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Sanatan Mindset
@DharmikFor5x
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Bharat Katılım Ekim 2019
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@TanhaSafar_ सरकार से उम्मीद करना बेवकूफी है, ये लोग कुछ नहीं करते हैं
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@AnkurXpress हमने तो लगभग सभी के नोटिफिकेशन ऑन कर रखे हैं, समय न होने के कारण सबके पोस्ट पर जाना संभव नहीं है और होता भी है कि कुछ मिस भी हो जाता है
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@DharmikFor5x ऐसी बात नहीं है भाई पोस्ट दिखेगी तो मैं जरूर आऊंगा, और बड़े हैंडल वाले लोग नहीं हम
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चुनाव में हारने के बाद ज्यादातर लोग टूट जाते हैं, कुछ सालों तक जनता से मिलना जुलना तक बंद कर देते है लेकिन प्रशांत किशोर तो प्रशांत किशोर है उन्होंने हार को ही अपनी ताकत बना लिया
पूरा देश मज़ाक उड़ाता रहा, फिर भी उनका फोकस नहीं बदला उनका मुद्दा आज भी वही है बिहार से बेरोजगारी और पलायन खत्म करना।
पटना IIT BIHTA के पास बाँस से बन रहा उनका 9 एकड़ का आश्रम आज पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। न वहां AC होगा, न चमचमाती दीवारें क्योंकि राजनीति अगर बदलाव के लिए हो, तो ज़मीन से जुड़ना पड़ता है दरी पर बैठना भी पड़ता है ।
प्रशांत किशोर की ये नई शुरुआत कैसी लगी आपको .??


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आज दोपहर की भयंकर गर्मी में अचानक घर का submersible बंद हो गया नल खोला तो पानी की एक बूंद तक नहीं:😱
Situation ऐसी थी कि बिना पानी के 10 मिनट निकालना भी मुश्किल लग रहा था मैंने तुरंत mechanic को call किया,,
वो आया थोड़ा इधर उधर check किया और बड़ी confidence से बोला
Motor खराब हो गई है बदलनी पड़ेगी लगभग ₹2500 का खर्च आएगा:
उसके बोलने का तरीका ऐसा था कि मुझे भी लगा अब खर्चा पक्का है
मैंने मन ही मन पैसे जोड़ने शुरू कर दिए
लेकिन तभी मेरी नजर side में लगे छोटे से condenser पर पड़ी
मैंने कहा
भाई एक बार इसे भी properly check कर लो:?
पहले उसने बात को casually लिया
फिर जब condenser चेक किया तो उसका expression ही बदल गया
वो बोला
हाँ शायद issue इसी में है:
बस फिर क्या था
मैंने तुरंत उसे नई motor लाने से मना कर दिया घर में पुराना condenser रखा हुआ था वो लगवाया:
और अगले ही second
Submersible फिर से full speed में चालू :
उस moment जो relief मिला ना वो अलग ही level का था:
मैंने mechanic को ₹200 दिए और हंसकर कहा भाई आज तू लगभग ₹2300 का नुकसान करवाने वाला था
सच कहूँ तो
थोड़ी technical जानकारी और अपने सामने काम करवाना आजकल बहुत जरूरी हो गया है:
क्यों कि कई बार problem छोटी होती है लेकिन bill सीधा बड़ा बना दिया जाता है:??


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1 मिनट की देरी और लाखों की चपत... ये सबक मुझे ताउम्र याद रहेगा! 🚆🚫
LTT से गांव की ट्रेन पकड़नी थी, घर से 2.5 घंटे पहले निकला फिर भी स्टेशन पहुँचते-पूँछते पसीने छूट गए। सिर्फ **1 मिनट की देरी** और सामने खड़ी ट्रेन रेंगने लगी थी।
सामान उठाया, रिश्तेदारों को धक्का दिया और जैसे-तैसे चलती गाड़ी के जिस कोच में जगह मिली, उसमें खुद को और सामान को 'झोंक' दिया। उस वक्त जो दिमाग में डर था न, वो शब्दों में बयान नहीं हो सकता।
आजकल के लोग बड़ी-बड़ी बातें करते हैं कि 'Life is short, enjoy every moment', लेकिन भाई, असल जिंदगी में वो **1 मिनट** आपकी पूरी मेहनत, पैसा और उम्मीदों पर पानी फेर सकता है। उस दिन के बाद से मैंने कान पकड़ लिए हैं—अब कहीं भी आधे घंटे पहले पहुँच कर बैठ जाता हूँ।
लोग अक्सर पूछते हैं कि 'ट्रेन छूट गई तो क्या?'... भाई, जिनका गांव जाने का साल भर का इंतजार और मेहनत उस एक टिकट पर टिकी होती है, उनसे पूछो कि ट्रेन छूटने का दर्द क्या होता है। सब बेकार हो जाता है!

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अलविदा, जिमखाना क्लब!
एक रॉयल अड्डे की दर्द भरी विदाई !
दिल्ली के दिल में, लुटियंस की हरी-भरी गोद में, जहाँ आम आदमी का सपना भी घुसने की हिम्मत नहीं करता, वहाँ सालों से एक खास अड्डा चला
आ रहा था ,जिसका किराया
सरकार मिलता था ₹1000 प्रति वर्ष ।
जिमखाना क्लब।
यह कोई साधारण क्लब नहीं था ।
यह था रसूख का किला।
अंदर सिर्फ़ वही लोग जा सकते हैं
जो इस क्लब के मेंबर हैं।
जिनके नाम के आगे “सर”,
“जनरल”, “मिनिस्टर”, “अबाउट”
या कम से कम “अरबपति” लगा ही हो। अपर मिडिल क्लास? कैटल क्लास?
वो तो गेट पर ही “सॉरी सर, मेंबरशिप कार्ड दिखाइए” सुनकर लौट जाते।
अंदर का माहौल? जन्नत से सस्ता।
व्हिस्की, वाइन, भुना मटन, दाल-तड़का—सब सरकारी रेट पर।
और सबसे मज़ेदार बात—नगद पैसे
की कोई ज़रूरत नहीं।
जो खाया-पिया, सब उस महानुभाव
के खाते में चढ़ जाता
जो मेहमान लेकर आया था।
पुराने ज़माने का उधार का सिस्टम, लेकिन सिर्फ़ रईसों के लिए।
कहानी शुरू हुई थी...113 साल पहले। जब अंग्रेज़ों ने कलकत्ता से राजधानी दिल्ली शिफ़्ट की तो उन्हें लगा—
“अरे, हमारे अफ़सर कहाँ बैठकर
विस्की पीएँगे?”
तो लुटियंस में 27 एकड़ ज़मीन दे दी गई। सर हर्बर्ट (वही जिन्होंने कानपुर इंजीनियरिंग कॉलेज बनाया) ने नींव रखी। लॉर्ड वेडिंग्टन की बेगम ने 20 हज़ार
रुपये देकर स्विमिंग पूल बनवा दिया—उस ज़माने में जब 20 हज़ार का मतलब आज के 20 करोड़ से कम नहीं था।
सात रजवाड़ों ने पैसा लगाया, बदले में मिली परिवार सहित आजीवन सदस्यता।
आईसीएस अफ़सरों को यहाँ “तहज़ीब” सिखाई जाती—कैसे ग्लास पकड़ना है, कैसे बैडमिंटन खेलना है, कैसे “ओल्ड चैप” कहकर दूसरे को गले लगाना है। लेकिन हाँ, भूरे लोग? वो अंदर नहीं।
लॉन में खड़े-खड़े ट्रेनिंग लेते।
इमारत अंग्रेज़ों के लिए थी, “नेटिव्स” के लिए लॉन पर्याप्त था।
फिर आज़ादी आई। चच्चा जी के
ज़माने में मेन्यू और सस्ता हुआ—
लेकिन रसूख? वो जस का तस।
मेंबरशिप?
अरे भाई, 30 साल पहले फॉर्म भरा तो आज भी वेटिंग लिस्ट में पड़ा होगा। सदस्य मर जाए तो बेटा-बेटी को मिल सकती है—बशर्ते वो भी “रसूखदार” साबित हो। वरना नहीं।
और अब?
अलविदा जिमखाना!
मौजूदा सरकार ने फैसला कर लिया है—
रईसी की पुरानी परंपरा को आगे
नहीं बढ़ाना है।
गरीबों की अवैध झुग्गियाँ हटाईं, अमीरों के अवैध अय्याशी के अड्डे भी हटाए जा रहे हैं।
“सिस्टम तो हमारा है” वाले गठजोड़ के ठिकाने भी अब धूल फाँक रहे हैं।
कल को जब नई पीढ़ी पूछेगी—
“दादा, दिल्ली में ऐसा कोई क्लब था
जहाँ अफ़सर-नेता-जनरल-रईस जाम टकराते हुए देश की दुर्दशा पर
गहरी चर्चा करते थे?”
तो हमें सिर्फ़ इतना कहना होगा:
“हाँ बेटा, था।
पर मोदी सरकार ने सब बर्बाद
कर दिया 😭
क्या आप सरकार के इस निर्णय के
साथ हैं ?
क्या सत्ता के आंगन में स्थित इस
27 एकड़ जमीन का बेहतर और
उचित उपयोग होना चाहिए ?




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