
Youth In Politics
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Youth In Politics
@ask_upsc
Founder & Director - Vyas Muni Durgawati Foundation NGO @sevadharm_ngo MAHUAVA , खड्डा विधानसभा क्षेत्र


Coming soon in other states too. Bajao thali aur taali.

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तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में मुख्य राजनीतिक दलों ने एक भी टिकट ब्राह्मणों को नहीं दिया, मामला ये है ही नहीं! मामला ये है कि:- - इन्ही ब्राह्मणों के प्रति जातीय राजनीतिक नफरत फैलाई जाती है - मामला ये है कि इन्हीं ब्राह्मणों को किसी तरह का कोई राजनीतिक संरक्षण नहीं है - मामला ये है कि यही ब्राह्मण आज प्रशासनिक-राजनीतिक-सामाजिक रूप से शोषित-पीड़ित-वंचित हैं - रमेश रंजन मिश्रा ने ठीक ही कहा है कि:- “चाहे तिल लो या ताड़ लो राजा, राई लो या पहाड़ लो राजा, मैं अभागा सवर्ण हूँ मेरा, रौंया-रौंया उखाड़ लो राजा”



समुचित और समावेशी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाना चाहिए. उत्तर भारत के राज्यों में अति पिछड़े और महादलित समुदायों की कई ऐसी जातियाँ हैं, जिनकी आबादी बहुत कम है. उन जातियों को विधानसभाओं और लोकसभा में प्रतिनिधित्व तो क्या, राजनीतिक दलों द्वारा चुनावों में उम्मीदवारी तक नहीं दी गई है. कुछ प्रतिनिधित्व मिला भी है, तो वह दिखावे से अधिक कुछ नहीं है. अब ऐसा ही कुछ दक्षिण भारत में भी होता दिख रहा है. तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में चार प्रमुख पार्टियों- भाजपा, कांग्रेस, डीएमके और एआईडीएमके- ने ब्राह्मण समुदाय से एक भी उम्मीदवार खड़ा नहीं किया है. ऐसा 35 साल में पहली बार हुआ है. इन दलों ने अपने आंतरिक आकलन के आधार पर उम्मीदवार खड़े किये होंगे, इसलिए उनके निर्णय पर सवाल उठाने का आधार नहीं है. तो, क्या यह माना जाए कि यह स्थिति केवल एक संयोग भर है? तमिलनाडु की जनसंख्या में ब्राह्मण समुदाय का हिस्सा तीन प्रतिशत से कम है, पर कई शहरों में उसकी आबादी 10 प्रतिशत से अधिक है. मुख्य रूप से शहरों में बसे होने के कारण विभिन्न राजनीतिक दलों में ब्राह्मण कार्यकर्ताओं की भागीदारी है. दो छोटी पार्टियों ने आठ ब्राह्मण उम्मीदवार उतारा है. तो, चार मुख्य पार्टियों का ऐसा करना केवल संयोग भर तो नहीं है. ऐसे में क्या यह माना जाए कि राजनीतिक लाभ-हानि देखने और अधिक जनसंख्या वाले जातिगत समुदायों को लुभाने की कोशिश के कारण ऐसा हुआ है? ऐसा राजनीति में होता रहा है, पर ऐसा नहीं लगना चाहिए कि यह किसी समुदाय विशेष के प्रतिनिधित्व और भागीदारी को सीमित किया जा रहा है. राजनीति को निरंतर समावेशी बनाने से लोकतंत्र सशक्त होता है. उस पर ध्यान दिया जाना चाहिए.







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