Aditya Mohan

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@AdityaJhamohan

कार्यकर्ता @Jansuraajonline पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, Mithila Student Union (MSU)

Bihar, India Katılım Eylül 2015
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Aditya Mohan
Aditya Mohan@AdityaJhamohan·
#DarbhangaAIIMS in "देश की बात सुनाता हूं" with Sonu Sood. ❤️
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Aditya Mohan
Aditya Mohan@AdityaJhamohan·
बिहार दिवस के मौके पर उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा की "मैं सभी बिहारवासियों को अब लौट आने का भी आग्रह कर रहा हूं, सब लोग अब लौटकर बिहार आइए और बिहार को समृद्ध बनाइए।" फेंकने में उस्ताद मोदीजी के ये चेले लोग बस देखादेखी में फेंकने में ही माहिर हैं। उपमुख्यमंत्री ने जो ये लौट आने का अपील किया है, जब लोग लौट आएंगे तो रोजगार क्या करेंगे ? बिहार में उद्योग लगाने, रोजगार पैदा करने का कौन सा प्रयास किया है सरकार ने ? बिहार में तो रोजगार का अभी तीन ही साधन है। या तो दारू का डिलीवरी बॉय बनिए या बालू का अवैध खनन कीजिए या चोरी, डकैती कीजिए। बिहार के लोग शिक्षा, स्वास्थ्य और 10-12 हजार के नौकरी जैसे मूलभूत चीजों के लिए हजारों किलोमीटर दूर पलायन करते हैं। आपके यहां शिक्षा व्यवस्था की हालत घटिया है, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है, अपराध चरम पर पहुंच रहा है। इतने वर्षों से आपकी सरकार है, आपने एक काम नहीं किया इन स्थितियों को बदलने की। अब आप लोगों से लौट आने के अपील का जो ढोंग कर रहे हैं, ये बेशर्मी भरा लगता है। आपके मन में यदि सच में ये भाव होता तो शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के लिए कुछ करते। जब से नई सरकार बनी है, नवंबर के बाद से देशभर में काम करने को गए 70 बिहारी मजदूरों की किसी न किसी दुर्घटना में मौत हुई है।
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Aditya Mohan
Aditya Mohan@AdityaJhamohan·
एक सत्य ये भी है की बिहार को लेकर जो नॉस्टैल्जिया और सुखद याद बाहर पलायन किए बिहारी पुरुषों में है, यह अधिकांश बिहारी महिलाओं में नहीं है। बिहारी पुरुष जो दूसरे प्रदेशों और महानगरों के थपेड़े में झुलस रहे हैं, उनके मन में शायद ये भाव होता भी है की एक दिन यदि बिहार में रोजगार और सुविधाएं आएंगी तो वापस जा पाऊं। लेकिन महिलाओं के मन में ये भाव लगभग नहीं के बराबर है। इसकी वजह है बिहारी समाज का अत्यधिक रूढ़िवादी होना, महिलाओं को घर आंगन तक समेट के रखना एवं उनपे अध्यधिक बंदिश। बिहार को याद करते हुए बिहारी पुरुषों के मन में गांवों के लोग, भोज, गाछी-मचान, नदी-तालाब, हाट, खेत-खरिहान, दालान, पर्व-त्यौहार सहित अन्य यादों को लेकर एक नॉस्टेल्जिक कसक होती है। लेकिन महिलाओं के मन में ऐसी सुखद स्मृतियां लगभग नहीं के बराबर होती है। गांव को लेकर उन्हें जो याद होता है वो है घर के अंदर रहना, कभी दालान तक पर न जाना, चूल्हा-चौकी में घुसे रहना, परंपरागत पहनावा, साड़ी, घूंघट, लोकलाज, कामकाज और बस यही। शादी के बाद वो तो कभी गांव के भोज में जा ही नहीं पाई, हाट पर कभी गई ही नहीं, गाछी-मचान-नदी-तालाब का सुख कभी ले ही नहीं पाई। इसके उलट शहर एवं अन्य प्रदेशों ने उन्हें आजादी दिया बाहर निकलने का, अपने मन से कपड़े पहनने का, लोगों से मिलने का, मार्केट घूमने का, नई चीजें देखने का। उन्हें शहरों में अच्छा लगता है। और यही वजह है की अधिकांश पुरुष भले ही पूरी जिंदगी गांव याद करते रह जाते हैं, महिलाएं शहर में ही रहना चाहती है। गांव से पढ़ने को निकली कुछ चुनिंदा लड़कियां होती है, लेकिन अक्सर वो एक बार निकल जाने के बाद कभी वापसी का नहीं सोचती। क्योंकि एक तरफ़ शहरों में आजादी है, बेहतरी है, सुविधाएं हैं, नयापन है। वहीं दूसरी तरफ़ गांव में आज भी घर-आंगन ही है, घूंघट ही है, परंपरा ही है। शादी के बाद एक भी लड़की आज गांव में नहीं रहना चाहती है और इसकी वजह यही है। जबकि इसी कारण अधिकांश पुरुष को भी न चाहते हुए भी पलायन करना ही पड़ता है। बिहार को यदि पलायन को रोकना है तो सरकार को शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, सुरक्षा जैसी चीजें ठीक करनी पड़ेंगी लेकिन साथ ही साथ हमारे समाज को भी बदलना पड़ेगा। यदि अब भी बिहारी समाज महिलाओं को इसी तरह घर में रखने, पाबंदियां लगाने एवं परंपरागत ढंग से जीने का नियम लगाके रखेगा तो सब सुविधाएं हो जाने के बावजूद नई लड़कियां यहां नहीं रहना चाहेंगी। और जब लड़कियां नहीं रहना चाहेंगी तो आपके लड़के भी नहीं रह पाएंगे।
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ThePoliTechs
ThePoliTechs@ForSuraaj·
बिहार सरकार के गठन के 125 दिनों की “ऐतिहासिक उपलब्धियाँ” 👏 सोचा था 100 दिन पूरे होने के बाद पोस्ट करूंगा, लेकिन इन 125 दिनों में ऐसा कुछ दिखा ही नहीं जो ध्यान खींच सके। खैर, पेश हैं सरकार की “उपलब्धियाँ”: 1.शम्भु गर्ल्स हॉस्टल कांड – सुरक्षा व्यवस्था की असली तस्वीर 2.पिछले 100 दिनों में 50+ बिहारी युवाओं की बाहर काम करते हुए मौत – मजबूरी और बेरोज़गारी की कहानी 3.गरीबों के घर “अतिक्रमण” के नाम पर तोड़े गए – बिना ठोस कारण और बिना पुनर्वास 4.भारी बहुमत (2/3) मिलने के बावजूद नीतीश कुमार का इस्तीफा – भारतीय राजनीति में एक और अनोखा उदाहरण 5.वंशवाद के खिलाफ बोलने वाले नीतीश कुमार ने अपने बेटे को ही JDU में एंट्री दिलाई – और जल्द ही मंत्रालय का रास्ता भी साफ 6.“समृद्धि यात्रा” पर निकले नीतीश कुमार – शायद बिहार के युवाओं और आम जनता का मज़ाक उड़ाने के लिए अगर मेरे से कुछ रह गया हो तो आप लोग इस लिस्ट में और जोड़ सकते है 🙏
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#YeThikKarkeDikhao
#YeThikKarkeDikhao@YTKDIndia·
11 years since AIIMS Darbhanga was announced (2015). >No Doctors. >No Hospital. >No Infrastructure. Just one gate. Bow freshly painted from white to brown. From “AIIMS coming soon” to “Gate upgraded successfully.” 🤡 Is this development or decoration?
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Aditya Mohan
Aditya Mohan@AdityaJhamohan·
कहीं किसी फैक्ट्री में आग लगे, दुर्घटना हो, मरता उसमें बिहारी ही है। 10-12 हजार की नौकरी के लिए घरपरिवार छोड़कर दूसरे प्रदेशों में जाते हैं, गाली-मार सहते हैं, अपमान झेलते हैं, शोषण झेलते हैं और एक दिन किसी दुर्घटना में मर जाते हैं...यही नियति है बिहार के लोगों का। कुछ देर में सरकार 2 लाख घोषित कर देगी मरने वालों के नाम पे, यही कीमत है बिहारी जान की
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Aditya Mohan
Aditya Mohan@AdityaJhamohan·
कल बिहार में बारहवीं का रिजल्ट निकला है। कल बिहार के लाखों बच्चों का दाना-पानी अपने गांव-समाज से उठ गया। जनरली भारत के अन्य राज्यों में बेटियां पराइ धन कही जाती है, उन्हें ब्याह के बाद अपना घर जो छोड़ना पड़ता है। बिहार में बेटियों के साथ साथ बेटे भी पराया धन ही होते हैं, 18 वर्ष होते होते बारहवीं के बाद अधिकांशतया बेटों को भी बिहार त्यागना ही पड़ता है। जिसको इंजीनियरिंग, साइंस आदि पढ़ना होता है वो जाते हैं बैंगलोर, जयपुर, भोपाल, नोयडा, पंजाब, भुवनेश्वर। जिन्हें पढ़ना होता है कॉमर्स वो जाते हैं लक्ष्मीनगर, कोलकाता, मुंबई। जो कुछ बच जाते हैं वो बिहार के किसी विश्वविद्यालय में नाम लिखवा कर निकल जाते हैं दिल्ली के मुखर्जीनगर सहित अन्य इलाकों में। वहां पहले तैयारी करते हैं UPSC, BPSC, SSC का और फिर बाद में आरएस अग्रवाल-प्रतियोगिता दर्पण घाँस के बैंक-रेलवे क्लर्क बनने की कोशिश में जवानी बहा देने को मजबूर हो जाते हैं। जो कुछ गिनती के सफ़ल होते हैं, कोचिंग छपाती है उनका इंटरव्यू और लगाती है पोस्टर अपने प्रचार के लिए। लेकिन अधिकतम जो रह जाते हैं असफल उन्हें दिल्ली में ही या किसी अन्य शहर जाना पड़ता है मजदूरी या किसी बेकार नौकरी के लिए। बारहवीं के बाद जो युवा बिहार छोड़ते हैं, कोई नहीं लौट पाता, कोई नहीं आ पाता वापस बिहार। पहले दोस्त छूटते हैं, फिर संबंध, रिश्तेदारों से अनावश्यक दूरी हो ही जाती है, छूट जाता है अपना पर्व-त्यौहार और छूट जाता है धीरे धीरे गांव की शादी और मरनी-हरनी भी। शुरू में आते हैं आम के मौसम में या छठ-दुर्गापूजा पे। लेकिन फिर नौकरी के कुछ सालों के बाद जब नांगलोई, संगम विहार, बदरपुर, कांदीवली, विरार आदि में कुछ गज़ जमीन खरीद के माचिस सा घर बना लेते हैं तो फिर त्योहारों में भी आना छूट जाता है बिहार। अपनी संस्कृति छूट जाती है, छूट जाती है परंपराएं। अपने घर में भी मैथिली, भोजपुरी, मगही के जगह भाषा हिंदी ही हो जाती है। बच्चे बोलने लगते हैं "मेरे को, तेरे को..." वाली भाषा और बिहार को देखने लगते हैं बैकवर्ड की नजर से। धीरे धीरे लोग छुपाने लगते हैं अपनी पहचान और बताने लगते हैं खुद को दिल्ली का, मुंबई का। मां-बाप जो छूट गए थे गांव में, बुढ़ापे में जब उनसे अब काम नहीं हो पाता तो या तो वो छूट जाते हैं राम भरोसे या मन मार के आ जाते हैं वो भी अपना गांव छोड़के बुढ़ापे में बेटे-पुतोहू के पास। अब तो होने लगा है बुजुर्गों का श्राद्ध और कर्म भी दिल्ली, मुंबई में ही, क्योंकि गांव से अधिक दियाद तो दिल्ली, मुंबई में ही हैं। कल बारहवीं के परीक्षा पास किए सभी छात्रों को बधाई, शुभकामनाएं। साथ ही गुड बाय, हैप्पी जर्नी। अपना प्रदेश छूटेगा तुम्हारा अभी, शुरू में थोड़ा दर्द होगा, बुरा फील होगा, याद आएगा गांव बार-बार, कुछ दिन तड़पोगे लौट आने को, भगवान से मनाओगे, लेकिन फिर धीरे-धीरे तुम्हारी भावनाएं मरने लगेंगी, धीरे-धीरे शायद फर्क पड़ना बंद हो जाएगा। तुम भी रम जाओगे दुनिया के थपेड़े में...ईश्वर तुम्हें सुखी रखें, कहीं भी रहो, सफल करें... कत्तऊ रहे नंदकेर बालक, गोपीन्हनाथ कहैहौं
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Bihar_se_hai
Bihar_se_hai@Bihar_se_hai·
Darbhanga AIIMS Update : Gate colour changed 🤡 in 11 years.
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Aditya Mohan
Aditya Mohan@AdityaJhamohan·
बिहार वाज वंश द इंडस्ट्रियल हर्ट ऑफ इंडिया। JRD टाटा साहब को जब भारत का पहला इंडस्ट्रियल शहर स्थापित करना था, तब उन्होंने तत्कालीन बिहार के जमशेदपुर को चुना था। डालमिया ने डालमियानगर बिहार में ही बसाया था। फ़िल्म डिवीजन द्वारा तैयार यह वीडियो देखिए और अपना स्वर्णयुग याद कीजिए। ऐसा भी नहीं की था की केवल झारखंड क्षेत्र के खनिज बहुलता के कारण बिहार इंडस्ट्रियल हब था, बिल्कुल उसकी भी भूमिका थी लेकिन उस दौर में झारखंड क्षेत्र के अलावे शेष बिहार भी उतना ही इंडस्ट्रियल था। न केवल खनिज प्रशंसकरण या स्टील, कोल जैसे भारी उद्योग थे बल्कि शेष बिहार के मिथिला, मगध, भोजपुर क्षेत्र में भी उद्योगों का जाल था। चीनी उत्पादन, भागलपुरी सिल्क उद्योग, सुता मील, जुट मील, पेपर मील, खाद मील, बंदूक कारखाना, पेट्रोकेमिकल्स, सीमेंट उत्पादन आदि जैसे उद्योगों की बहुलता के कारण बिहार भारत के औद्यौगिक उत्पादन में अग्रतम स्थान रखता था। अन्य प्रदेशों से लोग रोजगार के लिए बिहार प्रवासीत होते थे। समय कैसे बदल गया। झारखंड के अलग होने से न केवल खनिज आधारित उद्योग बिहार से निकल गए बल्कि वर्तमान बिहार क्षेत्र के जो कृषि आधारित उद्योग थे वो भी एक एक कर बंद होते चले गए। हमारे चीनी मिल, सुता मिल, जुट मिल, खाद मिल, पेपर मिल, भागलपुरी सिल्क उद्योग...सब बंद हो गए। हमारे लोग मजदूर बनकर दूसरे प्रदेशों में रोजगार के लिए पलायन करने लग गए। अपनी माटी छूटी, भाषा छूटी, संस्कृति छूटी, गांव छूटा, लोग छूटे...और छूटती गई स्वर्णिम इतिहास की वो यादें। आज पलायन को ही हमने सच समझ लिया है, स्वीकार कर लिया है, भाग्य और नियति समझ लिया है। हमारी पहचान गाली की तरह इस्तेमाल होती है। गाली, अपमान, मार, प्रताड़ना हमारे लोगों के हिस्से हो गया है। हम ऐसे तो न थे...ऐसा कैसे हो गए ? कारण क्या रहे ? और समाधान क्या है ? वीडियो: साभार
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Aditya Mohan
Aditya Mohan@AdityaJhamohan·
#BiharDiwas की शुभकामनाएं आज देश और दुनिया के नजर में हम भले ही जनरल बोगियों में भरकर आए सस्ते मजदूरों का प्रदेश हैं, लेकिन एक दिन ये बदलेगा, एक दिन बिहार जागेगा, उठेगा और अंगड़ाई लेगा। एक दिन हम पुनः हासिल करेंगे प्राचीन मगध का शौर्य, ऐतिहासिक मिथिला का ज्ञान, नालंदा-विक्रमशिला का बौद्धिक शक्ति, लिच्छवी का लोकतंत्र, बोधगया-वैशाली-सीतामढ़ी-पटनासाहिब का धर्मपथ। हमारा अशोक आएगा...।
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Aditya Mohan
Aditya Mohan@AdityaJhamohan·
दुनिया में भारत की जो स्थिति, इमेज, प्रभाव, स्वभाव है वही भारत में बिहार का है। दुनिया में भारत और देश के भीतर बिहार दोनों ग्लोरियस हिस्ट्री का मलबा सर पे लादे हुए, वर्तमान की स्थितियों से जूझते हुए, अपने भारी युवा जनसंख्या के साथ अनस्योर टेरिटरी में भटक रहा है। एक औसत भारतीय जैसे अपने देश में भले कैसे भी रह ले, लेकिन बेहतर मौकों की तलाश में दूसरे देश में भरपूर मेहनत करता है, वहां का नियम कानून मानता है, समृद्ध होकर स्थापित होता है और फिर वहां इज़्ज़त पाता है। वैसा ही स्वभाव एक आम बिहारी का देश के अंदर में है। दुनिया के लिए भारत चीप लेबर सहित मैनेजमेंट एवं टेक्निकल सपोर्ट के लिए प्रसिद्ध है, वैसे ही बिहार भी देश के भीतर वैसा ही इमेज रखता है। जैसे दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाला देशी भारत के लिए प्रेम और नास्टेल्जिया रखता है, एक आम बिहारी भी देश के किसी भी कोने में रहकर वैसा ही महसूस करता है। भारत दुनिया में कभी सोने की चिड़िया कहलाता था, ईस्ट के ज्ञान का केंद्र था, समृद्धि का आवास था। वैसे ही बिहार में कभी देश का पहला एम्पायर था, पहला विश्वविद्यालय था, पहला लोकतंत्र था, धर्म और ज्ञान का केंद्र था। बिहार शेष देश से अभी 40 साल पीछे चल रहा है। शायद बिहार कोई और कैलेंडर यूज कर रहा है। बिहार आज उसी कंडीशन में है जैसा देश 1991 से पहले था। 1991 से पहले दुनिया वाले भी भारत को थर्ड वर्ल्ड ही कहते थे, असीमित गरीबी थी, पॉलिटिकल इंस्टैबिलिटी थी, कोई आशा नहीं, कोई उम्मीद नहीं। बेहतरी के लिए इंडियंस को बाहर विदेश ही जाना पड़ता था, कोई दूसरा रास्ता नहीं था। लेकिन आज स्थिति अलग है। बिहार के लिए आज देश के भीतर वैसी ही स्थिति है। मुझे लगता है जिस तरह 1991 के बाद दुनिया ने एक अलग भारत देखा, वैसे ही 2030 के बाद देश एक अलग बिहार देखेगा। मैं जिस तरह देश के लिए एक दिन दुनिया के सिरमौर होने की आशा रखता हूं, वैसा ही आशावान भाव मेरे मन में बिहार के लिए भी देश के भीतर है। आज भले बिहार की स्थिति जैसी भी हो, लेकिन मुझे पूर्ण भरोसा है की एक दिन बिहार खड़ा होगा, जागेगा, अंगड़ाई लेगा। मगध का प्राचीन शौर्य, मिथिला का ऐतिहासिक ज्ञान, वैशाली का लोकतंत्र, युवा जनसंख्या की असीम संपदा सब नालंदा के भग्नावशेष की तरह लुप्त नहीं होगा...हमारा अशोक आएगा। #BiharDiwas
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Aditya Mohan@AdityaJhamohan·
दुनिया में करीब 7-8 देश ऐसे हैं जहां एक बड़ी जनसंख्या बिहारी मूल की है, जहां के प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति बिहारी मूल के लोग रह चुके हैं। उनमें से कई देश तो ऐसे हैं जहां अधिकांश वक़्त हेड ऑफ स्टेट कोई न कोई बिहारी मूल का व्यक्ति ही रहता आया है। अंग्रेजी शासनकाल में गिरमिटिया मजदूर के रूप में मॉरिशस, त्रिनिदाद एंड टोबैको, सूरीनाम, गुयाना, फ़िजी आदि अनेक देशों में भेजे गए बिहारी कभी लौट कर नहीं आ सके। वहीं बस गए, बढ़ते गए और आज वहां या तो मेजर या सिगनिफिकेंट संख्या में हैं। माइग्रेसन के दो सदी बीतने के बाद आज भी इनमें से बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो खुद को प्राउडली इंडियन ओरिजिन का बताते हैं। अपने एंसेस्ट्रल ट्रेस को ढूंढ़ते हुए हर साल सैकड़ों हजारों की संख्या में लोग बिहार में अपने पूर्वजों के मूल गांवों में आते हैं। उनके दिल में बिहार आज भी जिंदा है, आज भी वो उन देशों में बिहार की भाषा संस्कृति को जिंदा रक्खे हुए हैं। कई पीढ़ियों के बीतने के बावजूद आज भी उन्हें बिहार याद है, लेकिन बिहार ने उन्हें भुला दिया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी बिहार की किसी सरकार ने कोशिश नहीं की की अपने इन बिछुरे टुकड़ों से संवाद स्थापित किया जाए। क्या ऐसा नहीं हो सकता था की बिहार सरकार कोई ऐसा कार्यक्रम करती की जिसमें इन देशों में बसने वाले बिहारियों को आमन्त्रित किया जाता, उन्हें अपने जड़ों से जुड़ने का मौका मिलता, उन्हें बिहार में इन्वेस्टमेंट के लिए बुलाया जाता ? बिहार के प्रति अप्रतिम प्रेम मन में संजोए इन विदेशज बिहारियों को इग्नोर करके बिहार ने कितना कुछ गंवाया है। तस्वीर- मॉरिसस के राष्ट्रपति राजकेश्वर (अपने मूल गांव के यात्रा के दौरान, 2013) #BiharDiwas
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Aditya Mohan
Aditya Mohan@AdityaJhamohan·
कल से दरभंगा का सांसद गोपालजी ठाकुर, दरभंगा विधायक सह भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी एवं अन्य भाजपाई नेता न्यूज फैला रहे थे की दरभंगा के सॉफ्टवेयर पार्क में TCS अपना ऑफिस खोलने जा रही है। चहुंओर गुणगान शुरू हो गया, न्यूज बनने लगा, वाहवाही शुरू हो गई। अब पता चला है की ये खबर न केवल फर्जी है बल्कि बेवकूफाना है। दरअसल दरभंगा में पासपोर्ट ऑफिस रेंट के मकान में चल रहा है। उसे परमानेंट लोकेशन पर शिफ्ट करने का कार्य TCS करेगी, जिसके लिए TCS STPI में ऑफिस खोज रही है। इसी को फेक न्यूज़ के तौर पर फैलाया गया की दरभंगा में TCS अपना ऑफिस खोलने जा रही है। बिहार की जनता भाजपा के कैसे घोंचुओं को सांसद, विधायक बनाती है उसका ये स्पष्ट उदाहरण है।
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Aditya Mohan
Aditya Mohan@AdityaJhamohan·
"गैस नहीं मिलने की वजह से 3 दिन से खाना नहीं खा पा रहे थे, इसलिए गांव जा रहे हैं" बिहारी मजदूरों की किस्मत भी अजीब ही है। बिहार में रोजगार है नहीं, 10-12 हजार रुपए की मजदूरी के लिए हजारों किलोमीटर दूर जाते हैं। कभी मार-गाली सहते हैं, कभी अपमान झेलते हैं। देश में कहीं कोई एक्सीडेंट होता है तो उसमें मरता बिहारी मजदूर ही है। कभी कोई संकट आ जाए तो वापस गांव ही आना पड़ता है।
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PK FOR CM
PK FOR CM@PK_for_CM·
मैथिली ठाकुर और बिहार सरकार ने जिस विकलांग बच्ची को ठगा, उसके घर अब पहुंची बिजली और लगा चापाकल
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