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MOHAMMAD SAIFULLAH
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MOHAMMAD SAIFULLAH
@Allah_Ki_Talwar
National President & @Chief_Qazi : @GAF_NGO | Debater | Islamic Scholar | Writer | MLA Candidate: Vidyadhar Nagar Assembly | State Secretary & Spokesperson: API
India Katılım Haziran 2020
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*मदीने का सफ़र: आंसुओं, शर्म और मोहब्बत का वह रास्ता जो इंसान को बदल देता है*
आज के शोरगुल भरे, दौड़ती हुई दुनिया में इंसान बहुत कुछ हासिल कर लेता है। दौलत, शोहरत, ताक़त लेकिन एक चीज़ उससे दूर होती चली जाती है, दिल की नर्मी और रूह की सच्चाई। ऐसे दौर में मदीने का सफ़र केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि इंसान के अंदर होने वाली एक गहरी क्रांति का नाम है। जब एक आशिक़े रसूल, मदीने की ओर क़दम बढ़ाता है, तो वह एक आम मुसाफ़िर नहीं होता। वह अपने साथ अपने गुनाहों का बोझ, अपनी नाकामियों की कहानी और अपने दिल की टूटी हुई हालत लेकर चलता है। उसकी आंखों में आंसू होते हैं, माथे पर झुकाव होता है और क़दमों में लड़खड़ाहट। यह सब उसकी कमज़ोरी नहीं, बल्कि उसकी सच्ची पहचान है। असल में, यह सफ़र इंसान को यह एहसास दिलाता है कि वह खुद कुछ भी नहीं। अगर कोई चीज़ उसे आगे बढ़ा रही है, तो वह है रहमते मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का सहारा।
मदीने की सरज़मीं पर पहुंचकर इंसान को समझ में आता है कि पवित्रता (तक़द्दुस) किसे कहते हैं। वहां की हवा सिर्फ़ सांस लेने का ज़रिया नहीं होती, बल्कि दिल को पाक करने वाली एक रूहानी ताक़त बन जाती है। वहां का माहौल इंसान को ख़ामोशी में भी बहुत कुछ सिखा देता है। अदब, झुकाव और मोहब्बत।
इस सफ़र की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि यहां देखना आंखों से नहीं, बल्कि दिल से होता है। कई बार इंसान की आंखें उस नूर को देखने से क़िसिर रह जाती हैं लेकिन उसका दिल, उसकी बसीरत, उसे वह सब दिखा देती है जो ज़ाहिरी नज़र नहीं देख सकती और यही वह मुक़ाम है जहां से इंसान बदलना शुरू होता है। जो कभी अपनी खुशमिज़ाजी पर नाज़ करता था, वही अब मदीने की जुदाई में बेचैन और ग़मगीन रहने लगता है। यह ग़म कोई आम ग़म नहीं, बल्कि इश्क़ का वह दर्द है जो इंसान को अंदर से ज़िंदा कर देता है।
आज हमें खुद से एक सवाल पूछना चाहिए। क्या हमारा दिल भी उस सफ़र के लिए तैयार है? मदीने का रास्ता सिर्फ़ टिकट और पासपोर्ट से तय नहीं होता। यह रास्ता तय होता है आंसुओं से, तौबा से और सच्ची मोहब्बत से। अगर हम अपने दिल को साफ़ कर लें, अपने गुनाहों पर सच्चे दिल से पछता लें और अपनी ज़िंदगी को दरूद व सलाम से रोशन कर लें तो यक़ीन मानिए, मदीने का बुलावा भी दूर नहीं रहेगा क्योंकि मदीना सिर्फ़ एक शहर नहीं, वह एक एहसास है, एक पुकार है और एक ऐसी मंज़िल है जो इंसान को उसके रब और उसके नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से जोड़ देती है।
आज के इस भटके हुए दौर में, मदीने का सफ़र हमें यह सिखाता है कि असली कामयाबी बाहर की दुनिया जीतने में नहीं, बल्कि अपने अंदर की दुनिया को जीतने में है और जो इंसान इस सफ़र को समझ लेता है, वह फिर कभी पहले जैसा नहीं रहता।
*लेखक : सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी, चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी: ग़ौसे आज़म फाउंडेशन*

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*यौमे शहादत पर, विशेष समाचार रिपोर्ट*
*शहादत का सूरज फिर हुआ याद — हज़रत अमीर हम्ज़ा की शान में शोलाबार तक़रीर*
*सैकड़ों दिलों को झकझोर देने वाला बयान — सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने ग़ैरत, इश्क़ और कुर्बानी का जज़्बा किया ताज़ा*
*[विशेष प्रतिनिधि]*
इस्लामी कलेंडर 15 शव्वाल के मुक़द्दस दिन के मद्देनजर, यौमे शहादत हज़रत अमीर हम्ज़ा को बड़े अदब और अक़ीदत के साथ याद किया गया। इस मौक़े पर हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी (चेयरमैन एवं चीफ़ क़ाज़ी, ग़ौसे आज़म फाउंडेशन) ने एक बेहद शानदार, शोलाबार, जोश से भरपूर और दिलों को हिला देने वाला बयान पेश किया, जिसने मजमे में मौजूद हर शख्स के दिल में नई हरारत पैदा कर दी।
*यह सिर्फ एक शहादत नहीं… एक पैग़ाम है*
अपने प्रभावशाली अंदाज़ में सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि हज़रत अमीर हम्ज़ा की शहादत कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि यह एक ऐसा पैग़ाम है जो हर दौर के मुसलमानों को ग़ैरत, बहादुरी और सच्चाई पर डटे रहने की तालीम देता है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि आज भी अगर उम्मत अपने अंदर वही जज़्बा पैदा कर ले, तो हालात बदल सकते हैं।
*अज़मत, फ़ज़ीलत और शान का जीवंत चित्रण*
अपने बयान में सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने हज़रत अमीर हम्ज़ा की शख्सियत को बेहद प्रभावशाली अंदाज़ में पेश करते हुए कहा कि वह सिर्फ एक बहादुर योद्धा नहीं थे, बल्कि वफ़ादारी और इश्क़ की जीती - जागती मिसाल थे। उनका नाम सुनते ही मैदाने जंग में दुश्मनों के क़दम लड़खड़ा जाते थे। उनकी ज़िंदगी इस बात का सबूत है कि सच्चाई के लिए कुर्बानी देना ही असली कामयाबी है।
*इश्क़ ने शिकारी को इस्लाम का शेर बना दिया*
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने अपने बयान में वह दिलचस्प और ईमान अफ़रोज़ वाक़िआ भी बयान किया, जब हज़रत हम्ज़ा ने ग़ैरत और इश्क़ के जज़्बे में सच्चाई का साथ देने का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि यह इश्क़ था जिसने एक शिकारी को इस्लाम का शेर बना दिया और एक वार ने ज़ुल्म के गुरूर को तोड़ दिया।
*बदर से उहुद तक — कुर्बानी की मुकम्मल दास्तान*
अपने बयान में सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने जंगे बद्र में हज़रत अमीर हम्ज़ा की बहादुरी, उनकी जंगी महारत और दुश्मनों पर उनके रौब का ज़िक्र करते हुए कहा कि जहां वह खड़े होते, वहां मैदान का नक्शा बदल जाता था। दुश्मन भी उनकी ताक़त को मानने पर मजबूर हो जाते थे। इसके बाद उन्होंने जंगे उहद का वह दिल तोड़ देने वाला मंजर बयान किया, जहां हज़रत अमीर हम्ज़ा ने बहादुरी की इंतिहा दिखाते हुए शहादत का जाम पिया।
*मजलिस में नम आंखें, दिलों में जोश*
जैसे जैसे हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी का बयान आगे बढ़ता गया, मजलिस का माहौल ग़म और जोश के मिले-जुले जज़्बात से भर गया। कई बार लोगों की आंखें नम हो गईं, तो कई बार सुब्हानल्लाह, माशा अल्लाह और अल्हमदो लिल्लाह की गूंज ने फिज़ा को गरमा दिया।
*नौजवानों के नाम खास पैग़ाम*
अपने बयान के आखिर में सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने खास तौर पर नौजवानों को संबोधित करते हुए कहा कि अगर तुम हज़रत अमीर हम्ज़ा से मोहब्बत करते हो, तो उनके किरदार को अपनी ज़िंदगी में उतारो। सिर्फ नाम लेने से कुछ नहीं होगा, सच्चाई के लिए खड़े होना होगा।
*आख़िरी असरदार पुकार*
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने अपने बयान में कहा कि हज़रत अमीर हम्ज़ा, वह बुलंद मुक़ाम वाली हस्ती हैं जिन्हें अल्लाह का शेर और रसूल का शेर कहा गया। वह शहीदों के सरदार हैं, वफ़ादारी और बहादुरी की जीती - जागती मिसाल हैं। उन्होंने इस बात को बड़े असरदार अंदाज़ में पेश किया कि हज़रत अमीर हम्ज़ा सिर्फ रिश्ते में चाचा ही नहीं, बल्कि दूध-भाई भी थे यानी नज़दीकी, मोहब्बत और कुर्बत की वह तमाम मंज़िलें उनमें जमा थीं जो किसी को भी बुलंदी तक पहुंचा देती हैं। उन्होंने आगे कहा कि वह सिर्फ एक जंगी सिपाही नहीं थे, बल्कि गरजदार आवाज़, अटल हिम्मत और अडिग हौसले के मालिक थे। मुसीबत की घड़ी में सहारा बनना, हक़ के लिए डट जाना और हर हाल में सच्चाई का साथ देना, यही उनका पैग़ाम है। आख़िर में उन्होंने पूरे जोश के साथ कहा कि हज़रत अमीर हम्ज़ा फ़ख्र-ए-इस्लाम हैं और उनका नाम आज भी हर दिल में हिम्मत, ग़ैरत और कुर्बानी की नई रूह फूंक देता है।
*निष्कर्ष*
यह बयान सिर्फ एक तक़रीर नहीं था, बल्कि एक ऐसी पुकार थी, जिसने हर सुनने वाले को अपने ईमान, अपने किरदार और अपनी ज़िम्मेदारियों पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया। यौमे शहादत हज़रत अमीर हम्ज़ा के इस मौक़े पर पेश किया गया यह बयान, आने वाले वक़्त में भी लोगों के दिलों में जज़्बा और हिम्मत पैदा करता रहेगा।

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A Model of Pen, Law and Service: The National Role of Ghause Azam Foundation
By: Adv. Mohammad Osama Saifullah @Osama__GAF

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@grok @ManiYogini इसकी ज़रूरत नहीं है। मुझे पता है कि ग्रोक कैसे सवालों के जवाबात देता है?😄😊😂
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@Allah_Ki_Talwar @ManiYogini Ask Grok वर्तमान में केवल Premium और Premium+ सदस्यों के लिए उपलब्ध है। इस सुविधा को अनलॉक करने के लिए सदस्यता लें: x.com/i/premium_sign…
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अपनी ही सगी बहन को बना लिया बेगम । पाकिस्तान के रहने कलामुद्दीन खान की बेगम जब गुस्से में अपने मायके चली गयी और 2 महीने तक वापस नहीं लौटी तो कलामुद्दीन को अपनी बीबी की बेहद याद सताने लगी , क्योंकि कलामुद्दीन मियाँ को कुछ और भले नहीं आता था लेकिन पंचर बनाने में और खु•राखा•र करने में बहुत माहिर थे ,
रमजान ख़तम होते ही घर में ईद मनाई गयी खुशी का माहौल था । ईद के मौके पर शाम को अपनी ही जवान बहन शकीना खान को हसीन ड्रेस में देख कर मियाँ कलामुद्दीन की नीयत खराब हो गयी और मौका पाकर अपनी ही बहन शकीना संग उ•ला•ला कर दिया जिसके बाद अब शकीना बहन से बेगम बन गयी । इस तरह मियाँ कालामुद्दीन 2 - 2 बीवियों के सौहर बन गये ।
यही है मजा• हब की असली खूबसूरती
😜😂😜😂
वैसे तो ऐसी घटनाये शर्मशार करने वाली हैं. लेकिन बे•श•र्मों को कोई फर्क नहीं पड़ता । बाकी इस अनोखी घटना पर आपकी क्या राय है कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं ?

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بسم اللہ الرحمٰن الرحیم
میرے پیارے بیٹے,
*محمد خالد سیف اللہ!*
آج کا دن ہمارے لیے بے حد خوشی، شکر اور محبت کا دن ہے، کیونکہ یہ وہ مبارک گھڑی ہے جب اللہ ربُّ العزت نے ہمیں تم جیسی نعمتِ عظمیٰ سے نوازا۔ تمہاری پیدائش ہمارے گھر میں رحمت، برکت اور مسرت کا پیغام لے کر آئی۔
*بیٹا!*
ہم اللہ تعالیٰ کا جتنا شکر ادا کریں، کم ہے کہ اس نے تمہیں صحت، عقل، صلاحیت اور نیک فطرت عطا فرمائی۔ آج تمہاری سالگرہ کے موقع پر ہم تمہارے لیے دل کی گہرائیوں سے دعاگو ہیں کہ
اللہ تعالیٰ تمہیں دین و دنیا کی کامیابیوں سے سرفراز فرمائے،
تمہیں نیک، صالح اور باکردار انسان بنائے اور تمہیں ہمیشہ اپنے والدین کے لیے صدقۂ جاریہ بنائے۔
*میرے لختِ جگر!*
زندگی صرف خوشیوں اور جشن کا نام نہیں، بلکہ یہ ایک امانت اور آزمائش بھی ہے۔ تمہیں چاہیے کہ:
ہمیشہ نماز کی پابندی کرو، کیونکہ یہی کامیابی کی کنجی ہے۔
اپنے دل کو قرآنِ کریم کی روشنی سے منور رکھو۔
سچائی، دیانت اور حسنِ اخلاق کو اپنی پہچان بناؤ۔
بڑوں کا ادب اور چھوٹوں پر شفقت کو اپنی زندگی کا اصول بنا لو۔
علم حاصل کرنے میں کبھی سستی نہ کرو، کیونکہ علم ہی انسان کو بلند مقام عطا کرتا ہے۔
*بیٹا!*
یاد رکھو کہ دنیا کی سب سے بڑی کامیابی اللہ اور اس کے رسول ﷺ کی رضا ہے۔ لہٰذا اپنی زندگی کو ایسے گزارو کہ تمہارا ہر عمل اللہ کو پسند آئے اور تم قیامت کے دن سرخرو ہو سکو۔
*والدین کی جانب سے چند نصیحتیں:*
بیٹا! ہم تمہیں نصیحت کرتے ہیں کہ
اپنی صحبت نیک لوگوں کے ساتھ رکھو،
برے دوستوں سے ہمیشہ بچو،
وقت کی قدر کرو کیونکہ گزرا ہوا وقت واپس نہیں آتا اور ہمیشہ اپنے ماں باپ، بھائی اور فیملی کی عزت و خدمت کو اپنا شعار بناؤ۔
*میرے عزیز بیٹے!*
ہمیں تم پر فخر ہے اور ہمیں یقین ہے کہ تم ایک دن اپنے اخلاق، علم اور کردار سے نہ صرف اپنا اور اپنے خاندان کا بلکہ پوری قوم کا نام روشن کرو گے۔
*آخر میں ہماری دعا:*
اللہ تعالیٰ تمہاری عمر میں برکت عطا فرمائے، تمہیں ہر بلا و مصیبت سے محفوظ رکھے اور تمہیں دنیا و آخرت میں کامیاب و کامران فرمائے۔
آمین بجاہ سید المرسلین ﷺ
🎉 *سالگرہ مبارک ہو، میرے پیارے بیٹے!* 🎉
تمہارے والد و والدہ 💖
*سیف اللہ قادری*
*************سیف اللہ*
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*क़लम, क़ानून और ख़िदमत का मॉडल : ग़ौसे आज़म फाउंडेशन की राष्ट्रीय भूमिका*
भारत जैसे विविधतापूर्ण लोकतांत्रिक देश में सामाजिक संगठनों की भूमिका केवल सेवा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वे समय-समय पर समाज के नैतिक, वैचारिक और संवैधानिक मार्गदर्शक के रूप में भी कार्य करते हैं। ऐसे ही संगठनों में, सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त एनजीओ, ग़ौसे आज़म फाउंडेशन (जीएएफ़) और उसके चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी, हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी का नाम बहुत ही तेज़ी से राष्ट्रीय विमर्श में जगह बना चुका है। पिछले कुछ वर्षों में यह संस्था धार्मिक कार्यों के साथ साथ क़लम, क़ानून और ख़िदमत के त्रिकोण पर आधारित एक सशक्त सामाजिक-वैचारिक मॉडल के रूप में सामने आई है, जिसे अनदेखा करना संभव नहीं।
*डिजिटल दौर में धार्मिक नेतृत्व की नई परिभाषा*
आज जब सोशल मीडिया अक्सर भ्रम, उग्रता और ध्रुवीकरण का माध्यम बन जाता है, ऐसे समय में कुछ आवाज़ें इसे ज़िम्मेदारी और सुधार के औज़ार के रूप में भी इस्तेमाल कर रही हैं। ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के नेतृत्व ने डिजिटल प्लेटफॉर्म को केवल प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि
जनजागरूकता, क़ानूनी मार्गदर्शन और सामाजिक हस्तक्षेप का एक सशक्त मंच बनाया है। यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रतिक्रियात्मक राजनीति के बजाय संवैधानिक और शांतिपूर्ण प्रतिरोध को बढ़ावा दिया गया जो आज के दौर में एक संतुलित और परिपक्व दृष्टिकोण माना जाना चाहिए।
*नामूसे रिसालत से संविधान तक : संघर्ष का संतुलित रास्ता*
धार्मिक अस्मिता के प्रश्न अक्सर भावनात्मक होते हैं और कई बार इनका समाधान टकराव की ओर बढ़ जाता है लेकिन जीएएफ़ का मॉडल यहां एक अलग रास्ता प्रस्तुत करता है। भावना हो मज़बूत, मगर तरीका हो क़ानूनी। हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी (चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी, ग़ौसे आज़म फाउंडेशन) के नेतृत्व में यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि
किसी भी प्रकार के अपमान या अन्याय का जवाब सड़क पर नहीं, बल्कि अदालत में दिया जाए। यह सोच न केवल क़ानून के प्रति सम्मान को दर्शाती है बल्कि समाज को अराजकता से भी बचाती है।
*ख़िदमते ख़ल्क़: जब सेवा केवल नारा नहीं रहती*
किसी भी संगठन की असली पहचान उसके जमीनी कार्यों से होती है। लॉकडाउन और आपदाओं के दौरान ग़ौसे आज़म फाउंडेशन द्वारा हज़ारों परिवारों तक राहत पहुंचाना, बिना जाति और धर्म के भेदभाव के सेवा करना यह साबित करता है कि यह संस्था मैदान में उतरकर काम करने वाली शक्ति है। आज जब समाज में अविश्वास की खाई बढ़ रही है, ऐसे कार्य इंसानियत की साझा ज़मीन तैयार करते हैं।
*सूफ़ी विचारधारा: कट्टरता के दौर में एक संतुलित विकल्प*
देश और दुनिया आज जिस सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं, वह है, कट्टरता और वैचारिक अतिवाद। ऐसे समय में ग़ौसे आज़म फाउंडेशन द्वारा सूफ़ी विचारधारा, मोहब्बत, सहिष्णुता
और आत्मिक सुधार का प्रचार करना केवल धार्मिक कार्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता बन जाता है। यह दृष्टिकोण समाज को विभाजन से निकालकर संवाद और सहअस्तित्व की ओर ले जाता है।
*संगठन से आंदोलन तक : एक बढ़ती हुई ताक़त*
आज ग़ौसे आज़म फाउंडेशन का कार्य केवल कार्यक्रमों और बैठकों तक सीमित नहीं रहा। देश के विभिन्न राज्यों में इसकी उपस्थिति, कार्यकर्ताओं का नेटवर्क
और इसका निरंतर सामाजिक हस्तक्षेप, राष्ट्रीय सामाजिक-वैचारिक आंदोलन का रूप ले चुकी है।
*आलोचना से ऊपर उठकर, मूल्यांकन की ज़रूरत*
किसी भी संगठन के साथ आलोचनाएं भी जुड़ी होती हैं और यह लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है लेकिन यह भी ज़रूरी है कि मूल्यांकन तथ्यों और कार्यों के आधार पर किया जाए, न कि पूर्वाग्रहों के आधार पर। ग़ौसे आज़म फाउंडेशन का मॉडल इस मायने में अध्ययन योग्य है कि:
यह धार्मिक पहचान को सामाजिक ज़िम्मेदारी से जोड़ता है और भावनाओं को क़ानून के दायरे में रखकर आगे बढ़ाता है।
*निष्कर्ष: एक मॉडल, जिसे समझना होगा*
आज भारत को ऐसे मॉडलों की आवश्यकता है जो धर्म को विभाजन का नहीं बल्कि सेवा और नैतिकता का माध्यम बनाएं और समाज को टकराव से निकालकर सहयोग की ओर ले जाएं। ग़ौसे आज़म फाउंडेशन का स्वरूप यही संकेत देता है कि अगर नेतृत्व दूरदर्शी हो, तो एक संस्था केवल संगठन नहीं रहती, वह समाज में बदलाव की दिशा तय करती है। अब यह समय है कि नीति-निर्माता, बुद्धिजीवी और समाज के विभिन्न वर्ग
इस तरह के मॉडलों का गंभीरता से अध्ययन करें क्योंकि शायद यहीं से भविष्य के भारत का संतुलित, समावेशी और संवैधानिक रास्ता निकलता है।
*मौलाना जुनैद रज़ा पटेल*
लेखक : आला हज़रत मस्जिद के इमाम और हुज़ूर मुफ्ती-ए-आज़म मालवा के ख़लीफ़ा हैं।

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*क़लम, क़ानून और ख़िदमत का मॉडल : ग़ौसे आज़म फाउंडेशन की राष्ट्रीय भूमिका*
भारत जैसे विविधतापूर्ण लोकतांत्रिक देश में सामाजिक संगठनों की भूमिका केवल सेवा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वे समय-समय पर समाज के नैतिक, वैचारिक और संवैधानिक मार्गदर्शक के रूप में भी कार्य करते हैं। ऐसे ही संगठनों में, सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त एनजीओ, ग़ौसे आज़म फाउंडेशन (जीएएफ़) और उसके चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी, हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी का नाम बहुत ही तेज़ी से राष्ट्रीय विमर्श में जगह बना चुका है। पिछले कुछ वर्षों में यह संस्था धार्मिक कार्यों के साथ साथ क़लम, क़ानून और ख़िदमत के त्रिकोण पर आधारित एक सशक्त सामाजिक-वैचारिक मॉडल के रूप में सामने आई है, जिसे अनदेखा करना संभव नहीं।
*डिजिटल दौर में धार्मिक नेतृत्व की नई परिभाषा*
आज जब सोशल मीडिया अक्सर भ्रम, उग्रता और ध्रुवीकरण का माध्यम बन जाता है, ऐसे समय में कुछ आवाज़ें इसे ज़िम्मेदारी और सुधार के औज़ार के रूप में भी इस्तेमाल कर रही हैं। ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के नेतृत्व ने डिजिटल प्लेटफॉर्म को केवल प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि
जनजागरूकता, क़ानूनी मार्गदर्शन और सामाजिक हस्तक्षेप का एक सशक्त मंच बनाया है। यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रतिक्रियात्मक राजनीति के बजाय संवैधानिक और शांतिपूर्ण प्रतिरोध को बढ़ावा दिया गया जो आज के दौर में एक संतुलित और परिपक्व दृष्टिकोण माना जाना चाहिए।
*नामूसे रिसालत से संविधान तक : संघर्ष का संतुलित रास्ता*
धार्मिक अस्मिता के प्रश्न अक्सर भावनात्मक होते हैं और कई बार इनका समाधान टकराव की ओर बढ़ जाता है लेकिन जीएएफ़ का मॉडल यहां एक अलग रास्ता प्रस्तुत करता है। भावना हो मज़बूत, मगर तरीका हो क़ानूनी। हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी (चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी, ग़ौसे आज़म फाउंडेशन) के नेतृत्व में यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि
किसी भी प्रकार के अपमान या अन्याय का जवाब सड़क पर नहीं, बल्कि अदालत में दिया जाए। यह सोच न केवल क़ानून के प्रति सम्मान को दर्शाती है बल्कि समाज को अराजकता से भी बचाती है।
*ख़िदमते ख़ल्क़: जब सेवा केवल नारा नहीं रहती*
किसी भी संगठन की असली पहचान उसके जमीनी कार्यों से होती है। लॉकडाउन और आपदाओं के दौरान ग़ौसे आज़म फाउंडेशन द्वारा हज़ारों परिवारों तक राहत पहुंचाना, बिना जाति और धर्म के भेदभाव के सेवा करना यह साबित करता है कि यह संस्था मैदान में उतरकर काम करने वाली शक्ति है। आज जब समाज में अविश्वास की खाई बढ़ रही है, ऐसे कार्य इंसानियत की साझा ज़मीन तैयार करते हैं।
*सूफ़ी विचारधारा: कट्टरता के दौर में एक संतुलित विकल्प*
देश और दुनिया आज जिस सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं, वह है, कट्टरता और वैचारिक अतिवाद। ऐसे समय में ग़ौसे आज़म फाउंडेशन द्वारा सूफ़ी विचारधारा, मोहब्बत, सहिष्णुता
और आत्मिक सुधार का प्रचार करना केवल धार्मिक कार्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता बन जाता है। यह दृष्टिकोण समाज को विभाजन से निकालकर संवाद और सहअस्तित्व की ओर ले जाता है।
*संगठन से आंदोलन तक : एक बढ़ती हुई ताक़त*
आज ग़ौसे आज़म फाउंडेशन का कार्य केवल कार्यक्रमों और बैठकों तक सीमित नहीं रहा। देश के विभिन्न राज्यों में इसकी उपस्थिति, कार्यकर्ताओं का नेटवर्क
और इसका निरंतर सामाजिक हस्तक्षेप, राष्ट्रीय सामाजिक-वैचारिक आंदोलन का रूप ले चुकी है।
*आलोचना से ऊपर उठकर, मूल्यांकन की ज़रूरत*
किसी भी संगठन के साथ आलोचनाएं भी जुड़ी होती हैं और यह लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है लेकिन यह भी ज़रूरी है कि मूल्यांकन तथ्यों और कार्यों के आधार पर किया जाए, न कि पूर्वाग्रहों के आधार पर। ग़ौसे आज़म फाउंडेशन का मॉडल इस मायने में अध्ययन योग्य है कि:
यह धार्मिक पहचान को सामाजिक ज़िम्मेदारी से जोड़ता है और भावनाओं को क़ानून के दायरे में रखकर आगे बढ़ाता है।
*निष्कर्ष: एक मॉडल, जिसे समझना होगा*
आज भारत को ऐसे मॉडलों की आवश्यकता है जो धर्म को विभाजन का नहीं बल्कि सेवा और नैतिकता का माध्यम बनाएं और समाज को टकराव से निकालकर सहयोग की ओर ले जाएं। ग़ौसे आज़म फाउंडेशन का स्वरूप यही संकेत देता है कि अगर नेतृत्व दूरदर्शी हो, तो एक संस्था केवल संगठन नहीं रहती, वह समाज में बदलाव की दिशा तय करती है। अब यह समय है कि नीति-निर्माता, बुद्धिजीवी और समाज के विभिन्न वर्ग
इस तरह के मॉडलों का गंभीरता से अध्ययन करें क्योंकि शायद यहीं से भविष्य के भारत का संतुलित, समावेशी और संवैधानिक रास्ता निकलता है।
*मौलाना जुनैद रज़ा पटेल*
लेखक : आला हज़रत मस्जिद के इमाम और हुज़ूर मुफ्ती-ए-आज़म मालवा के ख़लीफ़ा हैं।

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*क़लम, क़ानून और ख़िदमत का मॉडल : ग़ौसे आज़म फाउंडेशन की राष्ट्रीय भूमिका*
भारत जैसे विविधतापूर्ण लोकतांत्रिक देश में सामाजिक संगठनों की भूमिका केवल सेवा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वे समय-समय पर समाज के नैतिक, वैचारिक और संवैधानिक मार्गदर्शक के रूप में भी कार्य करते हैं। ऐसे ही संगठनों में, सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त एनजीओ, ग़ौसे आज़म फाउंडेशन (जीएएफ़) और उसके चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी, हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी का नाम बहुत ही तेज़ी से राष्ट्रीय विमर्श में जगह बना चुका है। पिछले कुछ वर्षों में यह संस्था धार्मिक कार्यों के साथ साथ क़लम, क़ानून और ख़िदमत के त्रिकोण पर आधारित एक सशक्त सामाजिक-वैचारिक मॉडल के रूप में सामने आई है, जिसे अनदेखा करना संभव नहीं।
*डिजिटल दौर में धार्मिक नेतृत्व की नई परिभाषा*
आज जब सोशल मीडिया अक्सर भ्रम, उग्रता और ध्रुवीकरण का माध्यम बन जाता है, ऐसे समय में कुछ आवाज़ें इसे ज़िम्मेदारी और सुधार के औज़ार के रूप में भी इस्तेमाल कर रही हैं। ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के नेतृत्व ने डिजिटल प्लेटफॉर्म को केवल प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि
जनजागरूकता, क़ानूनी मार्गदर्शन और सामाजिक हस्तक्षेप का एक सशक्त मंच बनाया है। यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रतिक्रियात्मक राजनीति के बजाय संवैधानिक और शांतिपूर्ण प्रतिरोध को बढ़ावा दिया गया जो आज के दौर में एक संतुलित और परिपक्व दृष्टिकोण माना जाना चाहिए।
*नामूसे रिसालत से संविधान तक : संघर्ष का संतुलित रास्ता*
धार्मिक अस्मिता के प्रश्न अक्सर भावनात्मक होते हैं और कई बार इनका समाधान टकराव की ओर बढ़ जाता है लेकिन जीएएफ़ का मॉडल यहां एक अलग रास्ता प्रस्तुत करता है। भावना हो मज़बूत, मगर तरीका हो क़ानूनी। हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी (चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी, ग़ौसे आज़म फाउंडेशन) के नेतृत्व में यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि
किसी भी प्रकार के अपमान या अन्याय का जवाब सड़क पर नहीं, बल्कि अदालत में दिया जाए। यह सोच न केवल क़ानून के प्रति सम्मान को दर्शाती है बल्कि समाज को अराजकता से भी बचाती है।
*ख़िदमते ख़ल्क़: जब सेवा केवल नारा नहीं रहती*
किसी भी संगठन की असली पहचान उसके जमीनी कार्यों से होती है। लॉकडाउन और आपदाओं के दौरान ग़ौसे आज़म फाउंडेशन द्वारा हज़ारों परिवारों तक राहत पहुंचाना, बिना जाति और धर्म के भेदभाव के सेवा करना यह साबित करता है कि यह संस्था मैदान में उतरकर काम करने वाली शक्ति है। आज जब समाज में अविश्वास की खाई बढ़ रही है, ऐसे कार्य इंसानियत की साझा ज़मीन तैयार करते हैं।
*सूफ़ी विचारधारा: कट्टरता के दौर में एक संतुलित विकल्प*
देश और दुनिया आज जिस सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं, वह है, कट्टरता और वैचारिक अतिवाद। ऐसे समय में ग़ौसे आज़म फाउंडेशन द्वारा सूफ़ी विचारधारा, मोहब्बत, सहिष्णुता
और आत्मिक सुधार का प्रचार करना केवल धार्मिक कार्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता बन जाता है। यह दृष्टिकोण समाज को विभाजन से निकालकर संवाद और सहअस्तित्व की ओर ले जाता है।
*संगठन से आंदोलन तक : एक बढ़ती हुई ताक़त*
आज ग़ौसे आज़म फाउंडेशन का कार्य केवल कार्यक्रमों और बैठकों तक सीमित नहीं रहा। देश के विभिन्न राज्यों में इसकी उपस्थिति, कार्यकर्ताओं का नेटवर्क
और इसका निरंतर सामाजिक हस्तक्षेप, राष्ट्रीय सामाजिक-वैचारिक आंदोलन का रूप ले चुकी है।
*आलोचना से ऊपर उठकर, मूल्यांकन की ज़रूरत*
किसी भी संगठन के साथ आलोचनाएं भी जुड़ी होती हैं और यह लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है लेकिन यह भी ज़रूरी है कि मूल्यांकन तथ्यों और कार्यों के आधार पर किया जाए, न कि पूर्वाग्रहों के आधार पर। ग़ौसे आज़म फाउंडेशन का मॉडल इस मायने में अध्ययन योग्य है कि:
यह धार्मिक पहचान को सामाजिक ज़िम्मेदारी से जोड़ता है और भावनाओं को क़ानून के दायरे में रखकर आगे बढ़ाता है।
*निष्कर्ष: एक मॉडल, जिसे समझना होगा*
आज भारत को ऐसे मॉडलों की आवश्यकता है जो धर्म को विभाजन का नहीं बल्कि सेवा और नैतिकता का माध्यम बनाएं और समाज को टकराव से निकालकर सहयोग की ओर ले जाएं। ग़ौसे आज़म फाउंडेशन का स्वरूप यही संकेत देता है कि अगर नेतृत्व दूरदर्शी हो, तो एक संस्था केवल संगठन नहीं रहती, वह समाज में बदलाव की दिशा तय करती है। अब यह समय है कि नीति-निर्माता, बुद्धिजीवी और समाज के विभिन्न वर्ग
इस तरह के मॉडलों का गंभीरता से अध्ययन करें क्योंकि शायद यहीं से भविष्य के भारत का संतुलित, समावेशी और संवैधानिक रास्ता निकलता है।
*मौलाना जुनैद रज़ा पटेल*
लेखक : आला हज़रत मस्जिद के इमाम और हुज़ूर मुफ्ती-ए-आज़म मालवा के ख़लीफ़ा हैं।

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*क़लम, क़ानून और ख़िदमत का मॉडल : ग़ौसे आज़म फाउंडेशन की राष्ट्रीय भूमिका*
भारत जैसे विविधतापूर्ण लोकतांत्रिक देश में सामाजिक संगठनों की भूमिका केवल सेवा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वे समय-समय पर समाज के नैतिक, वैचारिक और संवैधानिक मार्गदर्शक के रूप में भी कार्य करते हैं। ऐसे ही संगठनों में, सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त एनजीओ, ग़ौसे आज़म फाउंडेशन (जीएएफ़) और उसके चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी, हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी का नाम बहुत ही तेज़ी से राष्ट्रीय विमर्श में जगह बना चुका है। पिछले कुछ वर्षों में यह संस्था धार्मिक कार्यों के साथ साथ क़लम, क़ानून और ख़िदमत के त्रिकोण पर आधारित एक सशक्त सामाजिक-वैचारिक मॉडल के रूप में सामने आई है, जिसे अनदेखा करना संभव नहीं।
*डिजिटल दौर में धार्मिक नेतृत्व की नई परिभाषा*
आज जब सोशल मीडिया अक्सर भ्रम, उग्रता और ध्रुवीकरण का माध्यम बन जाता है, ऐसे समय में कुछ आवाज़ें इसे ज़िम्मेदारी और सुधार के औज़ार के रूप में भी इस्तेमाल कर रही हैं। ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के नेतृत्व ने डिजिटल प्लेटफॉर्म को केवल प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि
जनजागरूकता, क़ानूनी मार्गदर्शन और सामाजिक हस्तक्षेप का एक सशक्त मंच बनाया है। यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रतिक्रियात्मक राजनीति के बजाय संवैधानिक और शांतिपूर्ण प्रतिरोध को बढ़ावा दिया गया जो आज के दौर में एक संतुलित और परिपक्व दृष्टिकोण माना जाना चाहिए।
*नामूसे रिसालत से संविधान तक : संघर्ष का संतुलित रास्ता*
धार्मिक अस्मिता के प्रश्न अक्सर भावनात्मक होते हैं और कई बार इनका समाधान टकराव की ओर बढ़ जाता है लेकिन जीएएफ़ का मॉडल यहां एक अलग रास्ता प्रस्तुत करता है। भावना हो मज़बूत, मगर तरीका हो क़ानूनी। हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी (चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी, ग़ौसे आज़म फाउंडेशन) के नेतृत्व में यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि
किसी भी प्रकार के अपमान या अन्याय का जवाब सड़क पर नहीं, बल्कि अदालत में दिया जाए। यह सोच न केवल क़ानून के प्रति सम्मान को दर्शाती है बल्कि समाज को अराजकता से भी बचाती है।
*ख़िदमते ख़ल्क़: जब सेवा केवल नारा नहीं रहती*
किसी भी संगठन की असली पहचान उसके जमीनी कार्यों से होती है। लॉकडाउन और आपदाओं के दौरान ग़ौसे आज़म फाउंडेशन द्वारा हज़ारों परिवारों तक राहत पहुंचाना, बिना जाति और धर्म के भेदभाव के सेवा करना यह साबित करता है कि यह संस्था मैदान में उतरकर काम करने वाली शक्ति है। आज जब समाज में अविश्वास की खाई बढ़ रही है, ऐसे कार्य इंसानियत की साझा ज़मीन तैयार करते हैं।
*सूफ़ी विचारधारा: कट्टरता के दौर में एक संतुलित विकल्प*
देश और दुनिया आज जिस सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं, वह है, कट्टरता और वैचारिक अतिवाद। ऐसे समय में ग़ौसे आज़म फाउंडेशन द्वारा सूफ़ी विचारधारा, मोहब्बत, सहिष्णुता
और आत्मिक सुधार का प्रचार करना केवल धार्मिक कार्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता बन जाता है। यह दृष्टिकोण समाज को विभाजन से निकालकर संवाद और सहअस्तित्व की ओर ले जाता है।
*संगठन से आंदोलन तक : एक बढ़ती हुई ताक़त*
आज ग़ौसे आज़म फाउंडेशन का कार्य केवल कार्यक्रमों और बैठकों तक सीमित नहीं रहा। देश के विभिन्न राज्यों में इसकी उपस्थिति, कार्यकर्ताओं का नेटवर्क
और इसका निरंतर सामाजिक हस्तक्षेप, राष्ट्रीय सामाजिक-वैचारिक आंदोलन का रूप ले चुकी है।
*आलोचना से ऊपर उठकर, मूल्यांकन की ज़रूरत*
किसी भी संगठन के साथ आलोचनाएं भी जुड़ी होती हैं और यह लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है लेकिन यह भी ज़रूरी है कि मूल्यांकन तथ्यों और कार्यों के आधार पर किया जाए, न कि पूर्वाग्रहों के आधार पर। ग़ौसे आज़म फाउंडेशन का मॉडल इस मायने में अध्ययन योग्य है कि:
यह धार्मिक पहचान को सामाजिक ज़िम्मेदारी से जोड़ता है और भावनाओं को क़ानून के दायरे में रखकर आगे बढ़ाता है।
*निष्कर्ष: एक मॉडल, जिसे समझना होगा*
आज भारत को ऐसे मॉडलों की आवश्यकता है जो धर्म को विभाजन का नहीं बल्कि सेवा और नैतिकता का माध्यम बनाएं और समाज को टकराव से निकालकर सहयोग की ओर ले जाएं। ग़ौसे आज़म फाउंडेशन का स्वरूप यही संकेत देता है कि अगर नेतृत्व दूरदर्शी हो, तो एक संस्था केवल संगठन नहीं रहती, वह समाज में बदलाव की दिशा तय करती है। अब यह समय है कि नीति-निर्माता, बुद्धिजीवी और समाज के विभिन्न वर्ग
इस तरह के मॉडलों का गंभीरता से अध्ययन करें क्योंकि शायद यहीं से भविष्य के भारत का संतुलित, समावेशी और संवैधानिक रास्ता निकलता है।
*मौलाना जुनैद रज़ा पटेल*
लेखक : आला हज़रत मस्जिद के इमाम और हुज़ूर मुफ्ती-ए-आज़म मालवा के ख़लीफ़ा हैं।

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*ईद सिर्फ कपड़ों की नहीं, किरदार की है - ईदगाह में गूंजा सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी का शोलाबार पैग़ाम*
*नमाज़ियों की मौजूदगी में गूंजी तक़रीर, गुनाहों से तौबा और असल ईद मनाने की दी ताकीद*
*विशेष प्रतिनिधि*
नूरी जामा मस्जिद के समीप, ईदगाह उस वक़्त ईमान की रौशनी से जगमगा उठा, जब ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के चेयरमैन एवं चीफ़ क़ाज़ी, हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने नमाज़ से पहले अपने जोशीले, शोलाबार और दिलों को झकझोर देने वाले अंदाज़ में नमाज़ियों को खिताब किया। उनकी आवाज़ में दर्द था, अल्फ़ाज़ में आग थी और पैग़ाम में ऐसी सच्चाई कि हर दिल झूम उठा।
*रमज़ान इम्तिहान था, ईद उसका रिज़ल्ट है*
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि रमज़ान रहमत, मग़फ़िरत और जहन्नम से आज़ादी का महीना था और आज ईद उस बंदे की है जिसने अपने गुनाहों को छोड़ा, अपने रब को राज़ी किया। उन्होंने कुरआन शरीफ़ की आयत का हवाला देते हुए कहा कि असली खुशी अल्लाह के फ़ज़्ल और रहमत पर मनाई जाए न कि सिर्फ नए कपड़ों, फैशन और दिखावे पर।
*ईद की सुबह, अल्लाह का आम माफ़ीनामा*
तक़रीर में सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने जोश के साथ बयान किया कि ईद की रात “लैलतुल जाइजाह” यानी इनाम की रात होती है। आज का दिन वह दिन है जब अल्लाह फरिश्तों के ज़रिये ऐलान करवाता है, ऐ उम्मते मोहम्मद! आओ, मांगो… आज कोई खाली नहीं जाएगा। यह सुनकर ईदगाह में “ सुब्हानल्लाह ” और “ माशा अल्लाह ” की सदाएं गूंज उठीं।
*खबरदार! ईद को गुनाहों का त्योहार मत बनाओ*
अपने बयान में सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने नसीहत भरे लहज़े में आगाह किया कि आज ईद का नाम लेकर गाने, नाच, फिज़ूलखर्ची और बेपरवाही… यह ईद नहीं, यह शैतान की जीत है। उन्होंने कुरआन की चेतावनी दोहराई, फ़िज़ूलखर्च करने वाले शैतान के भाई हैं।
*ईद या वईद, फैसला तुम्हारे आमाल करेंगे*
हज़रत उमर फ़ारूक़ का वाक़िया सुनाते हुए सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी की आवाज़ भर्रा गई। जिसके रोज़े-नमाज़ क़बूल हो गए, उसकी आज ईद है और जिसका सब रद्द हो गया, उसके लिए यही दिन वईद है।
*असल ईद, खुद को बदलने का नाम है*
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने ज़ोर देकर कहा कि ईद नए कपड़ों का नहीं, नए किरदार का नाम है, दिल की सफाई का नाम है, अल्लाह को खुश करने का नाम है।
*अमन, भाईचारे और मुल्क की खुशहाली के लिए दुआ*
तक़रीर के आखिर में सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने मुल्क में अमन, भाईचारे और तरक्की के लिए ईदगाह में ख़ास दुआ कराई, जिसमें हज़ारों हाथ एक साथ उठे और आमीन की सदाएं गूंज उठीं।
#عيد_الفطر_١٤٤٧ه
#ईद
#EIDMUMARAK

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