
ASHOK_LALSOT
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ASHOK_LALSOT
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जयभीम 💙 जौहार 🏹👨🌾 ✍Raising Voice of_ Tribals, Dalits, exploited, oppressed women and Unemployed youth Equality, Humanity & Justice ⚖️






कमेंट मे #HBDHanumanBeniwal हैशटैग लिखने वाले प्रत्येक साथी को फ़ॉलो करूँगा ❤️🙏 @hanumanbeniwal



आज छात्रों की सबसे बड़ी समस्या भर्ती प्रक्रियाओं में हो रहे घोटाले हैं। इनके विरोध में 27 जनवरी को नागौर में आयोजित विरोध प्रदर्शन में सभी युवाओं से एकजुट होकर मज़बूती से आवाज़ बुलंद करने की मेरी अपील है।




27 जनवरी - विद्यार्थी आक्रोश ज्ञापन नागौर के इस युवा हित कार्यक्रम में सभी युवाओं को अधिक से अधिक संख्या में शामिल होने का निवेदन करता हूँ ।। जिला कलेक्टर कार्यालय पर धरना-प्रदर्शन किया जाएगा ।। समय - 11:00 बजे बहुत बहुत धन्यवाद और आभार ।। 🤝🤝🤝🫡🫡🫡🫡👍👍👍👍👍👍



राजस्थान NSUI के प्रदेशाध्यक्ष श्री @VinodJakharIN जी के नेतृत्व में हनुमानगढ़ एवं श्रीगंगानगर NSUI द्वारा आयोजित 'युवाओं का युद्ध-ड्रग्स के विरुद्ध' कार्यक्रम के अन्तर्गत पदयात्रा एवं विशाल मशाल जुलूस में शामिल रहूंगा। आप समस्तजन युवा पीढ़ी को ड्रग्स नशे से बचाने की इस मुहीम में अधिक से अधिक संख्या में हिस्सा लें। @RahulGandhi @SachinPilot @RohitJawa12


NSUI में ये क्या हो रहा है? कांग्रेस की आज देश में जो हालत हो रही है, वह यों ही नहीं है। वह लंबी भूलाें का नतीजा है। उसमें बीजेपी को दोष देना ग़लत है। जो बीजेपी कर रही है, वह इतिहास में नया नहीं है। कांग्रेस के पुराने और ज़हीन-शहीन नेता इस बात को बेहतर जानते हैं कि युवा-विरोधाभास, भविष्य की खोज और भविष्य को ही रोक देने की कोशिशें आत्मघाती हुआ करती हैं। लेकिन अगर कोई फिर भी इस पर चले तो उन्हें कौन बचाए? कोई भी राजनीतिक दल अपने भविष्य को पोस्टरों पर नहीं, अपनी सबसे युवा शाखा की ऊर्जा में खोजता है। युवा संगठन केवल “कैडर” नहीं होते, वे पार्टी की राजनीतिक चेतना, जमीनी भाषा और आने वाले दशक का नेतृत्व-भंडार होते हैं। इसलिए जिस पार्टी में युवा संगठन को लगातार “कंट्रोल” के नाम पर कुचला जाता है, वहाँ भविष्य का संकट एक दिन नहीं; धीरे-धीरे, रोज़ घटता है। कांग्रेस में यह संकट अक्सर एक ही शक्ल में दिखाई देता है। नीचे से ऊपर तक प्रतिभा को उभरने देने में झिझक, और उभरती प्रतिभा को रोकने में तत्परता। राजस्थान में एनएसयूआई अध्यक्ष विनोद जाखड़ को नोटिस देने का प्रकरण इसी प्रवृत्ति का सबसे साफ़ और सबसे समकालीन उदाहरण बनता जा रहा है। राजनीति में नीयत और रणनीति हमेशा बहस के विषय होते हैं; लेकिन कुछ पैटर्न इतने दोहराए जाते हैं कि वे “एक्सेप्शन” नहीं, “संस्कृति” लगने लगते हैं। जाखड़ के साथ जो हो रहा है या जो संदेश बन रहा है, वह यही है कि पार्टी के भीतर युवा नेतृत्व की स्वायत्तता को संदेह की निगाह से देखा जाता है और उसकी लोकप्रियता को ताक़त नहीं, ख़तरा माना जाता है। सक्रियता, लोकप्रियता और अंदरूनी चेतना क्या अपराध होती है? कांग्रेस में लोकप्रियता की सज़ा क्यों मिलती है इसके ही नेताओं को? यह प्रश्न कांग्रेस में हर जगह तैरता है। कांग्रेस में चालाकियों को तरजीह मिलती है और प्रतिभाएँ क्यों किनारे कर दी जाती हैं। यह प्रकरण इसी का उदाहरण है। विनोद जाखड़ ही नहीं; अनिल चौपड़ा, अभिमन्यु पूनिया से लेकर दिव्या मदेरणा, संयम लोढ़ा, सीएस बैद, रघु शर्मा, सचिन पायलट, बीना काक, पिरथीपालसिंह संधु आदि के प्रकरण इसी तरह के हैं। विनोद जाखड़ राजस्थान में असाधारण रूप से सक्रिय रहे हैं। तपती लू में लंबी यात्रा, संगठन-निर्माण की कोशिश और सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक एक दृश्य उपस्थिति; ये सभी किसी भी आधुनिक राजनीतिक संगठन में “एसेट” माने जाने चाहिए। लेकिन कांग्रेस के युवा-तंत्र में अक्सर यही “एसेट” परेशानी बन जाता है; क्योंकि ऊर्जा जितनी तेज होती है, नियंत्रण-तंत्र उतना ही घबराता है। मुझे याद नहीं पड़ता कि अशोक गहलोत के बाद एनएसयूआई में कोई इतना सक्रिय प्रदेश अध्यक्ष आया है। मेरी यह बात ग़लत हो तो आप मुझे दुरुस्त ज़रूर कीजिएगा। यहाँ असली सवाल व्यक्तियों का नहीं; मनोवृत्ति का है। क्या कांग्रेस को ऐसे युवा चाहिए, जो केवल आदेश-पालक हों या ऐसे युवा जो जनता के बीच अपनी जगह बनाते हुए पार्टी के लिए नया स्पेस पैदा कर सकें? अगर दूसरा विकल्प सही है तो फिर सक्रियता को “अनुशासनहीनता” की तरह ट्रीट करना आत्मघाती है। और अगर पहला विकल्प चुना गया है तो पार्टी को ईमानदारी से मान लेना चाहिए कि वह नेतृत्व-निर्माण नहीं, नेतृत्व-प्रबंधन कर रही है। जाखड़ को केंद्रीय इकाई की तरफ़ से नोटिस और वह भी ऐसी भाषा में जिसे “अपमानकारी” ही माना जाएगा, एक सांगठनिक कदम भर नहीं रहता। वह एक राजनीतिक संदेश बन जाता है: “ज़्यादा दिखोगे तो काट दिए जाओगे।” "लोक तुम्हें चाहेंगे तो यह भी बर्दाश्त नहीं होगा।" यह संदेश केवल जाखड़ तक सीमित नहीं रहता; वह राजस्थान के हर छात्र नेता, हर युवा कार्यकर्ता, हर उभरते चेहरे के भीतर उतरता है। और वही भीतर उतरकर अगले पाँच साल का कैडर-निर्णय करता है कि इस पार्टी में मेहनत करने का रिटर्न क्या है। यह संदेश देखें तो वहाँ तक जाता है जहाँ युवक कांग्रेस के एक युवा अध्यक्ष का चुनाव जीत जाते हैं और उसे एक लंबे समय तक घोषित ही नहीं किया जाता। यह संदेश चूरू से सिरोही और अजमेर से उदयपुर तक समान रूप से जाता है। कांग्रेस की दिक्कत यह है कि वह लोकप्रियता को “लोकप्रियता” की तरह नहीं देखती; वह उसे “सत्ता-उत्तराधिकार” की शुरुआत की तरह देखती है। और फिर जो भी लोकप्रिय होता है, उसे पहले “लाइन में” लाने का प्रयास होता है और नहीं आया तो “नोटिस” की भाषा में लाया जाता है। यह संगठन का संचालन नहीं, संगठन का डर-प्रबंधन है। जिस प्रदेश अध्यक्ष को दो साल से अधिक हो गया हो वह अपनी मर्जी से कार्यकारिणी तक नहीं बना पा रहा तो फिर “प्रदेश नेतृत्व” का अर्थ क्या बचता है? संगठन का मूल सिद्धांत है। जिम्मेदारी के साथ अधिकार। अगर अधिकार नहीं तो जिम्मेदारी भी एक दिखावा बन जाती है। और जब जिम्मेदारी दिखावा बनती है, तब परिश्रम “भक्ति” बनता है, राजनीति नहीं। यही वह बिंदु है, जहाँ पार्टी अपने ही पैरों को कुल्हाड़ी पर मारती है। जो नेता संगठन को मजबूती देने के लिए नियुक्तियाँ करता है, उसे सार्वजनिक रूप से कठघरे में खड़ा कर देना, दरअसल संगठन की रफ्तार को दंडित करना है। और जब रफ्तार को दंड मिलता है तो संगठन धीरे-धीरे “फाइल संस्कृति” में चला जाता है, जहाँ फैसले भी डरकर होते हैं और लोग भी डरकर। दिल्ली से एक ऐसे युवक को NSUI महासचिव नियुक्त कर दिया गया जिसका “किसी को अता-पता नहीं।” यहाँ भी मुद्दा व्यक्ति नहीं, प्रक्रिया है। जमीनी संगठन को साइड-लाइन करके ऊपर से “इम्पोर्टेड” चेहरे उतारना, कैडर के आत्मसम्मान को चोट पहुँचाता है। कैडर की सबसे बड़ी पूंजी होती है यह भरोसा कि मेहनत की पहचान होगी। जब पहचान “कनेक्शन” से तय होने लगे, तो मेहनत पार्टी छोड़ देती है, और पार्टी केवल पोस्टर, बयान और गुट छोड़ देती है। कांग्रेस अगर सचमुच मजबूत होना चाहती है तो उसे एक कठोर लेकिन सरल नियम अपनाना होगा: युवा नेतृत्व को स्वायत्तता—नोटिस नहीं, मार्गदर्शन; नियंत्रण नहीं, निर्माण। लोकप्रियता को संपत्ति मानना—खतरा नहीं। निर्णय की पारदर्शिता—किस आधार पर किसे नोटिस, किस आधार पर किसे पद? प्रदेश इकाइयों का सम्मान—दिल्ली का “कमांड” नहीं, समन्वय। भाषा की मर्यादा—अपमान संगठन को नहीं, भीतर के भरोसे को तोड़ता है। आज कांग्रेस “वॉकल” हो सकती है; लेकिन कड़वा सच है: अगर राजनीतिक चेतना कम है यानी जमीनी सिग्नल पकड़ने की क्षमता कमजोर है तो आवाज़ केवल शोर बन जाती है। और शोर से संगठन नहीं बनता; संगठन भरोसे, स्वतंत्रता और न्याय से बनता है। विनोद जाखड़ का मामला किसी एक युवा नेता का नहीं रह गया है। यह कांग्रेस के उस प्रश्न का परीक्षण है कि वह अपना भविष्य सच में गढ़ना चाहती है या अपने भविष्य को भी अनुशासन की फाइल में बंद करके “सुरक्षित” रखना चाहती है। सुरक्षित भविष्य अक्सर पैदा ही नहीं होता। @nsui @VinodJakharIN @AbhimanyuP00NIA @DivyaMaderna @SachinPilot @NSUIRajasthan @SanyamLodha66 @AnilChopra_




नरेंद्र जी, बहुत शीघ्र ही 4th class भर्ती परीक्षा के सभी कैंडिडेट्स के स्कोर कार्ड जारी हो जाएंगे। तब ये गुत्थी अपने आप सॉल्व हो जाएगी।

