‘Greater Israel’, you’re either the dumbest person in the world or the most dishonest

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Rahul Gandhi
Rahul Gandhi@RahulGandhi·
रुपये का डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर 100 की तरफ बढ़ना और इंडस्ट्रियल फ्यूल की कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी - ये सिर्फ आंकड़े नहीं, आने वाली महंगाई के साफ संकेत हैं। सरकार चाहे इसे “नॉर्मल” बताए, लेकिन हकीकत ये है: • उत्पादन और ट्रांसपोर्ट महंगे होंगे • MSMEs को सबसे ज्यादा चोट लगेगी • रोज़मर्रा की चीज़ों के दाम बढ़ेंगे • FII का पैसा और तेजी से बाहर जाएगा, जिससे शेयर बाज़ार पर दबाव बढ़ेगा यानी, हर परिवार की जेब पर इसका सीधा और गहरा असर पड़ना तय है। और यह सिर्फ वक्त की बात है - चुनाव के बाद पेट्रोल, डीज़ल, LPG की कीमतें भी बढ़ा दी जाएंगी। मोदी सरकार के पास न दिशा है, न रणनीति - सिर्फ बयानबाज़ी है। सवाल यह नहीं कि सरकार क्या कह रही है - सवाल यह है कि आपकी थाली में क्या बचा है।
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Dr. Sanjukta Basu, M.A., LLB., PhD
The morning started with coming across a video shared by @Benarasiyaa of a bunch of gau rakshaks beating a Muslim man. It made me angry and disgusted with Hindutva politics. Then I came across post by an Israeli account about Atefeh Rajabi Sahaaleh, 16-year-old girl who was raped and executed for not wearing hijab. I felt shocked, disbelief and disgusted with Islamic Sharia law. I also felt that thankfully something as horrific can't happen in India because we do not have Sharia law in criminal matters. Lastly, I felt disgusted that all the liberal commentators of India who condemn hindutva everyday have never not said a word against Islamic regime of Iran. Instead they support and celebrate this regime. My disgust for these hypocrites is the strongest right now.
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Dr. Brahma Chellaney
Dr. Brahma Chellaney@Chellaney·
Since its founding in 1843, The Economist newsmagazine has often aligned itself with major Western military interventions — from the Crimean War (1853–56) and the Second Opium War (1856–60) to more recent U.S.-led wars. It was a staunch supporter of the wars in Vietnam and Iraq, including parroting the false claim that Iraq possessed weapons of mass destruction. Against this backdrop, its more skeptical coverage of the current U.S.-Israeli war on Iran marks a notable departure from its traditionally pro-war journalism. This may leave The Wall Street Journal as one of the last major Western publications still strongly backing the U.S.-Israeli attack on Iran.
Dr. Brahma Chellaney tweet media
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Supriya Shrinate
Supriya Shrinate@SupriyaShrinate·
“देवगौड़ा जी ने मोहब्बत हमसे की और शादी मोदी जी से कर ली” खरगे जी जैसे कौन खिंचाई करता है!
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Vishwa Deepak
Vishwa Deepak@vdiimc·
@Thinker_Brain1 @avinashonly थोड़ा और स्पष्ट कीजिए.अशोक पांडेय ने क्या लिखा मुझे नहीं मालूम.युद्ध के चीयरलीडर्स बहुत हैं.आपका फ्रस्ट्रेशन किस बात को लेकर है?
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Curious Brain
Curious Brain@Thinker_Brain1·
@avinashonly @vdiimc बिल्कुल, आपके दोस्त अशोक पांडे जो मुसलमानों की भावनाओं का दोहन करते रहते हैं वो अली की शहादत के साथ इज़राइल के स्टेशन की बर्बादी लिख रहे थे। इससे साबित हुआ आप सब एक नम्बर के फ़रेबी हो और बरसों की आपकी साधना, पढ़ाई लिखाई कूड़ा है। क्षमा करना यही आया दिल में सो कह दिया।
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Avinash Das
Avinash Das@avinashonly·
युद्ध की चियरलीडिंग बंद होनी चाहिए ▪️विश्व दीपक @vdiimc युद्ध की चियरलीडिंग बंद होनी चाहिए। ईरान ने यहां मिसाइल मार दी, वहां ड्रोन गिरा दिया इससे वास्तव में कोई फर्क नहीं पड़ता। सोशल मीडिया के युद्ध विश्लेषक मुस्लिम भावनाओं का दोहन करने के लिये ऐसा लिखते हैं। युद्ध के चियरलीडर्स मत बनिए! थाड एंटीना दोबारा बन जाएगा, एयरपोर्ट की रिपेयरिंग हो जाएगी लेकिन अली लारिजानी दोबारा नहीं मिलेगा। वह आइडियोलॉग था, रणनीतिकार था। उसे ज़िंदा रहना चाहिए था। लारिजानी को बचाना सिर्फ ईरान की नहीं दुनिया की जिम्मेदारी थी। कितना भी विरोध हो, मेरा मानना है कि बौद्धिक लोगों की युद्ध में भी हत्या नहीं करनी चाहिए। तैमूर लंग तक शायरों, बौद्धिकों को जिंदा छोड़ देता था। जब मध्यकाल में यह नैतिकता थी तो आज होनी चाहिए। दुनिया इस अर्थ में मध्यकाल से भी पीछे जा चुकी है। अली खामनेई की हत्या के 15 दिन के भीतर, पहले से घोषणा करके लारिजानी को मार देना बताता है कि ईरान अंदर से बेहद कमजोर हैं। कंप्रोमाइज्ड है। लारिजानी ने एक दिन पहले ही मुस्लिम देशों से एकता की अपील की थी। अगले दिन उसकी हत्या हो गयी। उसकी हत्या में वही मुस्लिम देश शामिल हैं जिनसे वह एकता की अपील कर रहा था। इसका क्या मतलब है? ओआईसी कहां है, क्या कर रहा है? फिर कह रहा हूं कि ट्रंप के साथ इस खेल में पुतिन और शी जिनपिंग भी शामिल हैं। माफिया पुतिन और कुंठित शी जिनपिंग की जगह कोई स्टेट्समैन होता तो ट्रंप से यही कहता कि लारिजानी को नहीं छुओगे। फरवरी से पहले तक खुद ट्रंप लारिजानी को विकल्प के तौर पर देख रहा था। ट्रंप की सनक ने ईरान युद्ध को वहां पहुंचा दिया है जहां बातचीत के सारे रास्ते बंद होते नज़र आ रहे हैं। अली लारिजानी को मार दोगे तो बात किससे करोगे? उनसे ज्यादा लेजिटिमेसी किसी की नहीं थी ईरान में। एक दिन बात करनी पड़ेगी अमरीका-इजराइल को भी, ईरान को भी। दोनों को एक दूसरे का अस्तित्व स्वीकार करना पड़ेगा। #iranisraelwar #IranUSAwar #AliLarijani #tehran #Israel
Avinash Das tweet media
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Mayur Waghela I.N.D.I.A 🇮🇳
Mayur Waghela I.N.D.I.A 🇮🇳@Mayur52974592·
युद्ध दुनिया का सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाला धंधा है. जिन्होंने 'गॉन विद द विंड' उपन्यास [संवाद प्रकाशन, संपादक-आलोक श्रीवास्तव] पढ़ा है या इस पर आधारित फिल्म देखी है वो जानते होंगे कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं. मेरा मानना है कि 'गॉन विद द विंड' ज़रूर पढ़ना चाहिये. काफी मोटा उपन्यास है. अगर नहीं पढ़ सकते तो फिल्म देखिये. क्लासिक का दर्जा रखती है यह फिल्म. अमरीकी गृहयुद्ध की पृष्ठभूमि पर लिखा गया यह उपन्यास बताता है कि कैसे युद्ध किसी के लिये मौत और तबाही लेकर आता है तो किसी के लिये बेहिसाब मुनाफा. कोई युद्ध यूं ही हवा में एक दिन शुरू नहीं हो जाता. उसके पीछे कौन सी समाजिक और राजनीतिक शक्तियां काम कर रही हैं - यह समझना चाहिए. अमरीका में गृहयुद्ध चल रहा है,लाखों लोग मारे जा चुके हैं, पूरा अमरीका रक्तरंजित है, हर तरफ चीख-पुकार मची है लेकिन रेट बटलर खुश है. वह युद्ध से तनिक भी परेशान नहीं है. वह चाहता है कि युद्ध और लंबा चले. स्कारलेट ओ हारा जिससे बटलर एकतरफा प्रेम करता है, अपने आदर्शवादी प्रेमी ऐशली के लिए परेशान है. बटलर स्कारलेट ओ हारा के सामने युद्ध का दूसरा नज़रिया पेश करता है. वह बताता है कि कैसे रक्त से मुनाफा कमाया जाता है. ईरान युद्ध में भी कई बटलर उभर कर सामने आए हैं. बिना भावुक हुए इनकी सचाई समझनी चाहिए. बेंजामिन नेतन्याहू – अक्टूबर में इजराइल में चुनाव है. खामनेई को मार कर नेतन्याहू ने खुद को यहूदी राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा नायक साबित कर दिया. भ्रष्टाचार का दाग धुल जाएगा. चुनाव भी जीतेगा. डोनाल्ड ट्रंप – दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार और आवागमन के रास्तों पर नियंत्रण. बेहिसाब मुनाफे के अलावा दुनिया पर रणनीतिक दबदबा कायम करेगा. अगले कई दशकों तक रूस,चीन भारत और पूरी दुनिया को नचाएगा. ब्लादिमीर पुतिन – ईरान युद्ध के बाद से150 मिलियन डॉलर का मुनाफा प्रतिदिन कमा रहा है. डील होगी तो अमरीका से यूक्रेन लेगा. ईरान की तबाही से उसे फर्क नहीं पड़ता. शी जिनपिंग – आज चीन जो भी है वह अमरीका की कृपा से है. शी जिनपिंग इस बात को जानता है इसलिये वह कोई सार्थक हस्तक्षेप नहीं कर रहा, न करेगा. जब डील होगी तो ताइवान लेगा. खामनेई की हत्या या ईरान की बर्बादी से उसे कोई मतलब नहीं. सुन्नी स्टेट्स – ईरान की तबाही से अगर कोई सबसे ज्यादा मुनाफा कमाएगा और फायदे में रहेगा तो वो हैं अरब के सुन्नी शेख. इलाके में प्रभुत्व के अलावा तेल के धंधे पर इनका कब्जा और दबदबा बना रहेगा. अमरीका साथ है, साथ रहेगा. मोदी जी के समर्थक नाराज़ न हों. उनका नाम इसलिये नहीं लिख रहा हूं क्योंकि वो न तीन में है न तेरह में. उनकी हैसियत बटलर वाली नहीं है अभी. वैश्विक संदर्भ में उनकी उपयोगिता सिर्फ इतनी है कि भारत के स्वयंभू क्रांतिकारी उनकी आलोचना करते हुये अपनी दुकान चलाते रहें. चूंकि अमरीका और ट्रंप के खिलाफ सीधा बोलने की हिम्मत स्वयंभू क्रांतिकारियों में नहीं है [अमरीकन वीजा, चंदा, हॉवर्ड-येल में एडमिशन सब बंद हो जाएगा] इसलिये मोदी जी को टैग करके अपना काम चलाते हैं. इससे मोदी जी का भी थोड़ा फायदा हो जाता है...!! #IranUSConflict #Israel #telaviv #tehran #Trump #BenjaminNetanyahu @RahulGandhi @Dr_MonikaSingh_ @garrywalia_ @sakshijoshii @Rashmi22302711 @AnumaVidisha @BhavikaOpinion @RuchiraC @maulinshah9 @Iam_MKharaud @Kumarjyoti49291 @sudhirchaudhary @AMISHDEVGAN @anjanaomkashya @RubikaLiyaquat @chitraaum @RajatSharmaLive @IndiaAwakened_ @AwasthiGyyan @PMNehru @RaGa4India @Raga3689 @Pawankhera @SupriyaShrinate @vdiimc
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Gitanjali J Angmo
Gitanjali J Angmo@GitanjaliAngmo·
After a long time had a free flowing chat with @Wangchuk66 without glancing at the scary clock every now and then to make the most of the fleeting 60 minutes as in jail! Taking him for a health checkup as per the strong recommendations of our family doctor. He will be under medical observation for 36 hours in a good hospital! #SatyamevaJayate #ForeverPositive
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Priyanka Chaturvedi🇮🇳
Priyanka Chaturvedi🇮🇳@priyankac19·
Why did NCERT apologise? Honestly why can’t we discuss transparency and accountability for all? Why should judiciary be excluded from scrutiny
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Shashi Tharoor
Shashi Tharoor@ShashiTharoor·
हिंदी भाषी लोगों के लिए हिंदी में। असहमति और लोकतंत्र पर मणि शंकर अय्यर के नाम एक खुला पत्र — लेखक शशि थरूर। कांग्रेस के लोकसभा सांसद शशि थरूर ने हाल ही में मणि शंकर अय्यर द्वारा उनके विचारों और उनके “चरित्र” को लेकर की गई टिप्पणी का जवाब दिया है। अय्यर जी। लोकतंत्र की खूबी यही है कि लोग अलग-अलग राय रख सकते हैं। असहमति होना गलत नहीं है। लेकिन सिर्फ इसलिए कि कोई विदेश नीति को थोड़ा अलग तरीके से देखता है, उसकी नीयत या देशभक्ति पर सवाल उठाना ठीक नहीं है। आपने मेरे विचारों और मेरे चरित्र के बारे में जो सार्वजनिक टिप्पणी की है, उसका जवाब देना जरूरी हो गया है। मैंने हमेशा अंतरराष्ट्रीय मामलों को भारत के राष्ट्रीय हित के नजरिए से देखा है। मेरे लिए भारत की सुरक्षा, भारत की अर्थव्यवस्था और दुनिया में भारत की इज्जत सबसे ऊपर है। दुनिया की राजनीतिक हकीकत को समझना और भारत के हितों को ध्यान में रखकर फैसला लेना कोई “मोरल सरेंडर” नहीं है — यह जिम्मेदार स्टेटक्राफ्ट है। भारत की विदेश नीति हमेशा principle और pragmatism दोनों का संतुलन रही है। Jawaharlal Nehru की Non-Alignment policy से लेकर आज की multi-alignment diplomacy तक भारत का मकसद हमेशा एक ही रहा है, अपनी संप्रभुता की रक्षा करना और दुनिया में न्याय की बात करना। संसद में हो या संसद के बाहर, मेरा रिकॉर्ड इसी संतुलन को दिखाता है। देशभक्ति पर किसी एक पीढ़ी का अधिकार नहीं है। और न ही गांधी जी या नेहरू जी को समझने का अधिकार किसी एक समूह के पास है। असली सम्मान यही है कि उनके विचारों को आज के समय की हकीकत के साथ समझकर लागू किया जाए। इतिहास में भी भारत ने कई बार ऐसा किया है कि किसी देश की गलत कार्रवाई को तुरंत सार्वजनिक रूप से नहीं ललकारा, क्योंकि हमारे अपने राष्ट्रीय हित उससे जुड़े हुए थे। उदाहरण के लिए, सोवियत यूनियन के साथ हमारे रिश्ते इतने महत्वपूर्ण थे कि हंगरी, चेकोस्लोवाकिया और अफगानिस्तान के मामलों में भी भारत ने बहुत संतुलित रुख अपनाया। आज भी खाड़ी देशों के साथ भारत के बहुत बड़े हित जुड़े हैं। लगभग 200 अरब डॉलर का व्यापार, हमारी energy security, और करीब 90 लाख भारतीय वहाँ काम कर रहे हैं। ऐसे में विदेश नीति बनाते समय इन सब बातों को ध्यान में रखना पड़ता है। यथार्थ को समझना किसी के आगे झुकना नहीं होता। आज अमेरिका में ऐसी सरकार है जो अंतरराष्ट्रीय कानून को हमेशा उसी तरह प्राथमिकता नहीं देती जैसे हम देना चाहते हैं। लेकिन अगर हम उसे खुलकर चुनौती देते हैं तो उसके परिणाम भी हो सकते हैं। अपने हाल के Indian Express लेख में मैंने साफ लिखा है कि यह युद्ध अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है, इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं और इसे तुरंत खत्म होना चाहिए। लेकिन साथ ही मैंने यह भी कहा कि अमेरिका के साथ हमारे कई महत्वपूर्ण हित जुड़े हैं, उन्हें खतरे में डालना समझदारी नहीं होगी। विदेश नीति आखिरकार राष्ट्रीय हित के बारे में ही होती है, केवल भाषण देने या दिखावे की राजनीति करने के बारे में नहीं। मेरी विदेश यात्राओं को लेकर जो आरोप लगाए गए हैं, वे बिल्कुल बेबुनियाद हैं। Operation Sindoor को छोड़कर मेरी बाकी विदेश यात्राएँ मेरी private capacity में होती हैं। न उन्हें सरकार आयोजित करती है, न सरकार उनका खर्च उठाती है। दुनिया भर के कई विश्वविद्यालय और संस्थान मुझे बुलाते हैं, जितने निमंत्रण आते हैं, उनमें से ज्यादातर को मैं अपने काम के कारण स्वीकार भी नहीं कर पाता। जहाँ तक क्षेत्रीय राजनीति की बात है, मेरे विचार सालों से एक जैसे रहे हैं। मैंने हमेशा Israel और Palestine के बीच two-state solution का समर्थन किया है। और यह भी कहा है कि पाकिस्तान में अक्सर ऐसा लगता है कि वहाँ सेना के पास देश है, न कि देश के पास सेना। Operation Sindoor के बाद जब हमने दुनिया में भारत का पक्ष रखा, तो मेरा संदेश साफ था — "भारत बुद्ध और गांधी की भूमि है। हम शांति चाहते हैं। लेकिन शांति का मतलब कमजोरी नहीं होता। अगर आतंकवाद हमारे लोगों की जान लेगा, तो भारत मजबूती से जवाब देगा।" सबरीमाला के मुद्दे पर भी आपकी आलोचना मुझे थोड़ी अजीब लगी। एक तरफ आप मुझे “गलत विचारों” के लिए कोसते हैं, दूसरी तरफ उसी मुद्दे पर पार्टी के निर्णय के साथ खड़े होने के लिए भी आलोचना करते हैं। मेरी जन्मतिथि को लेकर की गई टिप्पणी भी इस बहस से जुड़ी नहीं है। महात्मा गांधी का सम्मान करने के लिए यह जरूरी नहीं कि किसी को उनकी गोद में खेलने का मौका मिला हो। मैंने गांधी जी और नेहरू जी पर काफी लिखा है और उनका सम्मान मेरे विचारों में गहराई से मौजूद है। विदेश नीति के तरीकों पर मतभेद होना स्वाभाविक है। लेकिन principled pragmatism को गलत समझना ठीक नहीं है। मेरा मानना है कि भारत को ऐसी राष्ट्रवादी सोच की जरूरत है जो नैतिक मूल्यों और वास्तविक दुनिया की राजनीति, दोनों को साथ लेकर चले। आपने कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में मेरा समर्थन किया, उसके लिए मैं आपका आभारी हूँ। और जब आपको पार्टी से निलंबित किया गया था, तब मैंने भी आपके समर्थन में आवाज उठाई थी। मुझे खुशी है कि वह निर्णय बाद में ठीक किया गया। आपने अपने पत्र के अंत में “रास्ते अलग होने” की बात कही। सच यह है कि आपरेशन सिंदूर पर मेरे बोलने के बाद से ही आप लगातार मेरे बारे में कई टिप्पणियाँ कर रहे थे। मैंने अब तक सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया नहीं दी थी, लेकिन आपकी हाल की टिप्पणियों के बाद जवाब देना जरूरी हो गया, इसलिए दे रहा हूँ। सादर, डॉ. शशि थरूर सांसद, तिरुवनंतपुरम अध्यक्ष, विदेश मामलों पर संसदीय स्थायी समित
Shashi Tharoor@ShashiTharoor

My response to Shri Mani Shankar Aiyar on his public criticism of me for "moral amnesia" -- it is clear that others kinds of amnesia are also operating here! One "Open Letter" deserves another, so here is mine: ndtv.com/opinion/an-ope…

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Prabhat Ranjan
Prabhat Ranjan@prabhatranjann·
हिंदी किताबों का विस्तार हो रहा, उसकी व्याप्ति बढ़ रही लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि हिंदी का बौद्धिक समाज सिकुड़ता जा रहा, असहिष्णु होता जा रहा। एक समय में नामवर सिंह, विद्यानिवास मिश्र, विजयदेवनारायण साही वैचारिक रूप से एक दूसरे से पूरी तरह असहमत थे लेकिन उनके बीच एक आपसी सहिष्णुता भी थी। आज तो ध्रुवीकरण के सिवा कुछ नहीं दिखता।
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Wasim Akram Tyagi
Wasim Akram Tyagi@WasimAkramTyagi·
हिंद महासागर में अमरीका ने ईरान के नौसैनिकों को नहीं, भारत की संप्रभुता को डुबोया है. बहादुर शाह ज़फर की जीर्ण-शीर्ण सल्तनत से गुजरते हुए कम से कम 60 साल के भीषण संघर्ष के बाद भारत ने अपनी संप्रभुता हासिल की थी. संप्रभुता मतलब अपनी प्रभुता पर स्वयं का नियंत्रण. बहुत गहरा शब्द है यह. जैसे संप्रभुता एक दिन में हासिल नहीं होती वैसे ही संप्रभुता का क्षरण भी एक दिन में नहीं होता. इसकी शुरुआत होती है गुलामी का फायदा गिनवाने से. संघ पिछले 100 साल से, बीजेपी 45 साल से और मोदी जी पिछले 30 साल से अमरीका की गुलामी के फायदे जनता को गिनवा रहे हैं. अब जनता उसको आत्मसात कर चुकी है. वर्ना यह सवाल ज़रूर उठता कि अमरीका की हिम्मत कैसे हुई उस ईरानी जहाज को डुबाने की जो भारत के बुलावे पर, भारत में, भारतीय नौसेना के प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल होने आया था? अमरीका ने हिंद महासागर में करीब 100 बेगुनाह ईरानी नौसैनिकों की हत्या कर दी. भारत खामोश है. मोदी जी को अमरीका की चाकरी में इतने फायदे नज़र आते हैं कि उन्हें भारत की संप्रभुता महत्वहीन लगती है. कुछ नहीं तो कम से कम कड़ी निंदा करने के लिए मशहूर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह या आंख से लाल लेज़र निकालने वाले एस जयशंकर से एक बयान तो दिलवाया ही जा सकता था. अमरीका को भी लगता और दुनिया को पता चलता कि भारत एक संप्रभु राष्ट्र है. आज अमरीका ने भारतीय संप्रभुता को चुनौती दी कल चीन देगा. फिर चीन के उकसावे पर पाकिस्तान और बांग्लादेश. याद रखिए - जैसे संप्रभुता एक दिन में हासिल नहीं होती वैसे ही संप्रभुता का क्षरण भी एक दिन में नहीं होता. संयोग देखिए कि अमरीका ने ईरान के नौसैनिकों को उसी हिंद महासागर में डुबोया जिसका नाम सिंध के इस पार पड़ने वाले देश के नाम पर है. फारसी में 'स' की ध्वनि नहीं होती. 'स' को लोग 'ह' बोलते हैं. इसीलिए सिंधु नदी के इस पार वाला देश हिंद हुआ. उसका पाद प्रच्छालन करने वाला सागर - हिंद महासागर. हिंद महासागर भारत की संप्रभुता का सामुद्रिक विस्तार है. अमरीका ने उसे सामूहिक कब्रगाह बना दिया. फिर दोहरा रहा हूं - हिंद महासागर में अमरीका ने ईरान के नौसैनिकों को नहीं, भारत की संप्रभुता को डुबोया है. @vdiimc की टिप्पणी!
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Jairam Ramesh
Jairam Ramesh@Jairam_Ramesh·
Two days after Mr. Modi celebrated his visit to Israel, Israel and the US have begun their joint assault on Iran. This was fully expected given their military build-up in the last few months. Mr. Modi nevertheless chose to go to Israel, where he displayed the highest moral cowardice. He declared that India stood with Israel and got himself an award for saying so. This Israel visit was shameful and it is even more so in light of the war that has been launched by two of Mr. Modi’s 'good friends.’
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Priyanka Chaturvedi🇮🇳
Priyanka Chaturvedi🇮🇳@priyankac19·
India Trade Minister is busy hosting US Commerce Secretary Howard Lutnick under whom - India solar exports has been hit with 126% tariff because non cooperation in investigation by BJPs Param Pujya Adaniji -Lutnick has repeatedly said that India would "say sorry" to President Trump and return to the negotiating table due to the pressure of high tariffs. -He described India’s decision to increase imports of discounted Russian oil as "ridiculous" and "wrong". -Lutnick grouped India and Brazil as countries that "need to be fixed". Kya Majboori Hai in selling our national interests?
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Madhurendra kumar मधुरेन्द्र कुमार
कटु सत्य यह भी है कि प्रवक्ताओं से ज्यादा छीछालेदर उन पत्रकारों की हुई है जो एजेंसियों के दावे को परमसत्य मानकर फैसले सुना रहे थे और भ्रष्ट करार दे रहे थे। कई रिपोर्ट में तो "कथित" भी नहीं लिखा जाता था। सबको अपने अंदर झांकने की जरूरत है.
Sushant Sinha@SushantBSinha

आज का परम सत्य यही है कि अरविंद केजरीवाल को ना सिर्फ निचली अदालत ने बरी कर दिया है बल्कि ये तक कह दिया कि जांच में उन्हें फंसाने का प्रयास हुआ। अब बीजेपी भले कहे कि ये तो सिर्फ निचली अदालत का फैसला है, अभी ऊपरी अदालत से फैसला आना बचा है या कल तक केजरीवाल को इसी मामले में भ्रष्ट घोषित करनेवाली कांग्रेस भले आज इसे बीजेपी की साजिश बता दे पर सबसे बड़ी बात ये है कि केजरीवाल की पॉलिटिक्स आज पूरी तरह से रिवाइव हो चुकी है। आप और हम ये सोचते रह सकते हैं कि अगर कोई सबूत था ही नहीं तो केजरीवाल से लेकर मनीष सिसोदिया को इतने दिन जेल में क्यों रखा अदालतों ने, क्यों उनकी जमानत याचिकाएं खारिज होती रहीं, क्यों एक्साइज पॉलिसी कैंसिल हुई वगैरह वगैरह.. लेकिन इन सवालों का कोई मतलब आज की डेट में नहीं है.. आगे ऊपरी अदालत में क्या होता है ये तो बाद की बात है लेकिन आज केजरीवाल के हाथ में एक क्लीन चिट है और यही सत्य है। और ये क्लीन चिट सिर्फ केजरीवाल नहीं बल्कि बंगाल से लेकर हर राज्य तक में बीजेपी के लिए एक बड़ा सवाल खड़ा करता रहेगा कि क्या जानबूझकर विपक्ष को फंसाया गया है? कल सुप्रीम कोर्ट से माफी मांगने के बाद आज निचली अदालत ने छीछालेदर कर दी है सरकार की। उधर अरविंद केजरीवाल अब INDI अलायंस का एक मजबूत चेहरा बनने की दावेदारी रखते हैं। कई लोगों का मानना है कि पंजाब में उनकी जीत लगभग पक्की है.. औऱ आज के फैसले से उन संभावनाओं को बूस्ट ही मिलेगा। ऐसे में राहुल गांधी की जगह तीन बड़े चेहरे हैं जो इंडी गठबंधन को लीड करने का माद्दा रखते हैं.. ममता बनर्जी.. केजरीवाल और अखिलेश यादव। आज के फैसले के दूरगामी प्रभाव होंगे।

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