
बांग्लादेश और भारत के बीच रिश्तों में गिरावट अभी थमी नहीं है।
पिछले एक दशक (2014 से 2024) तक बांग्लादेश अपने सिविल सर्विस अधिकारियों को ट्रेनिंग के लिए भारत के मसूरी भेजता था। इस दौरान करीब 2,500 बांग्लादेशी अधिकारियों ने भारत में प्रशासनिक गुर सीखे लेकिन 2024 में बांग्लादेश में हुए तख्तापलट के बाद दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट आ गई, जिससे यह ट्रेनिंग प्रोग्राम रुक गया।
अब बांग्लादेश ने भारत पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए पाकिस्तान का हाथ थाम लिया है। 'पाकिस्तान-बांग्लादेश नॉलेज कॉरिडोर' के तहत मई 2026 में इतिहास में पहली बार बांग्लादेशी अधिकारियों का एक उच्चस्तरीय दल पाकिस्तान के लाहौर स्थित सिविल सर्विसेज एकेडमी में ट्रेनिंग ले रहा है, और इस पूरी ट्रेनिंग का खर्च भी पाकिस्तान सरकार उठा रही है।
सिर्फ ब्यूरोक्रेसी ही नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते भी बदल रहे हैं। अब पाकिस्तान से बांग्लादेश के लिए सीधी उड़ानें और कराची से चटगांव बंदरगाह तक सीधे समुद्री जहाज भी चलने लगे हैं। सरल शब्दों में कहें तो बांग्लादेश अब अपनी विदेश नीति को बदलने और पाकिस्तान के करीब जाने की कोशिश कर रहा है, जो भारत के लिए एक बड़ा कूटनीतिक बदलाव है।
मेरी समझ कहती है इसके पीछे बहुत चीज़ें हैं लेकिन अमेरिका असल सूत्रधार है। वक्त का कमाल, जिन पाकिस्तानियों के जुल्म से तंग आकर बंगालियों ने अलग मुल्क बनाया और जिन अमेरिकियों ने भारत को बीच में पड़ने से रोकने के लिए जंगी बेड़ा भेजा आज वो बांग्लादेशियों के मार्गदर्शक बने हुए हैं।
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