IIHC (مركز التراث الهندي الإسلامي)

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@IndoIslamicHC

Official A/C of Indo-Islamic Heritage Center 🇮🇳

New Delhi India 🇮🇳 Katılım Nisan 2022
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जहांगीर: न्याय की ज़ंजीर और कला का पारखी सम्राट ​"न्याय वह नींव है जिस पर साम्राज्य टिके होते हैं।" ​मुगल इतिहास में शहंशाह जहांगीर (सलीम) का व्यक्तित्व बड़ा ही अनूठा रहा है। जहाँ वे अपने पिता अकबर महान की विरासत को आगे बढ़ाने वाले एक शक्तिशाली शासक थे, वहीं वे अपनी न्यायप्रियता और प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम के लिए भी जाने जाते हैं। ​जहांगीर के शासनकाल की खास बातें: ​न्याय की ज़ंजीर (Zanjir-e-Adl): जहांगीर ने आगरा के किले में सोने की एक विशाल ज़ंजीर लगवाई थी। कोई भी फरियादी, चाहे वह कितना ही साधारण क्यों न हो, उस ज़ंजीर को खींचकर सीधे बादशाह से न्याय की गुहार लगा सकता था। ​कला और चित्रकला का स्वर्ण युग: जहांगीर को कला का इतना गहरा ज्ञान था कि वे किसी चित्र को देखकर बता सकते थे कि उसे किस चित्रकार ने बनाया है। उनके काल को 'मुगल चित्रकला का स्वर्ण युग' कहा जाता है। ​प्रकृति प्रेमी: उन्हें बाग-बगीचों और पशु-पक्षियों से बहुत लगाव था। श्रीनगर का प्रसिद्ध 'शालीमार बाग' आज भी उनके प्रकृति प्रेम की गवाही देता है। ​नूरजहाँ के साथ शासन: उनके जीवन में मलिका नूरजहाँ का गहरा प्रभाव था। वे इतिहास की सबसे शक्तिशाली महिलाओं में से एक बनीं, जिन्होंने शासन व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभाई। ​जहांगीर का काल वैभव, संस्कृति और न्याय के संतुलन का दौर था, जिसने भारतीय इतिहास और कला को नए आयाम दिए।
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भोपाल की महिला शासक नवाब सुल्तान जहां बेगम, विश्व इतिहास की पहली महिला हैं जो किसी यूनिवर्सिटी की इलेक्टेड चांसलर बनी। साल उन्नीस सौ बीस में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना के बाद उन्हें उसका पहला चांसलर बनाया गया।
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ये जहांगीर के ससुर और जोधपुर की राजकुमारी जगत गोसाईं के पिता राजा उदयसिंह की है। जगत गोसाईं, मुग़ल बादशाह शाहजहां की मां थीं। उदयसिंह ने जब अपनी बेटी की शादी अक़बर के बेटे जहांगीर के साथ तय की तो कल्याणदास राठौर ने इस शादी का विरोध किया था। लेकिन उदयसिंह को इस रिश्ते से कोई परहेज नही था क्योंकि जहांगीर खुद राजपूत राजकुमारी जोधाबाई के बेटे थे और राजपूताना तो मुग़लों का ननिहाल था। लेकिन दूसरे राठौर राजा इसके ख़िलाफ़ थे इस वजह से कल्याणदास ने उदय सिंह को क़त्ल करने की धमकी दी जिसकी वजह से राठौड़ वंश के दोनों राजाओ उदय सिंह और कल्याणदास के बीच जंग हुई जिसमें कल्याणदास, सिवाना के किले में मारे गए। 1586 में जहांगीर और राजकुमारी जगत गोसाईं की शादी फतेहपुर सीकरी में हुई।
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ये तस्वीर बैरम खान की है। वो शख़्स जिसने हुमायूँ की मौत के बाद हिन्दोस्तान में मुग़ल सल्तनत की बुनियाद को दोबारा यकीनी बनाया था। आज बैरम खां का ज़िक्र करने की एक खास वजह है, दरअस्ल आज के दिन ही 31 जनवरी 1561 में एक अफ़ग़ान सरदार ने गुजरात में बैरम खां का कत्ल कर दिया था। इस अफ़ग़ान सरदार के पिता को बैरम खान ने एक जंग में क़त्ल किया था। दरअस्ल बैरम खान शहंशाह अकबर के हुक्म से हज के सफर के लिए मक्का जा रहे थे। बैरम खान को मुग़ल बादशाह बाबर ने अपने बेटे हुमायूँ के साथ बेटे की तरह पाला था। बाद में बैरम खान ने अक़बर की अपने बेटे की तरह हिफ़ाज़त की और ज़िन्दगी भर साए की तरह हुमायूँ के दोस्त बन कर रहे। बैरम खान ही थे जिसकी वजह से मुगलों ने हेमू जैसे ताक़तवर राजा को हराकर वापस दिल्ली पर क़ब्ज़ा किया। बैरम खान हुमायूँ के साढ़ू, अकबर के मंत्री और अब्दुल रहीम खानेखाना के वालिद भी थे। बैरम खान ने मुगलों के लिए कई जंग फतह की। जब हुमायूँ ने चांपानेर (गुजरात) के क़िले पर घेरा डाला। किसी तरह से दाल ग़लती न देखकर चालीस मुग़ल जंगजू सीढ़ियों के सहारे क़िले में कूद गए, जिनमें बैरम ख़ाँ भी थे क़िला फ़तह कर लिया गया। शेरशाह से चौसा की जंग में लड़ते वक़्त बैरम ख़ाँ भी साथ ही थे। पानीपत के जंग में बैरम खान ही थे। कन्नौज की जंग में भी वही लड़े। इन सभी घटनाओं ने हुमायूँ और बैरम ख़ाँ को एक खास दोस्ती के बंधन में बाँध दिया था। आसान शब्दों मे कहे तो वो मुग़लो के कटप्पा थे जिसने अपनी सारी ज़िन्दगी एक वफादार बनकर उनकी हिफाज़त में गुज़ार दी।
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*रामपुर रियासत की स्थापना* चलो आज जिन नवाबों को बदनाम करके लोगों ने अपनी सियासी रोटियां सेंकी उन नवाबों के कार्य और इतिहास भी पढ़ लें जिन की बदोलत रामपूर का नाम इतिहास के पन्नों में अमर हो गया है रामपुर सन् 1742 से पूर्व रामपुर नाम से प्रसिद्ध नहीं था लेकिन इसके अन्तर्गत आने वाले सभी इलाकों पर नवाब अली मोहम्मद खाँ ने अपना अधिकार स्थापित किया तथा यह क्षेत्र रूहेलखंड रियासत का अंग बना। नवाब अली मोहम्मद की मृत्यु के पश्चात रूहेलखंड रियासत एकीकृत रूप में स्थापित नहीं रही। सन् 1752 में इस रियासत का अन्तिम रूप से बंटवारा हो गया। नवाब अली मोहम्मद खाँ के दो बेटों तथा अन्य रूहेला सरदारों में यह रियासत छोटे-छोटे भाग में विभाजित हो गई जिसके वह शासक बन गए। इसमें रामपुर, शाहबाद तथा छांछट का क्षेत्र नवाब फैज़ुल्लाह खाँ को प्राप्त हुआ। जो कि कई वर्षों तक बरेली में रहकर अपनी रियासत का प्रबंध करते रहे लेकिन बाद में उन्होंने शाहबाद को अपनी रियासत की राजधानी बनाया। सन् 1752 से सन् 1774 तक नवाब फैज़ुल्लाह खाँ रामपुर रियासत स्थापित होने से पूर्व भी यहाँ के नवाब थे। वर्ष 1774 ईं० में रूहेलों पर एक बड़ी विपत्ति आई। अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने अंग्रेज़ो से मिलकर रूहेलखंड पर आक्रमण कर दिया। इस समय हाफ़िज़ रहमत खाँ रूहेलों के सरदार थे, अन्य सभी सरदार मर चुके थे। उनकी सन्तानें रह गई थीं उनमें भी आपस में एकता नहीं थी तथा वह पहले की भांति शक्तिशाली भी नहीं थे। हाफ़िज़ रहमत खाँ तथा अन्य रूहेला शासकों ने शुजाउद्दौला का मुकाबला किया लेकिन जीत न सके और हार गए। पराजित होकर रूहेला पहाड़ की तरफ लाल डांग के स्थान पर कूच कर गए। शुजाउद्दौला ने उनका पीछा किया तथा अंग्रेजों के साथ लाल डांग पहुँच गया। दोनों ओर की सेनाएँ कुछ समय तक आमने-सामने डटी रहीं लेकिन फिर समझौता हो गया जो कि लाल डांग की संधि के नाम से जाना जाता है। 7 अक्तूबर 1774 को हस्ताक्षरित इस संधि के अनुसार नवाब फैज़ुल्लाह खाँ अपनी पहली जागीर के मालिक रहे। नवाब फैज़ुल्लाह खाँ युद्ध में बहादुरी से लड़े थे तथा उनमें रूहेलों को संगठित करने की योग्यता भी थी। इसलिए शुजाउद्दौला व अंग्रेज़ो ने शीघ्र ही यह संधि कर ली। संधि के पश्चात अब से नवाब फैज़ुल्लाह खाँ की रियासत रामपुर रियासत कहलायी। अब नवाब फैज़ुल्लाह खाँ की मौजूदा जागीर में शाहबाद, सरसावा (शीशगढ़) एवं चौमहला (बहेड़ी) के साथ कुछ और परगने आजोन (मीरगंज), राजपुर (बिलासपुर), ठाकुरद्वारा (मुरादाबाद), सरखड़ा (थाना मूण्डा पाण्डे इलाका मुरादाबाद, कावर (शेरगढ़ जिला बरेली), रेहड़ (काशीपुर) रिठौडा सम्मिलित कर दिये तथा नवाब अली मोहम्मद खाँ के शेष परिवार की परवरिश की ज़िम्मेदारी भी उन्हीं को सौंप दी गई। सन् 1752 ई० में रियासत विभाजन में हाफिज रहमत खां ने नवाब फैज़ुल्लाह खां को जो क्षेत्र दिया था वह 4-5 लाख की सालाना आमदनी का था। इतनी ही आमदनी का इलाका नवाब अब्दुल्ला खां को दिया था। इसके अतिरिक्त आठ लाख की राशि नवाब सादुल्ला खां को तथा उनके मरने के बाद उनकी बेगम को ढाई लाख रुपया दिए जाते थे। यह रकम बीस लाख रुपयों से ज्यादा होती थी। अब इन सबकी परवरिश के भार के साथ जो क्षेत्र नवाब फैज़ुल्लाह खां को दिया गया था वह पौने पंद्रह लाख रुपया की आमदनी का था जिसमें पांच हज़ार फौज रखने के खर्चे भी सम्मिलित थे। नवाब फैज़ुल्लाह खां ने न सिर्फ अपने रिश्तेदारों का भार उठाया बल्कि दूंदे खां की औलाद व अहमद खां बख्शी की औलाद तथा अहमद खां ख़ानसामा के वज़ीफे भी मुक़र्रर किये। दूंदे खां की औलाद में अज़ीमुल्ला खां तथा उनकी बहिन बेगम सादउल्ला खां रामपुर में आ गईं थीं। अहमद खाँ खानसामा तथा अहमद खाँ बख्शी भी रामपुर आ गए थे। हाफ़िज़ रहमत खाँ के छोटे बेटे अकबर खाँ तथा इनायत खाँ की बेगम भी रामपुर में आकर बस गई। इनके वज़ीफे भी नवाब फैज़ुल्लाह खाँ ने मुकर्रर कर दिए। क्योंकि अब रामपुर को छोड़कर पूरे रूहेलखंड पर नवाब अवध का अधिकार था अतः अन्य रूहेले भी अधिकतर रामपुर आकर बस गए। प्रारम्भ में नवाब फैज़ुल्लाह खाँ शाहबाद में रहे और उन्होंने नई राजधानी के लिए अपने भतीजे मुस्तफा खाँ की अध्यक्षता में एक कमीशन नियुक्त किया। तब कुछ माह बाद रामपुर को अपनी रियासत की राजधानी बनाया था इसका नाम मुस्तफाबाद रखा। जिस जगह नवाब साहब ने अपनी रियासत की राजधानी स्थापित की वहाँ उस समय घाटमपुर, डोंगरपुर, ठोटर, रम्पुरा प्रमुख रूप से आबाद थे तथा रम्पुरा अथवा रामपुर नाम प्रचलित था। नया नाम मुस्तफाबाद जनता की जुबान पर न चढ़ सका और रामपुर नाम ही प्रसिद्ध हुआ तथा रियासत भी रामपुर रियासत (स्टेट) प्रख्यात हुई।
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हमीदा बानो बेगम कौन थी हमीदा बानो बेगम (1527-1604) मुग़ल बादशाह हुमायूँ की पत्नी और महान मुग़ल सम्राट अकबर की माँ थीं। उन्हें 'मरियम मकानी' के नाम से भी जाना जाता है। फारसी मूल की हमीदा ने निर्वासन के कठिन समय में हुमायूँ का साथ दिया और अकबर के शासनकाल में भी एक प्रभावशाली महिला के रूप में अपनी भूमिका निभाई। मूल परिवार वह फारसी विद्वान शेख अली अकबर जामी की बेटी थीं। हुमायूँ से विवाह 1541 में 14 वर्ष की आयु में उनका विवाह हुमायूँ से हुआ। उन्होंने ही 1542 में अमरकोट में अकबर को जन्म दिया था, जब हुमायूँ निर्वासन में था। उन्होंने मुगल साम्राज्य में एक ताकतवर महिला (मरियम मकानी) के रूप में अहम योगदान दिया और अकबर के शासनकाल में भी सक्रिय रहीं। उन्होंने नई दिल्ली में हुमायूँ के प्रसिद्ध मकबरे के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
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MSO OF INDIA@msoofindia·
हज़रत अमीर ख़ुसरो रहमतुल्लाह अलैह के उर्स पर मुबारकबाद हज़रत अमीर ख़ुसरो रहमतुल्लाह अलैह ने इस्लाम के पैगाम को सूफियाना अंदाज मे में फैलाया जिसके ज़रिये मोहब्बत, इंसानियत और अक़ीदा ए अहले सुन्नत को बढ़ावा मिला आप हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया रहमतुल्लाह अलैह के अज़ीज़ शागिर्द थे और उनकी तालीमात को आम करने में आपका अहम किरदार रहा। आज के इस मुबारक दिन पर हम दुआ करते हैं कि अल्लाह तआला हमें भी उनके बताए हुए रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ अता फरमाए।
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3 अप्रैल 1325 ई. (18) रबी अल थानी 725 हिजरी) की सुबह 86 से 87 साल की उम्र में दिल्ली के मशहूर सूफी हजरत निजामुद्दीन औलिया की वफात हुई थी। 14वीं सदी के इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी का दावा है की दिल्ली के लोगों पर इनका असर इस कदर था की दुनियावी मुआमलात की तरफ से लोगों के नुक्तए नजर में एक मिसाली तब्दीली वाक्या हुयी लोग तसौउफ और नमाज की तरफ माएल होने लगे और दुनिया से दूर रहने लगे थे। हजरत निज़ामुद्दीन औलिया की पैदाइश उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में हुयी थी। महज पांच साल की उम्र में, अपने वालिद सैयद अब्दुल्ला बिन अहमद अल हुसैनी बदायुनी की वफ़ात के बाद, वह अपनी मां बीबी जुलेखा के साथ दिल्ली आ गए थे। उनकी बायोग्राफी का जिक्र आइन-ए-अकबरी में मिलता है, जो मुगल शहंशाह अकबर के वज़ीर, अबुल-फ़ज़ल इब्न मुबारक द्वारा लिखी गयी 16वीं सदी की एक किताब है। बीस साल की उम्र में, निजामुद्दीन औलिया अजोधन (मौजूदा पाकिस्तान में पाकपट्टन शरीफ) गए और सूफी संत फरीदुद्दीन गंजशकर के शागिर्द बन गए, जिन्हें आमतौर पर बाबा फरीद के नाम से जाना जाता है। निजामुद्दीन औलिया ने अजोधन में रिहाईश इख़्तियार नहीं की, लेकिन दिल्ली में अपनी तालीम को जारी रखा और साथ ही साथ सूफी अकीदत का आगाज किया। वह हर साल रमजान-उल मुबारक का महीना बाबा फरीद की बारगाह में गुजारने अजोधन जाते थे। अजोधन का उनका तीसरा दौरा था, जब बाबा फरीद ने उन्हें अपना जानशीन बनाया था। इसके कुछ अरसे बाद जब निजामुद्दीन औलिया दिल्ली आये तो उन्हें खबर मिली की बाबा फरीद का इंतकाल हो गया है। निज़ामुद्दीन औलिया दिल्ली के मुख्तलिफ मुक़ामात पर रहते हुए आखिरकार गियासपुर में आबाद हो गए। शहर के हंगामों से दूर उन्होंने यहां अपना खानकाह बनवाया, एक ऐसी जगह जहां हर तबके के लोगों को खाना खिलाया जाता था। यहां वो लोगों को रूहानी तालीम भी देते थे। बहुत जल्द ये खानकाह एक ऐसी जगह बन गयी जहां अमीर-गरीब हर तरह के लोगों का हुजूम रहने लगा। उनके कई शागिर्दों ने रूहानी उरूज हासिल किया जिनमे शेख नसीरुद्दीन चिरागे देहलवी और अमीर खुसरो (एक नामवर आलिम, गायक और दिल्ली सलतनत के शाही शायर) शामिल हैं। आज की तारिख में इनकी मजार, निजामुद्दीन दरगाह, दिल्ली में मौजूद है। असल में इस इलाके को पहले गयासपुर के नाम से जाना जाता था लेकिन हजरत के आबाद होने के बाद से इलाका उनके ही नाम पर आबाद हो गया। दरगाह के सफेद गुंबद व मरकजी ढांचे की तामीर उनकी वफ़ात के बाद मुहम्मद बिन तुग़लक़ ने करवाई थी। फ़िरोज़ शाह तुगलक ने बाद में इस ढांचे की मरम्मत की और गुंबद के चारों तरफ से चार सुनहरी प्यालियों को हटा दिया। हैदराबाद के खुर्शीद जाह ने कब्र के चारों ओर संगमरमर का कटघरा तोहफे में दिया था। मौजूदा गुम्बद फरीदुन खान ने 1562 में तामीर करवाया था।
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सुल्तान शमशुद्दीन इल्तुतमिश की रेहल इसी रेहल पर रख कर वो क़ुरआन की तिलावत किया करते थे। आज की तारीख में ये सालार जंग म्यूज़ियम हैदराबाद में मौजूद है। तारीखी दस्तावेजों से मालूम होता है की शमशुद्दीन इल्तुतमिश एक मुत्तक़ी मुसलमान थे जिन्होंने रात को अपना ज्यादातर वक्त इबादत में गुजारा था। उनकी वफात के बाद उन्हें मेहरौली में कुतुबमीनार के करीब दफन किया गया था। जहां कुरानी आयतों से सजा हुआ उनका खूबसूरत मकबरा बना हुआ है। उनके दरबारी शायर अमीर रूहानी ने उन्हें मुकद्दस जंगजू और ग़ाज़ी के तौर पर बयां किया है।
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हैदराबाद हाईकोर्ट , हैदराबाद के निज़ाम मीर उस्मान अली खान ने अपनी रियासत की अदालत के लिए इसकी तामीर करवाई थी। यहां पर कभी मुहम्मद कुली कुतुब शाह का हिना महल हुआ करता था, जिसे बाद में दोबारा तामीर करके निज़ाम मीर उस्मान अली ने कोर्ट में तब्दील कर दिया। आज यह तेलंगाना हाई कोर्ट के नाम से जाना जाता है।
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चीन की ज़ियान मस्जिद- ये चीन की मशहूर ज़ियान मस्जिद है जो 742 ईसवी में चीनी पगोडा की शक्ल की बनाई गई। दुनिया में ये अकेली ऐसी मस्जिद है जिसमें चीनी भाषा में अजा़न दी जाती है। ये अरबी व्यापारियों के यहां की चीनी लडकियों से शादी करने के बाद वजूद में आयी थी। चीन में इस वक्त लगभग 128 मिलियन मुसलमान रहते हैं। #China #Muslim #MuslimInChina
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औरंगज़ेब का निधन अहमदनगर में हुआ था लेकिन उन्हें 136 किमी दूर क्यों दफनाया गया? दर असल औरंगज़ेब ने अपनी वसीयत में इच्छा जताई थी कि उन्हें सूफी संत जैनुद्दीन शिराजी की दरगाह के पास दफन किया जाए इसी वजह से, उनकी मौत के बाद उनके शव को अहमदनगर से 136 किलोमीटर दूर खुल्दाबाद ले जाया गया और वहीं दफनाया गया कहा जाता है कि खुल्दाबाद का नाम उनके सम्मान में प्रसिद्ध हुआ, और यह भी माना गया कि मौत के बाद उनका निवास स्वर्ग में है औरंगज़ेब की कब्र बेहद साधारण है कहा जाता है कि उन्होंने अपनी कब्र के लिए सिर्फ 14 रुपये 12 आने खर्च किए थे, जो उन्होंने अपने आखिरी समय में टोपियां बुनकर कमाए थे Archaeological Survey of India (ASI) के अनुसार, कब्र का जो प्रवेश द्वार और गुंबद वाला बरामदा है , वह 1760 में जोड़ा गया था कब्र के ऊपर केवल मिट्टी है और एक छोटा सा हरा पौधा सबसे खास बात यह है कि यह कब्र खुली छत के नीचे है 1707 में जब औरंगज़ेब की मौत हुई , तो यह भारतीय इतिहास का एक बड़ा मोड़ साबित हुआ #Aurangzeb
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मुग़ल बादशाह अकबर ने 27 अगस्त 1598 को एक फ़रमान जारी कर मथुरा के मंदिर के सेवक गोबिंद राय को 135 बीघा ज़मीन के अनुदान दिया, जो सभी प्रकार के करों से मुक्त है। ठीक ऐसे कई फ़रमान औरंगज़ेब ने भी जारी किया था।
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Zakir Ali Tyagi
Zakir Ali Tyagi@ZakirAliTyagi·
International Forum Raises Voice for Minority Communities in Pakistan United Nations से जुड़े मंचों पर अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर बढ़ती चर्चा यह दर्शाती है कि धार्मिक समानता और सामाजिक न्याय आज विश्व स्तर का विषय बन चुके हैं। पाकिस्तान में विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों के सामने आने वाली चुनौतियों को प्रदर्शनी के माध्यम से प्रस्तुत कर यह संदेश दिया गया कि मानवाधिकारों के प्रश्न सीमाओं से परे हैं। किसी भी समाज की प्रगति तभी संभव है जब हर नागरिक को समान सम्मान, सुरक्षा और स्वतंत्रता प्राप्त हो। यही लोकतांत्रिक मूल्यों की वास्तविक पहचान है। youtu.be/_6wC5mtBiC4
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क्या आपको मालूम है कटिहार से कांग्रेस सांसद तारिक़ अनवर और 1979 में ईरान में हुई इस्‍लामिक क्रांति के नायक आयतुल्लाह रूहुल्लाह ख़ुमैनी एक ही परिवार से ताल्लुक़ रखते हैं?? अधिकतर न्यूज़ रिपोर्ट के हिसाब से {जिसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है} ये बात कही जाती है कि ईरान में हुई इस्‍लामिक क्रांति के नायक आयतुल्लाह रूहुल्लाह ख़ुमैनी के दादा सैयद अहमद मूसवी यूपी के बाराबंकी ज़िला के गांव किंतूर के रहने वाले थे। और वहीं से 19वी सदी में हिजरत कर ईरान चले गए थे। लेकिन ये बात कम लोगों को मालूम है कि तारिक़ अनवर का परिवार तुग़लक़ दौर में यूपी के बाराबंकी ज़िला के गांव किंतूर से हिजरत कर बिहार के अरवल ज़िले के शाही मुहल्ले में आबाद हुआ था। जहाँ सबसे पहले मख़दूम शाह शमशुद्दीन अरवली किंतूरी आबाद हुए। बाद में उनके भाई शाह ख़लीलउद्दीन यहाँ बसे, जिनसे पूरे अरवल का वो ख़ानवादा बढ़ा जिससे तारिक़ अनवर ताल्लुक़ रखते हैं। असल में, ख़्वारिज़्म सल्तनत के दौर में, ये ख़ानदान ईरान के निशापुर में आबाद था, लेकिन मंगोल चंगेज़ ख़ान के हमले के दौरान वो सल्तनत ख़त्म हो गई। फिर इन लोगों को भारत जाने की बशारत हुई। ये लोग ख़ुरासान होते भारत आ गए, उस ज़माने में दिल्ली में ममलूक सल्तनत की हुकूमत थी, उन्होंने इनका इस्तक़बाल किया और उनके ठहरने का इंतज़ाम दिल्ली में किया। लेकिन इस ख़ानवादे ने बशारत का हवाला देकर रुकने से इंकार कर दिया। फिर बाराबंकी ज़िले के बड़ो सराय में रुके, और फिर किंतूर में अपना डेरा डाला। यहाँ उनके लिए उस वक़्त के हाकिम ने गढ़ तामीर करवाया। और यहीं मख़दूम शमशुद्दीन किंतूरी 695 यानी 1295 में पैदा हुए, और बालिग़ होते ही घर छोड़ कर अकेले सुकून की तलाश में निकल पड़े और अलग अलग जंगल में इबादत करते हुए, पहले मनेर शरीफ़ और फिर बिहार शरीफ़ पहुँचे। वहीं बिजवन पर शाह तैमुल्लाह सुफ़ैदबाज़ के ख़िदमत में पहुँचे। उन्होंने मख़दूम शमशुद्दीन को पीर सम्मन का ख़िताब दिया और मख़दूम उल मुल्क शेख़ शरफ़ुद्दीन अहमद यहिया मनेरी की शागिर्दी में दे दिया। जब ख़िलाफ़त बँटने लगी तो मख़दूम शाह शमशुद्दीन किंतूरी को अरवल की विलायत मिली, वहीं इबादत के दौरान एक पेड़ के डाल को पकड़ कर एक लंबे अरसे तक खड़े रह गए यहाँ तक कि उनके बदन का एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह बालू से ढक गया। इधर किंतूर में घर वाले मख़दूम शमशुद्दीन की तलाश में निकले हुए थे, पता लगाते हुए जब उनके चचा बिहार शरीफ़ पहुंचे तो वहाँ लोगों ने बताया कि शमशुद्दीन नाम के एक पीरज़ादे को अरवल की विलायत मिली है, जो सोन नदी के किनारे है। पता लगते हुए अरवल पहुँचे, वहाँ के लोगों ने बताया कि एक बाबा वहाँ हैं जिन्होंने समाधि ले लिया है, इस लिए डर से कोई उधर जाता नहीं है। चचा जब वहाँ पहुँचे तो पहचाने नहीं, लेकिन देखा कि साँस चल रही है। तो बालू हटाना शुरू किया, जब बालू कमर से नीचे आ गया था, तो अंदाज़न आवाज़ दिया “बेटा शमशुद्दीन सतर ढाँपो”, तो होश में आ गए और चचा को पहचान लिया। और फिर कहा कि “शमशुद्दीन ने तो क़यामत तक के लिए ढाँप लिया था, आपने बरहना कर दिया - शमशुद्दीन के पास है क्या, नीचे शमशुद्दीन, और ऊपर उसका ख़ुदा”! फिर चचा ने लंगोट दिया, बाँधो। लंगोट बाँधते हुए कहा कि “चचा इंशाल्लाह अब ता क़यामत तक नहीं खुलेगा” तब चचा ने कहा कि ऐसा ना कहो, निकाह रसूल की सुन्नत है, तुम्हारा ख़ानदान कैसे चलेगा? तुम्हारा चिराग़ कौन जलायेगा? तब इशारा करते हुए कहा कि “औलाद ख़लीलउद्दीन से, नाम मेरा।” यानी ख़लीलउद्दीन से औलाद होगी और नाम मेरा चलेगा। चचा के समझाने पर भी मख़दूम शमशुद्दीन अरवली किंतूर जाने को तैयार नहीं हुए, की मैं उस गढ़ में नहीं जाऊँगा जो अवाम के ख़ून को निचोड़ कर बनाई गई है। चचा ने ख़बर किंतूर भिजवाया, तो छोटे भाई शाह ख़लीलउद्दीन जो उस वक़्त 18 साल के थे भाई को लेने पहुँचे। तो चचा ने मिलवाया, की ये तुम्हारे भाई हैं। फिर भी मख़दूम शमशुद्दीन अरवली किंतूर जाने को तैयार नहीं हुए, तो शाह ख़लीलउद्दीन ने कहा के अगर भैया नहीं जाएँगे तो हम भी नहीं जाएँगे। तो उन्होंने कहा की मत जाओ। इस तरह से शाह ख़लीलउद्दीन भी किंतूर से अरवल में आबाद हो गए और उन्ही की औलाद बहुत फली फूली, जिसमे एक ख़ानदान ख़ुद तारिक़ अनवर का है, उनके परदादा शाह अशफ़ाक़ मजिस्ट्रेट थे, दादा बैरिस्टर शाह ज़ुबैर कौंसिल स्टेट के मेंबर थे, वालिद शाह मुश्ताक़ विधायक और ख़ुद तारिक़ अनवर कई टर्म MP रहे हैं। वैसे मैंने अरवल खनक़ाह के सज्जादानशी का एक इंटरव्यू लिया था, लिंक कमेंट बॉक्स में डाल दिया है, वो काफ़ी डिटेल में बता रहे हैं। जिसमें वो कयालगढ़, अरवल के भूमिहार राजा तिलक चौधरी के इस्लाम क़बूल करने के क़िस्से पर भी रौशनी डाल रहे हैं। Via - Lost Muslim Heritage of Bihar
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यूँ तो देखा गया है की हर एक मुग़ल हुक्मरानों से सभी हिंदुस्तानी त्योहार बहुत ही धूम-धाम से मनाया लेकिन औरंगज़ेब आलमगीर की हुकूमत के दौरान कुछ त्योहारों पर थोड़ी लगाम लग गयी, उसके कुछ कायदे तय कर दिए गए उसकी ढेरों वजहें थी खैर उस पर फिर कभी बात होगी। औरंगज़ेब से पहले के सभी मुग़ल हुक्मरानों ने रमजान और ईद से ज़्यादा शान ओ शौकत से नौरोज़ को त्यौहार को मनाया था। लेकिन औरंगज़ेब ने हुकूमत सँभालने के बाद दोनों ईदों और रमजान को नवरोज़ से ज़्यादा शान शौकत से मनाना शुरू किया। ईद-उल फ़ित्र का महत्व इसलिए भी अधिक हो गया कि उनकी ताजपोशी उसके आसपास हुई थी यानी रमज़ान में। औरंगज़ेब ने अपनी ताजपोशी के जश्न को ईद तक बढ़ाकर दोनों को मिला दिया था। औरंगज़ेब नमाज़ पढ़ने और रोज़ा रखने में पूरी पाबंदी करते थे। हमेशा बा-जमात नमाज़ अदा करते, रमज़ान में तरावीह पर ख़ास ध्यान देते और रमज़ान के आख़िरी अशरे (आखिरी नौ-दस दिन) में एतकाफ़ करते (दिन-रात मस्जिद में रहते) इसके अलावा उन्होंने रमज़ान के दिनों में इफ़्तार के आयोजन को ज़्यादा तवज्जो दी। उस दौर में हिंदुस्तान आये एक फ़्रांसिसी यात्री फ्रांस्वा बर्नियर ने अपनी किताब Travels in the Mogul Empire में लिखा है की, औरंगज़ेब दिल्ली पहुंचे तो जून का महीना था और बहुत गर्मी पड़ रही थी। औरंगज़ेब ने इस गर्मी में रमज़ान के पूरे रोज़े रखे। वह रोज़े के बावजूद सारे हुकूमती काम करते। शाम होती तो रोज़ा इफ़्तार करते। इफ़्तार में वह ज्वार और मकई की रोटी खाते, फिर तरावीह पढ़ते और रात का अधिकतर हिस्सा इबादत में गुज़ारते। औरंगज़ेब के बाद मुग़ल हुकूमत रफ्ता-रफ्ता ख़त्म ही होती गई, बावजूद इसके आख़िरी मुग़ल बादशाह जो की अंग्रेज़ों के वज़ीफ़े पर चलते थे उनकी हुकूमत में भी रमज़ान का आयोजन धूमधाम से होता था। चांद नज़र आने पर जो नज़ारा होता था उसका हाल मुंशी फ़ैज़ुद्दीन देहलवी अपनी किताब 'बज़्म-ए-आख़िर' में कुछ इस तरह से लिखते हैं: "सभी बेगम, हरमें (सेविकाएं और बीवियां), तेज़-तर्रार औरतें, ज़नानख़ाने में रहने वालियां, पैर दबाने वालियां, गाने वाली औरतें, शाहज़ादे, शाहज़ादियां, मुबारकबाद देने को आईं। ताशे, बाजे, रौशन चौकी (बादशाह की सवारी के साथ चलते बाजे वाले), नौबत ख़ाने वालियां मुबारकबाद बजाने लगीं." यह मुबारकबाद इकतरफ़ा नहीं होती। बादशाह के यहां से पनीर और मिस्री सबको बांटी गई। #ramadankareem #ramzanspecial #mughalempire #aurangzeb #ramazan
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अहमदाबाद शहर में स्वामी विवेकानंद रोड पर मौजूद इस बुर्ज का नाम मानेक बुर्ज है जहां आज के दिन ही 26 फरवरी 1411 ई. को जुमेरात के दिन जोहर की नमाज़ के बाद 1:30 बजे दोपहर में सुल्तान अहमद शाह ने अहमदाबाद शहर की बुनियाद रखी थी, लेकिन 1999 में जब इससे सटे हुए पुल की तामीर की गयी तो 53 फिट ऊँचे इस बुर्ज का एक हिस्सा तोड़ दिया गया, लेकिन इस बुर्ज का आधा हिस्सा खंडहर की शक्ल में अब भी मौजूद है। शुरुआत में अहमदाबाद सिर्फ 10 किमी के एरिया में ही था जो चारो तरफ एक दीवार से घिरा था। मुग़ल सल्तनत में शहर का दायरा बढ़ाया गया। शहर आबाद होने के बाद अहमदाबाद की सरज़मी पर सैकड़ो जंग लड़ी गयी। चंपानेर की जंग के बाद 1535 में हुमायूं ने कुछ समय के लिए इस शहर पर राज किया। मुग़ल बादशाह अक़बर ने दोबारा इस शहर को फ़तह किया। अक़बर के शासन में ये शहर बहुत फला फूला और भारत का एक बड़ा व्यापार केंद्र बना दिया बड़े लेवल पर भारत से यूरोप में कपड़ा एक्सपोर्ट होने लगा जिससे अहमदाबाद काफी सम्पन्न हो गया। इसके बाद 1686 तक शाहजहां ने और उसके बाद औरंगजेब ने इस शहर में काफी वक़्त बिताए। अहमदाबाद 1758 तक मुग़लो के पास रहा। मुग़लों के बाद इस शहर पर मराठा और पेशवाओं का शासन रहा और उसके बाद भारत आज़ाद होने तक यहां अंग्रेजों का शासन रहा।
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हरियाणा राज्य के फर्रुखनगर में मौजूद इस मस्जिद की तामीर मुग़ल गवर्नर फौजदार खान ने 1732 ई. में करवाई थी फर्रुखनगर मुग़ल बादशाह फर्रुखसियर के दौर-ए-हुकूमत में उन्हीं के नाम पर बसाया गया था, और फौजदार खान फर्रुखनगर के पहले नवाब थे। इस मस्जिद की अब एक मीनार नहीं रही और दूसरी आधी रह गयी है। बंटवारे के बाद फर्रुखनगर से बड़ी तादाद में मुसलमानों का पलायन हुआ जिसके बाद मस्जिद को मंदिर और गुरुद्वारे में तब्दील कर दिया गया।
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आज के दिन ही, 20 फरवरी 1258 को, मंगोल फौज के हाथों बगदाद फतह हो जाने के बाद हलाकू खान के हुक्म पर अब्बासी खलीफा अल-मुस्तसिम बिल्लाह को कत्ल कर दिया गया था। अल-मुस्तसिम ने 5 दिसंबर 1242 से 20 फरवरी 1258 तक 15 साल, 2 महीने और 15 दिनों तक हुक्मरानी की थी। ऐसा माना जाता है कि मंगोल शाही खून नहीं बहाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने खलीफा को एक कालीन में लपेट कर घोड़ों से कुचलवा दिया था। 10 फरवरी को बगदाद फतह करने के बाद मंगोलों ने बगदाद पर खूब कहर बरपा किया इमारतों को और Bayt al-Ḥikmah/House of Wisdom में रखी लाखों किताबों को आग के हवाले कर दिया गया। इसके अलावा इतनी ज्यादा संख्या में लोगों का क़त्ल हुआ की दजला नदी का पानी लाल हो गया। मंगोलों ने खलीफा अल-मुस्तसिम बिल्लाह को गिरफ्तार कर लिया। मार्को पोलो अपनी किताब The Travels of Marco Polo में लिखता है - खलीफा के पास से खजाने का ज़खीरा मिलने के बाद, जो उसकी सल्तनत की दिफ़ा (रक्षा) के लिए खर्च किया जा सकता था। हलाकू खान ने उसे बिना खाना या पानी के खलीफा के खजाने के कमरे में बंद कर दिया, और उससे कहा, "अपने खजाने को जितना खा सकते हो खाओ, क्योंकि तुम इसे बहुत पसंद करते हो।" इसके कुछ दिनों बाद 20 फरवरी को खलीफा को हलाकू खान के हुक्म पर एक कालीन में लपेट कर घोड़ों से कुचलवा दिया गया था।
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