Nitin Thakur

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@thenitinnotes

Associate Editor @aajtakradio, Podcast: Padhaku Nitin & Sandarbh, Ex @CNBC_awaaz, @TV9Bharatvarsh, @News24tvchannel •Lawyer • Writer of #इतिइतिहास, #नफरतीचिंटू

Noida, India Katılım Nisan 2013
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
बांग्लादेश और भारत के बीच रिश्तों में गिरावट अभी थमी नहीं है। पिछले एक दशक (2014 से 2024) तक बांग्लादेश अपने सिविल सर्विस अधिकारियों को ट्रेनिंग के लिए भारत के मसूरी भेजता था। इस दौरान करीब 2,500 बांग्लादेशी अधिकारियों ने भारत में प्रशासनिक गुर सीखे लेकिन 2024 में बांग्लादेश में हुए तख्तापलट के बाद दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट आ गई, जिससे यह ट्रेनिंग प्रोग्राम रुक गया। अब बांग्लादेश ने भारत पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए पाकिस्तान का हाथ थाम लिया है। 'पाकिस्तान-बांग्लादेश नॉलेज कॉरिडोर' के तहत मई 2026 में इतिहास में पहली बार बांग्लादेशी अधिकारियों का एक उच्चस्तरीय दल पाकिस्तान के लाहौर स्थित सिविल सर्विसेज एकेडमी में ट्रेनिंग ले रहा है, और इस पूरी ट्रेनिंग का खर्च भी पाकिस्तान सरकार उठा रही है। सिर्फ ब्यूरोक्रेसी ही नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते भी बदल रहे हैं। अब पाकिस्तान से बांग्लादेश के लिए सीधी उड़ानें और कराची से चटगांव बंदरगाह तक सीधे समुद्री जहाज भी चलने लगे हैं। सरल शब्दों में कहें तो बांग्लादेश अब अपनी विदेश नीति को बदलने और पाकिस्तान के करीब जाने की कोशिश कर रहा है, जो भारत के लिए एक बड़ा कूटनीतिक बदलाव है। मेरी समझ कहती है इसके पीछे बहुत चीज़ें हैं लेकिन अमेरिका असल सूत्रधार है। वक्त का कमाल, जिन पाकिस्तानियों के जुल्म से तंग आकर बंगालियों ने अलग मुल्क बनाया और जिन अमेरिकियों ने भारत को बीच में पड़ने से रोकने के लिए जंगी बेड़ा भेजा आज वो बांग्लादेशियों के मार्गदर्शक बने हुए हैं।
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
Take Right from here.
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Nitin Thakur@thenitinnotes·
भाषा ने अकेले होने के दर्द को ज़ाहिर करने के लिए शब्द रचा “अकेलापन”, अकेले होने को प्रतिष्ठा देने के लिए शब्द दिया “एकांत”. - Paul Tillich
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
राघव चड्ढा बीजेपी में चले गए हैं। जिस तरह के मुद्दे वो पिछले दिनों उठा रहे थे लेकिन सरकार पर हमलावर ना दिखते हुए.. उससे साफ है कि स्क्रिप्ट काफी पहले लिखी जा चुकी थी। राघव को अपना करियर उसी तरह बनाने का पूरा हक है जैसे केजरीवाल ने अन्ना से छिटक कर बनाया। राजनीति में किसी का अहसान आप पर सिर्फ तब तक है जब तक आप मानते रहें।
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
बालेन शाह हीरो थे। अब आपको उनके विरुद्ध ख़बरें सुनने को मिल सकती हैं क्योंकि उन्होंने भी तेवर दिखाने शुरू कर दिए। नेपाल का भारत विरोधी व्यवहार एक पैटर्न है। पॉलिसी है। ये एक दो फैसलों की बात नहीं। ज़्यादा पहले की घटनाओं का क्या कहें अभी साल दो साल में ऐसा बहुत कुछ घटा जिसे देख नई दिल्ली को अपनी नेपाल नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए था। जैसे- 1. नेपाल सरकार ने 2025 के अंत में सौ रुपए के नए नोट जारी करने का फैसला लिया, जिस पर नेपाल का वो नया नक्शा छपा है जिसमें लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया है। सब जानते हैं कि भारत इन क्षेत्रों को अपना अभिन्न अंग मानता है। 2. इसी हफ्ते बालेन शाह सरकार ने भारत से आने वाले सामान पर सख्ती बढ़ा दी है। अब भारत से सौ रुपए से अधिक मूल्य का सामान लाने पर सीमा शुल्क (Customs Duty) अनिवार्य कर दिया गया है। मधेस और तराई क्षेत्र इससे तनाव में हैं। स्थानीय लोग इसे भारत के साथ पारंपरिक रोटी-बेटी के संबंधों और सहज व्यापार पर हमला मान रहे हैं। हाल के दिनों में कई बॉर्डर पॉइंट्स पर झड़पें भी देखी गई हैं। 3. नेपाल की नई युवा पीढ़ी के नेतृत्व वाली पार्टियों और वामपंथी दलों ने 1950 की शांति और मित्रता संधि को 'असमान' बताते हुए इसे रद्द करने या पूरी तरह बदलने की मांग तेज़ कर दी है। इस संधि को दोनों देशों के बीच संबंधों की आधारशिला माना जाता है। यह संधि 31 जुलाई 1950 को काठमांडू में नेपाल के अंतिम राणा प्रधानमंत्री मोहन शमशेर जंग बहादुर राणा और नेपाल में भारत के तत्कालीन राजदूत चन्देश्वर नारायण सिंह के बीच हस्ताक्षरित हुई थी। 4. नेपाल सरकार ने हालिया बयानों में मांग की है कि भारत को नेपाल से नीचे की ओर बहने वाले "रेगुलेटेड वाटर" (सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण के लिए) का भुगतान करना चाहिए। यह जल संधियों के पारंपरिक ढांचे से हटकर एक नई और सख्त लाइन है। 5. अग्निवीर योजना पर भी नेपालियों का अड़ियल रुख बरकरार है। मुझे नहीं पता कि इसका कोई समाधान निकला है क्या? निकला हो तो आप बताइए लेकिन ये ऐसा मुद्दा था जिस पर नेपाली युवा भारत सरकार की नीति से सहमत नहीं थे। हमने पढ़ाकू नितिन “वर्ल्ड अफेयर्स” में नेपाल पर कई बार बात की हैं। हर बार एक्सपर्ट्स ने यही कहा कि नेपाल को लेकर हमने जिस आश्वस्ति और फॉर ग्रान्टेडनेस का परिचय अब तक दिया वो छोड़ना पड़ेगा। उम्मीद है सरकार को भी यही राय मिलती हो।
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
सुकरात इसलिए सबसे विद्वान था क्योंकि वो जानता था कि वो नहीं जानता, और ये बात उसने तब जानी जब जानने का दावा करनेवालों से मुलाकात की. इन मुलाक़ातों से सुकरात ने जाना कि जानने का दावा करनेवाले कतई नहीं जानते और जब उसने सबको बताया कि जाननेवाले अनजान हैं तो कुपित लोगों ने उसे हेमलॉक पिला दिया। आज हम उसके हत्यारों को नहीं जानते मगर सुकरात को जानते हैं। हम जानते हैं कि सुकरात विद्वान था क्योंकि वो जानता था कि वो नहीं जानता। (एथेंस की जेल जहां सुकरात कैद था)
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
एक बार आठ-दस साल का चार्ली चैप्लिन लंदन की दुपहरी में घर के बाहर खड़ा था. बस यूं ही गली की हलचल देख टाइमपास कर रहा था. तभी उसने देखा कि एक आदमी छोटे से मेमने को पकड़े हुए गली से गुज़र रहा है. गली के सिरे पर एक कसाईखाना था. अचानक ही मेमना उस आदमी की पकड़ से छूट गया और जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगा. इधर मेमना छूटा और उधर आदमी ने उसे पकड़ने को दौड़ लगाई. मेमना था कि हाथ ही ना आए.. कभी इधर फुदकता तो कभी उधर. गली-मुहल्ले के बच्चे ये नज़ारा देख पेट पकड़कर हंसने लगे. चार्ली ने भी जब छुटकू से मेमने को उस लंबे-चौड़े आदमी को हलकान करते देखा तो खूब हंसा. पांच-दस मिनट तक ये खेल चलता रहा. आखिरकार मेमना उस आदमी के हाथ लग ही गया. थकान और गुस्से से चूर उस आदमी ने मेमने को बहुत ही क्रूरता से जकड़ा और कंधों पर रखकर चल दिया. हंसी का दौर जैसे ही थमा, अचानक एक ख्याल ने चार्ली को हिलाकर रख दिया. उसे समझ आया कि अभी जो मेमना दौड़ लगा रहा था वो अपनी मौत से बचने की कोशिश कर रहा था. कुछ ही देर बाद मेमना जिबह कर दिया जाएगा. उसकी मुलायम गर्दन को किसी तलवार या बड़े चाकू से काट दिया जाएगा .उसका संघर्ष कितना दयनीय लेकिन ठीक उसी वक्त कितना हास्यपूर्ण था. नन्हा चार्ली कल्पना करने मात्र से विचलित हो उठा. वो भागकर घर में घुसा और मां की गोद में मुंह छिपाकर रोने लगा. चार्ली को इस हालत में देखकर मां घबरा गई. उसने प्यार से चार्ली के सिर पर हाथ फेरा. उसके रोने की वजह पूछी लेकिन वो बस रोता गया. अपनी आत्मकथा में चार्ली चैप्लिन ने इस घटना का ज़िक्र किया है और बताया है कि कैसे कई बार ज़िंदगी की ट्रेजेडी और कॉमेडी आपस में मिक्स होती हैं. किसी की ट्रेजडी किसी की कॉमेडी बन जाती है, जैसे कोई गिर पड़ा और आप उसे देखकर हंस पड़े। ऐसे ही कोई ट्रेजडी कुछ दिन बाद कॉमेडी हो जाती है, जैसे आप गिरे लेकिन बाद में याद करके हंसे। चार्ली चैप्लिन ने अपनी फिल्मों में भी यही किया. मैंने इस सूत्र को समझने के बाद उनकी फिल्में देखी तो उस दृष्टि और गहराई का कायल हो गया. चार्ली एक फिल्म में श्रमिक बनते हैं। वो एक फैक्ट्री में खड़े हैं जहां उनके सामने एक मेज पर चलनेवाली पट्टी है। उस पट्टी पर एक के बाद एक कुछ सामान चार्ली के पास पहुंचता है और उन्हें उस सामान का पेंच ठीक करना होता है। ऐसा करने के लिए उन्हें दो ही सेकेंड मिलते थे। चलायमान पट्टी पर अगर उन्होंने दो सेकेंड से ज़्यादा लगाया तो अगला सामान इतनी देर में उनके पास पहुंच जाता था। बेचारे चार्ली इतनी तेज़ी से काम नहीं कर पाते और फिर इसी चक्कर में वो पट्टी के साथ चलते-चलते मशीन के बड़े से मुंह में जा फंसते हैं। देखनेवालों को ये बड़ा मनोरंजक लगेगा लेकिन चार्ली चैप्लिन अपनी फिल्म के ज़रिए पूंजीपतियों का वो जानलेवा दबाव दिखा रहे थे जो श्रमिकों पर लगातार बना हुआ था। श्रमिकों को तयशुदा घंटों में ज़्यादा से ज़्यादा उत्पादन करना होता था और ऐसा उनकी जान की परवाह किए बगैर चलता रहता था। इसी तरह चार्ली चैप्लिन एक सर्कस में काम करनेवाले चरित्र को निभाते हैं। वो वहां पर शायद जोकर की नौकरी करते हैं लेकिन उन्हें जो लड़की पसंद है वो एक जानलेवा करतब करनेवाले पर फिदा है। चार्ली चैप्लिन उसे रिझा लेना चाहते हैं। एक दिन अचानक करतब करनेवाला सर्कस के शो पर नहीं पहुंचता। चार्ली को लगता है कि लड़की को प्रभावित करने का यही मौका है। वो बिना सोचे उस करतब करनेवाले की जगह जा पहुंचते हैं। दर्शकों को उनकी ये स्थिति बहुत हंसाती है मगर यदि आप अपनी ज़िंदगी पर नज़र डालें तो वहां भी ऐसा कुछ मिलेगा, पर आप उस पर हंसते नहीं बल्कि अपने बेचारगी पर दुखी होते हैं। तो ऐसा ही कुछ कमाल था उस अभिनेता का जो मुझे पसंद है। वो सिर्फ अभिनेता नहीं था बल्कि कहानी कहने की कला में निपुण संपूर्ण शो मैन था। असल ज़िंदगी में भी चार्ली चैप्लिन ने अपनी संवेदनशीलता की वजह से बहुत कुछ भुगता। एक वक्त तो ऐसा आया कि अपनी जन्मभूमि और कर्मभूमि दोनों ही छोड़कर जाना पड़ा। आज उनका जन्मदिन है। #इतिइतिहास
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
Bro, मैच बीस ओवर का हो या 11 का!! जीतेगा कौन?? Rajasthan Royals!
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
मटर कुल्चों में पड़ने वाली खटाई बहुत महत्वपूर्ण है। मेरे परिचितों में कोई मटर कुल्चे बनानेवाला नहीं है, लेकिन जो भी किसी मटर कुल्चे बनानेवाले को जानते हों कृपया उन तक मेरी बात पहुंचाएं। थोड़ा पनियल मटर ज़्यादा स्वाद लगते हैं। दिल्ली में तो स्विमिंग पूल वाले मटर कुल्चे बनते हैं क्योंकि अंकल मटरों को गोल गोल साइड लगाकर बीच में खटाई का पानी भर देते हैं। इसके अतिरिक्त मुझे ये भी कहना है कि गोलगप्पे वाले भैया अपनी दुकान तुरंत बढ़ा लिया करें जैसे ही चटनी/सोंठ खत्म हो। ऐसे पानी पतासों का कोई मतलब नहीं जिनमें पानी खट्टा मीठा ना हो। मीठा ना हो तो आदमी गोलगप्पे क्यों खाये वो जलजीरा ही पी ले, या चार हाजमोला पानी में मिलाकर पी जाए! #मनखट्टा फोटो पालकपत्ता चाट का है। ये काफी अंडर रेटेड चल रही है तो लगा दिया।
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
@pranvs बाबा रे!!! इतना याद है!!
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Pranav Sisodia@pranvs·
The very spirit of the party was crushed. I recall (maybe) @thenitinnotes had once written - AAP ko thoda BJP aur thoda Congress banane ki shubhkamnayein. How true! I saw it first hand how all the core principles of the party were compromised in the name of 'political strategy'.
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Pranav Sisodia
Pranav Sisodia@pranvs·
Rant on Raghav Chaddha: Some time after my (late adult life) ADHD diagnosis a peculiar thing about me was demystified: ADHDer intuition/gut-feeling about people is very strong and is usually right. This stems from our exceptional pattern recognition & hyper-vigilance. [🧵contd.]
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
बचपन से उसे मेहनत करने की आदत थी। ना करता तो ज़िंदा बच पाना मुश्किल था। वो अपना देश और शहर छोड़कर परदेस में इसलिए जान खपा रहा था ताकि गरीबी के अभिशाप से जान छुड़ा सके। पांच महीने की जी तोड़ मेहनत के बाद वो फिलाडेल्फिया से ऊबने लगा था। एक हफ्ते की छुट्टी पर जाने का मौका मिला तो उसने ज़िंदगी में पहली बार अमीरों की तरह बर्ताव करने की ठानी। अच्छा एक्टर था इसलिए वैसी एक्टिंग करने भी लगा। तुरत-फुरत एक शोरूम में पहुंचा और पाई-पाई बचाने की कंजूसी के उलट महंगा ड्रेसिंग गाउन और 75 डॉलर का शानदार सूटकेस खरीदा। दुकानदार ने प्रभावित होकर सूटकेस घर पर ही भिजवाने का प्रस्ताव रखा तो उसे अचानक अहसास हुआ कि वो किसी पिरामिड के शीर्ष पर खड़ा है। ज़िंदगी उसके साथ ऐसे अदब से कभी पेश नहीं आई थी। इसके बाद उसने शहर के सबसे महंगे होटल का रुख किया। डर्बी टोप पहन शान से छड़ी घुमाते हुए उसने होटल एस्टॉर में प्रवेश किया। अमीरी और शानो शौकत के साथ सहज नहीं था इसलिए जगमगाहट देख थोड़ी देर के लिए घबराहट हुई। डेस्क पर संभलकर अपना नाम दर्ज कराया और जब कमरे का एक दिन का किराया पता किया तो पैसा एडवांस में जमा करने की पेशकश की। अब तक सरायों और सस्ते होटलों में ठहरने का तजुर्बा उसका पीछा कर रहा था। गरीबी का भूत चारों तरफ नाच रहा था और वो था कि दौड़े चला जा रहा था। दमकती लॉबी से गुज़रा तो मन भर आया। कमरे में पहुंचकर बाथरूम के हर आइने और नल का मुआयना करने लगा। हाथों से सब कुछ छूकर देखता रहा। वो अपना हर पैसा वसूल लेना चाहता था। अपने पैसों पर ऐश करने का उसका पहला मौका था। नहा धोकर कुछ पढ़ने की इच्छा हुई लेकिन फोन करके अखबार तक मंगाने का आत्मविश्वास खुद में पैदा नहीं कर सका। कुछ रुक कर कपड़े पहने और बाहर निकल आया। वो किसी सम्मोहन में बंधा डिनर हॉल तक पहुंच गया। वेटर ने एक टेबल तक उसे गार्ड किया और पल भर बाद वो फिर से अदब की दुनिया के पिरामिड पर बैठा था। वेटरों की फौज उसे ठंडा पानी, मेन्यू, मक्खन और ब्रेड पेश कर रही थी। वो बेचारा संभल कर अपनी सबसे उम्दा अंग्रेज़ी बोल रहा था। खा-पी कर उसने एक डॉलर की बड़ी टिप दी। वो कमरे में लौट फिर बाहर निकल आया। उसके भीतर कुछ तो था जो बाहर आने को खदबदा रहा था। समझ वो भी नहीं पा रहा था कि ये ज्वालामुखी आखिर किस वजह से फटना चाहता है। चलते-चलते मेट्रोपॉलिटन ओपेरा पहुंच उसने ना जाने क्यों जर्मन ग्रैण्ड ओपेरा का टिकट खरीदा। उसे ये कभी पसंद नहीं था। जर्मन भाषा में ओपेरा चलता रहा और वो ऐसे ही बैठा रहा। जैसे ही रानी के मरने का दृश्य आया अचानक फूट-फूट कर रोने लगा। आसपास कौन है और क्या सोच रहा है उसे कुछ खबर नहीं थी। वो बस रोये चला जा रहा था। वो तब तक रोया जब तक बदन की ताकत बाहर नहीं निकल गई। आखिरकार निढाल होकर उसे चैन मिला. ये चार्ली चैप्लिन था जिसने बला की गरीबी के बाद पैसे और शोहरत की इंतहां देखी और अगले महीने उनका जन्मदिन है. - नितिन ठाकुर
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
अब ईरान वाली वॉर का फॉलोअप लेते ठीकठाक वक्त हो गया है। कई पॉडकास्ट भी हो गए। जितना समझ आ रहा है वो ये कि इस जंग को खत्म करने का सौभाग्य ट्रंप को नहीं मिलेगा। उसने खामेनेई को सद्दाम या गद्दाफी समझ लिया था जो अपने देशों में पर्याप्त अलोकप्रिय हो चुके थे। वहां विरोध में खड़े होनेवाले संगठन अमेरिका को मिल गए थे। ईरान की स्क्रिप्ट में ये सब गायब है। फिर ईरान की आबादी, ताकत, तंत्र सब कुछ क्रूर नेता में तब्दील हो चुके सद्दाम और अय्याशी के पर्याय के तौर पर देखे जानेवाले गद्दाफी के मुकाबले बड़े और बेहतर रहे। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज़ को अमेरिका के गले की घंटी बनाने का विकल्प भी उनके पास नहीं था जो ईरानियों के पास है। अब हालत ये है कि ट्रंप दुनिया को बातचीत का आश्वासन देकर स्थितियां सामान्य बनाने का प्रयास कर रहे हैं, ईरानी मीम बनाकर ट्रंप का मज़ाक उड़ा रहे हैं। ईरान के पड़ोसी विचार करने लगे हैं कि अमेरिका के अड्डे अपने यहां रखना सुरक्षा की जगह नुकसान का कारण बनने लगा है तो क्या अब वक्त है कि अपनी सिक्योरिटी के लिए कहीं और देखना चाहिए? नेतन्याहू की बात अलग है। उनके लिए ये इतिहास सही करने का अवसर है। अपना राजनीतिक अस्तित्व बनाए रखने का भी। उनकी किस्मत से एक अमेरिकी राष्ट्रपति मोसाद के तर्कों पर राज़ी होकर जंग को तैयार हो गया लेकिन नतीजे जैसे आए हैं उसके बाद सोच विचार इज़रायल में चल रहा है। हिज़बुल्ला और हमास बस संगठन थे मगर ईरान एक राष्ट्र है। सारे गणित उलटा सकने की क्षमता दिखानेवाला राष्ट्र। भारत सरकार की फॉरेन पॉलिसी थोड़ी भ्रम का शिकार रही। जंग के एक दिन पहले नेतन्याहू की बगल में खड़े दिखना कोई रणनीति नहीं हो सकती। ये सिर्फ गलत सलाहकारों की सलाह का नतीजा कहा जा सकता है। हालांकि अच्छा ये है कि ईरान को लेकर जो कुछ जनसमर्थन और मीडिया का भाव दिखा उसके चलते ईरानी सरकार ने समझा होगा कि भारत इस जंग के पक्ष में नहीं है। पिछले कुछ दिनों में जो तटस्थता सरकार ने दिखाई वो भी ठीक थी। हां कुछ लोग भारत सरकार से स्टैंड की मांग कर रहे हैं लेकिन मुझे नहीं लगा कि अभी किसी स्टैंड का कोई वक्त है। जितना हो सके अमेरिका से दूर दिखना चाहिए। इज़रायल से दोस्ती व्यवहारिक ज़रूरत है पर उन्होंने हमें कभी वेस्ट एशिया की लड़ाई में नहीं खींचा सो अपने को दूरी रखनी चाहिए। वैसे भी जिनके घरों में सिलेंडर और तेल की कमी का खतरा हो उनको ज़्यादा चैंपियन नहीं बनना चाहिए। हमारे पास वेनेजुएला या इराक का तेल नहीं है। बेसिकली ज़रूरत है कि पहले हम अंदर से मज़बूत बनें। बिन मज़बूती स्टैंड लेकर नुकसान उठाने का कोई फायदा नहीं। ये कोई नैतिक युद्ध भी नहीं। दूर से “लड़ो मत लड़ो मत” पहले भी किया है अब भी जारी रखें। खामेनेई की हत्या और बच्चियों की मौत पर शोक ज़ाहिर करनेवाला टाइम तो पहले ही गंवा दिया, सो अब जो है वो है। अगर तब किया होता तो हम ट्रंप को एम्बेरेस करके उस हरकत का बदला लेते जो उसने भारत पाकिस्तान वाली झड़प के दौरान सीज़फायर का क्रेडिट लेने के लिए की थी।
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
@Bluetick_dhari ब्रो झरने को झील लिख दिया था।
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Hakam Singh Returns
Hakam Singh Returns@Bluetick_dhari·
@thenitinnotes झील में पानी यदा कदा बहता है झील स्थिर होती हैं मिसाल उपमा तो उचित दीजिए
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
मुझे फारुख शेख़ का चेहरा बहुत पसंद था। उनकी कितनी ही फिल्में एक के बाद एक देखीं। संयोग ही था कि जिन गानों में दिखे सभी मेरे दिल को छूने वाले रहे। फारुख कोई शहंशाह या बादशाह नहीं थे इसलिए उनकी कोई खास अदा भी नहीं थी। एक्टिंग ऐसे करते मानो झील में पानी बह रहा हो। फारुख ने अदाकारी का कोई माध्यम नहीं छोड़ा, सभी में हाथ आज़माए। ज़मींदार खानदान के थे और पिता मुंबई के नामी वकील के तौर पर मशहूर थे। पढ़ाई के ऐसे कीड़े कि शॉट खत्म होते ही किताब लेकर पढ़ने बैठ जाते। इंडस्ट्री में जितने लोगों को जानते थे उनके जन्मदिन और एनिवर्सरी याद रखना सबको हैरान करता था। फारुख को देख दीप्ति नवल और दीप्ति को देख फारुख को ज़माना याद करता है। खुद फारुख शेख ने दीप्ति के साथ अपने रिश्ते को एक दफा डिवाइन कहा था। शबाना आज़मी तो कॉलेज में उनकी जूनियर ही थीं और शुरूआती दिनों से दोनों ने मिलकर कई नाटक खेले। रेडियो पर फारुख शेख की आवाज़ खूब पहचानी जाती थी। मखमली और साफ उच्चारण वाली स्वर्गिक आवाज़। कौन बता सकता था कि फारुख ने वकालत पढ़ी थी लेकिन उसमें करियर बनाने की जगह बलराज साहनी की आखिरी फिल्म गरम हवा को अपनी पहली फिल्म बना लिया। इसके बाद आई गमन में वो टैक्सी ड्राइवर बने तो उमराव जान में नवाब। हर भूमिका में रचबस जाने का शानदार हुनर छिपा कहां था। बाज़ार और किसी से ना कहना दोनों एक दूसरे से एकदम अलग फिल्में थीं मगर फारुख ने दोनों में काम किया और क्या जम कर काम किया। उनका शो जीना इसी का नाम है ऐसा था कि कोई भी उसे स्किप नहीं कर सकता था। शंघाई फिल्म में तो मैं खुद उनको देखकर चौंका और उनका ये जादू आखिरी फिल्म क्लब 60 तक बरकरार रहा। अभी तो उन्होंने चमक बिखेरनी ही शुरू की थी कि 27 दिसंबर 2013 को दुबई में दिल का दौरा पड़ने से वो गुज़र गए। आज उनका जन्मदिन है। 1948 में उनका जन्म हुआ था। गूगल ने 2018 में डूडल बनाया था इसके लिए शुक्रिया.
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Nitin Thakur
Nitin Thakur@thenitinnotes·
ट्रंप कह रहे हैं उनकी बात ईरान से हो रही है, ईरानी कह रहे हैं हमारी कोई बात ही नहीं हुई। फिर वो है कौन जिससे ट्रंप फुनिया रहे हैं???
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