Nitin Thakur

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@thenitinnotes

Associate Editor @aajtakradio, Podcast: Padhaku Nitin & Sandarbh, Ex @CNBC_awaaz, @TV9Bharatvarsh, @News24tvchannel •Lawyer • Writer of #इतिइतिहास, #नफरतीचिंटू

Noida, India 가입일 Nisan 2013
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
बचपन से उसे मेहनत करने की आदत थी। ना करता तो ज़िंदा बच पाना मुश्किल था। वो अपना देश और शहर छोड़कर परदेस में इसलिए जान खपा रहा था ताकि गरीबी के अभिशाप से जान छुड़ा सके। पांच महीने की जी तोड़ मेहनत के बाद वो फिलाडेल्फिया से ऊबने लगा था। एक हफ्ते की छुट्टी पर जाने का मौका मिला तो उसने ज़िंदगी में पहली बार अमीरों की तरह बर्ताव करने की ठानी। अच्छा एक्टर था इसलिए वैसी एक्टिंग करने भी लगा। तुरत-फुरत एक शोरूम में पहुंचा और पाई-पाई बचाने की कंजूसी के उलट महंगा ड्रेसिंग गाउन और 75 डॉलर का शानदार सूटकेस खरीदा। दुकानदार ने प्रभावित होकर सूटकेस घर पर ही भिजवाने का प्रस्ताव रखा तो उसे अचानक अहसास हुआ कि वो किसी पिरामिड के शीर्ष पर खड़ा है। ज़िंदगी उसके साथ ऐसे अदब से कभी पेश नहीं आई थी। इसके बाद उसने शहर के सबसे महंगे होटल का रुख किया। डर्बी टोप पहन शान से छड़ी घुमाते हुए उसने होटल एस्टॉर में प्रवेश किया। अमीरी और शानो शौकत के साथ सहज नहीं था इसलिए जगमगाहट देख थोड़ी देर के लिए घबराहट हुई। डेस्क पर संभलकर अपना नाम दर्ज कराया और जब कमरे का एक दिन का किराया पता किया तो पैसा एडवांस में जमा करने की पेशकश की। अब तक सरायों और सस्ते होटलों में ठहरने का तजुर्बा उसका पीछा कर रहा था। गरीबी का भूत चारों तरफ नाच रहा था और वो था कि दौड़े चला जा रहा था। दमकती लॉबी से गुज़रा तो मन भर आया। कमरे में पहुंचकर बाथरूम के हर आइने और नल का मुआयना करने लगा। हाथों से सब कुछ छूकर देखता रहा। वो अपना हर पैसा वसूल लेना चाहता था। अपने पैसों पर ऐश करने का उसका पहला मौका था। नहा धोकर कुछ पढ़ने की इच्छा हुई लेकिन फोन करके अखबार तक मंगाने का आत्मविश्वास खुद में पैदा नहीं कर सका। कुछ रुक कर कपड़े पहने और बाहर निकल आया। वो किसी सम्मोहन में बंधा डिनर हॉल तक पहुंच गया। वेटर ने एक टेबल तक उसे गार्ड किया और पल भर बाद वो फिर से अदब की दुनिया के पिरामिड पर बैठा था। वेटरों की फौज उसे ठंडा पानी, मेन्यू, मक्खन और ब्रेड पेश कर रही थी। वो बेचारा संभल कर अपनी सबसे उम्दा अंग्रेज़ी बोल रहा था। खा-पी कर उसने एक डॉलर की बड़ी टिप दी। वो कमरे में लौट फिर बाहर निकल आया। उसके भीतर कुछ तो था जो बाहर आने को खदबदा रहा था। समझ वो भी नहीं पा रहा था कि ये ज्वालामुखी आखिर किस वजह से फटना चाहता है। चलते-चलते मेट्रोपॉलिटन ओपेरा पहुंच उसने ना जाने क्यों जर्मन ग्रैण्ड ओपेरा का टिकट खरीदा। उसे ये कभी पसंद नहीं था। जर्मन भाषा में ओपेरा चलता रहा और वो ऐसे ही बैठा रहा। जैसे ही रानी के मरने का दृश्य आया अचानक फूट-फूट कर रोने लगा। आसपास कौन है और क्या सोच रहा है उसे कुछ खबर नहीं थी। वो बस रोये चला जा रहा था। वो तब तक रोया जब तक बदन की ताकत बाहर नहीं निकल गई। आखिरकार निढाल होकर उसे चैन मिला. ये चार्ली चैप्लिन था जिसने बला की गरीबी के बाद पैसे और शोहरत की इंतहां देखी और अगले महीने उनका जन्मदिन है. - नितिन ठाकुर
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
अब ईरान वाली वॉर का फॉलोअप लेते ठीकठाक वक्त हो गया है। कई पॉडकास्ट भी हो गए। जितना समझ आ रहा है वो ये कि इस जंग को खत्म करने का सौभाग्य ट्रंप को नहीं मिलेगा। उसने खामेनेई को सद्दाम या गद्दाफी समझ लिया था जो अपने देशों में पर्याप्त अलोकप्रिय हो चुके थे। वहां विरोध में खड़े होनेवाले संगठन अमेरिका को मिल गए थे। ईरान की स्क्रिप्ट में ये सब गायब है। फिर ईरान की आबादी, ताकत, तंत्र सब कुछ क्रूर नेता में तब्दील हो चुके सद्दाम और अय्याशी के पर्याय के तौर पर देखे जानेवाले गद्दाफी के मुकाबले बड़े और बेहतर रहे। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज़ को अमेरिका के गले की घंटी बनाने का विकल्प भी उनके पास नहीं था जो ईरानियों के पास है। अब हालत ये है कि ट्रंप दुनिया को बातचीत का आश्वासन देकर स्थितियां सामान्य बनाने का प्रयास कर रहे हैं, ईरानी मीम बनाकर ट्रंप का मज़ाक उड़ा रहे हैं। ईरान के पड़ोसी विचार करने लगे हैं कि अमेरिका के अड्डे अपने यहां रखना सुरक्षा की जगह नुकसान का कारण बनने लगा है तो क्या अब वक्त है कि अपनी सिक्योरिटी के लिए कहीं और देखना चाहिए? नेतन्याहू की बात अलग है। उनके लिए ये इतिहास सही करने का अवसर है। अपना राजनीतिक अस्तित्व बनाए रखने का भी। उनकी किस्मत से एक अमेरिकी राष्ट्रपति मोसाद के तर्कों पर राज़ी होकर जंग को तैयार हो गया लेकिन नतीजे जैसे आए हैं उसके बाद सोच विचार इज़रायल में चल रहा है। हिज़बुल्ला और हमास बस संगठन थे मगर ईरान एक राष्ट्र है। सारे गणित उलटा सकने की क्षमता दिखानेवाला राष्ट्र। भारत सरकार की फॉरेन पॉलिसी थोड़ी भ्रम का शिकार रही। जंग के एक दिन पहले नेतन्याहू की बगल में खड़े दिखना कोई रणनीति नहीं हो सकती। ये सिर्फ गलत सलाहकारों की सलाह का नतीजा कहा जा सकता है। हालांकि अच्छा ये है कि ईरान को लेकर जो कुछ जनसमर्थन और मीडिया का भाव दिखा उसके चलते ईरानी सरकार ने समझा होगा कि भारत इस जंग के पक्ष में नहीं है। पिछले कुछ दिनों में जो तटस्थता सरकार ने दिखाई वो भी ठीक थी। हां कुछ लोग भारत सरकार से स्टैंड की मांग कर रहे हैं लेकिन मुझे नहीं लगा कि अभी किसी स्टैंड का कोई वक्त है। जितना हो सके अमेरिका से दूर दिखना चाहिए। इज़रायल से दोस्ती व्यवहारिक ज़रूरत है पर उन्होंने हमें कभी वेस्ट एशिया की लड़ाई में नहीं खींचा सो अपने को दूरी रखनी चाहिए। वैसे भी जिनके घरों में सिलेंडर और तेल की कमी का खतरा हो उनको ज़्यादा चैंपियन नहीं बनना चाहिए। हमारे पास वेनेजुएला या इराक का तेल नहीं है। बेसिकली ज़रूरत है कि पहले हम अंदर से मज़बूत बनें। बिन मज़बूती स्टैंड लेकर नुकसान उठाने का कोई फायदा नहीं। ये कोई नैतिक युद्ध भी नहीं। दूर से “लड़ो मत लड़ो मत” पहले भी किया है अब भी जारी रखें। खामेनेई की हत्या और बच्चियों की मौत पर शोक ज़ाहिर करनेवाला टाइम तो पहले ही गंवा दिया, सो अब जो है वो है। अगर तब किया होता तो हम ट्रंप को एम्बेरेस करके उस हरकत का बदला लेते जो उसने भारत पाकिस्तान वाली झड़प के दौरान सीज़फायर का क्रेडिट लेने के लिए की थी।
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
@Bluetick_dhari ब्रो झरने को झील लिख दिया था।
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Hakam Singh Returns
Hakam Singh Returns@Bluetick_dhari·
@thenitinnotes झील में पानी यदा कदा बहता है झील स्थिर होती हैं मिसाल उपमा तो उचित दीजिए
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
मुझे फारुख शेख़ का चेहरा बहुत पसंद था। उनकी कितनी ही फिल्में एक के बाद एक देखीं। संयोग ही था कि जिन गानों में दिखे सभी मेरे दिल को छूने वाले रहे। फारुख कोई शहंशाह या बादशाह नहीं थे इसलिए उनकी कोई खास अदा भी नहीं थी। एक्टिंग ऐसे करते मानो झील में पानी बह रहा हो। फारुख ने अदाकारी का कोई माध्यम नहीं छोड़ा, सभी में हाथ आज़माए। ज़मींदार खानदान के थे और पिता मुंबई के नामी वकील के तौर पर मशहूर थे। पढ़ाई के ऐसे कीड़े कि शॉट खत्म होते ही किताब लेकर पढ़ने बैठ जाते। इंडस्ट्री में जितने लोगों को जानते थे उनके जन्मदिन और एनिवर्सरी याद रखना सबको हैरान करता था। फारुख को देख दीप्ति नवल और दीप्ति को देख फारुख को ज़माना याद करता है। खुद फारुख शेख ने दीप्ति के साथ अपने रिश्ते को एक दफा डिवाइन कहा था। शबाना आज़मी तो कॉलेज में उनकी जूनियर ही थीं और शुरूआती दिनों से दोनों ने मिलकर कई नाटक खेले। रेडियो पर फारुख शेख की आवाज़ खूब पहचानी जाती थी। मखमली और साफ उच्चारण वाली स्वर्गिक आवाज़। कौन बता सकता था कि फारुख ने वकालत पढ़ी थी लेकिन उसमें करियर बनाने की जगह बलराज साहनी की आखिरी फिल्म गरम हवा को अपनी पहली फिल्म बना लिया। इसके बाद आई गमन में वो टैक्सी ड्राइवर बने तो उमराव जान में नवाब। हर भूमिका में रचबस जाने का शानदार हुनर छिपा कहां था। बाज़ार और किसी से ना कहना दोनों एक दूसरे से एकदम अलग फिल्में थीं मगर फारुख ने दोनों में काम किया और क्या जम कर काम किया। उनका शो जीना इसी का नाम है ऐसा था कि कोई भी उसे स्किप नहीं कर सकता था। शंघाई फिल्म में तो मैं खुद उनको देखकर चौंका और उनका ये जादू आखिरी फिल्म क्लब 60 तक बरकरार रहा। अभी तो उन्होंने चमक बिखेरनी ही शुरू की थी कि 27 दिसंबर 2013 को दुबई में दिल का दौरा पड़ने से वो गुज़र गए। आज उनका जन्मदिन है। 1948 में उनका जन्म हुआ था। गूगल ने 2018 में डूडल बनाया था इसके लिए शुक्रिया.
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
ट्रंप कह रहे हैं उनकी बात ईरान से हो रही है, ईरानी कह रहे हैं हमारी कोई बात ही नहीं हुई। फिर वो है कौन जिससे ट्रंप फुनिया रहे हैं???
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
@SamratBaisana हां, इसके अलावा जो बोला वो भी विवाद में चल रहा है।
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Yuvrajan Singraur
Yuvrajan Singraur@SamratBaisana·
@thenitinnotes दरअसल यह बालक तुर्क बोलना चाह रहा था, लेकिन मुगल निकल गया।
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
नालंदा को किसने खत्म किया ये तो पता नहीं लेकिन मुगलों को 1526 ईस्वी से 1200 ईस्वी में खींच लाना गाइड साहब के बस में ही था।
हर्ष वर्धन त्रिपाठी 🇮🇳Harsh Vardhan Tripathi@MediaHarshVT

खतरनाक तरीके से झूठ बोलकर भारत में #ब्राह्मण के प्रति घृणा भरी जा चुकी है। यह @TourismBiharGov का गाइड संजय कुमार है जो #Nalanda @nalanda_univ के बारे में बता रहा है कि, हिन्दू/ब्राह्मणों ने मुगलों से पहले नालंदा पर आक्रमण किया और बख्तियार ख़िलजी का सहयोग लिया। ऐसे ही भारत का इतिहास दूषित किया जाता रहा है @PoliceNalanda इस पर कार्रवाई कीजिए @gssjodhpur @MinOfCultureGoI

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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
@MediaHarshVT @TourismBiharGov @nalanda_univ ये भी तो पूछ लें कि बारह सौ ईस्वी में मुगल आकर कैसे खत्म कर गए। पहला मुगल 1526 में आया था।
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हर्ष वर्धन त्रिपाठी 🇮🇳Harsh Vardhan Tripathi
खतरनाक तरीके से झूठ बोलकर भारत में #ब्राह्मण के प्रति घृणा भरी जा चुकी है। यह @TourismBiharGov का गाइड संजय कुमार है जो #Nalanda @nalanda_univ के बारे में बता रहा है कि, हिन्दू/ब्राह्मणों ने मुगलों से पहले नालंदा पर आक्रमण किया और बख्तियार ख़िलजी का सहयोग लिया। ऐसे ही भारत का इतिहास दूषित किया जाता रहा है @PoliceNalanda इस पर कार्रवाई कीजिए @gssjodhpur @MinOfCultureGoI
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
भाषा कोई अंतिम समाधान नहीं है। सारी भाषाएं मिलकर भी हर विचार हर बात को कपड़े नहीं पहना सकते। हज़ारों साल की कोशिशों में इतना भर हुआ कि एकाध बात ठीक से पहुंच जाए, अपने पूरे संदर्भ और अहसास के साथ। इसमें भी शक़ है कि क्या कोई एक बात भी ठीक से पहुंची? या फिर इतनी मेहनत से गढ़ा गया वाक्य आधा अधूरा इशारा था? हमारी पूरी सभ्यता ने भाषा के सहारे एक भरीपूरी वर्ग पहेली के कुछ खाली स्थानों को भरा है. फिर हमें दंभ है कि हमने बोलना सीखा, लिखना सीखा.. उन्हीं बालसुलभ कोशिशों का व्याकरण बनाकर मेड़ें तैयार कर लीं। इंसान के भीतर छिपी असंख्य संभावनाओं में एक भाषा का पैदा होना था.. वो हुआ मगर सिर्फ वही था मन नहीं मानता। संवादों के और पुल ज़रूर होंगे। इन पुलों को खोजना पड़ेगा या फिर शुरू से बनाना। विकास क्रम की समझ कहती है कि भाषा से बेहतर कुछ हमारी प्रतीक्षा में है। उसकी खोज के बाद संभवतः मनुष्यता नहीं, बल्कि वनस्पति और पशु पक्षी संवाद कर सकें। अभी तो अपने अपने टापू पर बैठकर हम आपस में झगड़ रहे हैं और एक दूसरे से भी।
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
जीत के दावे और दोस्तो से मदद का आग्रह करते ट्रंप बुरी तरह चिढ़े हुए हैं और अब धमकाने पर उतर आए हैं। शुरूआती कुछ घंटों में बढ़त बनाने के बाद ट्रंप को समझ आ चुका है कि ईरान वाकई वेनेज़ुएला नहीं था। खामेनेई की मौत ईरान का पतन साबित नहीं हुई। उलटा इसने ट्रंप के सामने मुसीबतों का पिटारा खोल दिया। पिछली हरेक जंग की तरह ईरान का ये युद्ध भी अमेरिका के लिए दलदल साबित होता दिख रहा है। ट्रंप नाटो सहयोगियों से पूछ रहे हैं कि क्यों हॉर्मूज़ में हमारी मदद के लिए नहीं आ रहे, जबकि तेल तुमको भी चाहिए!! चेता रहे हैं कि मदद के लिए नहीं आए तो नाटो का भविष्य काफी बुरा होगा। उन्होंने कहा कि यूक्रेन में अमेरिका ने मदद की है तो अब यूरोपियन देशों को उनकी मदद करनी चाहिए। उनकी दलीलों पर कुछ लोग हंस रहे हैं। ट्रंप की सैन्य मदद की गुहार पर जापान मुकर चुका, ऑस्ट्रेलिया ने कन्नी काट ली और ब्रिटेन - फ्रांस भी अपनी नेवी भेजने से मना कर रहे हैं। यहां तक कि यूएस की नेवी खुद हॉर्मूज़ के आसपास जाने से बच रही है। ट्रंप चीन को भी बोल रहे हैं अगर उस ने मदद ना की तो वो चीनी दौरे पर नहीं जाएंगे। इस बीच चीन ने खेल कर दिया। द टेलीग्राफ के मुताबिक ईरान उन जहाज़ों को हॉर्मूज़ से गुज़रने देगा जो चीनी युआन में व्यापार करने को तैयार हैं। साफ है कि पेट्रो डॉलर को अड़ंगी देने की कोशिश हो रही है जिसकी कल्पना भर से अमेरिका सहम जाता है। अब ट्रंप अरब देशों से भी युद्ध में कूदने की अपेक्षा कर रहे हैं। एयर फोर्स वन में इंटरव्यू दे रहे ट्रंप कह रहे हैं कि जिनके लिए हम लड़ रहे हैं वो देश अपनी सरहदों के लिए लड़ें, यानि सऊदी अरब और यूएई जैसे देश। साफ है कि वो शेखों से उम्मीद कर रहे हैं कि ज़मीन पर वो ऑपरेशन शुरू करें जबकि ईरान के दिए ताज़ा ज़ख्मों को सहलाते शेख जंग से दूरी बनाना चाहते हैं। हालात ये हैं कि एक तिहाई यूएस नेवी हॉर्मूज़ नहीं खुलवा पा रही।अलबत्ता भारत का जहाज़ शिवालिक एलपीजी लेकर मुंद्रा पर लंगर डाल चुका।
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Kuldeep Mishra / sardar
Kuldeep Mishra / sardar@kuldeepmishra·
Our very own Tau receiving the 42nd Haldi Ghati Award 🫡
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
कल जंग किधर जाए मालूम नहीं, लेकिन अभी तो ईरान ने स्ट्रेट ऑफ हार्मूज़ में दुनिया को गले से पकड़ रखा है।
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
शाश्वत प्रश्नोत्तरीः ट्रैफिक पुलिस- हेलमेट कहां है? यान पे सवार- बस यहीं जा रहे थे!
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
लेकिन बहुत मुमकिन है कि आदर्श भाई सोशल मीडिया पर कमेंट में लड़ते हुए बहुत लोगों को गद्दार लिख देते हों।
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
एक दूसरे को चिढ़ाकर ना आप समझा सकते ना चैन से रह सकते। हिसाब लंबे चलते हैं और वक्त बदलता रहता है। आपकी समझदारी आनेवाली पीढ़ी को सुख चैन भी दे सकती है और विध्वंसक उन्माद भी।
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