sameer chougaonkar

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@semeerc

पत्रकार और लेखक।राजनीति पर ख़बरें सुनता और सुनाता हूँ।एक्स - इंडिया टुडे, राजस्थान पत्रिका. राजनीति पर सात किताबें प्रकाशित.

New Delhi Katılım Eylül 2009
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sameer chougaonkar@semeerc·
सुनिए 😊 @MinakshiKandwal से बाबा रामदेव की बातचीत
NDTV India@ndtvindia

#MicOnHai | 'मैं कोई आंदोलनजीवी नहीं हूं, सिर्फ राम मंदिर में ही चोरी नहीं हुई, कई अन्य मंदिरों में भी चोरी हुई है' राम मंदिर चढ़ावा चोरी केस को लेकर NDTV से #EXCLUSIVE बातचीत में बोले योग गुरु रामदेव #NDTVExclusive #Ramdev @MinakshiKandwal @yogrishiramdev

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sameer chougaonkar
sameer chougaonkar@semeerc·
राहुल गांधी 20 दिनों के विदेश दौरे के बाद भारत वापस आ गए हैं।राहुल कहा थे,मुझे यह जानने में जरा भी दिलचस्पी नहीं है।मेरी दिलचस्पी यह जानने में हमेशा रही है कि कांग्रेस के संकट के समय राहुल ने कांग्रेस के लिए क्या किया,या मोदी से लड़ने के लिए राहुल ख़ुद को ओर कांग्रेस को कैसे तैयार कर रहे हैं? राहुल की राजनीति पर विचार करता हूँ तो मैं अक्सर निराशा महसूस करता हूँ।मेरा निराश होना मायने नहीं रखता।कांग्रेस के नेता, कार्यकर्ता और प्रवक्ता राहुल गांधी की राजनीति से असहज महसूस करने लगे ओर राहुल की राजनीति पर बात करने से बचने लगे तो यह कांग्रेस के लिए गंभीर संकट का लक्षण है। क्यो राहुल गांधी हर बार वहाँ अनुपस्थित रहते हैं जहाँ उनका उपस्थित होना जरूरी था। राज्यसभा चुनाव में मध्य प्रदेश से मीनाक्षी नटराजन का पर्चा कांग्रेस की राजनीति के चलते ख़ारिज हो जाता है,झारखंड में कांग्रेस के उम्मीदवार को हराकर निर्दलीय परिमल नथवानी जीत जाते हैं।राहुल इसे सहजता से स्वीकार कर लेते हैं। पंजाब जैसे अति महत्वपूर्ण चुनावी राज्य में कांग्रेस टूटने के कगार पर है ओर राहुल इस सबसे परे विदेश में छुट्टियाँ मना रहे थे।राम मंदिर जैसा मामला और मसाला हाथ में आने के बाद भी राहुल ने इस पर चुप्पी साध ली।मोदी के मंत्री का पूरा स्टाफ हटा दिया गया,राहुल इस मुद्दे पर मोदी को घेरना तो दूर,एक शब्द नहीं बोले। राहुल क्या चाहते हैं,कोई नहीं समझ सकता।देश की जनता राहुल से क्या चाहती है,राहुल गांधी यह भी नहीं समझना चाहते।राहुल की राजनीतिक समझ,सबके समझ से परे है । यह राहुल की राजनीति ही है जिसके कारण मोदी-शाह की भाजपा को राहुल के नेतृत्व वाली कांग्रेस इतनी सुविधाजनक प्रतिद्वंद्वी नजर आती है। एक पत्रकार, एक नागरिक और एक मतदाता के रूप में मैं राहुल गांधी से उम्मीद करता हूँ कि एक सक्षम विपक्ष और बेहतर विकल्प के तौर पर ख़ुद को पेश करें। लोकतंत्र में जनता के पास हमेशा मजबूत विकल्प होना चाहिए।विपक्ष विहीन सरकार और विकल्प विहीन लोकतंत्र किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे बड़ा संकट होता है।फ़िलहाल देश का लोकतंत्र इसी संकट से गुज़र रहा है।
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संजय नामदेव पाली
@semeerc समीर जी, नमस्कार बहुत ही अच्छा लिखते हैं और प्रमाणिक जानकारी देते हैं मैं आपके लिखे गए वाक्यों में से चुनकर अपने व्हाट्सएप स्टेटस पर भी लगाता हूं। ऐसे ही लिखते रहें और स्वस्थ रहें
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sameer chougaonkar@semeerc·
सत्ता सर्वोपरि होती है।सत्ता मनुष्य को ना रुकने देती है,ना थकने देती हैं।उम्र सब पर हावी हो जाती है, पर सत्ता पर उम्र कभी हावी नहीं होती है।सत्ता का नशा और मोह इंसान को हर उम्र में और हर परिस्थिति में ऊर्जावान बनाए रखता है। सत्ता की जिजीविषा एक नेता कों उम्र के अंतिम पड़ाव में भी चिर युवा दिखने के लिए प्रेरित करती है। राजनीति में महत्त्वाकांक्षा कभी नहीं मरती।सत्ता का मोह और महत्वाकांक्षा मनुष्य की मनुष्यता को भीतर से मार देती हैं। अंग्रेज़ी के कवि,काव्यात्मकता के विद्वान नाटककार विलियम शेक्सपीयर ने मनुष्य का नाश करने वाली प्रवृत्तियों में महत्त्वाकांक्षा को सबसे ऊपर माना है।अपने नाटकों में शेक्सपीयर बार-बार महत्त्वाकांक्षा से बचने,उससे दूर रहने,उसे छोड़ देने की बातें करते है।महत्त्वाकांक्षा के कारण शेक्सपीयर के पात्र कभी मरते हैं,कभी नष्ट होते हैं। पर राजनीति में ऐसा नहीं होता।इसके उलट राजनीति में शक्ति और सत्ता की महत्त्वाकांक्षा को ही सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति माना गया है।महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने का संघर्ष,उत्तेजना और फिर सफल होने का उल्लास ही राजनीति का दूसरा नाम है। ग्रीक दार्शनिक प्लेटो ने राजनीति को मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ कर्म बताया है। प्लेटो ने मनुष्य के जीवन में दर्शन के बाद राजनीति को ही उच्चतर महत्त्व दिया है। सत्ता को उच्चतर विद्या और कौशल बताया है। प्लेटो की पुस्तक रिपब्लिक में 'रेसीमेकस' और ‘सुकरात’ के बीच का वाद-विवाद राजनीति के इतिहास में बहुत प्रसिद्ध है।यह प्रसंग वास्तव में इस विचार का सबसे पहला और स्पष्ट उदाहरण है कि राजनीतिक सत्ता ही अंतिम सत्य है। रेसीमेकस का तर्क था कि 'न्याय'कुछ और नहीं, बल्कि "शक्तिशाली का हित" होता है,जबकि सुकरात का तर्क था कि एक सच्चे शासक का उद्देश्य केवल अपना स्वार्थ साधना नहीं,बल्कि अपनी प्रजा की भलाई करना होता है।इस विवाद में सुकरात हार जाता है। सत्ता और राजनीति पर लेटो की पुस्तक रिपब्लिक के पात्र रेसीमेकस के तर्क को अंतिम सत्य मान लिया गया कि राजनीति में शक्ति और सत्ता ही सर्वोपरि होते हैं। सुकरात तब भी हारा था,आज भी हार रहा है। इतिहास हो या वर्तमान सत्ता सर्वोपरि रही है।
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sameer chougaonkar
sameer chougaonkar@semeerc·
बांकीपुर-दतिया उपचुनाव में बीजेपी टिकट विवाद के पीछे की इनसाइड स्टोरी: पीढ़ीगत बदलाव का ट्रेलर? thesootr.com/vicharmanthan/…
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sameer chougaonkar
sameer chougaonkar@semeerc·
दतिया विधानसभा उप चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की हार लगभग तय है।संघ, संगठन, सरकार और प्रशासन की पूरी ताकत झोकने के बाद ही कोई चमत्कार हो जाए तो कह नहीं सकते।फिलहाल यह सीट कांग्रेस के पास बरकरार रहती नजर आ रही है।
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sameer chougaonkar
sameer chougaonkar@semeerc·
@pankajjha_ पंकज भाई आप सब जानते हो।😃😃🙏. देश की राजनीति पर आपकी पकड़ और समझ का कोई मुक़ाबला नहीं है।
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पंकज झा
पंकज झा@pankajjha_·
@semeerc इस सुविचारित लेख का हाल के किसी घटनाक्रम से भी कनेक्शन है क्या ?
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IndiaBharat
IndiaBharat@IndiaBharat0805·
इस बदलाव का कारण चाहे जो हो लेकिन अब आप ऐसा लिख रहे हैं जो एक पत्रकार को लिखना चाहिए। आशा करते हैं प्रदीप जी जैसा बदलाव आप में नहीं होगा।
sameer chougaonkar@semeerc

सत्ता सर्वोपरि होती है।सत्ता मनुष्य को ना रुकने देती है,ना थकने देती हैं।उम्र सब पर हावी हो जाती है, पर सत्ता पर उम्र कभी हावी नहीं होती है।सत्ता का नशा और मोह इंसान को हर उम्र में और हर परिस्थिति में ऊर्जावान बनाए रखता है। सत्ता की जिजीविषा एक नेता कों उम्र के अंतिम पड़ाव में भी चिर युवा दिखने के लिए प्रेरित करती है। राजनीति में महत्त्वाकांक्षा कभी नहीं मरती।सत्ता का मोह और महत्वाकांक्षा मनुष्य की मनुष्यता को भीतर से मार देती हैं। अंग्रेज़ी के कवि,काव्यात्मकता के विद्वान नाटककार विलियम शेक्सपीयर ने मनुष्य का नाश करने वाली प्रवृत्तियों में महत्त्वाकांक्षा को सबसे ऊपर माना है।अपने नाटकों में शेक्सपीयर बार-बार महत्त्वाकांक्षा से बचने,उससे दूर रहने,उसे छोड़ देने की बातें करते है।महत्त्वाकांक्षा के कारण शेक्सपीयर के पात्र कभी मरते हैं,कभी नष्ट होते हैं। पर राजनीति में ऐसा नहीं होता।इसके उलट राजनीति में शक्ति और सत्ता की महत्त्वाकांक्षा को ही सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति माना गया है।महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने का संघर्ष,उत्तेजना और फिर सफल होने का उल्लास ही राजनीति का दूसरा नाम है। ग्रीक दार्शनिक प्लेटो ने राजनीति को मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ कर्म बताया है। प्लेटो ने मनुष्य के जीवन में दर्शन के बाद राजनीति को ही उच्चतर महत्त्व दिया है। सत्ता को उच्चतर विद्या और कौशल बताया है। प्लेटो की पुस्तक रिपब्लिक में 'रेसीमेकस' और ‘सुकरात’ के बीच का वाद-विवाद राजनीति के इतिहास में बहुत प्रसिद्ध है।यह प्रसंग वास्तव में इस विचार का सबसे पहला और स्पष्ट उदाहरण है कि राजनीतिक सत्ता ही अंतिम सत्य है। रेसीमेकस का तर्क था कि 'न्याय'कुछ और नहीं, बल्कि "शक्तिशाली का हित" होता है,जबकि सुकरात का तर्क था कि एक सच्चे शासक का उद्देश्य केवल अपना स्वार्थ साधना नहीं,बल्कि अपनी प्रजा की भलाई करना होता है।इस विवाद में सुकरात हार जाता है। सत्ता और राजनीति पर लेटो की पुस्तक रिपब्लिक के पात्र रेसीमेकस के तर्क को अंतिम सत्य मान लिया गया कि राजनीति में शक्ति और सत्ता ही सर्वोपरि होते हैं। सुकरात तब भी हारा था,आज भी हार रहा है। इतिहास हो या वर्तमान सत्ता सर्वोपरि रही है।

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पी एम राजपुरोहित
वाह!! समीर जी वाह... आज तो आप बेहद मार्मिक और दार्शनिक अंदाज में !! मुक्तकंठ से आपके आलेख की प्रशंसा किए बीना नहीं रह सकता हूं।
sameer chougaonkar@semeerc

सत्ता सर्वोपरि होती है।सत्ता मनुष्य को ना रुकने देती है,ना थकने देती हैं।उम्र सब पर हावी हो जाती है, पर सत्ता पर उम्र कभी हावी नहीं होती है।सत्ता का नशा और मोह इंसान को हर उम्र में और हर परिस्थिति में ऊर्जावान बनाए रखता है। सत्ता की जिजीविषा एक नेता कों उम्र के अंतिम पड़ाव में भी चिर युवा दिखने के लिए प्रेरित करती है। राजनीति में महत्त्वाकांक्षा कभी नहीं मरती।सत्ता का मोह और महत्वाकांक्षा मनुष्य की मनुष्यता को भीतर से मार देती हैं। अंग्रेज़ी के कवि,काव्यात्मकता के विद्वान नाटककार विलियम शेक्सपीयर ने मनुष्य का नाश करने वाली प्रवृत्तियों में महत्त्वाकांक्षा को सबसे ऊपर माना है।अपने नाटकों में शेक्सपीयर बार-बार महत्त्वाकांक्षा से बचने,उससे दूर रहने,उसे छोड़ देने की बातें करते है।महत्त्वाकांक्षा के कारण शेक्सपीयर के पात्र कभी मरते हैं,कभी नष्ट होते हैं। पर राजनीति में ऐसा नहीं होता।इसके उलट राजनीति में शक्ति और सत्ता की महत्त्वाकांक्षा को ही सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति माना गया है।महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने का संघर्ष,उत्तेजना और फिर सफल होने का उल्लास ही राजनीति का दूसरा नाम है। ग्रीक दार्शनिक प्लेटो ने राजनीति को मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ कर्म बताया है। प्लेटो ने मनुष्य के जीवन में दर्शन के बाद राजनीति को ही उच्चतर महत्त्व दिया है। सत्ता को उच्चतर विद्या और कौशल बताया है। प्लेटो की पुस्तक रिपब्लिक में 'रेसीमेकस' और ‘सुकरात’ के बीच का वाद-विवाद राजनीति के इतिहास में बहुत प्रसिद्ध है।यह प्रसंग वास्तव में इस विचार का सबसे पहला और स्पष्ट उदाहरण है कि राजनीतिक सत्ता ही अंतिम सत्य है। रेसीमेकस का तर्क था कि 'न्याय'कुछ और नहीं, बल्कि "शक्तिशाली का हित" होता है,जबकि सुकरात का तर्क था कि एक सच्चे शासक का उद्देश्य केवल अपना स्वार्थ साधना नहीं,बल्कि अपनी प्रजा की भलाई करना होता है।इस विवाद में सुकरात हार जाता है। सत्ता और राजनीति पर लेटो की पुस्तक रिपब्लिक के पात्र रेसीमेकस के तर्क को अंतिम सत्य मान लिया गया कि राजनीति में शक्ति और सत्ता ही सर्वोपरि होते हैं। सुकरात तब भी हारा था,आज भी हार रहा है। इतिहास हो या वर्तमान सत्ता सर्वोपरि रही है।

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atul Richhariya
atul Richhariya@MayaRichha83793·
@semeerc आज की पोस्ट पढ़कर दिल खुश हो गया काफी दिन बाद आप पुराने फॉर्म में आए हैं अति सुन्दर 👌👌👌
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sameer chougaonkar
sameer chougaonkar@semeerc·
@nr_kadam थोड़ा ध्यान से पढ़ लीजिए मेरा पोस्ट मित्र 😊🙏
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N.R.Kadam
N.R.Kadam@nr_kadam·
@semeerc यदि राजनीति मे सत्ता और शक्ति ही सर्वोपरि है तो फिर राष्ट्र भक्ति क्या है? क्या हम मान लें कि नरेन्द्र मोदी सिर्फ शक्ति और सत्ता के लिए ही राजनीति मे हैं, देश सेवा के लिए नहीं? विदेशी विद्वानो का जो भी मत हो समीर जी, भारत की राजनीति इस देश की मिट्टी की ऊर्जा से ही संचालित है।
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Dr Meena Kumari
Dr Meena Kumari@DrMeenaJangid·
@semeerc शेक्सपीयर ने महत्त्वाकांक्षा से सावधान किया था, राजनीति ने उसे सफलता का अनिवार्य गुण बना दिया। शायद इसी का नाम सत्ता का यथार्थ है।
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Brajesh Rajput
Brajesh Rajput@drbrajeshrajput·
मेरे उपन्यास “द एवरेस्ट गर्ल “ के लिये मिले साहित्य अकादमी अवार्ड पर सीएम @DrMohanYadav51 और भोपाल के विधायक @BDSabnani की संस्था नवप्रयास ने इस तरह सम्मानित किया, आभार 🙏
Brajesh Rajput tweet media
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sameer chougaonkar
sameer chougaonkar@semeerc·
@TrivediNik32ny आने वाले दिनो में इस पर लिखूँगा निखिल जी
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Trivedi Nikhil
Trivedi Nikhil@TrivediNik32ny·
@semeerc Punjab me bjp ki situation kaisi hai sir aur Aaj kal arvind kejriwal Punjab me hindu hindu kar rah hai uske bare me kuch details share kijiye sir.
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sameer chougaonkar
sameer chougaonkar@semeerc·
दतिया भाजपा में टिकट को लेकर मचे बवाल के बीच कांग्रेस ने पूर्व विधायक कुंवर घनश्याम सिंह को टिकट दिया है।दतिया राजघराने से जुडे घनश्याम तीन बार 1993, 2003 में दतिया से और 2018 में सेवढ़ा से विधायक रहे हैं। 2023 में सेवढ़ा से चुनाव हार गए थे। कांग्रेस ने दतिया विधानसभा सीट पर सबसे योग्य व्यक्ति को टिकट दिया है।घनश्याम के मैदान में आने से कांग्रेस और बीजेपी में ​कांटे की लड़ाई तय हैं। उम्मीदवारों की तुलना में कांग्रेस का पलड़ा भारी दिख रहा हैं।घनश्याम सिंह दतिया से ही हैं,हर घर में संपर्क है,जबकि भाजपा के आशुतोष तिवारी दतिया के लिए बाहरी हैं।क्षेत्र और भाजपा कार्यकर्ताओं से संपर्क भी बहुत कम हैं। भाजपा से संगठन,सरकार और प्रशासन चुनाव लड़ेगा और कांग्रेस से घनश्याम सिंह के व्यक्तिगत संपर्क और उनकी मोहक मुस्कान।फिलहाल कांग्रेस के घनश्याम का पलड़ा भारी दिख रहा है। अगर आशुतोष तिवारी हारते है,तो ठीकरा नरोत्तम पर फूटेगा और 2028 के विधानसभा चुनाव में नरोत्तम या उनके परिवार का पत्ता हमेशा के लिए इस सीट से पार्टी काट देंगी।अगर आशुतोष जीतते है तो यह संगठन और मोहन सरकार के कामकाज की जीत मानी जाएगी और 2028 में आशुतोष तिवारी फिर से बीजेपी के उम्मीदवार होंगे। मतलब यह सीट अब नरोत्तम के हाथ से निकल चुकी है।भाजपा जीते या हारें।नुकसान हर हाल में नरोत्तम का होना हैं। कांग्रेस से घनश्याम सिंह के मैदान में आने से और नरोत्तम समर्थकों के नाराजगी से दतिया विधानसभा की यह सीट कड़े मुकाबले में तब्दील हो गई है।
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