

Mukesh
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@Journomukesh
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माननीय कॉक्रोस्टिस महोदय, आपको 'माननीय' लिखते हुए उंगलियाँ थोड़ी झिझक रही हैं। वजह यह नहीं कि कुर्सी छोटी है, वजह यह है कि कुर्सी इतनी बड़ी हो चुकी है कि शायद उस पर बैठा आदमी नीचे खड़े लोगों की चीखें सुन ही नहीं पाता। इंसाफ़ पाने के लिए शायद अब जमीन से कुर्सी तक लिफ्ट लगाए जाने की जरूरत है। आपको पत्र लिखना थोड़ा कठिन काम है। इसलिए नहीं कि शब्द नहीं मिलते, बल्कि इसलिए कि इस देश में अब न्याय पर बात करते समय लोग पहले कमरे का दरवाज़ा बंद करते हैं, फिर फुसफुसा कर बोलते हैं। लोकतंत्र में नागरिकों का यह सावधान स्वर शायद अदालतों की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। कहा जाता था कि अदालत आख़िरी उम्मीद होती है। लेकिन अब लगता है कि उम्मीद भी पहले वकील करती होगी, फिर तारीख़ लेती होगी, फिर थककर रिकॉर्ड रूम के किसी कोने में बैठ जाती होगी। कभी सुना था कि न्यायपालिका लोकतंत्र की प्रहरी होती है। अब लगता है प्रहरी तो है, मगर शायद वीआईपी ड्यूटी पर लगी हुई है। आम आदमी दरवाज़े पर खड़ा रहता है और भीतर से आवाज़ आती है, “लिस्टेड नहीं है।” प्रिय कॉक्रोस्टिस महोदय, आपकी अदालतें बड़ी अद्भुत जगह हैं। किसी मामले में रात दो बजे सुनवाई हो जाती है, और किसी में पीढ़ियाँ बूढ़ी हो जाती हैं। शायद न्याय भी अब इमरजेंसी और नॉन-इमरजेंसी पैकेज में आने लगा है। गरीब आदमी का मामला साधारण डाक से चलता है, और सत्ता से जुड़ी फाइलें शायद ब्लू टिक वाले व्हाट्सऐप की तरह सीधे स्क्रीन पर चमक उठती हैं। अदालत भावनाओं से नहीं चलती। बिल्कुल सही बात है। अगर भावनाओं से चलती तो शायद किसी माँ की चीख़, किसी बेरोज़गार की टूटती उम्मीद, किसी जेल में बंद व्यक्ति की घुटन, किसी पत्रकार की खामोशी... इनमें से कुछ तो सुनाई देता। लेकिन अदालतें तो सिद्धांतों से चलती हैं... और सिद्धांत भी इतने ऊँचे कि आम आदमी उन्हें देखने के लिए गर्दन ऊपर करते-करते सर्वाइकल का मरीज बन जाए। और क्या शानदार व्यवस्था बनाई है आपने! जनता वोट देकर सरकार चुनती है, फिर सरकार अपने मित्र पूंजिपतियों के हक़ में फैसले लेती है, फिर जनता अदालत जाती है, फिर अदालत कहती है हम नीति में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। यानी जनता अंत में वहीं खड़ी रह जाती है जहाँ से चली थी। इसे ही शायद संवैधानिक चक्रव्यूह कहते होंगे। प्रिय कॉक्रोस्टिस महोदय, आपकी न्याय की कुर्सी इतनी पवित्र बना दी गई है कि उसके बारे में सवाल पूछना भी लगभग सांस्कृतिक अपराध हो गया है। मानो किसी प्राचीन मंदिर की मूर्ति हों। फर्क सिर्फ इतना है कि मंदिरों में कभी-कभी प्रसाद तो मिल जाता है... लेकिन आपके यहाँ मिलती है अगली तारीख़। आपके हर बड़े फैसले के बाद न्यूज़ चैनल का एंकर चीख़ता है, लोकतंत्र की जीत! अब जनता कन्फ्यूज़ है कि लोकतंत्र इतनी बार जीत कैसे जाता है जबकि उसकी हालत हर साल और दयनीय होती जा रही है। इतिहास बड़ा बेरहम होता है, कॉक्रोस्टिस महोदय। वह यह नहीं देखता कि आदेश कितने पन्नों का था। वह सिर्फ यह देखता है कि जब नागरिक डर रहा था तब अदालत उसकी ढाल बनी या दर्शक दीर्घा में बैठकर प्रक्रिया समझाती रही। फिर भी लोग अदालत की तरफ देखते हैं। क्योंकि इस देश में उम्मीद मरती नहीं, बस तारीख़ पर चली जाती है। आपका, वही आम नागरिक 'ऑर्डर रिज़र्व्ड' शब्द सुनकर जिसके दिल की धड़कन बढ़ जाती है...!! सौजन्य:- @ManojAbhigyan @RahulGandhi @Dr_MonikaSingh_ @garrywalia_ @sakshijoshii @Rashmi22302711 @AnumaVidisha @RuchiraC @maulinshah9 @Iam_MKharaud @Kumarjyoti49291 @GoIShadow @sudhirchaudhary @AMISHDEVGAN @anjanaomkashya @RubikaLiyaquat @chitraaum @RajatSharmaLive @AwasthiGyyan @PMNehru @RaGa4India @Raga3689 @Pawankhera @SupriyaShrinate


















जमवारामगढ़, जयपुर के बिवाल परिवार ने जिस ऋषि के लिए नीट का पेपर खरीदा, उसकी 12th की मार्कशीट देखिए। सेकंड डिवीजन बाय ग्रेस पास है। थ्योरी के 56 नंबर के पेपर में फिजिक्स में 9, केमिस्ट्री में 15 और बायोलॉजी में 20 नंबर आए हैं। यदि भांडा नहीं फूटता तो इसके नीट में 600+ नंबर आते और इसे आसानी से सरकारी मेडिकल कॉलेज में एडमिशन मिल जाता।



#WATCH | Delhi: Union Minister for Petroleum and Natural Gas, Hardeep Singh Puri, says, "... If you look at the fiscal situation, if you look at the fact that my oil companies are losing Rs 1,000 crores every day, the under recovery is going to be Rs 1,98,000 crores. The losses are Rs 1 lakh crore, if you look at the quarter. In that context, how long can you keep it like this? Where is the oil? It used to be around $64 or $65. It has gone up to $115 in that basket..."


