sameer chougaonkar@semeerc
सत्ता सर्वोपरि होती है।सत्ता मनुष्य को ना रुकने देती है,ना थकने देती हैं।उम्र सब पर हावी हो जाती है, पर सत्ता पर उम्र कभी हावी नहीं होती है।सत्ता का नशा और मोह इंसान को हर उम्र में और हर परिस्थिति में ऊर्जावान बनाए रखता है।
सत्ता की जिजीविषा एक नेता कों उम्र के अंतिम पड़ाव में भी चिर युवा दिखने के लिए प्रेरित करती है।
राजनीति में महत्त्वाकांक्षा कभी नहीं मरती।सत्ता का मोह और महत्वाकांक्षा मनुष्य की मनुष्यता को भीतर से मार देती हैं।
अंग्रेज़ी के कवि,काव्यात्मकता के विद्वान नाटककार
विलियम शेक्सपीयर ने मनुष्य का नाश करने वाली प्रवृत्तियों में महत्त्वाकांक्षा को सबसे ऊपर माना है।अपने नाटकों में शेक्सपीयर बार-बार महत्त्वाकांक्षा से बचने,उससे दूर रहने,उसे छोड़ देने की बातें करते है।महत्त्वाकांक्षा के कारण शेक्सपीयर के पात्र कभी मरते हैं,कभी नष्ट होते हैं।
पर राजनीति में ऐसा नहीं होता।इसके उलट राजनीति में शक्ति और सत्ता की महत्त्वाकांक्षा को ही सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति माना गया है।महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने का संघर्ष,उत्तेजना और फिर सफल होने का उल्लास ही राजनीति का दूसरा नाम है।
ग्रीक दार्शनिक प्लेटो ने राजनीति को मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ कर्म बताया है। प्लेटो ने मनुष्य के जीवन में दर्शन के बाद राजनीति को ही उच्चतर महत्त्व दिया है। सत्ता को उच्चतर विद्या और कौशल बताया है।
प्लेटो की पुस्तक रिपब्लिक में 'रेसीमेकस' और ‘सुकरात’ के बीच का वाद-विवाद राजनीति के इतिहास में बहुत प्रसिद्ध है।यह प्रसंग वास्तव में इस विचार का सबसे पहला और स्पष्ट उदाहरण है कि राजनीतिक सत्ता ही अंतिम सत्य है।
रेसीमेकस का तर्क था कि 'न्याय'कुछ और नहीं, बल्कि "शक्तिशाली का हित" होता है,जबकि सुकरात का तर्क था कि एक सच्चे शासक का उद्देश्य केवल अपना स्वार्थ साधना नहीं,बल्कि अपनी प्रजा की भलाई करना होता है।इस विवाद में सुकरात हार जाता है।
सत्ता और राजनीति पर लेटो की पुस्तक रिपब्लिक के पात्र रेसीमेकस के तर्क को अंतिम सत्य मान लिया गया कि राजनीति में शक्ति और सत्ता ही सर्वोपरि होते हैं।
सुकरात तब भी हारा था,आज भी हार रहा है।
इतिहास हो या वर्तमान सत्ता सर्वोपरि रही है।