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Katılım Ocak 2022
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MOHAMMAD SAIFULLAH
MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
*मदीने का सफ़र: आंसुओं, शर्म और मोहब्बत का वह रास्ता जो इंसान को बदल देता है* आज के शोरगुल भरे, दौड़ती हुई दुनिया में इंसान बहुत कुछ हासिल कर लेता है। दौलत, शोहरत, ताक़त लेकिन एक चीज़ उससे दूर होती चली जाती है, दिल की नर्मी और रूह की सच्चाई। ऐसे दौर में मदीने का सफ़र केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि इंसान के अंदर होने वाली एक गहरी क्रांति का नाम है। जब एक आशिक़े रसूल, मदीने की ओर क़दम बढ़ाता है, तो वह एक आम मुसाफ़िर नहीं होता। वह अपने साथ अपने गुनाहों का बोझ, अपनी नाकामियों की कहानी और अपने दिल की टूटी हुई हालत लेकर चलता है। उसकी आंखों में आंसू होते हैं, माथे पर झुकाव होता है और क़दमों में लड़खड़ाहट। यह सब उसकी कमज़ोरी नहीं, बल्कि उसकी सच्ची पहचान है। असल में, यह सफ़र इंसान को यह एहसास दिलाता है कि वह खुद कुछ भी नहीं। अगर कोई चीज़ उसे आगे बढ़ा रही है, तो वह है रहमते मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का सहारा। मदीने की सरज़मीं पर पहुंचकर इंसान को समझ में आता है कि पवित्रता (तक़द्दुस) किसे कहते हैं। वहां की हवा सिर्फ़ सांस लेने का ज़रिया नहीं होती, बल्कि दिल को पाक करने वाली एक रूहानी ताक़त बन जाती है। वहां का माहौल इंसान को ख़ामोशी में भी बहुत कुछ सिखा देता है। अदब, झुकाव और मोहब्बत। इस सफ़र की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि यहां देखना आंखों से नहीं, बल्कि दिल से होता है। कई बार इंसान की आंखें उस नूर को देखने से क़िसिर रह जाती हैं लेकिन उसका दिल, उसकी बसीरत, उसे वह सब दिखा देती है जो ज़ाहिरी नज़र नहीं देख सकती और यही वह मुक़ाम है जहां से इंसान बदलना शुरू होता है। जो कभी अपनी खुशमिज़ाजी पर नाज़ करता था, वही अब मदीने की जुदाई में बेचैन और ग़मगीन रहने लगता है। यह ग़म कोई आम ग़म नहीं, बल्कि इश्क़ का वह दर्द है जो इंसान को अंदर से ज़िंदा कर देता है। आज हमें खुद से एक सवाल पूछना चाहिए। क्या हमारा दिल भी उस सफ़र के लिए तैयार है? मदीने का रास्ता सिर्फ़ टिकट और पासपोर्ट से तय नहीं होता। यह रास्ता तय होता है आंसुओं से, तौबा से और सच्ची मोहब्बत से। अगर हम अपने दिल को साफ़ कर लें, अपने गुनाहों पर सच्चे दिल से पछता लें और अपनी ज़िंदगी को दरूद व सलाम से रोशन कर लें तो यक़ीन मानिए, मदीने का बुलावा भी दूर नहीं रहेगा क्योंकि मदीना सिर्फ़ एक शहर नहीं, वह एक एहसास है, एक पुकार है और एक ऐसी मंज़िल है जो इंसान को उसके रब और उसके नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से जोड़ देती है। आज के इस भटके हुए दौर में, मदीने का सफ़र हमें यह सिखाता है कि असली कामयाबी बाहर की दुनिया जीतने में नहीं, बल्कि अपने अंदर की दुनिया को जीतने में है और जो इंसान इस सफ़र को समझ लेता है, वह फिर कभी पहले जैसा नहीं रहता। *लेखक : सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी, चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी: ग़ौसे आज़म फाउंडेशन*
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MOHAMMAD SAIFULLAH
MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
A Model of Pen, Law and Service: The National Role of Ghause Azam Foundation By: Adv. Mohammad Osama Saifullah @Osama__GAF
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MOHAMMAD SAIFULLAH
MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
*यौमे शहादत पर, विशेष समाचार रिपोर्ट* *शहादत का सूरज फिर हुआ याद — हज़रत अमीर हम्ज़ा की शान में शोलाबार तक़रीर* *सैकड़ों दिलों को झकझोर देने वाला बयान — सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने ग़ैरत, इश्क़ और कुर्बानी का जज़्बा किया ताज़ा* *[विशेष प्रतिनिधि]* इस्लामी कलेंडर 15 शव्वाल के मुक़द्दस दिन के मद्देनजर, यौमे शहादत हज़रत अमीर हम्ज़ा को बड़े अदब और अक़ीदत के साथ याद किया गया। इस मौक़े पर हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी (चेयरमैन एवं चीफ़ क़ाज़ी, ग़ौसे आज़म फाउंडेशन) ने एक बेहद शानदार, शोलाबार, जोश से भरपूर और दिलों को हिला देने वाला बयान पेश किया, जिसने मजमे में मौजूद हर शख्स के दिल में नई हरारत पैदा कर दी। *यह सिर्फ एक शहादत नहीं… एक पैग़ाम है* अपने प्रभावशाली अंदाज़ में सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि हज़रत अमीर हम्ज़ा की शहादत कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि यह एक ऐसा पैग़ाम है जो हर दौर के मुसलमानों को ग़ैरत, बहादुरी और सच्चाई पर डटे रहने की तालीम देता है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि आज भी अगर उम्मत अपने अंदर वही जज़्बा पैदा कर ले, तो हालात बदल सकते हैं। *अज़मत, फ़ज़ीलत और शान का जीवंत चित्रण* अपने बयान में सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने हज़रत अमीर हम्ज़ा की शख्सियत को बेहद प्रभावशाली अंदाज़ में पेश करते हुए कहा कि वह सिर्फ एक बहादुर योद्धा नहीं थे, बल्कि वफ़ादारी और इश्क़ की जीती - जागती मिसाल थे। उनका नाम सुनते ही मैदाने जंग में दुश्मनों के क़दम लड़खड़ा जाते थे। उनकी ज़िंदगी इस बात का सबूत है कि सच्चाई के लिए कुर्बानी देना ही असली कामयाबी है। *इश्क़ ने शिकारी को इस्लाम का शेर बना दिया* सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने अपने बयान में वह दिलचस्प और ईमान अफ़रोज़ वाक़िआ भी बयान किया, जब हज़रत हम्ज़ा ने ग़ैरत और इश्क़ के जज़्बे में सच्चाई का साथ देने का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि यह इश्क़ था जिसने एक शिकारी को इस्लाम का शेर बना दिया और एक वार ने ज़ुल्म के गुरूर को तोड़ दिया। *बदर से उहुद तक — कुर्बानी की मुकम्मल दास्तान* अपने बयान में सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने जंगे बद्र में हज़रत अमीर हम्ज़ा की बहादुरी, उनकी जंगी महारत और दुश्मनों पर उनके रौब का ज़िक्र करते हुए कहा कि जहां वह खड़े होते, वहां मैदान का नक्शा बदल जाता था। दुश्मन भी उनकी ताक़त को मानने पर मजबूर हो जाते थे। इसके बाद उन्होंने जंगे उहद का वह दिल तोड़ देने वाला मंजर बयान किया, जहां हज़रत अमीर हम्ज़ा ने बहादुरी की इंतिहा दिखाते हुए शहादत का जाम पिया। *मजलिस में नम आंखें, दिलों में जोश* जैसे जैसे हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी का बयान आगे बढ़ता गया, मजलिस का माहौल ग़म और जोश के मिले-जुले जज़्बात से भर गया। कई बार लोगों की आंखें नम हो गईं, तो कई बार सुब्हानल्लाह, माशा अल्लाह और अल्हमदो लिल्लाह की गूंज ने फिज़ा को गरमा दिया। *नौजवानों के नाम खास पैग़ाम* अपने बयान के आखिर में सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने खास तौर पर नौजवानों को संबोधित करते हुए कहा कि अगर तुम हज़रत अमीर हम्ज़ा से मोहब्बत करते हो, तो उनके किरदार को अपनी ज़िंदगी में उतारो। सिर्फ नाम लेने से कुछ नहीं होगा, सच्चाई के लिए खड़े होना होगा। *आख़िरी असरदार पुकार* सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने अपने बयान में कहा कि हज़रत अमीर हम्ज़ा, वह बुलंद मुक़ाम वाली हस्ती हैं जिन्हें अल्लाह का शेर और रसूल का शेर कहा गया। वह शहीदों के सरदार हैं, वफ़ादारी और बहादुरी की जीती - जागती मिसाल हैं। उन्होंने इस बात को बड़े असरदार अंदाज़ में पेश किया कि हज़रत अमीर हम्ज़ा सिर्फ रिश्ते में चाचा ही नहीं, बल्कि दूध-भाई भी थे यानी नज़दीकी, मोहब्बत और कुर्बत की वह तमाम मंज़िलें उनमें जमा थीं जो किसी को भी बुलंदी तक पहुंचा देती हैं। उन्होंने आगे कहा कि वह सिर्फ एक जंगी सिपाही नहीं थे, बल्कि गरजदार आवाज़, अटल हिम्मत और अडिग हौसले के मालिक थे। मुसीबत की घड़ी में सहारा बनना, हक़ के लिए डट जाना और हर हाल में सच्चाई का साथ देना, यही उनका पैग़ाम है। आख़िर में उन्होंने पूरे जोश के साथ कहा कि हज़रत अमीर हम्ज़ा फ़ख्र-ए-इस्लाम हैं और उनका नाम आज भी हर दिल में हिम्मत, ग़ैरत और कुर्बानी की नई रूह फूंक देता है। *निष्कर्ष* यह बयान सिर्फ एक तक़रीर नहीं था, बल्कि एक ऐसी पुकार थी, जिसने हर सुनने वाले को अपने ईमान, अपने किरदार और अपनी ज़िम्मेदारियों पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया। यौमे शहादत हज़रत अमीर हम्ज़ा के इस मौक़े पर पेश किया गया यह बयान, आने वाले वक़्त में भी लोगों के दिलों में जज़्बा और हिम्मत पैदा करता रहेगा।
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MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
क़लम क़ानून और ख़िदमत का मॉडल बनकर उभरा ग़ौसे आज़म फाउंडेशन मौलाना जुनैद रज़ा पटेल
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MOHAMMAD SAIFULLAH
MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
इबादत, इंसानियत और अमन का संदेश ही शब-ए-क़द्र की असली रूह - सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी
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MOHAMMAD SAIFULLAH
MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
बहुत ही पुरानी वीडियो नागपुर महाराष्ट्र के प्रोग्राम की
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MOHAMMAD SAIFULLAH
MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
बीजेपी के वरिष्ठ नेता @Swamy39 ने प्रधानमंत्री @narendramodi पर तीखा बयान देते हुए कहा कि बीजेपी में कई महिला सांसद ऐसी हैं जो #मोदी की कृपा से संसद तक पहुंची हैं #स्वामी ने यह भी दावा किया कि उन महिला सांसदों में से एक आज मंत्री भी हैं। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज़ हो गई है और बयान को लेकर नई बहस छिड़ गई है। क्या यह पार्टी के अंदर की नाराज़गी का संकेत है या फिर एक बड़ा राजनीतिक संदेश? #SubramanianSwamy#NarendraModi#BJP#IndianPolitics#PoliticalStatement#BreakingNews#WomenMP#PoliticalDebate#ModiGovernment#IndianParliament
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MOHAMMAD SAIFULLAH
MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
*दिलों को झकझोर देने वाली रूहानी ख़बर* शबे क़द्र की फ़ैसलाकुन, ताजदार और रहमतों से लबरेज़ रात में कसरावद (मध्य प्रदेश) की सरज़मीन से एक ऐसा ईमान-अफ़रोज़, तारीख़-साज़ और रूहपरवर वाक़िआ सामने आया जिसने दिलों में दीन की मोहब्बत की नई चिंगारी भड़का दी। 27वीं रमज़ान की उस मुक़द्दस घड़ी में, जब सज्दे अश्कबार थे, फ़ज़ाएं तिलावते क़ुरआन से महक रही थीं और रहमतें अपने उरूज पर थीं। उसी नूरानी माहौल में, गौसिया जामा मस्जिद, कसरावद के इमाम, अज़ीज़म हज़रत मौलाना नौशाद आलम साहब क़ादरी को उनकी ख़िदमते-दीन, इल्मी व रूहानी वक़ार और इमामत की अज़ीम जिम्मेदारियों के एहतिराम में *“उमराह पैकेज”* से सरफ़राज़ किया गया। यह दिल को छू लेने वाली ख़बर मेरे करम फ़रमा, हज़रत मौलाना जुनैद रज़ा साहब क़ादरी ने मुझे फोन पर दी और कहा कि आपके सिलसिला में आपके हाथों पर तालिब होने वाले हज़रत मौलाना नौशाद साहब क़ादरी को इनाम से नवाज़ा गया है और उसके बाद हज़रत मौलाना नौशाद साहब क़ादरी ने भी मैसेज द्वारा इसकी तस्दीक़ फ़रमाई। *इमाम का मर्तबा — अज़मत का बुलंद मीनार* इमाम महज़ नमाज़ पढ़ाने वाला नहीं… 👉 वह क़ुरआन का अमीने हक़ है 👉 वह सुन्नत का मुहाफ़िज़ और पासबान है 👉 वह उम्मत का रहबर और रूहानी क़ाइद है 👉 उसकी ज़िंदगी का हर लम्हा इस्लाहे मुआशरा के लिए वक़्फ़ है हदीस का जामे उसूल: "अफ़ज़ल लोग वे हैं जो क़ुरआन सीखें और सिखाएं" तो जो शख़्स हर रोज़ क़ुरआन के साथ खड़ा होकर क़ौम की क़ियादत करता है। उसकी अज़मत का अंदाज़ा लफ़्ज़ों में मुमकिन नहीं। *इमाम की ताज़ीम — दीन की ताज़ीम* आज का सबसे बड़ा फ़ित्ना यह है कि हम दुनियावी हस्तियों को सर-आंखों पर बिठाते हैं, मगर इमाम, उलेमा और हाफ़िज़े क़ुरआन की क़द्र में कोताही करते हैं लेकिन कसरावद ने आज एक रौशन और ऐतिहासिक मिसाल क़ायम कर दी: “दीन के ख़ादिम हमारी इज़्ज़त के सबसे बड़े हक़दार हैं!” यह “उमराह पैकेज” महज़ एक इनाम नहीं… 👉 यह इल्मे दीन की अज़मत का ऐलाने आम है 👉 यह इमाम की कुर्बानियों का एतिराफ़ है 👉 यह मस्जिद से वफ़ादारी और दीन से इश्क़ का इज़हार है *उमराह — क़ुबूलियत की मुहर* एक इमाम को हरम की हाज़िरी का तोहफ़ा मिलना— यह उसकी इबादतों, तिलावतों और दुआओं की क़ुबूलियत की ज़िंदा सनद है। *क़ौम के नाम पैग़ाम* मैं, *सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी*, (चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी, ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन) पूरी उम्मत से पुरज़ोर अपील करता हूँ: 👉 अपने इमामों की इज़्ज़त को ईमान का हिस्सा बनाइए 👉 उनकी ज़रूरतों को अपनी ज़िम्मेदारी समझिए 👉 उन्हें मोहब्बत, तआवुन और इकराम दीजिए क्योंकि: 💥 “जिस क़ौम ने अपने इमामों और उलेमा को नज़रअंदाज़ किया, वह क़ौम रूहानी ज़वाल और बेदारी से महरूम हो गई!” *अंतिम ऐलान* कसरावद का यह अमल एक मामूली इनाम नहीं… 👉 यह एक रूहानी इन्क़लाब की शुरुआत है 👉 यह एक क़ौमी बेदारी का ऐलान है 👉 यह पूरी उम्मत के लिए राहे अमल और पैग़ामे बेदार है *दुआ:* अल्लाह तआला हज़रत मौलाना नौशाद आलम साहब क़ादरी की ख़िदमतों को शरफ़-ए-क़ुबूलियत अता फ़रमाए, उनके उमराह को मक़बूल व मबरूर बनाए और हमें दीन की ताज़ीम और इमामों की क़द्र की सच्ची तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। *सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी*, (चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी, ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन)
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MOHAMMAD SAIFULLAH
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मदीने का सफर है और मैं......
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MOHAMMAD SAIFULLAH
MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
क़ुरआन अल्लाह का संविधान.....
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MOHAMMAD SAIFULLAH
MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
फरमान न बदला....
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MOHAMMAD SAIFULLAH
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*कुरआन इंसानियत को अंधेरों से निकालकर रोशनी की राह दिखाने वाला दिव्य संविधान है : सुफी सैफुल्लाह क़ादरी, चेयरमैन : ग़ौसे आज़म फाउंडेशन*
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MOHAMMAD SAIFULLAH
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#EidKareem Mubarak #ईद_मुबारक #عیدـالفطر
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MOHAMMAD SAIFULLAH
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*ईद सिर्फ कपड़ों की नहीं, किरदार की है - ईदगाह में गूंजा सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी का शोलाबार पैग़ाम* *नमाज़ियों की मौजूदगी में गूंजी तक़रीर, गुनाहों से तौबा और असल ईद मनाने की दी ताकीद* *विशेष प्रतिनिधि* नूरी जामा मस्जिद के समीप, ईदगाह उस वक़्त ईमान की रौशनी से जगमगा उठा, जब ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के चेयरमैन एवं चीफ़ क़ाज़ी, हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने नमाज़ से पहले अपने जोशीले, शोलाबार और दिलों को झकझोर देने वाले अंदाज़ में नमाज़ियों को खिताब किया। उनकी आवाज़ में दर्द था, अल्फ़ाज़ में आग थी और पैग़ाम में ऐसी सच्चाई कि हर दिल झूम उठा। *रमज़ान इम्तिहान था, ईद उसका रिज़ल्ट है* सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि रमज़ान रहमत, मग़फ़िरत और जहन्नम से आज़ादी का महीना था और आज ईद उस बंदे की है जिसने अपने गुनाहों को छोड़ा, अपने रब को राज़ी किया। उन्होंने कुरआन शरीफ़ की आयत का हवाला देते हुए कहा कि असली खुशी अल्लाह के फ़ज़्ल और रहमत पर मनाई जाए न कि सिर्फ नए कपड़ों, फैशन और दिखावे पर। *ईद की सुबह, अल्लाह का आम माफ़ीनामा* तक़रीर में सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने जोश के साथ बयान किया कि ईद की रात “लैलतुल जाइजाह” यानी इनाम की रात होती है। आज का दिन वह दिन है जब अल्लाह फरिश्तों के ज़रिये ऐलान करवाता है, ऐ उम्मते मोहम्मद! आओ, मांगो… आज कोई खाली नहीं जाएगा। यह सुनकर ईदगाह में “ सुब्हानल्लाह ” और “ माशा अल्लाह ” की सदाएं गूंज उठीं। *खबरदार! ईद को गुनाहों का त्योहार मत बनाओ* अपने बयान में सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने नसीहत भरे लहज़े में आगाह किया कि आज ईद का नाम लेकर गाने, नाच, फिज़ूलखर्ची और बेपरवाही… यह ईद नहीं, यह शैतान की जीत है। उन्होंने कुरआन की चेतावनी दोहराई, फ़िज़ूलखर्च करने वाले शैतान के भाई हैं। *ईद या वईद, फैसला तुम्हारे आमाल करेंगे* हज़रत उमर फ़ारूक़ का वाक़िया सुनाते हुए सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी की आवाज़ भर्रा गई। जिसके रोज़े-नमाज़ क़बूल हो गए, उसकी आज ईद है और जिसका सब रद्द हो गया, उसके लिए यही दिन वईद है। *असल ईद, खुद को बदलने का नाम है* सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने ज़ोर देकर कहा कि ईद नए कपड़ों का नहीं, नए किरदार का नाम है, दिल की सफाई का नाम है, अल्लाह को खुश करने का नाम है। *अमन, भाईचारे और मुल्क की खुशहाली के लिए दुआ* तक़रीर के आखिर में सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने मुल्क में अमन, भाईचारे और तरक्की के लिए ईदगाह में ख़ास दुआ कराई, जिसमें हज़ारों हाथ एक साथ उठे और आमीन की सदाएं गूंज उठीं। #عيد_الفطر_١٤٤٧ه #ईद #EIDMUMARAK
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MOHAMMAD SAIFULLAH
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*रमज़ान इतिहास से प्रेरणा लेने का संदेश देता है : सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी चेयरमैन - ग़ौसे आज़म फाउंडेशन*
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*रमज़ान का तीसरा जुमा* *रमज़ान केवल रोज़े का महीना नहीं, बल्कि आत्मसंयम, सेवा और इतिहास से प्रेरणा लेने का संदेश देता है : सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी* *जंग-ए-बद्र का सबक़, संख्या नहीं, सच्चाई और सब्र की ताक़त बड़ी होती है* रमज़ान के तीसरे जुमा को, जुमा की नमाज़ पढ़ाने से पहले, हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी (चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी – ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन) ने अपने प्रभावशाली अंदाज़ में नूरी जामा मस्जिद में तक़रीर करते हुए कहा कि रमज़ान का महीना केवल इबादत का नहीं, बल्कि इंसान के अंदर आत्मसंयम, करुणा, सामाजिक ज़िम्मेदारी और अल्लाह पर भरोसे की भावना को मज़बूत करने का महीना है। उन्होंने कहा कि इस पवित्र महीने में इस्लामी इतिहास की महान घटना जंग-ए-बद्र भी हुई, जिसने पूरी दुनिया को यह संदेश दिया कि जब इंसान सच्चाई, न्याय और धैर्य के साथ खड़ा होता है तो अल्लाह की मदद उसके साथ होती है। सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि क़ुरआन में भी बद्र की घटना का उल्लेख मिलता है। अल्लाह तआला फरमाता है और निश्चय ही अल्लाह ने बद्र में तुम्हारी मदद की, जबकि उस समय तुम कमज़ोर थे। इसलिए अल्लाह से डरते रहो ताकि तुम शुक्रगुज़ार बनो। उन्होंने कहा कि यह आयत इंसान को यह भरोसा देती है कि कठिन परिस्थितियों में भी उम्मीद और सब्र नहीं छोड़ना चाहिए। सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि रोज़ा इंसान को केवल भूख और प्यास का एहसास नहीं कराता, बल्कि यह दिल में रहमदिली और समाज के कमज़ोर लोगों के प्रति संवेदनशीलता भी पैदा करता है। यही कारण है कि रमज़ान में ज़कात, सदक़ा और इंसानी सेवा की परंपरा विशेष रूप से बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि रमज़ान का असली संदेश यही है कि इंसान अपने अंदर की बुराइयों को छोड़कर अच्छाई, संयम और इंसानियत को अपनाए। जब समाज में नैतिकता और आपसी सम्मान बढ़ता है, तो अमन और भाईचारा भी मज़बूत होता है। सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि आज के दौर में इंसान को इतिहास से प्रेरणा लेकर अपने जीवन में ईमानदारी, संयम और सेवा की भावना को अपनाना चाहिए। यही वह रास्ता है जो समाज में अमन, स्थिरता और सकारात्मकता को मज़बूत करता है। अंत में उन्होंने दुआ करते हुए कहा कि रमज़ान का यह पवित्र महीना इंसानों के दिलों में रहमत, इंसानियत और भाईचारे की भावना को मज़बूत करे और देश में शांति, सद्भाव और तरक़्क़ी क़ायम रहे।
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MOHAMMAD SAIFULLAH
MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
*बरकत कॉलोनी, झोटवाड़ा की मोहब्बतों को सलाम* हर साल की तरह इस साल भी बरकत कॉलोनी, झोटवाड़ा में बड़े प्यार, अपनापन और भाईचारे के माहौल में रोज़ा इफ्तार का शानदार इंतज़ाम किया गया। यह वह मुक़द्दस महफ़िल होती है जहां रोज़ेदार इकट्ठा होकर अल्लाह की नेअ़मतों का शुक्र अदा करते हैं और रमज़ान की बरकतों को साझा करते हैं। हमेशा की तरह इस साल भी मुझे इस मुबारक इफ्तार में शरीक होने के लिए बड़े अदब और मोहब्बत के साथ याद किया गया, जिसके लिए मैं बरकत कॉलोनी के तमाम लोगों का दिल से शुक्रगुज़ार हूं। अफ़सोस कि इस साल भी मेरी व्यस्तताओं की वजह से इस मुबारक महफ़िल में शरीक होना मुमकिन न हो सका। पिछले कुछ वर्षों से मैं ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के ज़रिए होने वाले विभिन्न नेकी के कामों और दीन व इंसानियत की ख़िदमत के कामों में लगातार मशग़ूल रहता हूं। ख़ास तौर पर रमज़ान मुबारक के मुक़द्दस महीने में देश के अलग-अलग शहरों और कई जगहों से रोज़ा इफ्तार की दावतें पहले से तय हो जाती हैं। अक्सर ऐसा होता है कि जिस जगह से दावत पहले मिल जाती है, वहीं शिरकत करनी पड़ती है। कुछ मौक़ों पर तो मुझे रोज़ा इफ्तार की महफ़िलों में शामिल होने के लिए हवाई सफ़र भी करना पड़ता है। फिर भी बरकत कॉलोनी के लोगों की मोहब्बत मेरे दिल में हमेशा ज़िंदा रहती है और रहेगी। दुआ है कि अल्लाह तआला बरकत कॉलोनी के तमाम अहबाब को सलामती, खुशहाली और उनकी रोज़ी-रोटी में ढेरों बरकतें अता फरमाए और इस मोहब्बत व भाईचारे को हमेशा क़ायम रखे। आमीन सुम्मा आमीन। *सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी* चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी - ग़ौसे आज़म फाउंडेशन
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