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कहानी --
खोई हुई आवाज़ें ...!!
“कहानी में प्रयुक्त सभी नाम, क़िरदार और घटनाएँ लेखक की कल्पना पर आधारित हैं।
यदि किसी वास्तविक व्यक्ति या घटना से समानता हो, तो उसे केवल संयोग समझा जाए।”
प्रथम भाग ...
शहर के पुराने हिस्से में एक बंद पड़ा रेलवे स्टेशन था। वर्षों से वहां कोई ट्रेन नहीं रुकी थी। टूटी हुई बेंचें, जंग लगी पटरियां और दीवारों पर चिपके पुराने पोस्टर — सब कुछ जैसे वक़्त के साथ वहीं थम गया था।
लोग कहते थे कि रात के बाद उस स्टेशन के आसपास नहीं जाना चाहिए।
क्यों?
इसका ज़वाब हर किसी के पास अलग था।
कोई कहता, वहां रात को किसी के रोने की आवाज़ आती है। कोई कहता, खाली प्लेटफॉर्म पर कदमों की आहट सुनाई देती है। और कुछ लोग सिर्फ़ इतना कहते — "वहां आवाज़ें रहती हैं..."
कबीर इन बातों पर यक़ीन नहीं करता था।
वो एक लेखक था। अधूरी कहानियां, तन्हा जगहें और रहस्यमयी किस्से उसे हमेशा अपनी तरफ खींचते थे। शायद इसी वजह से एक ठंडी शाम वो अपना कैमरा और डायरी लेकर उस पुराने स्टेशन पर पहुंच गया।
आसमान धुंधला था।
हवा में ठंड और जंग की मिली-जुली गंध तैर रही थी।
स्टेशन बिल्कुल खाली पड़ा था।
कबीर धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म पर चलता रहा। उसके कदमों की आवाज़ पूरे स्टेशन में गूंज रही थी।
अचानक...
उसे लगा जैसे पीछे किसी ने उसका नाम लिया।
"कबीर..."
वो तुरंत पलटा।
मग़र वहां कोई नहीं था।
सिर्फ़ टूटी हुई बेंच... और हवा...
उसने ख़ुद को समझाया कि शायद वहम होगा।
मग़र जैसे-जैसे शाम गहराती गई, स्टेशन का माहौल बदलने लगा।
कहीं दूर से ट्रेन की हल्की सी सीटी सुनाई दी।
कबीर चौंक गया।
यहां तो सालों से कोई ट्रेन नहीं आई थी।
उसने पटरियों की तरफ देखा।
धुंध के बीच उसे एक लड़की दिखाई दी।
सफेद स्वेटर... लंबे खुले बाल... और आंखों में अजीब सी उदासी...
वो प्लेटफॉर्म के आख़िरी छोर पर खड़ी थी।
कबीर धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा।
"तुम यहां क्या कर रही हो?" उसने पूछा।
लड़की ने ज़वाब नहीं दिया।
बस हल्का सा मुस्कुराई।
फ़िर बोली, "कुछ आवाज़ें कभी खोती नहीं... बस लोग उन्हें सुनना छोड़ देते हैं।"
उसकी आवाज़ बेहद धीमी थी। मग़र अजीब तरह से साफ़...
कबीर कुछ कह पाता, उससे पहले स्टेशन की सारी लाइटें अचानक झपकने लगीं।
हवा तेज़ हो गई।
और अगले ही पल...
वो लड़की गायब थी।
सिर्फ़ पटरियों के पास एक पुराना टेप रिकॉर्डर पड़ा था... जिसमें धीमी आवाज़ में कोई गाना चल रहा था।
कबीर ने कांपते हाथों से टेप रिकॉर्डर उठाया।
उसमें बहुत पुरानी रिकॉर्डिंग चल रही थी।
ट्रेन की आवाज़... लोगों की हल्की बातचीत... और फ़िर अचानक एक लड़की की हंसी...
वही हंसी... जो उसने अभी कुछ देर पहले सुनी थी।
उस रात कबीर स्टेशन से लौट तो आया, मग़र उसके भीतर कुछ वहीं रह गया।
अगले दिन उसने शहर के पुराने अख़बार खंगालने शुरू किए।
घंटों तलाश करने के बाद उसे एक ख़बर मिली।
"बीस साल पहले रात की आख़िरी ट्रेन का हादसा"
उस हादसे में कई लोग मारे गए थे।
मग़र एक नाम बार-बार खबरों में लिखा था — रिया।
ख़बर के मुताबिक रिया एक गायिका थी। उस रात वो ट्रेन पकड़ने स्टेशन आई थी, मग़र हादसे में उसकी मौत हो गई।
कहा जाता था कि हादसे के बाद कई लोगों ने स्टेशन पर उसकी आवाज़ सुनी थी।
कबीर देर तक उस तस्वीर को देखता रहा।
वो वही लड़की थी।
उसी शाम वो फ़िर स्टेशन पहुंच गया।
इस बार मौसम और ज़्यादा ठंडा था।
धुंध इतनी घनी थी कि सामने की पटरी तक ठीक से दिखाई नहीं दे रही थी।
कबीर प्लेटफॉर्म पर खड़ा रहा।
कुछ मिनट बाद...
फ़िर वही आवाज़ सुनाई दी।
"तुम लौट आए..."
कबीर ने धीरे से पीछे देखा।
रिया वहीं खड़ी थी।
पहले से ज़्यादा धुंधली... मग़र मुस्कुराहट वही...
कबीर ने धीमे स्वर में पूछा, "तुम यहां क्यों हो?"
रिया ने पटरियों की तरफ देखा।
"क्योंकि कुछ अलविदा कभी पूरे नहीं होते..."
हवा अचानक ठंडी हो गई।
स्टेशन पर कहीं दूर पुरानी ट्रेन की सीटी गूंजी।
रिया ने कबीर की तरफ देखा। उसकी आंखों में इस बार उदासी कम थी।
"अग़र कभी मेरी आवाज़ फ़िर सुनो... तो डरना मत।"
इतना कहकर वो धीरे-धीरे धुंध में खोने लगी।
और कुछ ही सेकंड में वहां सिर्फ़ ख़ामोशी बची।
मग़र इस बार वो ख़ामोशी खाली नहीं थी।
उसमें एक अधूरी धुन थी... जो शायद हमेशा उस स्टेशन पर गूंजती रहने वाली थी।
#अशोक_मसरूफ़
Pic credit---Pinterest

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