
लड़ने के लिए लड़ना है या जीतने के लिए लड़ना है?
इतनी उम्र और वरिष्ठता के बावजूद भी ये मेहनत, ऊर्जा और समर्पण अशोक गहलोत जी को एक विराट व्यक्तित्व वाले नेता की श्रेणी में खड़ा कर देता है।
चुनाव को औपचारिकता समझने और करो-मरो जैसा समझने की प्रवृत्ति में अंतर समझाते नरेश अरोड़ा:
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