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🌼 इंटरनेट से पहले… मेरा बचपन कुछ यूँ गुज़रा था 🌼
ना फोन था, ना चार्जर का झंझट,
ना डेटा पैक, ना Wi-Fi का चट-पट।
खुले आँगन में खुशियाँ बिखरी रहतीं,
हम हवा संग दौड़ें, गलियाँ कहतीं—
“आ जा, खेलेंगे आज भी वही खेल,”
कभी पिट्ठू, कभी कंचे, कभी धमाधम रेल।
गिल्ली-डंडा हमारा PlayStation था,
पेड़ की छाया हमारा vacation था।
कागज़ के जहाज़ हवा में उड़ते,
हम भी सपनों के पीछे भागते-घुटते।
मिट्टी की गंध में जादू सा बसता,
हर दुपहरी नया किला हम रचते।
शाम को सूरज ढलता था धीरे,
माँ की आवाज़ आती— “बस, अब घर भी ले रे!”
पर दिल न माने, दोस्त न रुकें,
कहते— “अरे, एक आख़िरी गेम और पकडें!”
फिर हँसते-भागते घर तक आते,
रात को थककर जल्दी सो जाते।
छत पर लेटकर तारे गिनते,
हर तारा कहानी सा दिखता।
ना Instagram था, ना कोई trend,
फिर भी हर पल था बस — Happy & Brand New Friend।
अब डिजिटल दुनिया तेज़ हुई बहुत,
पर दिल आज भी वहीं कहीं अटका है—
जहाँ बचपन दौड़ता खुली हवा में,
और खुशियाँ मिट्टी में मिलकर चमका है।




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