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प्रिय साथियों,शुभचिंतकों एवं मेरे अपने जनों,
9 अक्टूबर मेरे जीवन का सबसे कठिन और असहनीय दिन बन गया,
जब मेरा लाडला पुत्र हनुमंत सदा के लिए मुझसे दूर चला गया।
एक पिता के रूप में यह पीड़ा शब्दों से कहीं गहरी है —
यह ऐसा घाव है, जो शायद जीवनभर नहीं भर पाएगा।
पर इस अंधेरे दुःख के बीच,आप सबका स्नेह, आपका साथ और आपकी संवेदनाएँ
मेरे लिए सच में ईश्वर के करुणामय आशीर्वाद बनकर उतरीं।
जब मन पूरी तरह टूट चुका था,
तब आपके प्रेमभरे शब्दों,आपकी करुण आँखों और आपके मौन स्नेह ने मुझे थाम लिया, संभाल लिया,और फिर से जीने की हिम्मत दी।
हजारों-लाखों साथियों, शुभचिंतकों और स्वजनों ने जिस आत्मीयता से मुझे संबल दिया,
उसने मुझे गहराई से महसूस कराया कि —
मेरा एक बेटा चला गया है,
पर मेरे हजारों-लाखों बेटे-बेटियाँ और साथी आज भी मेरे साथ खड़े हैं।
आप सबका यह प्रेम,यह साथ,अब मेरे जीवन में हनुमंत के रूप में जीवित है।
आपका स्नेह ही उसकी मुस्कान बनकर
मेरे हर दुःख में प्रकाश बन जाता है।
मैं और मेरा पूरा परिवार आप सभी के प्रेम, प्रार्थनाओं और अपनेपन के लिए हृदय की गहराइयों से आभारी हैं।
ईश्वर आप सबको सदा सुख, शांति और सुरक्षा प्रदान करे —
और हनुमंत की पवित्र स्मृति
आपके स्नेह और आशीर्वाद के रूप में
हमारे जीवन में हमेशा यूँ ही बनी रहे।
सादर।

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