Ashok Mushroof

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Ashok Mushroof

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@AMushroof

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Noida, India Katılım Aralık 2018
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Ashok Mushroof
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कहानी -- खोई हुई आवाज़ें ...!! “कहानी में प्रयुक्त सभी नाम, क़िरदार और घटनाएँ लेखक की कल्पना पर आधारित हैं। यदि किसी वास्तविक व्यक्ति या घटना से समानता हो, तो उसे केवल संयोग समझा जाए।” प्रथम भाग ... शहर के पुराने हिस्से में एक बंद पड़ा रेलवे स्टेशन था। वर्षों से वहां कोई ट्रेन नहीं रुकी थी। टूटी हुई बेंचें, जंग लगी पटरियां और दीवारों पर चिपके पुराने पोस्टर — सब कुछ जैसे वक़्त के साथ वहीं थम गया था। लोग कहते थे कि रात के बाद उस स्टेशन के आसपास नहीं जाना चाहिए। क्यों? इसका ज़वाब हर किसी के पास अलग था। कोई कहता, वहां रात को किसी के रोने की आवाज़ आती है। कोई कहता, खाली प्लेटफॉर्म पर कदमों की आहट सुनाई देती है। और कुछ लोग सिर्फ़ इतना कहते — "वहां आवाज़ें रहती हैं..." कबीर इन बातों पर यक़ीन नहीं करता था। वो एक लेखक था। अधूरी कहानियां, तन्हा जगहें और रहस्यमयी किस्से उसे हमेशा अपनी तरफ खींचते थे। शायद इसी वजह से एक ठंडी शाम वो अपना कैमरा और डायरी लेकर उस पुराने स्टेशन पर पहुंच गया। आसमान धुंधला था। हवा में ठंड और जंग की मिली-जुली गंध तैर रही थी। स्टेशन बिल्कुल खाली पड़ा था। कबीर धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म पर चलता रहा। उसके कदमों की आवाज़ पूरे स्टेशन में गूंज रही थी। अचानक... उसे लगा जैसे पीछे किसी ने उसका नाम लिया। "कबीर..." वो तुरंत पलटा। मग़र वहां कोई नहीं था। सिर्फ़ टूटी हुई बेंच... और हवा... उसने ख़ुद को समझाया कि शायद वहम होगा। मग़र जैसे-जैसे शाम गहराती गई, स्टेशन का माहौल बदलने लगा। कहीं दूर से ट्रेन की हल्की सी सीटी सुनाई दी। कबीर चौंक गया। यहां तो सालों से कोई ट्रेन नहीं आई थी। उसने पटरियों की तरफ देखा। धुंध के बीच उसे एक लड़की दिखाई दी। सफेद स्वेटर... लंबे खुले बाल... और आंखों में अजीब सी उदासी... वो प्लेटफॉर्म के आख़िरी छोर पर खड़ी थी। कबीर धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा। "तुम यहां क्या कर रही हो?" उसने पूछा। लड़की ने ज़वाब नहीं दिया। बस हल्का सा मुस्कुराई। फ़िर बोली, "कुछ आवाज़ें कभी खोती नहीं... बस लोग उन्हें सुनना छोड़ देते हैं।" उसकी आवाज़ बेहद धीमी थी। मग़र अजीब तरह से साफ़... कबीर कुछ कह पाता, उससे पहले स्टेशन की सारी लाइटें अचानक झपकने लगीं। हवा तेज़ हो गई। और अगले ही पल... वो लड़की गायब थी। सिर्फ़ पटरियों के पास एक पुराना टेप रिकॉर्डर पड़ा था... जिसमें धीमी आवाज़ में कोई गाना चल रहा था। कबीर ने कांपते हाथों से टेप रिकॉर्डर उठाया। उसमें बहुत पुरानी रिकॉर्डिंग चल रही थी। ट्रेन की आवाज़... लोगों की हल्की बातचीत... और फ़िर अचानक एक लड़की की हंसी... वही हंसी... जो उसने अभी कुछ देर पहले सुनी थी। उस रात कबीर स्टेशन से लौट तो आया, मग़र उसके भीतर कुछ वहीं रह गया। अगले दिन उसने शहर के पुराने अख़बार खंगालने शुरू किए। घंटों तलाश करने के बाद उसे एक ख़बर मिली। "बीस साल पहले रात की आख़िरी ट्रेन का हादसा" उस हादसे में कई लोग मारे गए थे। मग़र एक नाम बार-बार खबरों में लिखा था — रिया। ख़बर के मुताबिक रिया एक गायिका थी। उस रात वो ट्रेन पकड़ने स्टेशन आई थी, मग़र हादसे में उसकी मौत हो गई। कहा जाता था कि हादसे के बाद कई लोगों ने स्टेशन पर उसकी आवाज़ सुनी थी। कबीर देर तक उस तस्वीर को देखता रहा। वो वही लड़की थी। उसी शाम वो फ़िर स्टेशन पहुंच गया। इस बार मौसम और ज़्यादा ठंडा था। धुंध इतनी घनी थी कि सामने की पटरी तक ठीक से दिखाई नहीं दे रही थी। कबीर प्लेटफॉर्म पर खड़ा रहा। कुछ मिनट बाद... फ़िर वही आवाज़ सुनाई दी। "तुम लौट आए..." कबीर ने धीरे से पीछे देखा। रिया वहीं खड़ी थी। पहले से ज़्यादा धुंधली... मग़र मुस्कुराहट वही... कबीर ने धीमे स्वर में पूछा, "तुम यहां क्यों हो?" रिया ने पटरियों की तरफ देखा। "क्योंकि कुछ अलविदा कभी पूरे नहीं होते..." हवा अचानक ठंडी हो गई। स्टेशन पर कहीं दूर पुरानी ट्रेन की सीटी गूंजी। रिया ने कबीर की तरफ देखा। उसकी आंखों में इस बार उदासी कम थी। "अग़र कभी मेरी आवाज़ फ़िर सुनो... तो डरना मत।" इतना कहकर वो धीरे-धीरे धुंध में खोने लगी। और कुछ ही सेकंड में वहां सिर्फ़ ख़ामोशी बची। मग़र इस बार वो ख़ामोशी खाली नहीं थी। उसमें एक अधूरी धुन थी... जो शायद हमेशा उस स्टेशन पर गूंजती रहने वाली थी। #अशोक_मसरूफ़ Pic credit---Pinterest
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कहानी -- उस मोड़ पर कोई था...!! “कहानी में प्रयुक्त सभी नाम, किरदार और घटनाएँ लेखक की कल्पना पर आधारित हैं। यदि किसी वास्तविक व्यक्ति या घटना से समानता हो, तो उसे केवल संयोग समझा जाए।” प्रथम भाग 1... शाम उतर रही थी। सड़क पर पीली रोशनी वाले लैम्प एक-एक करके जलने लगे थे। हवा में ठंडक थी और पेड़ों की शाखों से सूखे पत्ते टूटकर सड़क पर बिखर रहे थे। शहर की भीड़ पीछे छूट चुकी थी। उस सुनसान रास्ते पर अब सिर्फ़ कदमों की आवाज़ बची थी। आरव रोज़ उस रास्ते से नहीं गुजरता था। मग़र उस दिन जाने क्यों उसने लंबा रास्ता छोड़कर वही पुराना मोड़ चुन लिया। वही मोड़, जहां कभी एक छोटी सी चाय की दुकान हुआ करती थी और जहां शामें अक़्सर किसी अधूरी कहानी जैसी लगती थीं। वो धीरे-धीरे चलता हुआ जैसे ही उस मोड़ तक पहुंचा, उसकी नज़र सामने खड़ी एक लड़की पर जाकर ठहर गई। सफेद दुपट्टा... हल्की हवा... और आंखों में अजीब सी ख़ामोशी... वो लड़की सड़क के किनारे लगे पुराने बरगद के पास खड़ी थी। ऐसा लग रहा था जैसे किसी का इंतज़ार कर रही हो। आरव ने एक पल को कदम रोके। दिल ने कहा — शायद रास्ता पूछना हो। मग़र अगले ही पल लड़की ने उसकी तरफ़ देखा... और हल्का सा मुस्कुरा दी। वो मुस्कान अजीब थी। जानी-पहचानी भी... और अनजान भी... आरव कुछ समझ नहीं पाया। उसने आसपास देखा। सड़क बिल्कुल खाली थी। दूर तक कोई इंसान नज़र नहीं आ रहा था। "तुम रोज़ यहां से नहीं गुजरते न?" लड़की ने धीरे से पूछा। आरव चौंका। "तुम्हें कैसे पता?" लड़की मुस्कुराई। "जो लोग अक़्सर यहां आते हैं, उनके चेहरों को ये मोड़ याद रखता है..." उसकी बात सुनकर आरव के भीतर अजीब सी बेचैनी उतर गई। वो लड़की सामान्य लग रही थी, मग़र उसकी आवाज़ में जैसे कोई पुरानी उदासी छिपी थी। हवा अचानक और ठंडी हो गई। बरगद के पत्ते तेज़ी से हिलने लगे। और तभी दूर कहीं से ट्रेन की आवाज़ सुनाई दी... आरव ने पलटकर एक सेकंड के लिए सड़क की तरफ देखा। मगर जब उसने वापस नज़र घुमाई... वहां कोई नहीं था। न लड़की... न उसकी परछाई... सिर्फ़ हवा चल रही थी। और बरगद के नीचे एक पुरानी चांदी की पायल पड़ी थी... भाग 2 -- आरव के हाथ हल्के कांप रहे थे। उसने झुककर वो पायल उठा ली। पायल बर्फ जैसी ठंडी थी। उसके छूते ही जैसे कानों में किसी की धीमी हंसी गूंज गई। उस रात आरव सो नहीं पाया। बार-बार वही चेहरा आंखों के सामने आ रहा था... वही मुस्कान... वही सवाल... "तुम रोज़ यहां से नहीं गुजरते न?" अगली शाम वो फ़िर उसी मोड़ पर पहुंच गया। पता नहीं क्यों। शायद ज़वाब चाहिए था। शायद यक़ीन करना चाहता था कि कल जो हुआ वो सिर्फ़ वहम था। मोड़ आज भी उतना ही सुनसान था। बरगद के पत्ते हवा में धीमे-धीमे हिल रहे थे। सड़क के किनारे वही टूटी चाय की दुकान बंद पड़ी थी। मग़र आज वहां एक बूढ़ा आदमी बैठा था। आरव ने उसके पास जाकर पूछा, "बाबा... यहां कोई लड़की आती है क्या?" बूढ़ा कुछ पल चुप रहा। फिर उसने धीरे से पूछा, "सफेद दुपट्टा?" आरव का दिल धड़क उठा। "आप जानते हैं उसे?" बूढ़े ने गहरी सांस ली। "बहुत साल पहले... एक लड़की इसी मोड़ पर किसी का इंतज़ार करती थी। रोज़ शाम को। कहती थी वो लौटकर आएगा। मगर एक रात सड़क हादसे में उसकी मौत हो गई..." हवा अचानक थम गई। आरव के हाथ से पायल लगभग छूट गई। "लोग कहते हैं..." बूढ़ा धीमे स्वर में बोला, "जिसे उस मोड़ पर वो दिखाई दे जाए... उसकी ज़िंदगी बदल जाती है।" आरव कुछ बोल नहीं पाया। तभी पीछे से वही आवाज़ आई... "तुम फ़िर आ गए?" आरव ने कांपते हुए पीछे देखा। वो फिर वहीं खड़ी थी... सफेद दुपट्टा... हल्की मुस्कान... और आंखों में वही इंतज़ार... मगर इस बार उसकी आंखों में नमी थी। उसने धीरे से कहा, "इस बार... देर मत करना..." और अगले ही पल तेज़ हवा चली। सड़क पर सूखे पत्ते उड़ने लगे। जब हवा थमी... वहां फिर कोई नहीं था। सिर्फ़ बरगद के नीचे एक हल्की सी ख़ुशबू रह गई थी... और आरव की धड़कनें, जो अब पहले जैसी नहीं थीं। #अशोक_मसरूफ़ PIC credit---Pinterest
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रदीफ़ — “रखते हैं” हम अपने दर्द को अक़्सर छुपा के रखते हैं, लबों पे हँसी,दिल में धुआँ-सा इक रखते हैं। जो लोग वक़्त की आँधियों में खड़े रहते हैं, वो ही हैं जो आँख में थोड़ा सा सब्र रखते हैं। एक के साथ तमाम उम्र निभाना इबादत है, ये बात दुनिया में कितने लोग याद रखते हैं। जिनके आस पास बहुत शोर है ज़माने का, तन्हाइयों में वही लोग ख़ुद से डरा करते हैं। मैंने ख़्वाब की खाक़ तक ज़ाया नहीं की है, हम भी अपने हाथ में अपना हुनर रखते हैं। किसी की जीत पे ख़ुश होना सीख लो यारो, यही लोग दिल में सबसे बड़ा असर रखते हैं। ये और बात कभी कभी रिश्ते थके लगते हैं, मग़र सच में यही लोग हैं जो वफ़ा रखते हैं। जो अपने दुख को दुनिया पे बोझ ना समझें, बशर वही तो जीने का सच्चा हुनर रखते हैं। बशर -- इंसान #अशोक_मसरूफ़ PIC credit---Pinterest
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Night vibe -- Good night my lovely X family hv sweet dreams whole night 🪴 रात की ख़ामोशी में कुछ आवाज़ें अब भी जागती हैं, एक तेरी याद और एक मेरी तन्हाई... चाँद खिड़की पे ठहरा है जैसे किसी का इंतज़ार हो, और हवा धीरे-धीरे पुरानी बातें दोहरा रही है। कुछ एहसास रात के साथ और गहरे हो जाते हैं, दिन में जो दिल छुपा लेता है वो रात खुलकर कह देती है... अब बस चाय ठंडी हो रही है, और आँखों में तेरा नाम गर्म है। 🛟🛟🛟🛟🛟 #अशोक_मसरूफ़ PIC credit---Pinterest
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"आज की आखिरी पोस्ट" कुछ लोग ज़िंदगी में देर से आते हैं, मगर फ़िर दिल के सबसे क़रीब हो जाते हैं... उनकी बातें रात की तन्हाई में भी साथ चलती हैं, और उनकी याद धीरे-धीरे आदत बन जाती है। फ़िर एक वक़्त ऐसा भी आता है जब इंसान भीड़ में रहकर भी सिर्फ़ उसी को ढूँढता है... अजीब है ना मोहब्बत भी, जिसे छुपाओ वही आँखों में सबसे ज़्यादा दिखती है। #अशोक_मसरूफ़ PIC credit---Pinterest
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हमने हर दर्द को सीने में छुपा रक्खा है, लोग चेहरे से मग़र हाल पढ़ा करते हैं। #अशोक_मसरूफ़ PIC credit---Pinterest
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रूबाई - तेरे होने .से मेरी ..साँस में .ख़ुशबू .सी रहे, मेरी ..आँखों ..में .हमेशा तेरी जादू .सी रहे। तू .. अग़र ..साथ रहे उम्र के आख़िर तक यूँ, मेरी दुनिया में सदा प्यार की बारिश सी रहे। #अशोक_मसरूफ़ PIC credit---Pinterest
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एक तरफ़ा इश्क़ ✨ तुम्हें देखकर दिल हर बार यही सोचता था कि शायद आज तुम मुझे समझ लोगे। मग़र तुम हर बार बस मुस्कुराकर गुजर गए, और मैं हर बार थोड़ा और टूट गया। किसी को चाहना आसान होता होगा, मग़र उसे बिना बताए चाहना… बहुत दर्द देता है। अब तो तुम्हारा नाम भी धीरे से लेता हूँ, कहीं दिल फ़िर से उम्मीद करना ना शुरू कर दे। #अशोक_मसरूफ़ PIC credit---Pinterest
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Middle Class Diary 📖 Middle class बच्चों की सबसे बड़ी acting तब निकलती है जब रिश्तेदार घर आते हैं। मम्मी पहले ही warning दे देती हैं.. “सीधे बैठना…” “ज़्यादा फोन मत चलाना…” “तमीज़ में रहना…” और हम भी ऐसे behave करते हैं जैसे संस्कारों की factory से निकले हों। 😄 लेकिन जैसे ही रिश्तेदार पूछते हैं... “बेटा आगे क्या सोचा है?” उसी पल आत्मा शरीर छोड़ने लगती है। 😂 #read
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दर्द वाला रोमांस ✨ तुम्हारे साथ मैंने मोहब्बत को बहुत क़रीब से महसूस किया था। तुम्हारी बातों में सुकून था, तुम्हारी आँखों में अपनापन… और तुम्हारे साथ एक छोटा सा संसार बस गया था। मग़र फ़िर एक दिन तुम चले गए, और पीछे छोड़ गए बहुत सारी यादें, कुछ अधूरे वादे और एक ऐसा दर्द जो अब मेरा हिस्सा बन चुका है। 🌧️ #अशोक_मसरूफ़ PIC credit---Pinterest
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“तू मेरा सवेरा” तेरे आने से दिल में रौशनी सी रहती है, मेरी हर उदासी अब तुझसे दूर रहती है। तेरे लफ़्ज़ों की बारिश रूह तक उतरती है, मेरे ख़ुश्क जज़्बातों को फ़िर से हरा करती है। तू अग़र साथ चलती है तो सफ़र आसान लगे, तेरी बाँहों का साया मुझे पूरा जहान लगे। #अशोक_मसरूफ़ PIC credit---Pinterest
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“चलो फ़िर से अज़नबी बन जाएँ” तेरे साथ वाली हर शाम भूल जाएँ, इस दिल के सारे इल्ज़ाम भूल जाएँ। ना तेरी राह देखें ना तेरा इंतज़ार करें, अब ख़ुद से ही थोड़ा प्यार करें। जो तस्वीरें दिल में थीं उन्हें धुँधला होने दें, इन बेचैन साँसों को थोड़ा सोने दें। अग़र कभी सामने हम आ भी जाएँ, तो अजनबियों जैसे नज़रें चुरा जाएँ। चलो फ़िर से अज़नबी बन जाएँ, तुम मुझे ना सोचो हम तुम्हें ना चाहें। #अशोक_मसरूफ़ PIC credit---Pinterest
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“मुझे भूल जाओ, जहाँ हो तुम खुश रहो” अब मेरी बातों का ज़िक्र ना किया करो, मेरी तस्वीरों को भी कम देखा करो। जो साथ गुज़ारा था उसे सपना समझ लेना, मेरे नाम को दिल से धीरे से मिटा देना। मैं अपनी रातों में तन्हा चला करूँगा, तेरी यादों के सहारे दिन काटा करूँगा। तू जहाँ भी रहे रौशनी में रहे, तेरा हर एक लम्हा ख़ुशी में गुजरे। #अशोक_मसरूफ़ PIC credit---Pinterest
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“हम तुम और वो” हमने तेरी ख़ामोशी को मोहब्बत समझ लिया, तुमने बस वक़्त काटा था। तू हमारे साथ था, मग़र तेरी आँखों में कोई और रहता था। वो तेरे क़रीब आया, और हम तेरे दिल से दूर होते गए। हमने तुझे चाहा था पूरी शिद्दत से, तुमने हमें आदत से ज़्यादा नहीं समझा। अब किस्सा इतना सा है, तुम उसके हो गए, और हम फ़िर से तन्हा। #अशोक_मसरूफ़ PIC credit---Pinterest
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पति पत्नी रिश्ते -- समझ.. हर बात कहना ज़रूरी नहीं समझना भी आता हो जो बिना बोले समझ जाए वही सच्चा हमसफ़र होता है बाकी सब बस साथ होते हैं। #अशोक_मसरूफ़ Pic credit---Pinterest
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तेरी बातों में मुझे ठहराव मिला करता था, तुम वो लम्हा भी बेचैन बना कर चले गए। हमने समझा था तुझे आख़िरी सच अपना, तुम हर सच को ही झूठा बता के चले गए। अब बस तन्हाई है,पल पल मुझे काटती है, तुम इस दिल को वीरान बना कर चले गए। तेरे जाने से कोई शोर नहीं उठता अब कहीं, तुम ख़ामोशी को तूफ़ान बना कर चले गए। #अशोक_मसरूफ़ PIC credit---Pinterest
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“रुकी हुई साँसों का कमरा” जैसे …बंद खिड़की के पास ठहरी धूप, जो भीतर आकर भी उजाला न कर पाए जैसे …पुरानी मेज़ पर रखा अधखुला ख़त, जो पढ़े बिना ही समझ में आ जाए जैसे …दीवार से टिककर बैठी थकान, जो उठने का इरादा टालती रहे जैसे …आईने में झुकी हुई नज़र, जो ख़ुद से मिलने से कतराए जैसे …छत के कोने में अटका साया, जो कहीं और जाने का रास्ता भूल जाए जैसे …मन के भीतर ठहरा हुआ एक पल, जो गुज़रकर भी गुज़र न पाए..!! #अशोक_मसरूफ़ PIC credit---Pinterest
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तेरी ख़ामोशी में-- जो कहानियाँ छुपी हैं, वो किसी अधूरी नज़्म की बिना लिखी लाइनें सी लगती है, जैसे खाली कप में भी चाय की महक बाक़ी रहे, जो जा कर भी जाने का अहसास न होने दे, दिल उसी में उलझा रह जाए..! ... ये रिश्ता होता ही है बनाया नहीं जा सकता। #अशोक_मसरूफ़ PIC credit---Pinterest
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तेरी बातों में - जो सुकून की लय है, वो किसी ग़ज़ल का सबसे मीठा तरन्नुम लगती है, जैसे लंबी शाम में धीरे-धीरे चाय पीना, और हर बात दिल को हल्का करती जाए, दिल उसी लय में बहता चला जाए...!! ....ये सुकून होता ही है, कहीं सीखा नहीं जाता। #अशोक_मसरूफ़ PIC credit---Pinterest
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बारिश आई देर से, सूखा दिल तर हो न सका, भीग तो गए यूँ काग़ज़ सब, एक हरफ़ अपना हो न सका। #अशोक_मसरूफ़ PIC credit---Pinterest
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चाय और तुम... मेज़ पे रखा कप था, रुख़सार तेरे खिलते रहे, हम ख़ामोश बैठे थे, ख़्वाब नए सिलते रहे। तेरे गालों की गरमाहट हवा में उतरती रही... तेरी हर मुस्कान के साथ वादे भी जुड़ते रहे... हम लफ़्ज़ ढूंढते रह गए, बात कहीं अटक गई, पर दिल तेरा हो गया। #अशोक_मसरूफ़ PIC credit---Pinterest
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