रावण

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@Dashanan_

शम्भो!

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रावण@Dashanan_·
तुम एक भूल-भुलैया हो आकाशगंगा में नक्षत्रों का जंगल और मैं तुममें होकर भी तुम्हें ढूँढते ढूँढते थक कर पत्थर का परिंदा हो जाऊँगा एक दिन फिर भला तुम मुझे क्यों ढूँढोगी अंधेरे की बारिश में गुमशुदा पत्थर के उस कबूतर को जिसे तुमने कभी देखा ही नहीं! – चन्द्रकान्त देवताले
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रावण@Dashanan_·
What you think are controlling, is controlling you.
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रावण@Dashanan_·
मैं पाता हूँ कि यह धरती छोटी पड़ गई है अपनी असंख्य और अकबकाई मनुष्यता के लिए जहाँ हर कोई एक-दूसरे की जगह हड़प लेना चाहता है और जगह बचती नहीं है किसी की स्मृतियों के लिए ख़ुद स्मृति की भी नहीं। और जब स्मृति खो जाती है पागल हिंसाओं का युग आता है। - दिलीप चित्रे
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Mantuuu
Mantuuu@_khanabadosh·
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ श्रीमद्भगवद्गीता. अध्याय 18, श्लोक 66. अर्थात सब धर्मों को त्यागकर केवल मेरी शरण में आ जाओ. मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो.
रावण@Dashanan_

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

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रावण@Dashanan_·
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
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रावण@Dashanan_·
एक उम्र में यह विचार ही बहुत रुआँसा लगता है कि कोई ख़ाली-खाली-सा होकर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हो... एक संग बहुत सुख-सा भी होता है- बाद में।... और यह असम्भव-सा लगता है कि जिस घड़ी तुम सो रहे हो उस घड़ी कोई तुम्हारी बाट जोह रहा हो... वे दिन | निर्मल वर्मा
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रावण@Dashanan_·
बारिश में भीगता सही-सलामत घर लौटने की दुआ माँगता बूढ़ा, आराधना के बीच सही मंत्र भूल गया पुरोहित, अपने अकेले होने की ऊब से उकताया हुआ ईश्वर— सब मेरी ओर से तुम्हें पुकारते हैं। ~ अशोक वाजपेयी
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रावण@Dashanan_·
इस समय जो भी कहीं भी किसी को भी पुकारता है मेरी ओर से तुम्हें पुकारता है : ब्रह्मारण्य में भटक गया देवता, डार से बिछुड़ गई बलाका, अपनी कविता के सुनसान में बैठा अधेड़ कवि, फूलों की चकाचौंध में दब गई पत्तियाँ, आधी रात को रेगिस्तान में आया अंधड़,
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रावण@Dashanan_·
उजले उजले से कफ़न में सहर ए हिज्र ‘फ़िराक़’, एक तस्वीर हूँ मैं रात के कट जाने की! — फ़िराक़ गोरखपुरी
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रावण@Dashanan_·
कुछ ऐसी बात न थी तुझसे दूर हो जाना, ये बात अलग है कि रह-रह के दर्द होता था.. — फ़िराक़ गोरखपुरी
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रावण@Dashanan_·
हर चेहरे की अपनी स्मृति, और हर स्मृति का अपना चेहरा, कैसा अजीब विरोधाभास है -मृत्यु जिसे हम ठहराव समझते थे, वहाँ से जीवन सहस्र छवियों में बहता दिखायी देने लगता है। – निर्मल वर्मा
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रावण@Dashanan_·
जब कोई व्यक्ति जीता है, हम अक्सर उसका चेहरा अपने चौखटे में जड़ लेते हैं, पर मृत्यु सहसा इस जड़ चौखटे के फ़्रेम को तोड़ देती है, और वह 'चेहरा' अपने को बने-बनाए सींखचों से मुक्त करके बाहर निकल आता है, और वह जिसे हम 'एक' समझ बैठे थे, वह अनेक चेहरों में बँटता जाता है।
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रावण@Dashanan_·
संसार में जितने धनी व्यक्ति हैं, उनमें से अधिकांश दलाली करके वस्तु या व्यक्ति के गुण को बेचने में माध्यम बन कर धन कमाते हैं। यह दलाली वस्तु और व्यक्ति के वास्तविक मुल्यांकन और मूल्य ग्रहण में बाधा है। डायरी, मोहन राकेश।
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रावण@Dashanan_·
एक वस्तु का अपना प्राकृतिक गुण होता है। व्यक्ति का भी अपना प्राकृतिक गुण होता है। मूल्य व्यक्ति और वस्तु के प्राकृतिक गुण का न लगाया जाकर प्राय: दूसरों की उस गुण को बेचने की शक्ति का लगाया जाता है।
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रावण@Dashanan_·
जब भगत सिंह फाँसी के तख़्ते की ओर बढ़े तो अहिंसा ही थी उनका सबसे मुश्किल सरोकार अगर उन्हें क़बूल होता युद्ध सरदारों का न्याय तो वे भी जीवित रह लेते बर्दाश्त कर लेते धीरे-धीरे उजड़ते रोज़ मरते हुए लाहौर की तरह बनारस अमृतसर लखनऊ इलाहाबाद कानपुर और श्रीनगर की तरह। — आलोकधन्वा
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रावण@Dashanan_·
कश्चित् कस्यचिन्मित्रं, न कश्चित् कस्यचित् रिपु:। अर्थतस्तु निबध्यन्ते, मित्राणि रिपवस्तथा॥ #नीति #सुप्रभात
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रावण@Dashanan_·
पहुँचा हुजूर-ए-शाह हर एक रंग का फ़क़ीर, पहुँचा नहीं जो, था वही पहुँचा हुआ फ़क़ीर.. — शुजा ख़ावर
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रावण@Dashanan_·
बचपन में किसी वृक्ष-मित्र ने कहा था देखो हम कितने हैं, कितनी पत्तियां हैं! पत्तियों की जगह लेखक के शब्दों को रख लेना शाखाओं की जगह पुस्तकें.. फिर चुप से चल देना। — अनिरुद्ध उमठ
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रावण@Dashanan_·
वे जाल नहीं बुनते बस जल कम करते जाते हैं बाद इसके जब तुम तड़पते हो गर्म रेत पर वे तुम्हारी विपत्तियों का मज़ा लेते हैं और जब तुम नहीं रहते तब तुम उनके और भी काम के हो जाते हो। — अविनाश मिश्र
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रावण@Dashanan_·
मैं अक्सर सोचता हूँ कि वे शहर कितने दुर्भाग हैं, जिनके अपने कोई खँडहर नहीं। उनमें रहना उतना ही भयानक अनुभव हो सकता है, जैसे किसी ऐसे व्यक्ति से मिलना, जो अपनी स्मृति खो चुका है, जिसका कोई अतीत नहीं। – निर्मल वर्मा
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रावण@Dashanan_·
जिन्हें पांच साल के लिये चुन लिया उन्होंने अपने को ही देश मान लिया। वे मुंह खोलकर अपने भीतर वैसे ही भारत को बताने लगे, जैसे कृष्ण ने अर्जुन को अपने मुंह में सारा ब्रह्माण्ड दिखाया था। – परसाई
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