

हिमाचल में कहा जाता है कि वहां के राजा सिद्ध सेन के पास एक तांत्रिक गुटिका थी, जिसे वे अपने मुख में रखते थे जिससे वे अदृश्य हो सकते थे। उनकी मृत्यु के पश्चात, उनकी साधना का अधिकांश प्रभाव इसी सिद्ध गणपति मंदिर के क्षेत्र में समाहित माना गया। यह विग्रह साधारण गणेश प्रतिमाओं से भिन्न है। गणपति तंत्र के अनुसार, इसके स्वरूप में छिपे शिवशक्ति का एकात्मक रूप, विग्रह के भाल पर त्रिनेत्र शिव स्वरूप, गले में नाग कुण्डलिनी शक्ति स्वरूप यह दर्शाता है कि यहाँ गणपति केवल विघ्नहर्ता नहीं, बल्कि मोक्षदाता और पूर्ण शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हैं। तांत्रिक ग्रंथों में त्रिनेत्रधारी गणपति की साधना शत्रुओं के स्तंभन और कठिन कार्यों में विजय प्राप्त करने के लिए की जाती है। राजा सिद्ध सेन ने इसी उद्देश्य से इस प्रतिमा को अभिमंत्रित किया था ताकि मंडी राज्य की सुरक्षा अभेद्य रहे। भारत में ऐसे मात्र चार विग्रह हैं। इनमें से अन्य विग्रहों का संबंध भी प्राचीन तांत्रिक केंद्रों से है। माना जाता है कि इन मूर्तियों की प्राणप्रतिष्ठा के समय विशिष्ट धातुओं और अष्टगंध का प्रयोग किया गया था, जो आज भी वहां की ऊर्जा को जीवंत रखता है।औषध शास्त्र और तांत्रिक सिद्धियां हिमाचल की औझाई परंपरा में इस मंदिर को आरोग्य पीठ भी माना जाता है। प्राचीन समय में स्थानीय तांत्रिक अपनी जड़ी बूटियों और रसायनों को सिद्ध करने के लिए इस मंदिर के प्रांगण में अनुष्ठान करते थे। माना जाता है कि सिद्ध गणपति की छत्रछाया में तैयार की गई औषधियां असाध्य रोगों को दूर करने की क्षमता रखती हैं। साधना मार्ग पर चलने वाले साधक यहाँ मौन व्रत रखकर जप करते हैं ताकि उन्हें वाक सिद्धि प्राप्त हो सके। मंडी को छोटी काशी इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहाँ ८१ मंदिर हैं, जो काशी की भांति ही शिव और शक्ति के केंद्रों के रूप में स्थापित हैं। सिद्ध गणपति इस आध्यात्मिक मानचित्र के द्वारपाल/क्षेत्रपाल रूप में देखे जाते हैं। उनके दर्शन के बिना मंडी की तांत्रिक यात्रा अधूरी मानी जाती है।















